भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 663

विष्णुपर्व ] सप्ताधिकशततमोऽध्यायः ६४१


नमः शत्रुविनाशिन्यै नमो गौर्यै शिवप्रिये।
नमस्ये शुम्भमथनीं निशुम्भमथनीमपि ॥ ७ ॥
शत्रुओंको नष्ट करनेवाली गौरीदेवीको बारंबार प्रणाम है। शिवप्रिये ! शुम्भ दैत्यको मथ डालनेवाली और निशुम्भ-को भी रौंदनेवाली आपको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ७ ॥

कालरात्रि नमस्तुभ्यं कौमार्यै च नमो नमः।
कान्तारवासिनीं देवीं नमस्यामि कृताञ्जलिः ॥ ८ ॥
कालरात्रि ! आपको प्रणाम है। कौमारी शक्तिरूपा आपको बारंबार नमस्कार है। मैं कान्तारवासिनी देवीको हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ ॥ ८ ॥

विन्ध्यवासिनीं दुर्गघ्नां रणदुर्गा रणप्रियाम् ।
नमस्यामि महादेवीं जयाँ च विजयां तथा ॥ ९ ॥
मैं विन्ध्याचलमें निवास करनेवाली, विपत्तियोंको नष्ट करनेवाली, रणचण्डी, रणप्रिया, जया और विजया नामवाली महादेवीको प्रणाम करता हूँ ॥ ९ ॥

अपराजितां नमस्येऽहमजितां शत्रुनाशिनीम् ।
घण्टाहस्तां नमस्यामि घण्टामालाकुलां तथा ॥ १० ॥
मैं किसीसे पराजित न होनेवाली, शत्रुओंकी विनाश-कारिणी अपराजिता देवीको प्रणाम करता हूँ। घण्टाओंकी मालाओंसे व्याप्त और हाथमें घण्टा धारण करनेवाली देवीको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ १० ॥

त्रिशूलिनीं नमस्यामि महिषासुरघातिनीम् ।
सिंहवाहां नमस्यामि सिंहप्रवरकेतनाम् ॥ ११ ॥
मैं महिषासुरका संहार करनेवाली त्रिशूलधारिणी देवीको नमस्कार करता हूँ। सिंहपर सवार होनेवाली और सिंहके चिह्नसे अलंकृत श्रेष्ठ ध्वजावाली देवीको मैं प्रणाम करता हूँ ॥

एकानंशां नमस्यामि गायत्रीं यज्ञसत्कृताम् ।
सावित्रीं चापि विप्राणां नमस्येऽहं कृताञ्जलिः ॥ १२ ॥
रक्ष मां देवि सततं संग्रामे विजयं कुरु ।
मैं एकानंशा देवीको प्रणाम करता हूँ, यज्ञोंमें पूजित गायत्री देवीको नमस्कार करता हूँ और विप्रोंकी सावित्री (रूपसे उपास्य) देवीको भी मैं हाथ जोड़कर अभिवादन करता हूँ। देवि ! आप सर्वदा मेरी रक्षा कीजिये और संग्राममें मुझे विजय प्रदान कीजिये ॥ १२ १/२ ॥

इति कामवचःश्रुत्वा दुर्गा सम्प्रीतमानसा ॥ १३ ॥
उवाच वचनं देवी सुप्रीतेनान्तरात्मना ।
कामस्वरूप प्रद्युम्नके ऐसे प्रार्थनापूर्ण वचनोंसे दुर्गा देवी संतुष्ट हो गयीं। उनका मन प्रसन्न हो गया। तदनन्तर दुर्गा-देवी हृदयमें अत्यन्त आह्लादित हो यह वचन कहने लगीं—॥

पश्य पश्य महाबाहो रुक्मिण्यानन्दवर्धन ॥ १४ ॥
वरं वरय वत्स त्वममोघं दर्शनं मम।
'रुक्मिणीके आनन्दको बढ़ानेवाले महाबाहु प्रद्युम्न ! (मेरी ओर) देख ! देख !! मेरा दर्शन अमोघ है, अतः वत्स ! तू मनोवाञ्छित वर माँग ले' ॥ १४ १/२ ॥

देव्यास्तु वचनं श्रुत्वा रोमाञ्चोद्गतमानसः ॥ १५ ॥
प्रणम्य शिरसा देवीं विज्ञप्तुमुपचक्रमे ।
यदि त्वं देवि तुष्टासि दीयतां मे यदीप्सितम् ॥ १६ ॥
देवीके इस वचनको सुनकर प्रद्युम्न रोमाञ्चित हो गये, हर्षसे उनका हृदय उछलने लगा। तब उन्होंने सिर झुकाकर देवीको प्रणाम करके उनसे इस प्रकार निवेदन किया—'देवि ! यदि आप प्रसन्न हैं तो मैं जो चाहता हूँ, वह मुझे दीजिये ॥ १५-१६ ॥

वरं च वरदे याचे सर्वमित्रेषु मे जयः ।
यस्त्वया मुद्गरो दत्तः शम्बरस्यात्मसम्भवः ॥ १७ ॥
एष मे गात्रमासाद्य माला पद्मवती भवेत् ।
तथास्त्विति च साप्युक्त्वा तत्रैवान्तरधीयत ॥ १८ ॥
'वरदे ! मैं यह वर माँगता हूँ कि सब शत्रुओंपर मुझे विजय प्राप्त हो और अपने शरीरसे प्रकट किया हुआ जो मुद्गर आपने शम्बरासुरको दिया है, वह मेरे शरीरपर प्राप्त होकर कमलोंकी माला बन जाय।' तब वे देवी 'ऐसा ही होगा' यह कहकर वहीं ही अन्तर्धान हो गयीं ॥ १७-१८ ॥

प्रद्युम्नस्तु महातेजास्तुष्टो रथमथारुहत् ।
मुद्गरं तं गृहीत्वा च शम्बरः क्रोधमूर्च्छितः ॥ १९ ॥
भ्रामयित्वा स चिक्षेप प्रद्युम्नोरसि वीर्यवान् ।
तब महातेजस्वी प्रद्युम्न संतुष्ट होकर रथपर आरूढ़ हुए। उधर क्रोधसे अचेत हुए पराक्रमी शम्बरने उस मुद्गरको हाथमें लेकर घुमाया और प्रद्युम्नकी छातीपर दे मारा ॥

स गत्वा मदनाभ्याशं माला भूत्वा तु पौष्करी ॥ २० ॥
प्रद्युम्नस्य च कण्ठे तु समासक्ता व्यराजत ।
नक्षत्राणां तु मालायां यथा परिवृतो विधुः ॥ २१ ॥
प्रद्युम्नके निकट जाकर वह मुद्गर कमल-पुष्पोंकी माला बन गया। वह माला प्रद्युम्नके कण्ठमे आसक्त होकर अतिशय शोभा पाने लगी। उस समय वे नक्षत्रोंकी मालासे घिरे हुए चन्द्रमाकी भाँति सुशोभित हुए ॥ २०-२१ ॥

ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः ।
साधु साध्विति वाचोचुः पूजयन् केशवात्मजम् ॥ २२ ॥
मुद्गरं पुष्पभूतं तु दृष्ट्वा प्रद्युम्नसन्निधौ ।
वैष्णवं परमास्त्रं तु नारदेन यथाहृतम् ॥ २३ ॥
संदधे चापमानम्य इदं वचनमब्रवीत् ।
तत्पश्चात् देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षि 'साधु ! साधु !' कहकर केशवकुमारकी प्रशंसा करने लगे। प्रद्युम्नके निकट जब वह मुद्गर कमलपुष्प बन गया, तब प्रद्युम्नने


म० ह० २१ L-