भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 665

[विष्णुपर्व ] अष्टाधिकशततमोऽध्यायः ६४३


आकाशमें स्थित हो अपने पिताके तेजसे सुरक्षित रमणीय पुरी द्वारकामें आये ॥ ३ ॥

सोऽन्तरिक्षान्निपतितः केशवान्तःपुरे शिशुः ।
मायावत्या सह तया रूपवानिव मन्मथः ॥ ४ ॥

वे आकाशसे भगवान् श्रीकृष्णके अन्तःपुरमें उतर पड़े। उस समय उस मायावती (रति) के साथ मूर्तिमान् कामदेवके समान प्रतीत होते थे ॥ ४ ॥

तस्मिंस्तत्रावपतिते महिष्यः केशवस्य याः ।
विस्मिताश्चैव हृष्टाश्च भीताश्चैवाभवंस्ततः ॥ ५ ॥

उस समय वहाँ उनके उतरनेपर भगवान् श्रीकृष्णकी जो रानियाँ थीं, उनमेंसे कुछ तो आश्चर्यसे चकित हो उठीं, कितनी स्त्रियोंको महान् हर्ष हुआ और बहुत-सी भयभीत हो गयीं ॥ ५ ॥

ततस्तं कामसंकाशं कान्तया सह सङ्गतम् ।
प्रेक्षन्त्यो हृष्टवदनाः पिवन्त्यो नयनोत्सवम् ॥ ६ ॥

प्रद्युम्न अपनी प्रियतमाके साथ मिलकर कामदेवके समान शोभा पा रहे थे। उनकी ओर निहारती हुई रानियोंके मुखपर हर्ष छा रहा था। वे नेत्रोंसे उनकी रूपमाधुरीका पान कर रही थीं, प्रद्युम्न उनके नयनोंके लिये उत्सवरूप हो गये थे ॥ ६ ॥

तं विनीतमुखं दृष्ट्वा लज्जमानं पदे पदे ।
अभवन् स्निग्धसंकल्पाः सर्वास्ताः कृष्णयोषितः ॥ ७ ॥

उनका मुख विनयसे झुका हुआ था। वे पग-पगपर संकोचका अनुभव कर रहे थे। उन्हें देखकर श्रीकृष्णकी सभी रानियोंके हृदयमे वात्सल्य-स्नेहका संचार हो आया था ॥ ७ ॥

रुक्मिणी चैव तं दृष्ट्वा शोकार्ता पुत्रगर्द्धिनी ।
सपत्नीशतसंकीर्णा सबाष्पा वाक्यमब्रवीत् ॥ ८ ॥

पुत्रकी इच्छा रखनेवाली रुक्मिणी उन्हें देखकर शोकसे कातर हो उठीं। वे सैकड़ो सौतोंसे घिरकर आँसू बहाती हुई इस प्रकार बोलीं—॥ ८ ॥

यादृक् स्वप्नो मया दृष्टो निशायां यौवने गते ।
कंसारिणा ममानिय दत्तं साहारपल्लवम् ॥ ९ ॥

'मैंने रातमें निशाकालकी युवावस्था बीत जानेपर अर्थात् पिछले पहरमे जैसा स्वप्न देखा है, (वह इस प्रकार है—) 'मेरे प्राणनाथ कंसनिषूदनने मेरे हाथमें फलयुक्त आम्रपल्लव लाकर दिया है ॥ ९ ॥

शशिरश्मिप्रतीकाशं मुक्तादाम च शोभनम् ।
केशवेनाङ्कमारोप्य मम कण्ठे न्यबध्यत ॥ १० ॥

'फिर श्रीकेशवने मुझे अपने अङ्कमें बिठाकर मोतियोंकी 'एक बहुत सुन्दर माला मेरे कण्ठमें बाँध दी। वह माल चन्द्रमाकी किरणोंके समान प्रकाशमान थी ॥ १० ॥

श्यामा सुचारुकेशा स्त्री शुक्लाम्बरविभूषिता ।
पद्महस्ता निरीक्षन्ती प्रविष्टा मम वेश्मनि ॥ ११ ॥

'फिर एक श्यामा (सोलह वर्षकी अवस्थावाली अथवा श्यामवर्णा) स्त्री मेरे महलमे प्रविष्ट हुई, जिसके केश बड़े ही मनोहर थे। श्वेत वस्त्र उसके अङ्गोंकी शोभा बढ़ा रहे थे। उसके हाथमें कमल था। वह मेरी ओर देखती हुई घरके भीतर घुसी थी ॥ ११ ॥

तया पुनरहं गृह्य स्नापिता रुचिराम्बुना ।
कुशेशयमयीं मालां स्त्री संगृह्याथ पाणिना ॥ १२ ॥
मम मूर्ध्न्युपाघ्राय दत्ता स्वच्छा तया मम ।

'वह स्त्री मेरा हाथ पकड़कर मुझे स्नानागारमें ले गयी और स्वच्छ जलसे उसने मुझे नहलाया। तत्पश्चात् मेरा मस्तक सूँघकर उसने अपने हाथसे एक निर्मल कमलपुष्पोंकी माला लेकर मुझे पहना दी' ॥ १२ १/२ ॥

एवं स्वप्नान् कीर्तयन्ती रुक्मिणी हृष्टमानसा ॥ १३ ॥
सखीजनवृता देवी कुमारं वीक्ष्य तं मुहुः ।

इस प्रकार स्वप्नोंका वर्णन करती हुई रुक्मिणीका हृदय हर्षसे खिल उठा। सखियोंसे घिरी हुई उन महारानीने कुमार प्रद्युम्नकी ओर बारंबार देखकर कहा—॥ १३ १/२ ॥

धन्यायाः खल्वयं पुत्रो दीर्घायुः प्रियदर्शनः ॥ १४ ॥
ईदृशः कामसंकाशो यौवने प्रथमे स्थितः ।

'निश्चय ही यह किसी बड़भागिनी माताका दीर्घायु पुत्र है, जो देखनेमें बहुत ही प्रिय है। इस तरह कामदेव जैसा सुन्दर यह बालक अभी पहले-पहल युवावस्थामें प्रविष्ट हुआ है' ॥ १४ १/२ ॥

जीवपुत्रा त्वया पुत्र कासौ भाग्यसमन्विता ॥ १५ ॥
किमर्थं चाम्बुदश्यामः सभार्यस्त्वमिहागतः ।

(फिर वे प्रद्युम्नसे बोलीं—) 'बेटा ! वह कौन-सी सौभाग्यशालिनी माता है, जो तुम जैसे चिरंजीवी पुत्रसे पुत्रवती हुई है ? मेघके समान श्यामसुन्दर शरीरवाले तुम अपनी पत्नीके साथ किसलिये यहाँ पधारे हो ? ॥ १५ १/२ ॥

अस्मिन् वयसि सुव्यक्तं प्रद्युम्नो मम पुत्रकः ॥ १६ ॥
भवेद् यदि न नीतः स्यात् कृतान्तेन बलीयसा ।

'यदि बलवान् काल न उठा ले गया होता तो मेरा बेटा प्रद्युम्न भी अवश्य ही इसी (तरुण) अवस्थामें स्थित होता ॥ १६ १/२ ॥

व्यर्कं कृष्णकुमारस्त्वं न मिथ्या मम तर्कितम् ॥ १७ ॥
विज्ञातोऽसि मया चिह्नैर्विना चक्रं जनार्दनः ।

'अथवा मेरा तर्क करना—सोचना व्यर्थ नहीं है। तुम अवश्य ही श्रीकृष्णके पुत्र हो। मैंने लक्षणोंसे तुम्हें पहचान लिया। तुम बिना चक्रके जनार्दन हो (यदि तुम्हारे हाथमें