विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 664, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ६४२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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नारदजीके दिये हुए वैष्णव नामक दिव्यास्त्रका संधान किया और अपने धनुषको झुकाकर इस प्रकार कहा—॥ २२-२३½॥
यद्यहं रुक्मिणीपुत्रः केशवस्यात्मजो ह्यहम् ॥ २४ ॥
तेन सत्येन बाणेन जहि त्वं शम्बरं रणे।
'वैष्णवास्त्र ! यदि मैं रुक्मिणीदेवी और भगवान् श्रीकृष्णका पुत्र हूँ, तो इस सत्यके प्रभावसे तुम अपने वाण-द्वारा रणभूमिमें शम्बरासुरको मार डालो' ॥ २४½ ॥
इत्युक्त्वा चापमाकृष्य संधाय च महामनाः ॥ २५ ॥
विक्षेप शम्बरस्याथ दहँल्लोकत्रयं यथा।
ऐसा कहकर महामनस्वी प्रद्युम्नने धनुष खींचकर उसपर वाण रखा और तीनों लोकोंको जलाते हुए उसको शम्बरासुरके ऊपर छोड़ दिया ॥ २५½ ॥
स क्षिप्तो वृष्णिसिंहेन शरः क्रव्यादमोहनः ॥ २६ ॥
हृदयं शम्बरस्याथ भित्त्वा धरणिमागतः।
न चास्य मांसं न स्नायुर्नास्थि न त्वङ् न शोणितम् ॥ २७ ॥
सर्वं तद् भस्मसाद्भूतं वैष्णवास्त्रस्य तेजसा।
वृष्णिवंशके सिंह प्रद्युम्नके द्वारा चलाया गया वह वाण राक्षसोंको मोहमें डालनेवाला था। वह शम्बरासुरके हृदयको विदीर्ण करके पृथ्वीपर आ गया, इससे उस दैत्यका न तो मांस, न स्नायुजाल, न हड्डी, न त्वचा और न रक्त ही शेष बचा। वैष्णवास्त्रके तेजसे वह सब कुछ भस्म हो गया ॥ २६-२७½ ॥
हते दैत्ये महाकाये दानवे शम्बरेऽधमे ॥ २८ ॥
जहृषुर्दैवगन्धर्वा ननृतुश्चाप्सरोगणाः।
उर्वशी मेनका रम्भा विप्रचित्तिस्तिलोत्तमा ॥ २९ ॥
उस महाकाय अधम दानव शम्बर दैत्यके मारे जानेपर देवता और गन्धर्व हर्षसे खिल उठे तथा उर्वशी, मेनका, रम्भा, विप्रचित्ति और तिलोत्तमा आदि अप्सराएँ नृत्य करने लगीं ॥
ननृतुहृष्टमनसो जगत् स्थावरजङ्गमम् ।
देवराजस्तु सुप्रीतः सर्वदेवगणैः सह।
प्रद्युम्नं पुष्पवर्षेण तमभ्यर्च्य प्रहृष्टवत् ॥ ३० ॥
उपर्युक्त अप्सराएँ जब प्रसन्नचित्त होकर नाचने लगीं, उस समय यह चराचर जगत् भी हर्षसे झूम उठा। समस्त देवताओंसहित देवराज इन्द्र अत्यन्त प्रसन्न हो फूलोंकी वर्षासे प्रद्युम्नका सत्कार करके हर्ष विभोर हो गये ॥ ३० ॥
अथ समरहते तु दैत्यराजे मधुमथनस्य सुतेन वैष्णवास्त्रैः।
विगतरिपुभयाः सुराश्च जग्मुर्मकरविभूषणकेतनं स्तुवन्तः ॥ ३१ ॥
मधुसूदन श्रीकृष्णके पुत्र प्रद्युम्नद्वारा समरभूमिमें वैष्णवास्त्रसे दैत्यराज शम्बरके मारे जानेपर समस्त देवताओंका शत्रुसम्बन्धी भय दूर हो गया और वे मकरध्वज प्रद्युम्नकी स्तुति करते हुए अपने स्थानको चले गये ॥ ३१ ॥
स च समरपरिश्रमं वहन् वै नगरसुखं प्रविवेश रौक्मिणेयः।
प्रियतम इव कान्तया प्रहृष्टस्त्वरितपदं रतिदर्शनं चकार ॥ ३२ ॥
अपने शरीरद्वारा युद्धजनित थकावटका भार वहन करते हुए रुक्मिणीकुमार प्रद्युम्नने नगरद्वारमें प्रवेश किया। जैसे प्रेयसीसे मिलकर प्रियतमको प्रसन्नता होती है, उसी प्रकार अत्यन्त हर्षमें भरे हुए प्रद्युम्नने तुरंत ही अपनी पत्नी रतिके साक्षात्कार किया ॥ ३२ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि शम्बरवधे सप्ताधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०७ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें शम्बरासुरका वधविषयक एक सौ सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०७ ॥
अष्टाधिकशततमोऽध्यायः
मायावतीसहित प्रद्युम्नका द्वारकामें आगमन और रुक्मिणीके भवनमें प्रवेश
वैशम्पायन उवाच
समाप्तमायो मायाज्ञो विक्रान्तः समरेऽव्ययः।
अष्टम्यां निहतो युद्धे मायावी कालशम्बरः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! शम्बरासुर मायाओंका ज्ञाता था, किंतु उसकी सारी माया समाप्त हो गयी। मायावी कालशम्बर रणभूमिमें पराक्रम प्रकट करनेवाला और अविनाशी था, तो भी अष्टमीको युद्धमे प्रद्युम्नद्वारा मार डाला गया ॥ १ ॥
तमृक्षवन्ते नगरे निहत्यासुरसत्तमम्।
गृह्य मायावतीं देवीमागच्छन्नगरं पितुः ॥ २ ॥
ऋक्षवन्त नामक नगरमें असुरशिरोमणि शम्बरका वध करके देवी मायावतीको साथ ले प्रद्युम्न अपने पिताके नगरमें आये ॥ २ ॥
सोऽन्तरिक्षगतो भूत्वा मायावी शीघ्रविक्रमः।
आजगाम पुरीं रम्यां रक्षितां तेजसा पितुः ॥ ३ ॥
शीघ्रतापूर्वक पराक्रम प्रकट करनेवाले मायावी प्रद्युम्न