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विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

[विष्णुपर्व ] अष्टाधिकशततमोऽध्यायः ६४३


आकाशमें स्थित हो अपने पिताके तेजसे सुरक्षित रमणीय पुरी द्वारकामें आये ॥ ३ ॥

सोऽन्तरिक्षान्निपतितः केशवान्तःपुरे शिशुः ।
मायावत्या सह तया रूपवानिव मन्मथः ॥ ४ ॥

वे आकाशसे भगवान् श्रीकृष्णके अन्तःपुरमें उतर पड़े। उस समय उस मायावती (रति) के साथ मूर्तिमान् कामदेवके समान प्रतीत होते थे ॥ ४ ॥

तस्मिंस्तत्रावपतिते महिष्यः केशवस्य याः ।
विस्मिताश्चैव हृष्टाश्च भीताश्चैवाभवंस्ततः ॥ ५ ॥

उस समय वहाँ उनके उतरनेपर भगवान् श्रीकृष्णकी जो रानियाँ थीं, उनमेंसे कुछ तो आश्चर्यसे चकित हो उठीं, कितनी स्त्रियोंको महान् हर्ष हुआ और बहुत-सी भयभीत हो गयीं ॥ ५ ॥

ततस्तं कामसंकाशं कान्तया सह सङ्गतम् ।
प्रेक्षन्त्यो हृष्टवदनाः पिवन्त्यो नयनोत्सवम् ॥ ६ ॥

प्रद्युम्न अपनी प्रियतमाके साथ मिलकर कामदेवके समान शोभा पा रहे थे। उनकी ओर निहारती हुई रानियोंके मुखपर हर्ष छा रहा था। वे नेत्रोंसे उनकी रूपमाधुरीका पान कर रही थीं, प्रद्युम्न उनके नयनोंके लिये उत्सवरूप हो गये थे ॥ ६ ॥

तं विनीतमुखं दृष्ट्वा लज्जमानं पदे पदे ।
अभवन् स्निग्धसंकल्पाः सर्वास्ताः कृष्णयोषितः ॥ ७ ॥

उनका मुख विनयसे झुका हुआ था। वे पग-पगपर संकोचका अनुभव कर रहे थे। उन्हें देखकर श्रीकृष्णकी सभी रानियोंके हृदयमे वात्सल्य-स्नेहका संचार हो आया था ॥ ७ ॥

रुक्मिणी चैव तं दृष्ट्वा शोकार्ता पुत्रगर्द्धिनी ।
सपत्नीशतसंकीर्णा सबाष्पा वाक्यमब्रवीत् ॥ ८ ॥

पुत्रकी इच्छा रखनेवाली रुक्मिणी उन्हें देखकर शोकसे कातर हो उठीं। वे सैकड़ो सौतोंसे घिरकर आँसू बहाती हुई इस प्रकार बोलीं—॥ ८ ॥

यादृक् स्वप्नो मया दृष्टो निशायां यौवने गते ।
कंसारिणा ममानिय दत्तं साहारपल्लवम् ॥ ९ ॥

'मैंने रातमें निशाकालकी युवावस्था बीत जानेपर अर्थात् पिछले पहरमे जैसा स्वप्न देखा है, (वह इस प्रकार है—) 'मेरे प्राणनाथ कंसनिषूदनने मेरे हाथमें फलयुक्त आम्रपल्लव लाकर दिया है ॥ ९ ॥

शशिरश्मिप्रतीकाशं मुक्तादाम च शोभनम् ।
केशवेनाङ्कमारोप्य मम कण्ठे न्यबध्यत ॥ १० ॥

'फिर श्रीकेशवने मुझे अपने अङ्कमें बिठाकर मोतियोंकी 'एक बहुत सुन्दर माला मेरे कण्ठमें बाँध दी। वह माल चन्द्रमाकी किरणोंके समान प्रकाशमान थी ॥ १० ॥

श्यामा सुचारुकेशा स्त्री शुक्लाम्बरविभूषिता ।
पद्महस्ता निरीक्षन्ती प्रविष्टा मम वेश्मनि ॥ ११ ॥

'फिर एक श्यामा (सोलह वर्षकी अवस्थावाली अथवा श्यामवर्णा) स्त्री मेरे महलमे प्रविष्ट हुई, जिसके केश बड़े ही मनोहर थे। श्वेत वस्त्र उसके अङ्गोंकी शोभा बढ़ा रहे थे। उसके हाथमें कमल था। वह मेरी ओर देखती हुई घरके भीतर घुसी थी ॥ ११ ॥

तया पुनरहं गृह्य स्नापिता रुचिराम्बुना ।
कुशेशयमयीं मालां स्त्री संगृह्याथ पाणिना ॥ १२ ॥
मम मूर्ध्न्युपाघ्राय दत्ता स्वच्छा तया मम ।

'वह स्त्री मेरा हाथ पकड़कर मुझे स्नानागारमें ले गयी और स्वच्छ जलसे उसने मुझे नहलाया। तत्पश्चात् मेरा मस्तक सूँघकर उसने अपने हाथसे एक निर्मल कमलपुष्पोंकी माला लेकर मुझे पहना दी' ॥ १२ १/२ ॥

एवं स्वप्नान् कीर्तयन्ती रुक्मिणी हृष्टमानसा ॥ १३ ॥
सखीजनवृता देवी कुमारं वीक्ष्य तं मुहुः ।

इस प्रकार स्वप्नोंका वर्णन करती हुई रुक्मिणीका हृदय हर्षसे खिल उठा। सखियोंसे घिरी हुई उन महारानीने कुमार प्रद्युम्नकी ओर बारंबार देखकर कहा—॥ १३ १/२ ॥

धन्यायाः खल्वयं पुत्रो दीर्घायुः प्रियदर्शनः ॥ १४ ॥
ईदृशः कामसंकाशो यौवने प्रथमे स्थितः ।

'निश्चय ही यह किसी बड़भागिनी माताका दीर्घायु पुत्र है, जो देखनेमें बहुत ही प्रिय है। इस तरह कामदेव जैसा सुन्दर यह बालक अभी पहले-पहल युवावस्थामें प्रविष्ट हुआ है' ॥ १४ १/२ ॥

जीवपुत्रा त्वया पुत्र कासौ भाग्यसमन्विता ॥ १५ ॥
किमर्थं चाम्बुदश्यामः सभार्यस्त्वमिहागतः ।

(फिर वे प्रद्युम्नसे बोलीं—) 'बेटा ! वह कौन-सी सौभाग्यशालिनी माता है, जो तुम जैसे चिरंजीवी पुत्रसे पुत्रवती हुई है ? मेघके समान श्यामसुन्दर शरीरवाले तुम अपनी पत्नीके साथ किसलिये यहाँ पधारे हो ? ॥ १५ १/२ ॥

अस्मिन् वयसि सुव्यक्तं प्रद्युम्नो मम पुत्रकः ॥ १६ ॥
भवेद् यदि न नीतः स्यात् कृतान्तेन बलीयसा ।

'यदि बलवान् काल न उठा ले गया होता तो मेरा बेटा प्रद्युम्न भी अवश्य ही इसी (तरुण) अवस्थामें स्थित होता ॥ १६ १/२ ॥

व्यर्कं कृष्णकुमारस्त्वं न मिथ्या मम तर्कितम् ॥ १७ ॥
विज्ञातोऽसि मया चिह्नैर्विना चक्रं जनार्दनः ।

'अथवा मेरा तर्क करना—सोचना व्यर्थ नहीं है। तुम अवश्य ही श्रीकृष्णके पुत्र हो। मैंने लक्षणोंसे तुम्हें पहचान लिया। तुम बिना चक्रके जनार्दन हो (यदि तुम्हारे हाथमें

६५४ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [हरिवंश

चक्र हो तो तुममें और श्रीकृष्णमें कोई अन्तर नहीं रह जायगा-) ॥ १७ १/२ ॥

मुखं नारायणस्येव केशाः केशान्त एव च ॥ १८ ॥ ऊरू वक्षो भुजौ तुल्यौ हलिनः श्वशुरस्य मे ।

'तुम्हारा मुख नारायण (श्रीकृष्ण) के समान है। तुम्हारे केश और केशान्तभाग उन्हींके सदृश हैं। तुम्हारी दोनों जाँघें, वक्षःस्थल और दोनों भुजाएँ मेरे श्वशुर हलधरके सदृश हैं ॥ १८ १/२ ॥

कस्त्वं वृष्णिकुलं सर्वं द्योतयन् वपुषा स्थितः ॥ १९ ॥ अहो नारायणस्येव दिव्या ते परमा तनुः ।

'तुम कौन हो, जो यहाँ अपने शरीरकी कान्तिसे समस्त वृष्णिकुलको प्रकाशित करते हुए खड़े हो? अहो! भगवान् नारायणके समान तुम्हारा शरीर परम दिव्य है' ॥ १९ १/२ ॥

एतस्मिन्नन्तरे कृष्णः सहसा प्रविवेश ह । नारदस्य वचः श्रुत्वा शम्बरस्य वधं प्रति ॥ २० ॥

इसी बीचमें शम्बर-वधके विषयमें नारदजीका वचन सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण सहसा अन्तःपुरमें आये ॥ २० ॥

सोऽपश्यत् तं सुतं ज्येष्ठं सिद्धं मन्मथलक्षणैः । स्नुषां मायावतीं चैव हृष्टचेता जनार्दनः ॥ २१ ॥

उन्होंने कामदेवके लक्षणोंसे सम्पन्न अपने ज्येष्ठ पुत्र प्रद्युम्नको तथा पुत्रवधू मायावतीको भी देखा । इससे जनार्दनके चित्तमें बड़ा हर्ष हुआ ॥ २१ ॥

सोऽब्रवीत् सहसा देवीं रुक्मिणीं देवतामिव । अयं स देवि सम्प्राप्तः सुतश्चापधरस्तव ॥ २२ ॥

वे सहसा देवताके समान दीप्तिमती देवी रुक्मिणीसे बोले--'देवि ! यह वही तुम्हारा पुत्र है, जो इस समय धनुष धारण करके तुम्हारे पास आया है ॥ २२ ॥

अनेन शम्बरं हत्वा मायायुद्धविशारदम् । हृता मायाश्च ताः सर्वा याभिर्देवानबाधयत् ॥ २३ ॥

'इसने मायायुद्धविशारद शम्बरासुरका वध करके उसकी ये सारी मायाएँ भी हर ली हैं, जिनके बलपर वह देवताओंको सताया करता था ॥ २३ ॥

सती चेयं शुभा साध्वी भार्या वै तनयस्य ते । मायावतीति विख्याता शम्बरस्य गृहोषिता ॥ २४ ॥

'यह तुम्हारे पुत्रकी सती साध्वी शुभलक्षणा पत्नी है । इसका नाम मायावती है। यह शम्बरासुरके घरमें चिरकाल-तक रही है ॥ २४ ॥

मा च ते शम्बरस्येयं पत्नीति भवतु व्यथा । मन्मथे तु गते नाशं गते चानङ्गतां पुरा ॥ २५ ॥ कामपत्नी न कान्तैषा शम्बरस्य रतिः प्रिया ।

'यह कहीं शम्बरासुरकी स्त्री न हो, ऐसी बात सोचकर तुम मनमें व्यथित न होना । पूर्वकालमें जब कामदेवका शरीर नष्ट हो गया और वे अनङ्ग हो गये, उस समय उनकी प्यारी पत्नी जो रति थी, वही यह मायावती है। यह शम्बरासुरकी वल्लभा कभी नहीं रही है ॥ २५ १/२ ॥

मायारूपेण तं दैत्यं मोहयत्यसकृच्छुभा ॥ २६ ॥ न चैषा तस्य कौमारे वशे तिष्ठति शोभना । आत्ममायामयं कृत्वा रूपं शम्बरमाविशत् ॥ २७ ॥

'यह शुभलक्षणा सुन्दरी सदा मायामयरूपसे ही उस दैत्यको मोहमें डाले रखती थी। यह कुमारावस्थामें कभी उसके वशमें नहीं हुई। अपनी मायासे ही एक मनोहर नारीका रूप रचकर उसीको शम्बरासुरके शयनागारमें प्रविष्ट करती थी ॥ २६-२७ ॥

पत्‍न्येषा मम पुत्रस्य स्नुषा तव वराङ्गना । लोककान्तस्य साहाय्यं करिष्यति मनोमयम् ॥ २८ ॥

'यह सुन्दरी मेरे पुत्रकी पत्नी तथा तुम्हारी बहू है । यह लोककमनीय रूपवाले प्रद्युम्नकी मनोमय (संकल्पमय) सहायता करेगी ॥ २८ ॥

प्रवेशयैनां भवनं पूज्यां ज्येष्ठां स्नुषां मम । चिरं प्रनष्टं च सुतं भजस्व पुनरागतम् ॥ २९ ॥

'यह मेरी आदरणीया ज्येष्ठ बहू है, इसे घरके भीतर ले चलो । चिरकालसे नष्ट हुआ तुम्हारा पुत्र फिर आ गया। इसे अपनाओ' ॥ २९ ॥

वैशम्पायन उवाच

श्रुत्वा तु वचनं देवी कृष्णेनोदाहृतं तदा । प्रहर्षमतुलं लब्ध्वा रुक्मिणी वाक्यमब्रवीत् ॥ ३० ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! श्रीकृष्णका यह कथन सुनकर उस समय देवी रुक्मिणीको अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ। वे बोलीं—॥ ३० ॥

अहो धन्यतरास्मीति वीरपुत्रसमागमात् । अद्य मे सफलः कामः पूर्णो मेऽद्य मनोरथः ॥ ३१ ॥

'अहो ! आज अपने वीर पुत्रके मिल जानेसे मैं परम धन्य हो गयी। अब मेरी कामना सफल हो गयी । सम्पूर्ण मनोरथ पूर्ण हो गया ॥ ३१ ॥

चिरप्रणष्टपुत्रस्य दर्शनं प्रियया सह । आगच्छ पुत्र भवनं सभार्यः प्रविशोह च ॥ ३२ ॥

'चिरकालसे खोये हुए पुत्रका आज मुझे उसकी पत्नीके साथ दर्शन हुआ। बेटा ! आओ, अपनी पत्नीके साथ इस घरके भीतर प्रवेश करो' ॥ ३२ ॥

ततोऽभिवाद्य चरणौ गोविन्दं मातरं च ताम् । प्रद्युम्नः पूजयामास हलिनं च महाबलम् ॥ ३३ ॥

विष्णुपर्व ] नवाधिकशततमोऽध्यायः ६४५ तदनन्तर प्रद्युम्नने अपने पिता श्रीकृष्ण और माता रुक्मिणीके चरणोंमें प्रणाम करके अपने ताऊ महाबली हलधरका भी पूजन किया ॥ ३३ ॥ उत्थाप्य तं परिष्वज्य मूर्क्युपाघ्राय वीर्यवान् । प्रद्युम्नं वलिनां श्रेष्ठं केशवः परवीरहा ॥ ३४ ॥ शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्णने बलवानोंमें श्रेष्ठ प्रद्युम्नको उठाकर हृदयसे लगाया और मस्तक सूँघकर अपना स्नेह प्रदान किया ॥ ३४ ॥ स्नुषां चोत्थाप्य तां देवी रुक्मिणी रुक्मभूषणा । परिष्वज्योपसंगृह्य स्नेहाद् गद्गदभाषिणी ॥ ३५ ॥ सोनेके आभूषणोंसे विभूषित हुई देवी रुक्मिणीने अपनी उस पुत्रवधूको उठाकर हृदयसे लगा लिया और उसे सर्वतोभावेन अपनाकर स्नेहसे गद्गद वाणीद्वारा उसका स्वागत किया ॥ ३५ ॥ समेत्य भवनं पत्न्या शचीन्द्रमदितिर्यथा । प्रवेशयामास तदा रुक्मिणी सुतमागतम् ॥ ३६ ॥ जैसे देवमाता अदितिने शची और इन्द्रको देवभवनमें प्रविष्ट किया था, उसी प्रकार रुक्मिणीने पत्नीके साथ आये हुए पुत्रसे मिलकर उसका भवनके भीतर प्रवेश कराया ॥ ३६ ॥ इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि प्रद्युम्नागमने अष्टाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०८ ॥ इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें प्रद्युम्नका आगमनविषयक एक सौ आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०८ ॥ नवाधिकशततमोऽध्यायः बलदेवजीके द्वारा प्रद्युम्नको आह्निकस्तोत्रका उपदेश वैशम्पायन उवाच अत्राश्चर्यात्मकं स्तोत्रमाह्निकं जयतां वर । प्रद्युम्ने द्वारकां प्राप्ते हत्वा तं कालशम्बरम् ॥ १ ॥ बलदेवेन रक्षार्थं प्रोक्तमाह्निकमुच्यते । यज्जप्त्वा तु नृपश्रेष्ठ सायं पूतात्मतां व्रजेत् ॥ २ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ जनमेजय ! जब प्रद्युम्न कालशम्बरका वध करके द्वारकापुरी- में आये, उस समय बलदेवजीने उनकी रक्षाके लिये उन्हें एक स्तोत्रका उपदेश दिया; जिसे आह्निक कहते हैं। नृपश्रेष्ठ ! उसी आश्चर्यमय आह्निक स्तोत्रका यहाँ वर्णन किया जाता है, जिसका सायंकालमें जप करनेसे मनुष्य पूतात्मा ( पवित्र अन्तःकरणवाला) हो जाता है ॥ १-२ ॥ कीर्तितं बलदेवेन विष्णुना चैव कीर्तितम् । धर्मकामैश्च मुनिभिर्ऋषिभिश्चापि कीर्तितम् ॥ ३ ॥ इस स्तोत्रका बलदेवजीने, भगवान् विष्णुने तथा धर्मा- भिलाषी ऋषि-मुनियोंने भी कीर्तन किया है ॥ ३ ॥ कर्हिचिद् रुक्मिणीपुत्रो हलिना संयुतो गृहे । उपविष्टः प्रणम्याथ तमुवाच कृताञ्जलिः ॥ ४ ॥ एक समयकी बात है, रुक्मिणीपुत्र प्रद्युम्न घरमें बलरामजीके साथ बैठे हुए थे। उन्होंने हाथ जोड़कर बलरामजीको प्रणाम किया और इस प्रकार पूछा ॥ ४ ॥ प्रद्युम्न उवाच कृष्णानुज महाभाग रोहिणीतनय प्रभो । किंचित् स्तोत्रं मम ब्रूहि यज्जप्त्वा निर्भयोऽभवम् ॥ ५ ॥ प्रद्युम्न बोले—भगवान् श्रीकृष्णके बड़े भाई महाभाग रोहिणीनन्दन ! प्रभो ! मुझे किसी ऐसे स्तोत्रका उपदेश दीजिये, जिसका जप करके मैं निर्भय हो जाऊँ ॥ ५ ॥ श्रीबलदेव उवाच सुरासुरगुरुर्ब्रह्मा पातु मां जगतः पतिः। अथोङ्कारवषट्कारौ सावित्री विधयस्त्रयः ॥ ६ ॥ ऋचो यजूंषि सामानि छन्दांस्याथर्वणानि च । चत्वारस्त्वखिला वेदाः सरहस्याः सविस्तराः ॥ ७ ॥ पुराणमितिहासश्चाखिलान्युपखिलानि च। अङ्गान्यङ्गोपाङ्गानि तथा व्याख्यातानि च पान्तु माम् ॥ ८ ॥ श्रीबलदेवजीने कहा--देवताओं और असुरोंके गुरु जगत्पति ब्रह्माजी मेरी रक्षा करें। ओङ्कार, वषट्कार, सावित्री, तीन प्रकारकी¹ विधियाँ, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, रहस्य और विस्तारसहित सम्पूर्णरूपसे चारों वेद, इतिहास, पुराण, खिल, उपखिल, अङ्ग, उपाङ्ग तथा व्याख्याग्रन्थ-इन सबके अभिमानी देवता मेरी रक्षा करें ॥ पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् । इन्द्रियाणि मनो बुद्धिस्तथा सत्त्वं रजस्तमः ॥ ९ ॥ व्यानोदानौ समानश्च प्राणोऽपानश्च पञ्चमः । वायवः सप्त चैवान्ये येष्वायत्तमिदं जगत् ॥ १० ॥ मरीचिरङ्गिरात्रिश्च पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः। भृगुर्वसिष्ठो भगवान् पान्तु ते मां महर्षयः ॥ ११ ॥ पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, पाँचवाँ तेज, इन्द्रियाँ, १. अपूर्वविधि, नियमविधि और परिसंख्याविधि ।

६४६ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


मन, बुद्धि, सत्त्वगुण, रजोगुण, तमोगुण, व्यान, उदान, समान, प्राण और पाँचवाँ अपान, जिनके अधीन यह सारा जगत् है, वे प्रवह आदि अन्य सात वायु, मरीचि, अङ्गिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु और भगवान् वसिष्ठ—ये महर्षि तथा पूर्वोक्त पृथ्वी आदिके अभिमानी देवता मेरी रक्षा करें ॥ ९-११ ॥

कश्यपाद्याश्च मुनयश्चतुर्दश दिशो दश ।
नरनारायणौ देवौ सगणौ पान्तु मां सदा ॥ १२ ॥

कश्यप-आदि चौदह मुनि, दस दिशाएँ तथा अपने गणोंसहित देव नर और नारायण—ये सदा मेरा संरक्षण करें ॥ १२ ॥

रुद्राश्चैकादश प्रोक्ता आदित्या द्वादशैव तु ।
अष्टौ च वसवो देवा अश्विनौ द्वौ प्रकीर्तितौ ॥ १३ ॥

ग्यारह रुद्र कहे गये हैं और बारह आदित्य, आठ वसुदेवता बताये गये हैं और दो अश्विनीकुमार—ये सब मेरी रक्षा करें ॥ १३ ॥

ह्रीः श्रीर्लक्ष्मीः स्वधा पुष्टिर्मेधा तुष्टिः स्मृतिर्धृतिः ।
अदितिर्दितिर्दनुश्चैव सिंहिका दैत्यमातरः ॥ १४ ॥

ह्री, श्री, लक्ष्मी, स्वधा, पुष्टि, मेधा, तुष्टि, स्मृति, धृति, देवमाता अदिति तथा दैत्योंकी माताएँ दिति, दनु और सिंहिका आदि मेरी रक्षा करें ॥ १४ ॥

हिमवान् हेमकूटश्च निषधः श्वेतपर्वतः ।
ऋषभः पारियात्रश्च विन्ध्यो वैदूर्यपर्वतः ॥ १५ ॥
सह्योदयश्च मलयो मेरुमन्दरदर्दुराः ।
क्रौञ्चकैलासमैनाकाः पान्तु मां धरणीधराः ॥ १६ ॥

हिमवान्, हेमकूट, निषध, श्वेतपर्वत, ऋषभ, पारियात्र, विन्ध्य, वैदूर्यपर्वत, सह्य, उदयगिरि, मलय, मेरु, मन्दर, दर्दुर, क्रौञ्च, कैलास और मैनाक आदि पर्वत मेरी रक्षा करें॥

शेषश्च वासुकिश्चैव विशालाक्षश्च तक्षकः ।
एलापत्रः शुक्लवर्णः कम्बलाश्वतरावुभौ ॥ १७ ॥
हस्तिभद्रः पिटकः कर्कोटकधनंजयौ ।
तथा पूरणकश्चैव नागश्च करवीरकः ॥ १८ ॥
सुमनास्यो दधिमुखस्तथा शृङ्गारपिण्डकः ।
मणिनागश्च भगवान्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः ॥ १९ ॥
नागराजधिकर्णश्च तथा हारिद्रकोऽपरः ।
एते चान्ये च बहवो ये चान्ये नानुकीर्तिताः ॥ २० ॥
भूधराः सत्यधर्माणः पान्तु मां भुजगेश्वराः ।

शेष, वासुकि, विशालाक्ष और तक्षक, एलापत्र, शुक्लवर्ण, कम्बल, अश्वतर, हस्तिभद्र, पिटक, कर्कोटक, धनंजय, पूरणक, करवीरक नाग, सुमनास्य, दधिमुख, शृङ्गारपिण्डक, तीनों लोकोंमें विख्यात भगवान् मणिनाग, नागराज अधिकर्ण तथो हारिद्रक-ये तथा दूसरे भी बहुत-से नाग, जिनके नाम यहाँ नहीं लिये गये हैं, वे सभी सत्यधर्मा एवं पृथ्वीका भार धारण करनेवाले नागराज मेरी रक्षा करें ॥ १७-२०½ ॥

समुद्राः पान्तु चत्वारो गङ्गा च सरितां वरा ॥ २१ ॥
सरस्वती चन्द्रभागा शतद्रुर्देविका शिवा ।
द्वारावती विपाशा च सरयूर्यमुना तथा ॥ २२ ॥
कल्माषी च रथोष्मा च बाहुदा च हिरण्यदा ।
प्लक्ष्शा चेक्षुमती चैव स्रवन्ती च बृहद्रथा ॥ २३ ॥
ख्याता चर्मण्वती चैव पुण्या चैव वधूसरा ।
एताश्चान्याश्च सरितो याश्चान्या नानुकीर्तिताः॥ २४ ॥
उत्तरापथगामिन्यः सलिलैः स्नपयन्तु माम् ।

चारों समुद्र मेरी रक्षा करें। सरिताओंमें श्रेष्ठ गङ्गा, सरस्वती, चन्द्रभागा, शतद्रु, देविका, शिवा, द्वारावती, विपाशा, सरयू, यमुना, कल्माषी, रथोष्मा, बाहुदा, हिरण्यदा, प्लक्षा, इक्षुमती, स्रवन्ती, बृहद्रथा, सुविख्यात चर्मण्वती तथा पुण्यसलिला वधूसरा—ये और दूसरी बहुत-सी नदियाँ जिनके नाम यहाँ नहीं लिये गये हैं तथा जो उत्तरभारतमें बहनेवाली हैं, वे सब-की-सब अपने जलसे मुझे नहलायें ॥ २१-२४½ ॥

वेणी गोदावरी सीता कावेरी कौङ्कणावती ॥ २५ ॥
कृष्णा वेणा शुक्तिमती तमसा पुष्पवाहिनी ।
ताम्रपर्णी ज्योतिरथा उत्फलोदुम्बरावती ॥ २६ ॥
नदी वैतरणी पुण्या विदर्भा नर्मदा शुभा ।
वितस्ता भीमरथ्या च ऐला चैव महानदी ॥ २७ ॥
कालिन्दी गोमती पुण्या नदः शोणश्च विश्रुतः ।
एताश्चान्याश्च वै नद्यो याश्चान्या न तु कीर्तिताः॥ २८ ॥
दक्षिणापथवाहिन्यः सलिलैः स्नपयन्तु माम् ।

वेणी, गोदावरी, सीता, कावेरी, कौङ्कणावती, कृष्णा, वेणा, शुक्तिमती, तमसा, पुष्पवाहिनी, ताम्रपर्णी, ज्योतिरथा, उत्फला, उदुम्बरावती, वैतरणी नदी, पुण्यसलिला विदर्भा, शुभरूपा नर्मदा, वितस्ता, भीमरथ्या, महानदी ऐला, कालिन्दी, पुण्यसलिला गोमती, सुविख्यात नद शोणभद्र—ये तथा दूसरी नदियाँ जिनके नाम यहाँ नहीं लिये गये हैं और जो दक्षिण भारतमें बहनेवाली हैं, वे सब-की-सब अपने जलसे मुझे नहलायें ॥ २५-२८½ ॥

क्षिप्रा चर्मण्वती पुण्या मही शुभ्रवती तथा ॥ २९ ॥
सिन्धुर्वेत्रवती चैव भोजान्ता वनमालिका ।
पूर्वभद्रा परामद्रा ऊर्मिला च परद्रुमा ॥ ३० ॥
ख्याता वेत्रवती चैव चापदासीति विश्रुता ।
प्रस्थावती कुण्डनदी नदी पुण्या सरस्वती ॥ ३१ ॥
चित्रघ्नी चेन्दुमाला च तथा मधुमती नदी ।
उमा गुरुनदी चैव तापी च विमलोदका ॥ ३२ ॥
विमला विमलोदा च मत्तगङ्गा पयस्विनी ।

[विष्णुपर्व ] नवाधिकशततमोऽध्यायः ६४७


एताश्चान्याश्च वै नद्यो याश्चान्या नानुकीर्तिताः ॥ ३३ ॥
ता मां समभिषिञ्चन्तु पश्चिमामाश्रिता दिशम् ।

क्षिप्र्रा, चर्मण्वती, पुण्यसलिला मही, शुभ्रवती, सिन्धु, वेत्रवती, भोजान्ता, वनमालिका, पूर्वभद्रा, पराभद्रा, ऊर्मिला, परद्रुमा, विख्यात वेत्रवती, चापदासी, प्रख्यावती, कुण्डनदी, पुण्यसलिला सरस्वती, चित्रघ्नी, इन्दुमाला, मधुमती नदी, उमा, गुरुनदी, तापी, विमलोदका, विमला, विमलोदा, मत्तगङ्गा, पयस्विनी—ये तथा दूसरी नदियाँ जिनके नाम यहाँ नहीं लिये गये हैं तथा जो पश्चिम दिशाका आश्रय लेकर बहती हैं, वे सब नदियाँ अपने जलसे मेरा अभिषेक करें ॥

भागीरथी पुण्यजला प्राच्यां दिशि समाश्रिता ॥ ३४॥
सा तु दहतु मे पापं कीर्तिता शम्भुना धृता ।

पुण्यसलिला भागीरथी जो पूर्वदिशाका आश्रय लेकर बहती हैं और जिन्हें भगवान् शङ्करने अपने मस्तकपर धारण कर रखा है, वे अपना नाम कीर्तन करनेपर मेरे पापको दग्ध कर दें ॥ ३४ ॥

प्रभासं च प्रयागं च नैमिषं पुष्कराणि च ॥ ३५ ॥
गङ्गातीर्थं कुरुक्षेत्रं श्रीकण्ठं गौतमाश्रमम् ।
रामह्रदं विनशनं रामतीर्थं तथैव च ॥ ३६ ॥
गङ्गाद्वारं कनखलं सोमो वै यत्र चोत्थितः ।
कपालमोचनं तीर्थं जम्बूमार्गं च विश्रुतम् ॥ ३७ ॥
सुवर्णबिन्दुं विख्यातं तथा कनकपिङ्गलम् ।
दशाश्वमेधिकं चैव पुण्याश्रमविभूषितम् ॥ ३८ ॥
बदरी चैव विख्याता नरनारायणाश्रमः ।
विख्यातं फल्गुतीर्थं च तीर्थं चन्द्रवटं तथा ॥ ३९ ॥
कोकामुखं पुण्यतमं गङ्गासागरमेव च ।
मगधेषु तपोदञ्च गङ्गोद्भेदञ्च विश्रुतः ॥ ४० ॥
तीर्थान्येतानि पुण्यानि सेवितानि महर्षिभिः ।
मां प्लावयन्तु सलिलैः यानि मे कीर्तितानि वै ॥ ४१ ॥

प्रभास, प्रयाग, नैमिष, पुष्कर, गङ्गातीर्थ, कुरुक्षेत्र श्रीकण्ठ, गौतमाश्रम, परशुरामकुण्ड, विनशनतीर्थ, रामतीर्थ, गङ्गाद्वार, कनखलतीर्थ, जहाँ सोमका उत्थान हुआ था, वह सोमोत्थानतीर्थ, कपालमोचनतीर्थ, सुविख्यात जम्बूमार्ग, सुवर्णबिन्दु नामसे विख्यात तीर्थ, कनकपिङ्गलतीर्थ, पवित्र आश्रमोंसे विभूषित दशाश्वमेधिक तीर्थ, सुविख्यात बदरीतीर्थ, नर-नारायणका आश्रम, फल्गुतीर्थ, चन्द्रवटतीर्थ, परम पवित्र कोकामुखतीर्थ, गङ्गासागर, मगधदेशीय तपोद तथा गङ्गोद्भेद नामसे विख्यात तीर्थ—ये महर्षियोंद्वारा सेवित सभी पुण्यतीर्थ, जिनका मैने यहाँ कीर्तन किया है, निश्चय ही मुझे अपने जलसे आप्लावित करें ॥ ३५--४१ ॥

सूकरं योगमार्गं च श्वेतद्वीपं तथैव च ।
ब्रह्मतीर्थे रामतीर्थे वाजिमेधशतोपमम् ॥ ४२ ॥
धारासम्पातसंयुक्ता गङ्गा किल्बिषनाशिनी ।
गङ्गा वैकुण्ठकेदारं सूकरोद्भेदकं परम् ।
तच्छापमोचनं तीर्थं पुनन्त्वेतानि किल्बिषात् ॥ ४३ ॥

सूकरतीर्थ, योगमार्ग, श्वेतद्वीप, ब्रह्मतीर्थ, सौ अश्वमेध यज्ञोंके समान फल देनेवाला रामतीर्थ, धाराके रूपमें गिरती हुई गङ्गा, पापनाशिनी गङ्गा, वैकुण्ठकेदार, उत्तम सूकरोद्भेदकतीर्थ तथा सुप्रसिद्ध शापमोचनतीर्थ—ये सारे तीर्थ मुझे पापसे रहित एवं पवित्र करें ॥ ४२-४३ ॥

धर्मार्थकामविषयो यशःप्राप्तिः शमो दमः ।
वरुणेशोऽथ धनदो यमो नियम एव च ॥ ४४ ॥
कालो नयः संततिश्च क्रोधो मोहः क्षमा धृतिः ।
विद्युतोऽभ्राण्यथौषध्यः प्रमादोन्मादविग्रहाः ॥ ४५ ॥
यक्षाः पिशाचा गन्धर्वाः किन्नराः सिद्धचारणाः ।
नक्तंचराः खेचरिणो दंष्ट्रिणः प्रियविग्रहाः ॥ ४६ ॥
लम्बोदराश्च बलिनः पिङ्गाक्षा विश्वरूपिणः ।
मरुतः सहपर्जन्याः कलात्रुटिलवाः क्षणाः ॥ ४७ ॥
नक्षत्राणि ग्रहाश्चैव ऋतवः शिशिरादयः ।
मासाहोरात्रयश्चैव सूर्याचन्द्रमसौ तथा ॥ ४८ ॥
आमोदश्च प्रमोदश्च प्रहर्षः शोक एव च ।
रजस्तमस्तपः सत्यं शुद्धिर्बुद्धिर्धृतिः श्रुतिः ॥ ४९ ॥
रुद्राणी भद्रकाली च भद्रा ज्येष्ठा तु वारुणी ।
भासी च कालिका चैव शाण्डिली चेति विश्रुताः ॥ ५० ॥
आर्या कुहूः सिनीवाली भीमा चित्ररथी रतिः ।
एकानंशा च कूष्माण्डी देवी कात्यायनी च या ॥ ५१ ॥
लोहित्या जनमाता च देवकन्यास्तु याः स्मृताः ।
गोनन्दा देवपत्नी च मां रक्षन्तु सबान्धवम् ॥ ५२ ॥

धर्म, अर्थ और कामविषयक शास्त्र, यशकी प्राप्ति, शम, दम, वरुण, ईश, धनद, यम, नियम, काल, नय, संतति, क्रोध, मोह, क्षमा, धृति, विद्युत्, मेघ, ओषधियाँ, प्रमाद, उन्माद, विग्रह, यक्ष, पिशाच, गन्धर्व, किन्नर, सिद्ध, चारण, निशाचर, खेचर, बड़ी-बड़ी दाढ़ोंवाले हिंसक जीव, जिन्हें विग्रह प्रिय है, बलवान्, लम्बोदर, पीले नेत्रवाले तथा विश्वरूपधारी गण, मरुद्गण, मेघ, कला, त्रुटि, लव, क्षण, नक्षत्र, ग्रह, शिशिर आदि ऋतु, मास, दिन, रात, सूर्य, चन्द्रमा, आमोद, प्रमोद, हर्ष, शोक, रज, तम, तप, सत्य, शुद्धि, बुद्धि, धृति, श्रुति, रुद्राणी, भद्रकाली, भद्रा, ज्येष्ठा, वारुणी, भासी, कालिका, शाण्डिली, आर्या, कुहू, सिनीवाली, भीमा, चित्ररथी, रति, एकानंशा, कूष्माण्डी, कात्यायनी देवी, लोहित्या, जनमाता, देवकन्याएँ, गोनन्दा तथा देवपत्नी—ये बन्धु-बान्धवोंसहित मेरी रक्षा करें ॥

नानाभरणवेशाश्च नानारूपाङ्किताननाः ।
नानादेशविचारिण्यो नानाशस्त्रोपशोभिताः ॥ ५३ ॥

६४८ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे


मेदॊमज्जाप्रियाश्चैव मद्यमांसवसाप्रियाः ।
मार्जारद्वीपिवक्त्राश्च गजसिंहनिभाननाः ॥ ५४ ॥
कङ्कवायसगृध्राणां क्रौञ्चतुल्याननास्तथा ।
व्यालयज्ञोपवीताश्च चर्मप्रावरणास्तथा ॥ ५५ ॥
क्षतजोक्षितवक्त्राश्च खरभेरीसमस्वनाः ।
मत्सराः क्रोधनाश्चैव प्रासादा रुचिरालयाः ॥ ५६ ॥
मत्तोन्मत्तप्रमत्ताश्च प्रहरन्त्यश्च धिष्ठिताः ।
पिङ्गाक्षाः पिङ्गकेशाश्च ततोऽन्या लूनमूर्धजाः ॥ ५७ ॥
ऊर्ध्वकेश्याः कृष्णकेश्याः श्वेतकेश्यस्तथापराः ।
नागायुतबलाश्चैव वायुवेगास्तथापराः ॥ ५८ ॥
एकहस्ता एकपादा एकाक्षाः पिङ्गला मताः ।
बहुपुत्राल्पपुत्राश्च द्विपुत्राः पुत्रमण्डिकाः ॥ ५९ ॥
मुखमण्डी विडाली च पूतना गन्धपूतना ।
शीतवातोष्णवेताली रेवती ग्रहसंज्ञिताः ॥ ६० ॥
प्रियहास्याः प्रियक्रोधाः प्रियवासाः प्रियंवदाः ।
सुखप्रदाश्चासुखदाः सदा द्विजजनप्रियाः ॥ ६१ ॥
नक्तंचराः सुखोदर्काः सदा पर्वणि दारुणाः ।
मातरो मातृवत्पुत्रं रक्षन्तु मम नित्यशः ॥ ६२ ॥

जो नाना प्रकारके आभूषण और वेष धारण करती हैं, जिनके मुखपर अनेक प्रकारके चित्र अङ्कित होते हैं, जो विभिन्न देशोंमें विचरनेवाली तथा अनेक शस्त्रोंसे सुशोभित हैं, जिन्हें मेदा, मज्जा, मद्य, मांस और वसा प्रिय है, जिनके मुख बिल्ली, बाघ, हाथी, सिंह, कंक, कौआ, गीध अथवा क्रौञ्चके समान हैं, जो सर्पमय यज्ञोपवीत धारण करनेवाली तथा चर्ममय वस्त्रसे अपने अङ्गोंको ढकनेवाली हैं, जिनके मुख रक्तसे अभिषिक्त हैं तथा जिनकी वाणी नगाड़ोंकी प्रखर ध्वनिकी भाँति गम्भीर है, जो ईर्ष्यालु और क्रोधी हैं, महल जिनके सुन्दर निवास हैं, जो मत्त, उन्मत्त और प्रमत्त रहकर प्रहार करती हुई घरोंमें स्थित रहती हैं, जिनके नेत्र और केश पिङ्गलवर्णके दिखायी देते हैं, इनके अतिरिक्त जिनके केश कटे हुए हैं, जिनके सिरके बाल ऊपरकी ओर उठे हैं, जो काले अथवा सफेद केश धारण करती हैं, जो छोटे कदकी हैं, जिनमें दस हजार हाथियोंके समान बल है तथा जो वायुके तुल्य वेगवाली हैं, जिनके एक पैर, एक हाथ और एक आँख है, जो देखनेमें पिङ्गल वर्णकी प्रतीत होती हैं, जो अधिक या थोड़े पुत्रवाली हैं, जिनके दो ही पुत्र हैं, जो पुत्रोंका शृङ्गार करनेवाली हैं, मुखमण्डी, विडाली, पूतना, गन्धपूतना, शीतवातोष्णवेताली तथा रेवती आदि नामोंसे जिनकी प्रसिद्धि है, जिन्हें बालग्रह कहते हैं, जिन्हें हास्य और क्रोध प्रिय है, जो वस्त्र एवं वासस्थानसे प्रेम करती हैं, सदा प्रिय वचन बोलती हैं, जो सुख और दुःख भी देती हैं तथा जो द्विजातियोंको सदा प्रिय हैं, जो रातमें विचरनेवाली तथा उपासकको भविष्यमें सुख देनेवाली हैं तथा जो पर्वकालमें सदा अपने दारुण स्वभावका परिचय देती हैं, वे मातृकाएँ मेरी प्रतिदिन रक्षा करें, जैसे माता अपने पुत्रकी रक्षा करती है ॥

पितामहमुखोद्भूता रौद्रा रुद्राङ्गसम्भवाः ।
कुमारस्वेदजाश्चैव ज्वरा वै वैष्णवादयः ॥ ६३ ॥
महाभीमा महावीर्या दर्पोद्भूता महाबलाः ।
क्रोधनाक्रोधनाः क्रूराः सुरविग्रहकारिणः ॥ ६४ ॥
नक्तंचराः केसरिणो दंष्ट्रिणः प्रियविग्रहाः ।
लम्बोदरा जघनिनः पिङ्गाक्षा विश्वरूपिणः ॥ ६५ ॥
शक्त्यृष्टिशूलपरिघप्रासचर्मासिपाणयः ।
पिनाकवज्रमुसलग्रहादण्डायुधप्रियाः ॥ ६६ ॥
दण्डिनः कुण्डिनः शूरा जटामुकुटधारिणः ।
वेदवेदाङ्गकुशला नित्ययज्ञोपवीतिनः ॥ ६७ ॥
व्यालापीडाः कुण्डलिनो वीराः केयूरधारिणः ।
नानावसनसंवीताश्चित्रमाल्यानुलेपनाः ॥ ६८ ॥
गजाश्वोष्ट्रर्क्षमार्जारसिंहव्याघ्रनिभाननाः ।
वराहोल्कगोमायुमृगाखुमहिषाननाः ॥ ६९ ॥
वामना चिकटाः कुब्जाः कराला लूनमूर्धजाः ।
सहस्रशतशश्चान्ये सहस्रजटधारिणः ॥ ७० ॥
श्वेताः कैलाससंकाशाः केचिद् दिनकरप्रभाः ।
केचिज्जलदवर्णाभा नीलाञ्जनचयोपमाः ॥ ७१ ॥
एकपादा द्विपादाश्च तथा त्रिशिरसोऽपरे ।
निर्मांसाः स्थूलजंघाश्च व्यादितास्या भयङ्कराः ॥ ७२ ॥
वापीतडागकूपेषु समुद्रेषु सरित्सु च ।
श्मशानशैलवृक्षेषु शून्यागारनिवासिनः ॥ ७३ ॥
एते ग्रहाश्च सततं रक्षन्तु मम सर्वतः ।

जो पितामह ब्रह्माजीके मुखसे प्रकट हुए हैं, रौद्र हैं, रुद्रदेवके अङ्गोंसे उत्पन्न हुए हैं, कुमार कार्तिकेयके स्वेदसे प्रकट हुए हैं तथा जो वैष्णव आदि ज्वर हैं, जो महाभयंकर, महापराक्रमी, दर्पयुक्त तथा महाबली हैं, क्रोधयुक्त अथवा क्रोधरहित हैं, जिनका स्वभाव क्रूर है, जो देवताओंके समान स्वरूप धारण करनेवाले हैं, जिनके गलेमें अयाल हैं, जो रात्रिमें विचरनेवाले हैं, जिनकी बड़ी-बड़ी दाढ़ें हैं, जिन्हें विग्रह प्रिय है, जिनके पेट लम्बे, कूल्हे मोटे और आँखें पिङ्गलवर्णकी हैं, जो विश्वरूपधारी हैं, जिनके हाथोंमें शक्ति, ऋष्टि, शूल, परिघ, प्रास, ढाल और तलवार आदि अस्त्र-शस्त्र शोभा पाते हैं, पिनाक, वज्र, मुसल और ग्रहदण्डनामक आयुध जिन्हें प्रिय हैं, जो दण्ड और कुण्ड धारण करते हैं, शूरवीर हैं, मस्तकपर जटा और मुकुट धारण किये रहते हैं, वेद और वेदाङ्गमें कुशल हैं, नित्य यज्ञोपवीतधारी हैं, माथेपर सर्पका मुकुट धारण करते हैं, जिनके कानोंमें कुण्डल और भुजाओंमें भुजबन्द शोभा पाते हैं, जो वीर हैं, नाना प्रकारके वस्त्र पहनते हैं, विचित्र माला और अनुलेप धारण करते हैं, जिनके मुख हाथी, घोड़े, ऊँट, रीछ, बिलाव, सिंह, व्याघ्र, सूअर, उल्लू,

[विष्णुपर्व ] नवाधिकशततमोऽध्यायः ६४९

गीदड़, मृग, चूहों और भैंसोंके समान हैं, जो बौने, विकट आकारवाले, कुबड़े, विकराल तथा कटे हुए केशवाले हैं, इनके सिवा जो लाखोंकी संख्यामें सहस्रों जटाएँ धारण करनेवाले हैं, जिनमेंसे कोई कैलास पर्वतके समान श्वेत, कोई दिनकरके समान दीप्तिमान्, कोई मेघोंके समान काले तथा कोई अञ्जनराशिके समान नील हैं, जो एक अथवा दो पैरोंसे युक्त हैं, जिनके दो-दो सिर हैं, जो मांसरहित कङ्काल-से दिखायी देते हैं, जिनकी पिण्डलियों बहुत मोटी हैं, जो मुँह बाये रहनेके कारण बड़े भयङ्कर प्रतीत होते हैं, बावड़ी, पोखरे, कुएँ, समुद्र, नदी, श्मशानभूमि, पर्वत, वृक्ष तथा सूने घरोंमें निवास करनेवाले हैं, ये ग्रह सदा सब ओरसे मेरी रक्षा करें ॥

महागणपतिर्नन्दी महाकालो महाबलः ।
माहेश्वरो वैष्णवश्च ज्वरौ लोकभयावहौ ॥ ७४ ॥
ग्रामणीश्चैव गोपालो भृङ्गीरिटिर्गणेश्वरः ।
देवश्च वामदेवश्च घण्टाकर्णः करंधमः ॥ ७५ ॥
श्वेतमोदः कपाली च जम्भकः शत्रुतापनः ।
मज्जनोन्मज्जनौ चोभौ संतापनविलापनौ ॥ ७६ ॥
निजघासोऽघसश्चैव स्थूणाकर्णः प्रशोषणः ।
उल्कामाली धमधमो ज्वालामाली प्रमर्दनः ॥ ७७ ॥
संघट्टनः संकुटनः काष्ठभूतः शिवंकरः ।
कूष्माण्डः कुम्भमूर्धा च रोचनो वैकृतो ग्रहः ॥ ७८ ॥
अनिकेतः सुरारिघ्नः शिवश्चाशिव एव च ।
क्षेमकः पिशिताशी च सुरारिर्हरिलोचनः ॥ ७९ ॥
भीमको ग्राहकश्चैव तथैवाग्रमयो ग्रहः ।
उपग्रहोऽर्यकश्चैव तथा स्कन्दग्रहोऽपरः ॥ ८० ॥
चपलोऽसमवेतालस्तामसः सुमहाकपिः ।
हृदयोद्वर्तनश्चैडः कुण्डाशी कङ्कणप्रियः ॥ ८१ ॥
हरिश्मश्रुर्गरुत्मन्तो मनोमारुतरंहसः ।
पार्वत्या रोषसम्भूताः सहस्राणि शतानि च ॥ ८२ ॥
शक्तिमन्तो धृतिमन्तो ब्रह्मण्याः सत्यसङ्गराः ।
सर्वकामापहन्तारो द्विषतां च मृधेमृधे ॥ ८३ ॥
रात्रावहनि दुर्गेषु कीर्तिताः सकलैर्गुणैः ।
तेषां गणानां पतयः सगणाः पान्तु मां सदा ॥ ८४ ॥

कङ्कणप्रिय, हरिश्मश्रु तथा मन और वायुके समान वेगशाली गरुत्मान्, पार्वतीके रोषसे उत्पन्न हुए सैकड़ों और हजारों गण, जो शक्तिमान्, धैर्यवान्, ब्राह्मणभक्त और सत्यप्रतिज्ञ हैं तथा प्रत्येक युद्धमें शत्रुओंकी सम्पूर्ण कामनाओंका विनाश करनेवाले हैं; इन सबका रात और दिनमें दुर्गम संकटके अवसरोंपर जब-जब कीर्तन किया जाय, तब-तब वे समस्त गणपति अपने सारे गुणों और सम्पूर्ण गणोंके साथ सदा मेरी रक्षा करें ॥ ७४-८४ ॥

नारदः पर्वतश्चैव गन्धर्वाप्सरसां गणाः ।
पितरः कारणं कार्यमाधयो व्याधयस्तथा ॥ ८५ ॥
अगस्त्यो गालवो गार्ग्यः शक्तिर्धौम्यः पराशरः ।
कृष्णात्रेयश्च भगवानसितो देवलो बलः ॥ ८६ ॥
बृहस्पतिरुतथ्यश्च मार्कण्डेयः श्रुतश्रवाः ।
द्वैपायनो विदर्भश्च जैमिनिर्माठरः कठः ॥ ८७ ॥
विश्वामित्रो वसिष्ठश्च लोमशश्च महामुनिः ।
उत्तङ्कश्चैव रैभ्यश्च पौलोमश्च द्वितस्त्रितः ॥ ८८ ॥
ऋषिर्वै कालवृक्षीयो मुनिर्मेधातिथिस्तथा ।
सारस्वतॊ यवक्रीतिः कुशिको गौतमस्तथा ॥ ८९ ॥
संवर्त ऋष्यशृङ्गश्च स्वस्त्यात्रेयो विभाण्डकः ।
ऋचीको जमदग्निश्च तथौर्वस्तपसां निधिः ॥ ९० ॥
भरद्वाजः स्थूलशिराः कश्यपः पुलहः क्रतुः ।
बृहदग्निर्हरिश्मश्रुर्विजयः कण्व एव च ॥ ९१ ॥
वैतण्डी दीर्घतपाश्च वेदगाथोंऽशुमांञ्छिवः ।
अष्टावक्रो दधीचिश्च श्वेतकेतुस्तथैव च ॥ ९२ ॥
उद्दालकः क्षीरपाणिः शृङ्गी गौरमुखस्तथा ।
अग्निवेश्यः शमीकश्च प्रमुचुर्मुमुचुस्तथा ॥ ९३ ॥
एते चान्ये च ऋषयो बहवः शंसितव्रताः ।
मुनयः शंसितात्मानो ये चान्ये नानुकीर्तिताः ॥ ९४ ॥
क्रतवः श्लाघिनः शान्ताः शान्तिं कुर्वन्तु मे सदा ।

महागणपति, नन्दी, महाबली महाकाल, लोकभयङ्कर माहेश्वर तथा वैष्णव ज्वर, ग्रामणी, गोपाल, भृङ्गीरिटि, गणेश्वर, देव, वामदेव, घण्टाकर्ण, करंधम, श्वेतमोद, कपाली, जम्भक, शत्रुतापन, मज्जन, उन्मज्जन, संतापन, विलापन, निजघास, अघस, स्थूणाकर्ण, प्रशोषण, उल्कामाली, धमधम, ज्वालामाली, प्रमर्दन, संघट्टन, संकुटन, काष्ठभूत, शिवङ्कर, कूष्माण्ड, कुम्भमूर्धा, रोचन, वैकृत ग्रह, अनिकेत, सुरारिघ्न, शिव, अशिव, क्षेमक, पिशिताशी, सुरारि, हरिलोचन, भीमक, ग्राहक, अग्रमय ग्रह, उपग्रह, अर्यक, स्कन्द-ग्रह, चपल, असमवेताल, तामस, सुमहाकपि, हृदयोद्वर्तन, ऐड, कुण्डाशी, नारद, पर्वत, गन्धर्वों और अप्सराओंके समुदाय, पितर, कारण, कार्य, आधि-व्याधि, अगस्त्य, गालव, गार्ग्य, शक्ति, धौम्य, पराशर, कृष्णात्रेय, ऐश्वर्यशाली असित-देवल, बल, बृहस्पति, उतथ्य, मार्कण्डेय, श्रुतश्रवा, द्वैपायन, विदर्भ, जैमिनि, माठर, कठ, विश्वामित्र, वसिष्ठ, महामुनि लोमश, उत्तङ्क, रैभ्य, पौलोम, द्वित, त्रित, कालकवृक्षीय ऋषि, मुनि मेधातिथि, सारस्वत, यवक्रीति, कुशिक, गौतम, संवर्त, ऋष्यशृङ्ग, स्वस्त्यात्रेय, विभाण्डक, ऋचीक, जमदग्नि, तपोनिधि और्व, भरद्वाज, स्थूलशिरा, कश्यप, पुलह, क्रतु, बृहदग्नि, हरिश्मश्रु, विजय, कण्व, वैतण्डी, दीर्घतपा, वेदगाथ, अंशुमान्, शिव, अष्टावक्र, दधीचि, श्वेतकेतु, उद्दालक, क्षीरपाणि, शृङ्गी, गौरमुख, अग्निवेश्य, शमीक, प्रमुचु तथा मुमुचु और दूसरे बहुत-से उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ऋषि

६५०श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

एवं शुद्धात्मा मुनि तथा दूसरे यज्ञपरायण स्पृहणीय तथा शान्त महर्षि जिनका यहाँ कीर्तन नहीं किया गया है, सदा मेरे लिये शान्ति प्रदान करें ॥ ८५-९४ १/२ ॥

त्रयोऽग्नयस्त्रयो वेदास्त्रैविद्याः कौस्तुभो मणिः ॥ ९५॥
उच्चैःश्रवा हयः श्रीमान् वैद्यो धन्वन्तरिर्हरिः ।
अमृतं गौः सुपर्णश्च दधि गौराश्च सर्षपाः ॥ ९६ ॥
शुक्लाः सुमनसः कन्याः श्वेतच्छत्रं यवाक्षताः ।
दूर्वा हिरण्यं गन्धाश्च वालव्यजनमेव च ॥ ९७ ॥
तथाप्रतिहतं चक्रं महोक्षश्चन्दनं विषम् ।
श्वेतो वृषः करी मत्तः सिंहो व्याघ्रो हयो गिरिः ॥ ९८ ॥
पृथिवी चोद्धृता लाजा ब्राह्मणा मधु पायसम् ।
स्वस्तिको वर्धमानश्च नन्द्यावर्तः प्रियङ्गवः ॥ ९९ ॥
श्रीफलं गोमयं मत्स्यो दुन्दुभिः पटहस्वनः ।
ऋषिपत्न्यश्च कन्याश्च श्रीमद् भद्रासनं धनुः ।
रोचना रुचकश्चैव नदीनां संगमोदकम् ॥ १००॥
सुपर्णाः शतपत्राश्च चकोरा जीवजीवकाः ।
नन्दीमुखो मयूरश्च बद्धमुक्तामणिध्वजाः ॥ १०१॥
आयुधानि प्रशस्तानि कार्यसिद्धिकराणि च ।

तीन अग्नि, तीन वेद, तीनों विद्याओंके ज्ञाता, कौस्तुभमणि, उच्चैःश्रवा अश्व, श्रीमान् धन्वन्तरि वैद्य, हरि, अमृत, गौ, सुपर्ण (गरुड़), दही, श्वेत सरसों, सफेद फूल, कुमारी कन्या, श्वेत छत्र, जौ, अक्षत, दूर्वादल, सुवर्ण, गन्ध, वालव्यजन (चँवर); कहीं भी प्रतिहत न होनेवाला सुदर्शनचक्र, साँड, चन्दन, विष, श्वेत वृषभ, मदमत्त हाथी, सिंह, व्याघ्र, घोड़ा, पर्वत खोदकर निकाली हुई मिट्टी, लाजा, ब्राह्मण, मधु, खीर, स्वस्तिक, वर्धमान, नन्द्यावर्त, प्रियङ्गु, श्रीफल, गोमय, मत्स्य, दुन्दुभि और पटहकी ध्वनि, ऋषिपत्नियों, कन्याएँ, शोभाशाली भद्रासन, धनुष, गोरोचन, रुचक, नदियोंके सङ्गमका जल, सुपर्ण, शतपत्र, चकोर, जीवजीवक, नन्दीमुख, मयूर, जिनमें मोती और मणि बँधे हुए हों ऐसे ध्वज, कार्यसिद्धि करनेवाले उत्तम आयुध—ये सब सदा ही मेरी रक्षा करें ॥ ९५-१०१ १/२ ॥

पुण्यं वै विगतक्लेशं श्रीमद् वै मङ्गलान्वितम् ॥ १०२॥
रामेणोदाहृतं पूर्वमायुःश्रीजयकाङ्क्षिणा ।

पूर्वकालमें आयु, लक्ष्मी तथा विजयकी अभिलाषा रखनेवाले बलरामजीने इस पवित्र क्लेशहारी और उनकी प्राप्ति करानेवाले मङ्गलयुक्त स्तोत्रका वर्णन किया था ॥ १०२ १/२ ॥

य इदं श्रावयेद् विद्वांस्तथैव शृणुयान्नरः ॥ १०३॥
मङ्गलाष्टशतं स्नातो जपन् पर्वणि पर्वणि ।
वधबन्धपरिक्लेशं व्याधिशोकपराभवम् ॥ १०४॥
न च प्राप्नोति वैकल्यं परत्रेह च शर्मदम् ।

जो विद्वान् मनुष्य प्रत्येक पर्वमें स्नान करके जपपरायण हो, इस आठ सौ माङ्गलिक नामोंसे युक्त स्तोत्रका श्रवण करता अथवा कराता है, वह वध और बन्धनके क्लेश, व्याधि एवं शोकसे प्राप्त होनेवाले पराभव और व्याकुलताको नहीं पाता है। यह स्तोत्र इहलोक और परलोकमें भी कल्याण प्रदान करनेवाला है ॥ १०३-१०४ १/२ ॥

धन्यं यशस्यमायुष्यं पवित्रं वेदसम्मितम् ॥ १०५॥
श्रीमत्स्वर्ग्यं सदा पुण्यमपत्यजननं शिवम् ।
शुभं क्षेमकरं नृणां मेधाजननमुत्तमम् ।
सर्वरोगप्रशमनं स्वकीर्तिकुलवर्धनम् ॥ १०६॥

इससे धन, यश और आयुकी प्राप्ति होती है। यह पवित्र तथा वेदके तुल्य आदरणीय है। यह श्रीसम्पन्न, स्वर्गदायक, सदा पुण्यकारक, कल्याणमय तथा संतानकी प्राप्ति करानेवाला है; इस शुभ, उत्तम एवं बुद्धिवर्धक स्तोत्रके सेवनसे मनुष्योंको क्षेमकी प्राप्ति होती है। इतना ही नहीं, यह समस्त रोगोंको शान्त करनेवाला तथा अपनी कीर्ति और कुलको बढ़ानेवाला है ॥ १०५-१०६ ॥

श्रद्दधानो दयोपेतो यः पठेदात्मसंयतः ।
सर्वपापविशुद्धात्मा लभते च शुभां गतिम् ॥ १०७॥

जो श्रद्धालु, दयालु और आत्मसंयमी मनुष्य इसका पाठ करता है, वह सब पापोंसे शुद्धचित्त हो शुभ गतिको भागी होता है ॥ १०७ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि बलदेवाह्निकं नाम नवाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें बलदेवाह्निक नामक एक सौ नवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०९ ॥


दशाधिकशततमोऽध्यायः

साम्बकी उत्पत्ति और अस्त्रशिक्षा तथा द्वारकामें पधारे हुए राजाओंके बीच नारदजीके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी परम धन्यताका प्रतिपादन

वैशम्पायन उवाचवैशम्पायनजी कहते हैं—
हतो यदैव प्रद्युम्नः शम्बरेणात्मघातिना ।<br>मासेऽस्मिन्नेव साम्बस्तु जाम्बवत्यामजायत ॥ १ ॥जनमेजय ! आत्मघाती शम्बरासुरने जब प्रद्युम्नका अपहरण किया था, उसी महीनेमें जाम्बवतीके गर्भसे साम्बका जन्म हुआ ॥ १ ॥

[विष्णुपर्व ] दशाधिकशततमोऽध्यायः ६५१


बाल्यात्प्रभृति रामेण शस्त्रेषु विनियोजितः ।
रामादनन्तरश्चैव मानितः सर्ववृष्णिभिः ॥ २ ॥
बलरामजीने साम्बको बचपनसे ही अस्त्र-शस्त्रोंके अभ्यासमें लगा रखा था। बलरामजीके बाद साम्ब ही उनके-जैसे अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञाता थे, इसलिये समस्त वृष्णिवंशी वीर उनका बड़ा सम्मान करते थे ॥ २ ॥

जातमात्रे ततः कृष्णः शुभां तामवसत् पुरीम् ।
निहतामित्रसामन्तः शक्रोद्यानं यथामरः ॥ ३ ॥
साम्बके जन्म लेनेके पश्चात् भगवान् श्रीकृष्ण अपने शत्रुभूत सामन्तोंका संहार करके शुभस्वरूपा द्वारकापुरीमें रहने लगे; जैसे कोई देवता इन्द्रके उद्यान नन्दनवनमें निवास करता हो ॥ ३ ॥

यादर्वी च श्रियं दृष्ट्वा स्वां श्रियं द्वेष्टि वासवः ।
जनार्दनभयाच्चैव न शान्तिं लेभिरे नृपाः ॥ ४ ॥
यदुवंशियोंकी सम्पत्ति देखकर देवराज इन्द्र अपनी राज्यलक्ष्मीसे द्वेष करने लगे थे । भगवान् श्रीकृष्णके भयसे राजाओंको कभी शान्ति नहीं मिलती थी ॥ ४ ॥

कस्यचित् त्वथ कालस्य पुरे वारणसाह्वये ।
दुर्योधनस्य यज्ञे वै समीयुः सर्वपार्थिवाः ॥ ५ ॥
किसी समय हस्तिनापुरमें दुर्योधनके यज्ञमें भूमण्डलके समस्त राजा एकत्र हुए ॥ ५ ॥

तां श्रुत्वा माधवीं लक्ष्मीं सपुत्रं च जनार्दनम् ।
पुरीं द्वारावतीं चैव निविष्टां सागरान्तरे ॥ ६ ॥
दूतैस्तैः कृतसंघानाः पृथिव्यां सर्वपार्थिवाः ।
श्रियं द्रष्टुं हृषीकेशमाजग्मुः कृष्णमन्दिरम् ॥ ७ ॥
वहाँ यदुवंशियोंकी राज्यलक्ष्मी, पुत्रसहित भगवान् श्रीकृष्ण तथा समुद्रके भीतर बसी हुई द्वारकापुरीकी विशेष चर्चा सुनकर अपने दूतोंद्वारा भगवान् श्रीकृष्णके साथ संधि स्थापित करके, पृथ्वीके समस्त भूपाल यादवोंकी राजलक्ष्मीका दर्शन करनेके लिये द्वारकामें भगवान् हृषीकेशके पास उनके निवास-मन्दिरमें आये ॥ ६-७ ॥

दुर्योधनमुखाः सर्वे धृतराष्ट्रवशानुगाः ।
पाण्डवप्रमुखाश्चैव धृष्टद्युम्नादयो नृपाः ॥ ८ ॥
पाण्ड्याश्चोलकलिङ्गाश्च बाह्लीका द्राविडाः खशाः।
अक्षौहिणीः प्रकर्षन्तो दश चाष्टौ च भूमिपाः ॥ ९ ॥
आजग्मुर्यादवपुरीं गोविन्दभुजपालिताम् ।
धृतराष्ट्रकी आज्ञाके अधीन रहनेवाले दुर्योधन आदि सब भाई, पाण्डवोंको अगुआ बनाकर चलनेवाले धृष्टद्युम्न आदि नरेश, पाण्ड्य, चोल और कलिङ्ग देशके भूपाल, बाह्लीक, द्राविड़ और खश देशोंके राजा अठारह अक्षौहिणी सेनाएँ साथ लिये श्रीकृष्णकी भुजाओंसे सुरक्षित यादव-पुरीमें आये ॥ ८-९ १/२ ॥

ते पर्वतं रैवतकं परिवार्थ्यावनीश्वराः ॥ १० ॥
विविशुर्योजनाख्यासु स्वासु स्वासु च भूमिषु ।
वे भूमिपाल रैवतक पर्वतको चारों ओरसे घेरकर अपने-अपने लिये निश्चित की हुई एक-एक योजनकी भूमिमें डेरा डालकर बस गये ॥ १० १/२ ॥

ततः श्रीमान् हृषीकेशः सह यादवपुङ्गवैः ॥ ११ ॥
समीपं मानवेन्द्राणां निर्ययौ कमलेक्षणः ।
तदनन्तर कमलनयन श्रीमान् हृषीकेश यादव-शिरोमणियों-के साथ पुरीसे निकलकर उन नरेन्द्रोंके समीप गये ॥११ १/२॥

स तेषां नरदेवानां मध्यस्थो मधुसूदनः ॥ १२ ॥
व्यराजत यदुश्रेष्ठः शरदीव दिवाकरः ।
उन नरदेवोंके बीचमें बैठे हुए यदुश्रेष्ठ मधुसूदन शरत्कालके सूर्यकी भाँति शोभा पाने लगे ॥ १२ १/२ ॥

स तत्र समुदाचारं यथास्थानं यथावयः ॥ १३ ॥
कृत्वा सिंहासने कृष्णः काञ्चने निषसाद ह ।
वहाँ स्थान और अवस्थाके अनुसार शिष्टाचारका निर्वाह करके भगवान् श्रीकृष्ण सोनेके सिंहासनपर विराजमान हुए ॥

राजानोऽपि यथास्थानं निषेदुर्विविधेष्वथ ॥ १४ ॥
सिंहासनेषु चित्रेषु पीठेषु च नराधिपाः ।
फिर वे नरेश भी नाना प्रकारके सिंहासनों और विचित्र पीठोंपर यथास्थान बैठे ॥ १४ १/२ ॥

स यादवनरेन्द्राणां समाजः शुशुभे तदा ॥ १५ ॥
सुराणामसुराणां च सदसि ब्रह्मणो यथा ।
वहाँ उस समय यादव नरेशोंका समाज ब्रह्माजीकी सभामें एकत्र हुए देवताओं और असुरोंके समाजकी भाँति शोभा पाने लगा ॥ १५ १/२ ॥

तेषां चित्राः कथास्तत्र प्रवृत्तास्तत्समागमे ।
यदूंनां पार्थिवानां च केशवस्योपशृण्वतः ॥ १६ ॥
उस राजसमाजमें वहाँ भगवान् श्रीकृष्णके सुनते हुए उन यादवों और भूपालोंमें विचित्र बातें होने लगीं ॥ १६ ॥

एतस्मिन्नन्तरे वायुर्ववौ मेघरवोपमः ।
तुमुलं दुर्दिनं चासीत् सविद्युत्स्तनयित्नुमत् ॥ १७ ॥
इसी बीचमें मेघोंकी गर्जनाके समान सनसनाहट पैदा करती हुई प्रचण्ड वायु चलने लगी । घोर दुर्दिन छा गया । बिजली चमकने और गड़गड़ाहट पैदा करने लगी ॥ १७ ॥

तद् दुर्दिनतलं भित्त्वा नारदः प्रत्यदृश्यत ।
संवेष्टितजटाभारो वीणासक्तेन बाहुना ॥ १८ ॥
उस दुर्दिनतल अर्थात् मेघोंके आवरणको भेदकर नारदजी दिखायी दिये, उन्होंने अपने सिरपर बढ़े हुए जटा-भारको लपेट रखा था, उनकी एक भुजामें वीणा थी ॥ १८ ॥

६५२ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


स पपात नरेन्द्राणां मध्ये सागरसंनिभः।
नारदोऽग्निशिखाकारः श्रीमाञ्छक्रसखो मुनिः॥ १९॥
वे समुद्रके समान गम्भीर और अग्नि-शिखाके समान तेजस्वी नारद मुनि जो देवराज इन्द्रके मित्र हैं, उन नरेशोंके बीचमें उतरे॥ १९॥

तस्मिन् निपतिते भूमौ नारदे मुनिपुङ्गवे।
तदद्भुतं महामेघं व्यपाकृष्यत दुर्दिनम्॥ २०॥
मुनिवर नारदजीके भूमिपर उतर आनेपर महान् मेघोंकी घटासे छाया हुआ वह अद्भुत दुर्दिन तत्काल दूर हो गया॥ २०॥

सोऽवगाह्य नरेन्द्राणां मध्ये सागरसंनिभः।
आसनस्थं यदुश्रेष्ठमुवाच मुनिरव्ययम्॥ २१॥
सागरसदृश गम्भीर स्वभाववाले नारद मुनिने उन नरेशोंके मध्यभागमें प्रवेश करके सिंहासनपर बैठे हुए अविनाशी यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा—॥ २१॥

आश्चर्यं खलु देवानामेकस्त्वं पुरुषोत्तमः।
धन्योऽस्यासि महाबाहो लोकेनान्योऽस्ति कश्चन॥ २२॥
'महाबाहो ! बड़े आश्चर्यकी बात है, अवश्य ही देवताओंमें एकमात्र आप ही पुरुषोत्तम हैं और आप ही धन्य हैं, संसारमें दूसरा कोई ऐसा नहीं है'॥ २२॥

एवमुक्तः स्मितं कृत्वा प्रत्युवाच मुनिं प्रभुः।
आश्चर्यश्चैव धन्यश्च दक्षिणाभिः सहेत्यहम्॥ २३॥
उनके ऐसा कहनेपर भगवान् श्रीकृष्ण मुसकराकर नारद मुनिसे बोले—'मैं दक्षिणाओंके साथ आश्चर्य एवं धन्य हूँ'॥

एवमुक्तो मुनिश्रेष्ठः प्राह मध्ये महीभृताम्।
कृष्ण पर्याप्तवाक्योऽस्मि गमिष्यामि यथागतम्॥ २४॥
भगवान्‌के ऐसा कहनेपर मुनिश्रेष्ठ नारद उन राजाओंके बीचमें इस प्रकार बोले—'श्रीकृष्ण ! मुझे अपनी बातका पूरा उत्तर मिल गया, अब मैं जैसे आया था वैसे ही लौट जाऊँगा' ॥ २४ ॥

तं प्रस्थितमभिप्रेक्ष्य पार्थिवाः प्राहिरीश्वरम्।
गुह्यं मन्त्रमजानन्तो वचनं नारदेरितम्॥ २५॥
उन्हें जाते देख उन नारदजीके कहे हुए गूढ़ मन्त्ररूपी वाक्यका तात्पर्य न जाननेवाले भूपालोंने भगवान्‌से कहा—॥

आश्चर्यमित्यभिहितं धन्योऽसीति च माधव।
दक्षिणाभिः सहेत्येवं प्रत्युक्तेऽपि च नारदे॥ २६॥
किमेतन्नाभिजानीमो दिव्यं मन्त्रपदं महत्।
यदि श्राव्यमिदं कृष्ण श्रोतुमिच्छाम तत्त्वतः॥ २७॥
'माधव ! नारदजीने आपके विषयमें आश्चर्य और धन्य कहा है और आपने 'दक्षिणाओंके साथ' ऐसा कहकर नारदजीको उनकी बातका उत्तर दे दिया है; यह सब हो जानेपर भी हम यह नहीं समझ सके कि 'यह क्या है ?' इस दिव्य एवं महान् मन्त्रपदका तात्पर्य क्या है ? श्रीकृष्ण ! यदि वह सुनानेयोग्य हो तो हमलोग यथार्थरूपसे इसका रहस्य सुनना चाहते हैं' ॥ २६-२७ ॥

तानुवाच ततः कृष्णः सर्वान् पार्थिवपुङ्गवान्।
श्रोतव्यं नारदस्तेव द्विजो वः कथयिष्यति॥ २८॥
तब भगवान् श्रीकृष्णने उन समस्त भूपाल-शिरोमणियोंसे कहा—'राजाओ ! यदि तुम्हें इसका तात्पर्य सुनना है तो ये विप्रवर नारदजी ही आपके समक्ष पूर्वोक्त वचनोंकी व्याख्या करेंगे' ॥ २८ ॥

ब्रूहि नारद तत्त्वार्थं श्रोतुकामा महीभुजः।
यत् त्वयाभिहितं वाक्यं मया नु प्रतिभाषितम्॥ २९॥
ऐसा कहकर वे नारदजीसे बोले—'नारदजी ! तुमने जो बात कही और मैंने जो उसका उत्तर दिया, उसका यथार्थ रहस्य ये राजालोग सुनना चाहते हैं; अतः आप इन्हें बताइये' ॥

स पीठे काञ्चने शुभ्रे सूपविष्टः स्वलंकृतः।
प्रभावं तस्य वन्द्यस्य प्रवक्तुमुपचक्रमे॥ ३०॥
तब वे सुन्दर सुवर्णमय पीठपर जमकर बैठ गये। वे सुन्दर अलंकारोंसे अलंकृत भी थे, उन्होंने उन वन्दनीय प्रभुके प्रभावका वर्णन इस प्रकार आरम्भ किया ॥ ३० ॥

नारद उवाच

श्रूयतां भो नृपश्रेष्ठा यावन्तः स्थ समागताः।
अस्य कृष्णस्य महतो यथा पारमहं गतः॥ ३१॥
नारदजी बोले—नृपवरो ! आपलोग जितनी संख्यामें यहाँ पधारे हैं, वे सुनें, मैं इन परम महान् श्रीकृष्णकी महिमाके पार कैसे पहुँचा, यह बता रहा हूँ ॥ ३१ ॥

अहं कदाचिद् गङ्गायास्तीरे त्रिशवणातिथिः।
चराम्येकः क्षपापाये दृश्यमाने दिवाकरे॥ ३२॥
अपश्यं गिरिकूटाभं कपालद्वयदेहिनम्।
क्रोशमण्डलविस्तारं तावद् द्विगुणमायतम्॥ ३३॥
चतुश्चरणसुश्लिष्टं क्लिन्नं चैव सपङ्किलम्।
मम वीणाकृतिं कूर्मं गजचर्मचयोपमम्॥ ३४॥
किसी समय मैं गङ्गाजीके तटपर तीनों समय स्नान करनेवाले अतिथिके रूपमें अकेला ही विचरता था। एक दिन जब रात बीत चुकी थी और सूर्यदेव दिखायी देने लगे थे, मैंने एक कछुआ देखा, जो पर्वतके शिखरके समान प्रतीत होता था। उसका शरीर दो कपालोंके संयोगसे बना था। उसका मण्डलाकार विस्तार एक कोसका था, लंबाई इससे दूनी थी। उसके चार पैर थे। वह पानीसे भीगा और कीचड़में सना हुआ था। उसकी आकृति मेरी वीणाके समान थी। उसे देखकर ऐसा जान पड़ता था, मानो हाथीके चमड़ेका ढेर लगा हो ॥ ३२-३४ ॥

[ विष्णुपर्व ] दशाधिकशततमोऽध्यायः ६५३


(प्रथम स्तम्भ)

सोऽहं तं पाणिना स्पृष्ट्वा प्रोक्तवाञ्जलचारिणम्।
त्वमाश्चर्यशरीरोऽसि कूर्म धन्योऽसि मे मतः ॥ ३५ ॥

मैंने उस जलचर जन्तुको हाथसे छूकर उससे कहा—'कूर्म ! तुम्हारा शरीर आश्चर्यजनक है। मेरे मतमें तुम धन्य हो ॥ ३५ ॥

यस्त्वमेवमभेद्याभ्यां कपालाभ्यां समावृतः।
तोये चरसि निःशङ्कः कंचिदन्यमचिन्तयन् ॥ ३६ ॥

'क्योंकि तुम दो अभेद्य कपालोंसे आवृत रहकर दूसरे किसीकी परवा न रखते हुए पानीमें निःशङ्क विचरते हो'॥ ३६ ॥

स मामुवाचाम्बुचरः कूर्मो मानुषवत्स्वयम्।
किमाश्चर्यं मयि मुने धन्यश्चाहं कथं विभो ॥ ३७ ॥

तब उस जलचर कछुएने स्वयं ही मनुष्यकी-सी बोलीमें मुझसे कहा—'मुने! मुझमें क्या आश्चर्य है? प्रभो! मैं कैसे धन्य हूँ ? ॥ ३७ ॥

गङ्गेयं निम्नगा धन्या किमाश्चर्यमतः परम्।
यत्राहमिव सत्त्वानि चरन्त्ययुतशो द्विज ॥ ३८ ॥

ब्रह्मन्! धन्य तो ये गङ्गा नदी हैं। इनसे बढ़कर आश्चर्यकी वस्तु और क्या है? जिनके भीतर मुझ-जैसे हजारों जलजन्तु विचरते हैं' ॥ ३८ ॥

सोऽहं कुतूहलाविष्टो नदीं गङ्गामुपस्थितः।
धन्यासि त्वं सरिच्छ्रेष्ठे नित्यमाश्चर्यभूषिता ॥ ३९ ॥
या त्वमेवं महादेहः श्वापदैरुपशोभिता।
ह्रदिनी सागरं यासि रक्षन्ती तापसाश्रमान् ॥ ४० ॥

तब मैं कौतूहलवश गङ्गा नदीके निकट गया और बोला—'सरिताओंमें श्रेष्ठ गङ्गे! तुम धन्य हो और सदा आश्चर्यसे विभूषित रहती हो, क्योंकि ऐसे-ऐसे विशालकाय हिंसक जन्तु तुम्हारी शोभा बढ़ाते हैं; तुम अनेकानेक कुण्डोंसे युक्त हो और कितने ही तापसोंके आश्रमोंकी रक्षा करती हुई समुद्रतक जाती हो' ॥ ३९-४० ॥

एवमुक्ता ततो गङ्गा रूपिणी प्रत्यभाषत।
नारदं देवगन्धर्वं शक्रस्य दयितं द्विजम् ॥ ४१ ॥

मेरे इस तरह कहनेपर गङ्गाजी अपने दिव्य रूपसे प्रकट होकर मुझ देवगन्धर्वजातीय तथा इन्द्रके प्रिय मित्र नारद नामक ब्राह्मणसे यों बोलीं—॥ ४१ ॥

मा मैवं देवगन्धर्व संग्रामकलहप्रिय।
नाहं धन्या द्विजश्रेष्ठ नैवाश्चर्योपशोभिता ॥ ४२ ॥

'देवगन्धर्व! ऐसा न कहो, न कहो। युद्ध और कलहके प्रेमी द्विजश्रेष्ठ! मै न तो धन्य हूँ और न आश्चर्यजनक जन्तुओंसे सुशोभित ही ॥ ४२ ॥

तव सत्ये निविष्टस्य वाक्यं मां प्रतिबाधते।
सर्वाश्चर्यकरो लोके धन्यश्चैवार्णवो द्विज ॥ ४३ ॥
यत्राहमिव विस्तीर्णाः शतशो यान्ति निम्नगाः।


(द्वितीय स्तम्भ)

'आप सत्यपरायण महर्षिका यह वचन मेरे प्रति बाधित हो रहा है। ब्रह्मन् ! संसारमें पूर्णतः आश्चर्यकारक और धन्य तो एकमात्र समुद्र ही है, जिसमे मुझ-जैसी सैकड़ो विस्तृत नदियाँ जाकर मिलती हैं' ॥ ४३ ½ ॥

सोऽहं त्रिपथगावाक्यं श्रुत्वार्णवमुपस्थितः ॥ ४४ ॥
आश्चर्यं खलु लोकानां धन्यश्चासि महार्णव।
येन खल्वसि योनस्त्वमम्भसां सलिलेश्वरः ॥ ४५ ॥

गङ्गाजीका उक्त वचन सुनकर मैं महासागरके तटपर गया और बोला—'महार्णव! तुम समस्त लोकोंमें आश्चर्यमय और धन्य हो, क्योंकि तुम जलकी योनि और स्वामी हो। ४४-४५।

स्थाने त्वां वारिवाहिन्यः सरितो लोकपावनाः।
इमाः समभिगच्छन्ति पत्न्यो लोकनमस्कृताः ॥ ४६ ॥

'जल बहानेवाली जो ये लोकपावन और विश्ववन्दित नदियाँ पत्नीभावसे तुम्हारे समीप जाती हैं, यह सब उचित ही है' ॥ ४६ ॥

समुद्रस्त्वेवमुक्तस्तु ततो मामवदद्-वचः।
स्वं जलौघतलं भित्त्वा व्युत्थितः पवनेरितः ॥ ४७ ॥

मेरे ऐसा कहनेपर पवनप्रेरित समुद्र अपनी अगाध जलराशिका भेदन करके उठ खड़ा हुआ और मुझसे इस प्रकार बोला—॥ ४७ ॥

मा मैवं देवगन्धर्व नास्म्याश्चर्यो द्विजर्षभ।
वसुधेयं मुने धन्या यत्राहमुपरि स्थितः ॥ ४८ ॥
ऋते तु पृथिवीं लोके किमाश्चर्यमतः परम्।

'देवगन्धर्व! आप ऐसा न कहें ! न कहे !! द्विजश्रेष्ठ! मैं ऐसा आश्चर्यरूप नहीं हूँ। मुने! धन्य तो यह वसुधा है, जिसके ऊपर मैं स्थित हूँ। संसारमे पृथ्वीके सिवा उससे बढ़कर आश्चर्यकी वस्तु दूसरी कौन है ?' ॥ ४८ ½ ॥

सोऽहं सागरवाक्येन क्षितिं क्षितितले स्थितः ॥ ४९ ॥
कौतूहलसमाविष्टो ह्यध्रुवं जगतो गतिम्।

समुद्रके कहनेसे मैं पृथ्वीपर खड़ा हुआ और कौतूहल-युक्त होकर जगत्की आधारस्वरूपा पृथ्वीसे बोला—॥४९ ½॥

धरित्रि देहिनां योने धन्या खल्वसि शोभने ॥ ५० ॥
आश्चर्यं चापि भूतेषु महत्या क्षमया युते।

'धरित्रि! तू समस्त देहधारियोंकी योनि है, अतः शोभने! तू निश्चय ही धन्य है। महती क्षमासे संयुक्त होनेके कारण तू सम्पूर्ण भूतोंमें आश्चर्यरूप है ॥ ५० ½ ॥

तेन खल्वसि भूतानां धरणी मनुजारणिः ॥ ५१ ॥
क्षमा त्वत्तः प्रभूता च कर्म चाम्बरगामिनाम्।

'अतः निश्चय ही तू समस्त प्राणियोंको धारण करनेवाली और मनुष्योंका उत्पत्ति-स्थान है। तुझसे ही क्षमाभाव प्रकट हुआ है। आकाशचारियोंका कर्म भी तुझसे ही सिद्ध होता है' ॥ ५१ ½ ॥

६५४श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

ततो भूः स्तुतिवाक्येन सा मयोक्तेन तेजिता ॥ ५२ ॥
विहाय सहजं धैर्यं प्रत्यक्षा मामभाषत ।

मेरे द्वारा कहे गये प्रशंसासूचक वचनसे पृथ्वी उत्तेजित-सी हो उठी। उसने अपनी सहज धीरता छोड़ दी और प्रत्यक्ष होकर मुझसे कहा—॥ ५२॥

देवगन्धर्व मा मैवं संग्रामकलहप्रिय ॥ ५३ ॥
नास्मि धन्या न चाश्चर्यं पारक्येयं धृतिर्मम ।

‘युद्ध और कलहसे प्रेम रखनेवाले देवगन्धर्व ! ऐसी बात न कहो ! न कहो !! न तो मैं धन्य हूँ और न आश्चर्यंरूप ही हूँ। मुझमें जो धीरता दिखायी देती है, यह मेरी नहीं दूसरोंकी है ॥ ५३॥

एते धन्या द्विजश्रेष्ठ पर्वता धारयन्ति माम् ॥ ५४ ॥
आश्चर्याणि च दृश्यन्ते एते लोकस्य हेतवः ।

‘द्विजश्रेष्ठ ! ये पर्वत धन्य हैं, जो मुझे धारण करते हैं। ये ही आश्चर्यंरूप देखे जाते हैं तथा ये ही इस जगत्‌की स्थितिके हेतु हैं’ ॥ ५४॥

सोऽहं धरणिवाक्येन पर्वतान् समुपस्थितः ॥ ५५ ॥
धन्या भवन्तो दृश्यन्ते बह्वाश्चर्याश्च भूधराः ।

पृथ्वीके इस कथनसे प्रभावित होकर मैं पर्वतोंके यहाँ उपस्थित हुआ और बोला—‘भूधरो ! तुम धन्य हो। तुममें बहुत-सी आश्चर्यकी बातें दिखायी देती हैं ॥ ५५॥

काञ्चनस्याग्ररत्नस्य धातूनां च विशेषतः ॥ ५६ ॥
तेन खल्वाकराः सर्वे भवन्तो भुवि शाश्वताः ।

‘सुवर्ण, श्रेष्ठ रत्न और विशेषतः धातुओंके उत्पत्तिस्थान होनेके कारण तुम सब लोग आकर कहलाते हो। इस भूतलपर तुम सब ही सदा बने रहते हो’ ॥ ५६॥

ते ममैतद् वचः श्रुत्वा पर्वतास्तस्थुषां वराः ॥ ५७ ॥
ऊचुर्मां सान्त्वयुक्तानि वचांसि वनशोभिताः ।

मेरी यह बात सुनकर स्थावर पदार्थोंमें श्रेष्ठ पर्वत, जो वनोंसे सुशोभित होते हैं, मुझसे सान्त्वनायुक्त वचन बोले—॥५७॥

ब्रह्मर्षे न वयं धन्या नाप्याश्चर्याणि सन्ति नः ।
ब्रह्मा प्रजापतिर्धन्यः सर्वाश्चर्यः सुरेष्वपि ॥ ५८ ॥

‘ब्रह्मर्षे ! न तो हम धन्य हैं और न हमारे पास आश्चर्यजनक वस्तुएँ ही हैं। प्रजापति ब्रह्माजी धन्य हैं, देवताओंमें भी वे ही सम्पूर्ण आश्चयोंसे युक्त हैं’ ॥ ५८ ॥

सोऽहं प्रजापतिं गत्वा सर्वप्रभवमव्ययम् ।
तस्य वाक्यस्य पर्यायपर्याप्तमिव लक्षये ॥ ५९ ॥

तब मैंने सबके उत्पत्तिस्थान अविनाशी प्रजापतिके पास जाकर उनमें पर्वतोंके कहे हुए वचनोंकी पर्याप्त सार्थकता देखी ॥ ५९ ॥

सोऽहं पितामहं देवं लोकयोनिं चतुर्मुखम् ।
स्तोतुं पश्चादुपगतः प्रणतोऽवनताननः ॥ ६० ॥

इसके बाद मैंने सम्पूर्ण लोकोंकी उत्पत्तिके स्थानभूत, चार मुखवाले पितामह देवको नतमस्तक होकर प्रणाम किया और फिर स्तवन करनेके लिये मैं उनके पास खड़ा हुआ ॥ ६० ॥

सोऽहं वाक्यसमाप्त्यर्थं श्रावये पद्मयोनिजम् ।
आश्चर्यं भगवानेको धन्योऽसि जगतो गुरुः ॥ ६१ ॥

स्तुतिके बाद अपनी बात समाप्त करनेके लिये मैंने पद्मयोनि ब्रह्माजीको सुनाते हुए कहा—‘भगवन् ! एकमात्र आप ही आश्चर्यमय हैं, आप ही सम्पूर्ण जगत्‌के गुरु एवं धन्य हैं ॥ ६१ ॥

न किंचिदन्यत् पश्यामि भूतं यद् भवता समम् ।
त्वत्तः सर्वमिदं जातं जगत् स्थावरजङ्गमम् ॥ ६२ ॥

‘मैं दूसरे किसी भूतको ऐसा नहीं देखता, जो आपके समान हो। यह सम्पूर्ण चराचर जगत् आपसे ही उत्पन्न हुआ है ॥ ६२ ॥

सदेवदानवा मर्त्या लोके भूतेन्द्रियात्मकाः ।
भवन्ति सर्वदेवेश दृष्ट्वा सर्वमिदं जगत् ॥ ६३ ॥

‘सर्वदेवेश्वर ! संसारमें भूत और इन्द्रियमय जो देवता, दानव और मनुष्य आदि प्राणी देखे जाते हैं, वे सब आपसे ही उत्पन्न होते हैं, इस सम्पूर्ण जगत्‌को देखकर यही निश्चय होता है ॥ ६३ ॥

तेन खल्वसि देवानां देवदेवः सनातनः ।
तेषामेवासि यत्स्रष्टा लोकानामादिसम्भवः ॥ ६४ ॥

‘इसलिये आप अवश्य ही देवताओंके सनातन देवाधिदेव हैं; क्योंकि आप ही उनके स्रष्टा हैं और आप ही समस्त लोकोंके आदिकारण हैं’ ॥ ६४ ॥

ततो मां प्राह भगवान् ब्रह्मा लोकपितामहः ।
धन्याश्चर्याश्रितैर्वाक्यैः किं मां नारद भाषसे ॥ ६५ ॥

तब लोकपितामह भगवान् ब्रह्माने मुझसे कहा—‘नारद ! धन्य और आश्चर्यके विवेचनसे सम्बन्ध रखनेवाले वचनोंद्वारा मेरे विषयमें क्या कहते हो ? ॥ ६५ ॥

आश्चर्यं परमं वेदा धन्या वेदाश्च नारद ।
ये लोकान् धारयन्ति स्म वेदास्तत्त्वार्थदर्शिनः ॥ ६६ ॥

‘नारद ! सबसे महान् आश्चर्य तो वेद हैं, वे ही धन्य भी हैं; क्योंकि वे तत्त्वार्थदर्शी वेद सम्पूर्ण लोकोंको धारण करते हैं ॥ ६६ ॥

ऋक्सामयजुषां सत्यमथर्वणि च यन्मतम् ।
तन्मयं विद्धि मां विप्र धृतोऽहं तैर्मया च ते ॥ ६७ ॥

विष्णुपर्व ] दशाधिकशततमोऽध्यायः ६५५

'विप्रवर ! ऋक्, साम और यजुर्वेदका जो सत्य है तथा अथर्ववेदमे जो सत्य माना गया है, उसीको मेरा स्वरूप समझो। वेदोंने मुझे धारण कर रखा है और मैंने वेदोंको' ॥

पारमेष्ठ्येन वाक्येन नोदितोऽहं स्वयम्भुवा । वेदोपस्थानिकां चक्रे मतिं संस्थानविस्तरात् ॥ ६८ ॥

तब स्वयम्भू ब्रह्माजीके कहे हुए उनके स्वरूपके अनुरूप वचनसे प्रेरित हो मैंने लक्षणविस्तारके अनुसार वेदोंके उपस्थानका विचार किया ॥ ६८ ॥

सोऽहं स्वयम्भूवचनाद् वेदान् वै समुपस्थितः । अवोचं तांश्च चतुरो मन्त्रप्रवचनान्वितान् ॥ ६९ ॥

स्वयम्भू ब्रह्माजीके वचनसे मैंने मन्त्र और व्याख्यासे युक्त पूर्वोक्त चारों वेदोंकी सेवामें उपस्थित हो उनसे कहा—॥

धन्या भवन्तः पुण्याश्च नित्यमाश्चर्यभूषिताः । आधाराश्चैव विप्राणामेवमाह प्रजापतिः ॥ ७० ॥

'आपलोग धन्य हैं, पवित्र हैं और सदा आश्चर्यसे विभूषित रहते हैं। ब्राह्मणोंके आधार भी आप ही हैं, ऐसा प्रजापतिका कथन है ॥ ७० ॥

स्वयम्भुवोऽपीह परं भवत्सु प्रश्नमागतम् । युष्मत्परतरं नास्ति श्रुत्या वा तपसापि वा ॥ ७१ ॥

'आपलोगोंके विषयमे स्वयम्भू ब्रह्माजीका भी यही निर्णय है कि आपलोग सबसे श्रेष्ठ हैं। श्रुति अथवा तपस्याके द्वारा भी आपलोगोंसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है' ॥ ७१ ॥

प्रत्यूचुस्ते ततो वाक्यं वेदा मामभितः स्थिताः । आश्चर्याश्चैव धन्याश्च यज्ञाश्चात्मपरायणाः ॥ ७२ ॥

तब चारों वेदोंने मेरे सब ओर खड़े होकर इस प्रकार उत्तर दिया—'नारद ! परमात्माके उद्देश्यसे किये जानेवाले यज्ञ ही आश्चर्य और धन्य हैं ॥ ७२ ॥

यज्ञार्थे च वयं सृष्टा धात्रा येन स्म नारद । तदस्माकं परो यज्ञो न वयं स्ववशे स्थिताः ॥ ७३ ॥ स्वयम्भुवः परा वेदा वेदानां क्रतवः पराः ।

'नारद ! परमात्माने यज्ञके लिये ही हमें प्रकट किया है, अतः यज्ञ ही हमसे उत्कृष्ट है। हम अपने वशमें नहीं हैं, स्वयम्भू ब्रह्मासे उत्कृष्ट वेद हैं और वेदोंसे उत्कृष्ट यज्ञ हैं।'

ततोऽहमब्रुवं यज्ञान् बृहद्वाग्भिः पुरस्कृतान् ॥ ७४॥ भो यज्ञाः परमं तेजो युष्मासु खलु लक्ष्यते ।

तब मैंने वेदोंकी वाणीसे पुरस्कृत हुए यज्ञोंसे कहा—'यज्ञो ! तुमलोगोंमें सबसे उत्कृष्ट तेज दिखायी देता है॥७४१/२॥

ब्रह्मणाभिहितं वाक्यं यच्च वेदैरुदीरितम् ॥ ७५ ॥ आश्चर्यमन्यल्लोकेऽस्मिन् भवद्भ्यो नाभिगम्यते ।

'ब्रह्माजीने जो बात कही है और वेदोंनें जिस प्रकार प्रतिपादन किया है, उसके अनुसार इस जगत्में आपलोगोंके सिवा दूसरी कोई आश्चर्यकी वस्तु नहीं ज्ञात होती है ॥ ७५१/२ ॥

धन्याः खलु भवन्तो ये द्विजातीनां स्ववंशजाः ॥ ७६ ॥ तेऽपि खल्वग्नयस्तृप्तिं युष्माभियान्ति तर्पिताः । भागैश्च त्रिदशाः सर्वे मन्त्रैश्चैव महर्षयः ॥ ७७ ॥

'आपलोग धन्य हैं, जो द्विजातियोंके वंशज हैं। आपलोगोंसे तर्पित होनेपर त्रिविध अग्नियोंको तृप्ति प्राप्त होती है। यज्ञोंमें ही सब देवता अपने भागोंसे और महर्षिगण मन्त्रोंसे तृप्त होते हैं' ॥ ७६-७७ ॥

अग्निष्टोमादयो यज्ञा मम वाक्यादनन्तरम् । प्रत्यूचुर्मां ततो वाक्यं सर्वे यूपध्वजाः स्थिताः ॥ ७८ ॥

मेरे ऐसा कहनेके बाद यूपरूपी ध्वजसे सुशोभित समस्त अग्निष्टोम आदि यज्ञ खड़े होकर मुझसे बोले—॥ ७८ ॥

आश्चर्यशब्दो नास्मासु धन्यशब्दोऽपि वा मुने । आश्चर्यं परमं विष्णुः स ह्यस्माकं परा गतिः ॥ ७९ ॥

'मुने ! यह आश्चर्य अथवा धन्य शब्द हमलोगोंके लिये उपयुक्त नहीं है। भगवान् विष्णु ही परम आश्चर्यरूप हैं; क्योंकि वे ही हमारी परम गति हैं ॥ ७९ ॥

यदाज्यं वयमश्नीमो हुतमग्निषु पावनम् । तत् सर्वं पुण्डरीकाक्षो लोकमूर्तिः प्रयच्छति ॥ ८० ॥

'अग्निमें होमे गये जिस पावन आज्य-भागका हमलोग आस्वादन करते हैं, वह सब विश्वरूप कमलनयन भगवान् विष्णु हमें प्रदान करते हैं' ॥ ८० ॥

सोऽहं विष्णोर्गतिं प्रेप्सुरिह सम्पतितो भुवि । दृष्टश्चायं मया कृष्णो भवद्भिरिह संवृतः ॥ ८१ ॥

वेदोंके इस कथनके अनुसार मै भगवान् विष्णुकी गति प्राप्त करनेके लिये यहाँ इस पृथ्वीपर आया हूँ। यहाँ आप राजाओंसे घिरे हुए भगवान् श्रीकृष्णका मैंने दर्शन किया है ॥

यन्मयाभिहितो ह्येष त्वमाश्चर्यं जनार्दन । धन्यश्चासीति भवतां मध्यस्थो ह्यत्र पार्थिवाः ॥ ८२ ॥

राजाओ ! मैंने जो श्रीकृष्णके विषयमें यह कहा है कि 'जनार्दन ! तुम आश्चर्यरूप और धन्य हो,' वे ही यहाँ आपलोगोंके बीचमें विराजमान हैं ॥ ८२ ॥

प्रत्युक्तोऽहमनेनाद्य वाक्यस्यास्य यदुत्तरम् । दक्षिणाभिः सहेत्येवं पर्याप्तं वचनं मम ॥ ८३ ॥

इन्होंने आज मेरी इस बातका जो उत्तर दिया है कि 'दक्षिणाओंके सहित (मैं धन्य हूँ),' यह मेरे प्रश्नका पर्याप्त उत्तर प्राप्त हो गया ॥ ८३ ॥

यज्ञानां हि गतिर्विष्णुः सर्वेषां सहदक्षिणः । दक्षिणाभिः सहेत्येवं प्रश्नो मम समाप्तवान् ॥ ८४ ॥

६५६श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

क्योंकि दक्षिणाओंसहित विष्णु ही सब यज्ञोंके आश्रय हैं, इसलिये 'दक्षिणाओंसहित' इतना कह देनेपर मेरा प्रश्न समाप्त हो गया ॥ ८४ ॥
कूर्मेणाभिहितं पूर्वं पारम्पर्यादिहागतम् ।
सदक्षिणेऽस्मिन् पुरुषे तद्वाक्यं प्रतिपादितम् ॥ ८५ ॥
पहले कच्छपने धन्यताका प्रतिपादन आरम्भ किया था; फिर परम्परासे यहाँ इन दक्षिणासहित परमपुरुष श्रीकृष्णमें उसका उपसंहार हुआ है; अतः कौन धन्य है इस बातका उत्तर प्राप्त हो गया ॥ ८५ ॥
यन्मां भवन्तः पृच्छन्ति वाक्यस्यास्य विनिर्णयम्।
तदेतत् सर्वमाख्यातं साधयाम्यथागतम् ॥ ८६ ॥
आपलोग जो मेरे पूर्वोक्त कथनका निश्चित तात्पर्य पूछ रहे थे, उसके विषयमें यह सब कुछ मैंने बता दिया । अब मैं जैसे आया था, वैसे जा रहा हूँ ॥ ८६ ॥
नारदे तु गते स्वर्गं सर्वे ते पृथिवीभुजः।
विस्मिताः स्वानि राष्ट्राणि जग्मुः सबलवाहनाः ॥ ८७ ॥
नारदजीके स्वर्गलोकको चले जानेपर वे समस्त भूपाल विस्मित होकर सेना और सवारियोंसहित अपने राष्ट्रोंको चले गये ॥ ८७ ॥
जनार्दनोऽपि सहितो यदुभिः पावकोपमैः ।
स्वमेव भवनं वीरो विवेश यदुनन्दनः ॥ ८८ ॥
तत्पश्चात् यदुकुलको आनन्दित करनेवाले वीर जनार्दन भी अग्निके समान तेजस्वी यदुवंशी वीरोंके साथ अपने ही भवनमें पधारे ॥ ८८ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि धन्योपाख्यानं नाम दशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें धन्योपाख्यानविषयक एक सौ दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥११०॥


एकादशाधिकशततमोऽध्यायः

श्रीकृष्णकी महिमा—अर्जुनका श्रीकृष्णसे आज्ञा लेकर ब्राह्मण-बालककी रक्षाके लिये जाना

जनमेजय उवाच
भूय एव महाबाहो कृष्णस्य जगतां पतेः।
माहात्म्यं श्रोतुमिच्छामि परं द्विजसत्तम ॥ १ ॥
जनमेजयने कहा—महाबाहो ! द्विजश्रेष्ठ ! मैं पुनः जगदीश्वर श्रीकृष्णका उत्तम माहात्म्य सुनना चाहता हूँ॥१॥
न हि मे तृप्तिरस्तीह शृण्वतस्तस्य धीमतः ।
कर्मणामनुसंतानं पुराणस्य महात्मनः ॥ २ ॥
उन परम बुद्धिमान् महात्मा पुराणपुरुष श्रीकृष्णके कर्मोंकी परम्पराका श्रवण करनेसे मुझे यहाँ तृप्ति नहीं हो रही है ॥ २ ॥

वैशम्पायन उवाच
नान्तः शक्यः प्रभावस्य वक्तुं वर्षशतैरपि ।
गोविन्दस्य महाराज श्रूयतामिदमद्भुतम् ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजी बोले—महाराज जनमेजय ! भगवान् गोविन्दके प्रभावका पूरा-पूरा वर्णन करना—उसका अन्त बता देना तो सैकड़ों वर्षोंमें भी सम्भव नहीं है । अतः उनके इस अद्भुत माहात्म्यका वर्णन सुनो ॥ ३ ॥
शरतल्पे शयानेन भीष्मेण परिचोदितः ।
गाण्डीवधन्वा वीभत्सुर्माहात्म्यं केशवस्य यत् ॥ ४ ॥
राज्ञां मध्ये महाराज ज्येष्ठं भ्रातरमब्रवीत् ।
युधिष्ठिरं जितामित्रमिति तच्छृणु कौरव ॥ ५ ॥
महाराज कुरुनन्दन ! बाणशय्यापर सोये हुए पितामह भीष्मकी आज्ञा पाकर गाण्डीवधन्वा अर्जुनने समस्त राजाओंके बीच अपने शत्रुविजयी ज्येष्ठ भ्राता युधिष्ठिरसे भगवान् केशवका जो माहात्म्य बताया था, उसीका वर्णन करता हूँ; सुनो ॥ ४-५ ॥

अर्जुन उवाच
पुराहं द्वारकां यातः सम्बन्धीनवलोककः ।
न्यवसं पूजितस्तत्र भोजवृष्ण्यन्धकोत्तमैः ॥ ६ ॥
अर्जुन बोले—पहलेकी बात है, मैं अपने सगे-सम्बन्धियोंसे मिलने-जुलनेके लिये द्वारकापुरीमें गया था। वहाँ उत्तम भोज, वृष्णि और अन्धक वीरोंसे सम्मानित हो कई दिनोंतक रहा ॥ ६ ॥
ततः कदाचिद् धर्मात्मा दीक्षितो मधुसूदनः ।
एकाहेन महाबाहुः शास्त्रदृष्टेन कर्मणा ॥ ७ ॥
एक दिन धर्मात्मा महाबाहु मधुसूदनने शास्त्रोक्त-विधिसे एकाह सोमयागकी दीक्षा ली ॥ ७ ॥
ततो दीक्षितमासीनमभिगम्य द्विजोत्तमः ।
कृष्णं विज्ञापयामास त्राहि त्राहीति चाब्रवीत् ॥ ८ ॥
भगवान् श्रीकृष्ण ज्यों ही दीक्षा लेकर बैठे त्यों ही एक श्रेष्ठ ब्राह्मणने उनके पास पहुँचकर अपना संकट निवेदन किया और कहा—'प्रभो ! रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये'॥८॥

ब्राह्मण उवाच
रक्षाधिकारो भवतः परित्रायस्व मां विभो ।
चतुर्थांशं हि धर्मस्य रक्षिता लभते फलम् ॥ ९ ॥

विष्णुपर्व ] द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः [ ६५७


ब्राह्मणने फिर कहा—प्रभो ! रक्षा करना आपके अधिकारकी बात है, आप मेरी रक्षा कीजिये; क्योंकि जो रक्षा करता है, वह रक्षित पुरुषके धर्मका चतुर्थांश फल प्राप्त कर लेता है ॥ ९ ॥

वासुदेव उवाच
न भेतव्यं द्विजश्रेष्ठ रक्षामि त्वां कुतो भयम्।
ब्रूहि तत्त्वेन भद्रं ते यद्यपि स्यात् सुदुष्करम् ॥ १० ॥

**भगवान् श्रीकृष्ण बोले—**द्विजश्रेष्ठ ! तुम्हे डरना नहीं चाहिये। मैं तुम्हारी रक्षा करूँगा। तुम्हारा भला हो, ठीक-ठीक बताओ तुम्हे किससे भय है ? यदि अत्यन्त दुष्कर कार्य हो तो भी उसे कहनेमें संकोच न करो ॥ १० ॥

ब्राह्मण उवाच
जातो जातो महाबाहो पुत्रो मे ह्रियतेऽनघ।
त्रयो हृताश्चतुर्थं त्वं कृष्ण रक्षितुमर्हसि ॥ ११ ॥

ब्राह्मणने कहा— महाबाहो ! निष्पाप श्रीकृष्ण ! जब मेरे पुत्र पैदा होता है, तब-तब काल उसे हर ले जाता है। इस प्रकार मेरे तीन पुत्र हर लिये गये। अब चौथा पुत्र होनेवाला है, अतः आप ही उसकी रक्षा करनेयोग्य हैं ॥ ११ ॥

ब्राह्मण्याः सूतिकालेऽद्य तत्र रक्षा विधीयताम्।
यथा म्रियेदपत्यं मे तथा कुरु जनार्दन ॥ १२ ॥

जनार्दन ! आज ब्राह्मणी (मेरी पत्नी) के प्रसवका समय है, अतः वहाँ रक्षा कीजिये। यह मेरी संतान जिस तरह भी जीवित बच जाय, वह उपाय कीजिये ॥ १२ ॥

अर्जुन उवाच
ततो मामाह गोविन्दो दीक्षितोऽहं क्रताविति ।
रक्षा च ब्राह्मणे कार्या सर्वावस्थागतैरपि ॥ १३ ॥

**अर्जुन कहते हैं—**तब भगवान् गोविन्दने मुझसे कहा—'पार्थ ! मैं तो यज्ञकी दीक्षा ले चुका, परंतु सभी अवस्थाओंमें भी ब्राह्मणकी रक्षा तो करनी ही चाहिये' ॥ १३ ॥

श्रुत्वाहमेवं कृष्णस्य वचोऽवोचं नराधिप ।
मां नियोजय गोविन्द रक्षिष्येऽहं द्विजं भयात् ॥ १४ ॥

नरेश्वर ! श्रीकृष्णका ऐसा वचन सुनकर मैंने उनसे कहा—'गोविन्द ! आप मुझे इस कार्यमें नियुक्त कीजिये। मैं इस ब्राह्मणकी भयसे रक्षा करूँगा' ॥ १४ ॥

इत्युक्तः स स्मितं कृत्वा मामुवाच जनार्दनः ।
रक्षसीत्येवमुक्तस्तु व्रीडितोऽस्मि नराधिप ॥ १५ ॥

नरेश्वर ! मेरे ऐसा कहनेपर जनार्दन मुसकराकर मुझसे बोले—'क्या तुम रक्षा कर लोगे ?' उनकी यह बात सुनकर मैं लज्जित हो गया ॥ १५ ॥

ततो मां व्रीडितं मत्वा पुनराह जनार्दनः ।
गम्यतां कौरवश्रेष्ठ शक्यते यदि रक्षितुम् ॥ १६ ॥

तब मुझे लज्जित जानकर जनार्दनने फिर कहा—'कौरवश्रेष्ठ ! यदि तुम रक्षा कर सको तो जाओ ॥ १६ ॥

त्वत्पुरोगाश्च रक्षन्तु वृष्ण्यन्धकमहारथाः ।
ऋते रामं महाबाहुं प्रद्युम्नं च महाबलम् ॥ १७ ॥

'महाबाहु बलराम तथा महाबली प्रद्युम्नको छोड़कर अन्य वृष्णि और अन्धकवंशी महारथी तुम्हे अगुआ बनाकर जायें और इस ब्राह्मणकी रक्षा करें' ॥ १७ ॥

ततोऽहं वृष्णिसैन्येन महता परिवारितः ।
तमग्रतो द्विजं कृत्वा प्रयातः सह सेनया ॥ १८ ॥

तब मैं वृष्णिवीरोंकी विशाल सेनासे घिरकर उस ब्राह्मणको आगे करके सेनाके साथ आगे बढ़ा ॥ १८ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि वासुदेवमाहात्म्ये एकादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १११ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें वासुदेवका माहात्म्यविषयक एक सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १११ ॥


द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः

ब्राह्मणबालककी रक्षा न होनेपर ब्राह्मणद्वारा अर्जुनका तिरस्कार और श्रीकृष्णके साथ उनका उत्तर दिशाको गमन

अर्जुन उवाच

मुहूर्तेन वयं ग्रामं तं प्राप्य भरतर्षभ।<br>विश्रान्तवाहनाः सर्वे निवासायोपसंस्थिताः ॥ १ ॥ततो ग्रामस्य मध्येऽहं निविष्टः कुरुनन्दन ।<br>समन्ताद् वृष्णिसैन्येन महता परिवारितः ॥ २ ॥
अर्जुन कहते हैं—भरतश्रेष्ठ ! तदनन्तर दो ही घड़ीमें हम सब लोग उस ब्राह्मणके गाँवमें पहुँचकर वहाँ ठहरनेकी व्यवस्थामें लग गये और हमारे वाहन विश्राम करने लगे ॥ १ ॥कुरुनन्दन ! इसके बाद चारों ओरसे विशाल वृष्णिसैनासे घिरा हुआ मैं उस गाँवके भीतर प्रविष्ट हुआ ॥ २ ॥
ततः शकुनयो दीप्ता मृगाश्च क्रूरभाषिणः।<br>दीप्तायां दिशि वाशन्तो भयमावेदयन्ति मे ॥ ३ ॥
६५८श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

उस समय मुखसे आग उगलनेवाले बहुत-से पक्षी तथा क्रूरतापूर्ण बोली बोलनेवाले मृग सामने आ गये और दाहयुक्त दिशामें अव्यक्त शब्द करते हुए मुझे भयकी सूचना देने लगे ॥

संध्यारागो जपावर्णो भानुमांश्चैव निष्प्रभः ।
पपात महती चोल्का पृथिवी चाप्यकम्पत ॥ ४ ॥

संध्याका रंग जपा-कुसुमके समान दिखायी दिया। सूर्यदेव प्रभाहीन प्रतीत हुए। आकाशसे उल्कापात हुआ और पृथ्‍वी काँपने लगी ॥ ४ ॥

तान् समीक्ष्य महोत्पातान् दारुणाँल्लोमहर्षणान् ।
योगमाज्ञापयंस्तत्र जनस्योत्सुकचेतसः ॥ ५ ॥
युयुधानपुरोगाश्च वृष्ण्यन्धकमहारथाः ।
सर्वे युक्तरथाः सज्जाः स्वयं चाहं तथाभवम् ॥ ६ ॥

उन भयंकर एवं रोमाञ्चकारी बड़े-बड़े दारुण उत्पातोंको देखकर सात्यकि आदि वृष्णि और अन्धकवंशके महारथियोंने उत्सुक चित्तवाले लोगोंको तैयार हो जानेकी आज्ञा दे दी। सबके रथ जोत दिये गये; सभी सुसज्जित हो गये। स्वयं मैं भी सब प्रकारसे तैयार हो गया ॥ ५-६ ॥

गतेऽर्धरात्रसमये ब्राह्मणो भयविह्वलः ।
उपागम्य भयादस्मानिदं वचनमब्रवीत् ॥ ७ ॥

जब आधी रातका समय बीत गया, तब ब्राह्मण भयसे व्याकुल होकर हमलोगोंके पास आया और भयभीत होकर इस प्रकार बोला—॥ ७ ॥

कालोऽयं समुदुप्राप्तो ब्राह्मण्याः प्रसवस्य मे ।
तथा भवन्तस्तिष्ठन्तु न भवेद् वञ्चनं यथा ॥ ८ ॥

'मेरी ब्राह्मणीके प्रसवका यह समय आ पहुँचा है, अब आपलोग इस तरह तैयार रहें, जिससे फिर धोखा न हो' ॥ ८ ॥

मुहूर्तादेव चाश्रौषं कृपणं रुदितस्वनम् ।
तस्य विप्रस्य भवने ह्रियतेऽह्रियतेति च ॥ ९ ॥

फिर तो दो ही घड़ीमें ब्राह्मणके घरके भीतर दीनतापूर्वक रोदनकी ध्वनि मुझे सुनायी दी। लोग कह रहे थे—'हाय ! बालकको हर ले जाता है, हर ले गया' ॥ ९ ॥

अथाकाशे पुनर्वाचमश्रौषं बालकस्य वै ।
ऊँहेति ह्रियमाणस्य न च पश्यामि राक्षसम् ॥ १० ॥

फिर आकाशमें मैंने अपहृत बालकका 'ऊँह' यह शब्द सुना; परंतु उसका अपहरण करनेवाले राक्षसको मैं नहीं देख पाता था ॥ १० ॥

ततोऽस्माभिस्तदा तात शरवर्षैः समन्ततः ।
विष्टम्भिता दिशः सर्वा हृत एव स बालकः ॥ ११ ॥

तात ! तब हमलोगोंने बाण-वर्षा करके चारों ओरसे सम्पूर्ण दिशाओंको रूँध डाला, तो भी उस बालकका अपहरण तो हो ही गया ॥ ११ ॥

ब्राह्मणोऽऽर्तस्वरं कृत्वा हृते तस्मिन् कुमारके ।
वाचः स परुषास्तीव्राः श्रावयामास मां तदा ॥ १२ ॥

उस कुमारका अपहरण हो जानेपर ब्राह्मणने आर्तनाद करके उस समय मुझे अत्यन्त कड़वी खरी-खोटी बातें सुनानी आरम्भ कीं ॥ १२ ॥

वृष्णयो हतसंकल्पास्तथाहं नष्टचेतनः ।
मामेवं हि विशेषेण ब्राह्मणः प्रत्यभाषत ॥ १३ ॥

वृष्णिवंशी वीरोंका सारा मनसूबा चौपट हो गया, मेरी तो चेतना ही नष्ट-सी हो गयी। वह ब्राह्मण विशेषतः मुझसे इस प्रकार कहने लगा—॥ १३ ॥

रक्षिष्यामीति चोक्तं ते न च रक्षितवानसि ।
शृणु वाक्यमिदं शेषं यत् त्वमर्हसि दुर्मते ॥ १४ ॥

'दुर्मते ! तूने कहा था कि रक्षा करूँगा, किंतु रक्षा नहीं की। अतः अन्तमें मेरी यह बात सुन, तू इसीका पात्र है ! ॥ १४ ॥

वृथा त्वं स्पर्धसे नित्यं कृष्णेनामितबुद्धिना ।
यदि स्यादिह गोविन्दो नैतदत्याहितं भवेत् ॥ १५ ॥

'तू अमित बुद्धिमान् भगवान् श्रीकृष्णके साथ सदा व्यर्थ ही स्पर्धा रखता है। यदि वे भगवान् गोविन्द स्वयं यहाँ होते तो यह दुर्घटना नहीं होने पाती ॥ १५ ॥

यथा चतुर्थं धर्मस्य रक्षिता लभते फलम् ।
पापस्यापि तथा मूढ भागं प्राप्नोत्यरक्षिता ॥ १६ ॥

'मूढ ! जैसे रक्षा करनेवाला क्षत्रिय रक्षित पुरुषके धर्मका चतुर्थांश फल पाता है, उसी प्रकार रक्षा न करनेवाला पुरुष उस अरक्षितके पापका भी भागी होता है ॥ १६ ॥

रक्षिष्यामीति चोक्तं ते न च शक्तोऽसिरक्षितुम् ।
मोघं गाण्डीवमेतत्ते मोघं वीर्यं यशश्च ते ॥ १७ ॥

'तूने घोषणा तो की थी कि 'मैं रक्षा करूँगा,' परंतु तू रक्षा करनेमे समर्थ नहीं है। तेरा यह गाण्डीव धनुष व्यर्थ है ! तेरा पराक्रम और यश भी व्यर्थ ही है' ॥ १७ ॥

अकिञ्चिदुक्त्वा तं विप्रं ततोऽहं प्रस्थितस्तथा ।
सह वृष्ण्यन्धकसुतैर्यत्र कृष्णो महाद्युतिः ॥ १८ ॥

उस ब्राह्मणसे कुछ न कहकर मैं वृष्णि और अन्धकवंशके उन राजकुमारोंके साथ प्रस्थित हो उस स्थानपर आया, जहाँ महातेजस्वी श्रीकृष्ण विराजमान थे ॥ १८ ॥

ततो द्वारवतीं गत्वा दृष्ट्वा मधुनिघातिनम् ।
व्रीडितः शोकंसंतप्तो गोविन्देनोपलक्षितः ॥ १९ ॥

द्वारकामें पहुँचकर मधुसूदनका दर्शन करके मैं लज्जित एवं शोकसे संतप्त हो उठा। गोविन्दने मेरी इस अवस्थाको लक्ष्य किया ॥ १९ ॥

[विष्णुपर्व ] त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः ६५९

स तु मां व्रीडितं दृष्ट्वा विनिन्दन् कृष्णसंनिधौ। मौढ्यं पश्यत मे योऽहं श्रद्दधे क्लीवकत्थनम् ॥ २०॥

इसी बीचमें उस ब्राह्मणने आकर मुझे लज्जित देख भगवान् श्रीकृष्णके समीप ही इस तरह निन्दित वचन कहना आरम्भ किया—'अहो ! मेरी मूर्खता तो देखो । मैंने इस कायर या नपुंसककी बातपर विश्वास कर लिया ॥ २० ॥

न प्रद्युम्नो नानिरुद्धो न रामो न च केशवः। यत्र शक्ताः परित्रातुं कोऽन्यस्तदवनेश्वरः ॥ २१ ॥

'जहाँ प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, बलराम और श्रीकृष्ण भी रक्षा करनेमें असमर्थ हों, वहाँ दूसरा कौन रक्षा कर सकता है ? ॥ २१ ॥

धिगर्जुनं वृथावादं धिगात्मश्लाघिनो धनुः। दैवोपसृष्टो यो मौर्ख्यादागच्छति च दुर्मतिः ॥ २२ ॥

'व्यर्थ बातें बनानेवाले इस अर्जुनको धिक्कार है ! झूठी आत्मप्रशंसा करनेवाले इस अर्जुनके धनुषको भी धिक्कार है ! क्योंकि यह खोटी बुद्धिवाला पुरुष स्वयं ही दैवका मारा हुआ है तो भी मूर्खतावश मेरी रक्षा करने आया था' ॥ २२ ॥

एवं शपति विप्रर्षौ विद्यामास्थाय वैष्णवीम् । ययौ याम्यीं वीरो यत्रास्ते भगवान् यमः ॥ २३ ॥

( वैशम्पायनजी कहते हैं—) वे ब्रह्मर्षि जब इस प्रकार आक्षेप करने लगे, तब वीर अर्जुन वैष्णवी विद्याका आश्रय ले संयमनी पुरीमें गये, जहाँ भगवान् यम विराजमान हैं ॥ २३ ॥

विप्रापत्यमचक्षाणस्तत ऐन्द्रीमगात् पुरीम् । आग्नेयीं नैर्ऋतीं सौम्यामुदीचीं वारुणीं तथा ॥ २४ ॥

वहाँ ब्राह्मणके बालकको न देखकर ये क्रमशः इन्द्र, अग्नि, निर्ऋति, सोमकी उदीची तथा वरुण—इन सबकी पुरीमें गये ॥ २४ ॥

रसातलं नाकपृष्ठं धिष्ण्यान्यन्यान्युदायुधः। ततोऽलब्ध्वा द्विजसुतमनिस्तीर्णप्रतिश्रवः ॥ २५ ॥ अग्निं विविक्षुः कृष्णेन प्रद्युम्नेन निषेधितः। दर्शये द्विजसूनूं ते मावज्ञात्मानमात्मना ॥ २६ ॥ कीर्तिं त एते विपुलां स्थापयिष्यन्ति मानवाः।

फिर वे अपना अस्त्र-शस्त्र लिये रसातल तथा स्वर्गमें भी गये । इतनेपर भी ब्राह्मण-बालकको न पाकर अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण न कर सके; अतः उन्होंने जलती आगमें प्रवेश करनेका विचार किया। उस समय श्रीकृष्ण और प्रद्युम्नने आकर उन्हें ऐसा करनेसे रोका और कहा—'मैं उन ब्राह्मण-बालकोंको तुम्हें दिखा दूंगा, तुम स्वयं ही अपनी अवज्ञा न करो । ये संसारके मनुष्य तुम्हारी सुविस्तृत कीर्तिकी स्थापना करेंगे' ॥ २५-२६॥

इति सम्भाष्य मां स्नेहात् समाश्वास्य च माधवः॥ २७॥ सान्त्वयित्वा तु तं विप्रमिदं वचनमब्रवीत् ।

( अर्जुन कहते हैं—) इस प्रकार स्नेहपूर्वक बात करके माधवने मुझे आश्वासन दिया और उन ब्राह्मणको सान्त्वना देकर सारथिसे यह बात कही—॥ २७॥

सुग्रीवं चैव शैव्यं च मेघपुष्पबलाहकौ ॥ २८॥ योजयाश्वानिति तदा दारुकं प्रत्यभाषत ।

'दारुक ! तुम सुग्रीव, शैव्य, मेघपुष्प और बलाहक नामक घोड़ोंको रथमें जोतो।' इस प्रकार उस समय उन्होंने दारुकसे कहा ॥ २८॥

आरोप्य ब्राह्मणं कृष्णो ह्यवरोप्य च दारुकम् ॥ २९॥ मामुवाच ततः शौरिः सारथ्यं क्रियतामिति ।

तदनन्तर रथ जुत जानेपर शूरनन्दन श्रीकृष्णने ब्राह्मण-को रथपर चढ़ा लिया और दारुकको उतारकर मुझसे कहा—'तुम सारथिका काम करो' ॥ २९॥

ततः समास्थाय रथं कृष्णोऽहं ब्राह्मणः स च । प्रायाताः स्म दिशं सौम्यामुदीचीं कौरवर्षभ ॥ ३० ॥

कौरवश्रेष्ठ ! तत्पश्चात् श्रीकृष्ण, मैं और वह ब्राह्मण तीनों उस रथपर बैठकर सोमपालित उत्तर दिशाकी ओर चल दिये ॥ ३० ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि वासुदेवमाहात्म्ये श्रीकृष्णस्योदीचीगमने द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११२ ॥

इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें वासुदेव-माहात्म्यके प्रसंगमें श्रीकृष्णका उत्तर दिशाको गमनविषयक एक सौ बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११२ ॥


त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः

श्रीकृष्णद्वारा ब्राह्मणपुत्रोंका आनयन

अर्जुन उवाच

ततः पर्वतजालानि सरितश्च वनानि च। अपश्यं समतिक्रम्य सागरं वरुणालयम् ॥ १॥

अर्जुन कहते हैं—तदनन्तर बहुत-से पर्वत-समूहों, सरिताओं और वनोंको लाँघकर मैंने वरुणालय समुद्रको देखा ॥ १॥

६६० श्रीमद्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

ततोऽर्घ्यमुदधिः साक्षादुपनीय जनार्दनम्।
स प्राञ्जलिः समुत्थाय किंकरोमीति चाब्रवीत्॥ २ ॥
उस समय साक्षात् समुद्रने भगवान् जनार्दनको अर्घ्य निवेदन किया और हाथ जोड़ खड़ा होकर कहा, 'प्रभो ! मैं आपकी क्या सेवा करूँ?' ॥ २ ॥

प्रतिगृह्य स तां पूजां तमुवाच जनार्दनः।
रथपन्थानमिच्छामि त्वया दत्तं नदीपते ॥ ३ ॥
समुद्रद्वारा अर्पित की हुई पूजाको ग्रहण करके भगवान् जनार्दनने कहा—'नदीपते ! मैं चाहता हूँ कि तुम मुझे मेरे रथके लिये मार्ग दे दो' ॥ ३ ॥

अथाब्रवीत् समुद्रस्तु प्राञ्जलिर्गरुडध्वजम्।
प्रसीद भगवन् नैवमन्योऽप्येवं गमिष्यति ॥ ४ ॥
तब समुद्रने हाथ जोड़कर गरुड़ध्वज श्रीकृष्णसे कहा—'भगवन् ! प्रसन्न होइये। इस तरह मेरे भीतर मार्ग न बनाइये, नहीं तो दूसरे लोग भी इसी तरह आया-जाया करेंगे' ॥ ४ ॥

त्वयैव स्थापितः पूर्वमगाधोऽस्मि जनार्दन।
त्वया प्रवर्तिते मार्गे यास्यामि गमनायताम् ॥ ५ ॥
'जनार्दन ! पहले आपने ही मुझे इस रूपमें प्रतिष्ठित किया है। मैं अगाध हूँ। जब आप मेरे भीतर मार्ग बना देंगे, तब मैं सबके लिये गमनीय (लाँघ जानेके योग्य) हो जाऊँगा ॥ ५ ॥

अन्येऽप्येवं गमिष्यन्ति राजानो दर्पमोहिताः।
एवं संचिन्त्य गोविन्द यत् क्षमं तत् समाचर ॥ ६ ॥
फिर तो अभिमानसे मोहित हुए दूसरे राजा भी मुझे इसी तरह लाँघ जाया करेंगे। गोविन्द ! इस बातका विचार करके जो उचित हो वह कीजिये' ॥ ६ ॥

वासुदेव उवाच
ब्राह्मणार्थे मदर्थे च कुरु सागर मद्वचः।
मदृते न पुमान् कश्चिदन्यस्त्वां धर्षयिष्यति ॥ ७ ॥
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—'सागर ! तुम इस ब्राह्मणके लिये और मेरे लिये भी मेरी इस बातको मान लो, मेरे सिवा दूसरा कोई पुरुष तुम्हें नहीं लाँघ सकेगा ॥ ७ ॥

अथाब्रवीत् समुद्रस्तु पुनरेव जनार्दनम्।
अभिशापभयाद् भीतो बाढमेवं भविष्यति ॥ ८ ॥
तब शापके भयसे डरे हुए समुद्रने पुनः जनार्दनसे कहा—'बहुत अच्छा ऐसा ही होगा' ॥ ८ ॥

शोषयाम्येष मार्गे ते येन त्वं कृष्ण यास्यसि।
रथेन सह सूतेन सध्वजेन तु केशव ॥ ९ ॥
'श्रीकृष्ण ! केशव ! यह लीजिये, मैं आपके मार्गको सुखाये देता हूँ, जिससे कि आप सारथि और ध्वजसहित रथके द्वारा यात्रा करेंगे' ॥ ९ ॥

वासुदेव उवाच
मया दत्तो वरः पूर्वं न शोषं यास्यसीति ह।
मानुषास्ते न जानीयुर्विविधान् रत्नसंचयान् ॥ १० ॥
जलं स्तम्भय साधो त्वं ततो यास्याम्यहं रथी।
न च कश्चित् प्रमाणं ते रत्नानां वेत्स्यते नरः ॥ ११ ॥
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—'सरित्पते ! मैंने पूर्वकालमें तुम्हें वर दिया है कि तुम कभी सूखोगे नहीं। मनुष्य तुम्हारे भीतर रखे हुए नाना प्रकारके रत्नोंके ढेरोंको न जान सकें, इसके लिये तुम केवल अपने जलको स्तम्भित कर लो। साधो ! ऐसा करनेसे मैं रथपर बैठा हुआ तुम्हारे ऊपरसे चला जाऊँगा और कोई मनुष्य तुम्हारे रत्नोंका प्रमाण नहीं जान सकेगा ॥ १०-११ ॥

सागरेण तथेत्युक्ते प्रस्थिताः स्मो जलेन वै।
स्तम्भितेन पथा भूमौ मणिवर्णेन भास्वता ॥ १२ ॥
तब समुद्रने 'तथास्तु' कहकर उनकी बात स्वीकार कर ली। फिर हम सब लोग स्तम्भित हुए जलके मार्गसे चले। वह मार्ग भूमिपर स्थित प्रकाशमान मणियोंकी प्रभासे उद्भासित हो रहा था ॥ १२ ॥

ततोऽर्णवं समुत्तीर्य कुरूनप्युत्तरान् वयम्।
क्षणेन समतिक्रान्ता गन्धमादनमेव च ॥ १३ ॥
तत्पश्चात् समुद्रको पार करके हम उत्तर कुरुमें जा पहुँचे। फिर एक ही क्षणमें गन्धमादन पर्वतको भी लाँघ गये ॥ १३ ॥

ततस्तु पर्वताः सप्त केशवं समुपस्थिताः।
जयन्तो वैजयन्तश्च नीलो रजतपर्वतः ॥ १४ ॥
महामेरुः सकैलास इन्द्रकूटश्च नामतः।
विभ्राणा वर्णरूपाणि विविधान्यद्भुतानि च ॥ १५ ॥
तदनन्तर जयन्त, वैजयन्त, नील, रजतपर्वत, महामेरु, कैलास और इन्द्रकूट नामवाले सात पर्वत भगवान् श्रीकृष्णकी सेवामें उपस्थित हुए। उन्होंने नाना प्रकारके अद्भुत रूप-रङ्ग धारण किये थे ॥ १४-१५ ॥

उपस्थाय च गोविन्दं किं कुर्मेत्यब्रुवंस्तदा।
तांश्चैव प्रतिजग्राह विधिवन्मधुसूदनः ॥ १६ ॥
उस समय गोविन्दकी सेवामें उपस्थित हो वे सब-के-सब कहने लगे—'भगवन् ! हम आपकी क्या सेवा करें?' तब मधुसूदनने विधिपूर्वक उन सबका सत्कार ग्रहण किया ॥ १६ ॥

तानुवाच हृषीकेशः प्रणामावनतान् स्थितान्।
विवरं गच्छतो मेऽद्य रथमार्गः प्रदीयताम् ॥ १७ ॥
प्रणाम करके विनीत भावसे खड़े हुए उन पर्वतोंसे हृषीकेशने इस प्रकार कहा—'पर्वतो ! मैं एक गूढ़-स्थानमें

[विष्णुपर्व ] त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः ६६१

जा रहा हूँ। वहाँ जानेके लिये आज मेरे रथको मार्ग प्रदान करो' ॥ १७ ॥
ते कृष्णस्य वचः श्रुत्वा प्रतिगृह्य च पर्वताः।
प्रददुः कामतो मार्गं गच्छतो भरतर्षभ ॥ १८ ॥
भरतश्रेष्ठ ! भगवान् श्रीकृष्णका यह वचन सुनकर उनकी आज्ञा शिरोधार्य करके उन पर्वतोंनो जाते समय उन्हें इच्छानुसार मार्ग दे दिया ॥ १८ ॥
तत्रैवान्तर्हिताः सर्वे तदाश्चर्यतरं मम।
असक्तं च रथो याति मेघजालेष्विवांशुमान् ॥ १९ ॥
फिर वे सब-के-सब वहीं अन्तर्धान हो गये। वह मेरे लिये परम आश्चर्यकी बात थी। रथ बिना किसी अटक या रुकावटके आगे बढ़ता जा रहा था, मानो अंशुमाली सूर्य मेघोंकी घटाओंमें अनासक्त भावसे चले जा रहे हों ॥ १९ ॥
सप्त द्वीपान् ससिन्धूंश्च सप्त सप्त गिरींस्तथा।
लोकालोकं तथातीत्य विवेश सुमहत्तमः ॥ २० ॥
सात द्वीपों, सातों समुद्रों तथा प्रत्येक द्वीपके सात-सात कुलपर्वतोंको लाँघकर लोकालोक पर्वतको भी पार करके वह रथ बड़े भारी अन्धकारमें प्रविष्ट हुआ ॥ २० ॥
ततः कदाचिद् दुःखेन रथमूहूस्तुरङ्गमाः।
पङ्कभूतं हि तिमिरं स्पर्शाद् विज्ञायते नृप ॥ २१ ॥
तब घोड़े कभी-कभी बड़े कष्टसे रथ खींचते थे। नरेश्वर ! वह अन्धकार कीचड़के रूपमें उपलब्ध हुआ, जो स्पर्श करनेसे ज्ञात होता था ॥ २१ ॥
अथ पर्वतभूतं तत् तिमिरं समपद्यत।
तदासाद्य महाराज निष्प्रयत्ना हयाः स्थिताः ॥ २२ ॥
तत्पश्चात् वह अन्धकार पर्वतके रूपमें प्राप्त हुआ। महाराज ! उसके पास पहुँचकर रथके घोड़े निश्चेष्ट होकर खड़े हो गये ॥ २२ ॥
ततश्चक्रेण गोविन्दः पाटयित्वा तमस्तदा।
आकाशं दर्शयामास रथपन्थानमुत्तमम् ॥ २३ ॥
तब गोविन्दने अपने चक्रसे उस अन्धकारको विदीर्ण करके अवकाश दिखाया, जो रथके लिये उत्तम मार्ग था ॥ २३ ॥
निष्क्रम्य तमसस्तस्मादाकाशे दर्शिते तदा।
भविष्यामीति संज्ञा मे भयं च विगतं मम ॥ २४ ॥
उस अन्धकारसे निकलकर आकाशका दर्शन करनेपर मुझे यह ज्ञान हुआ कि अब मैं जी जाऊँगा, फिर तो मेरा सारा भय दूर हो गया ॥ २४ ॥
ततस्तेजः प्रज्वलितमपश्यं तत् तदाम्बरे।
सर्वलोकं समाविश्य स्थितं पुरुषविग्रहम् ॥ २५ ॥
इसके बाद मैंने आकाशमे एक प्रज्वलित तेजका दर्शन किया, जो पुरुषके आकारमें स्थित था। वह सम्पूर्ण लोकोंमें व्याप्त जान पड़ता था ॥ २५ ॥
तं प्रविष्टो हृषीकेशो दीप्तं तेजोनिधिं तदा।
रथ एव स्थितश्चाहं स च ब्राह्मणसत्तमः ॥ २६ ॥
उस समय भगवान् हृषीकेश उस प्रज्वलित तेजकी राशिमें समा गये, किंतु मैं और वह श्रेष्ठ ब्राह्मण रथपर ही बैठे रहे ॥ २६ ॥
स मुहूर्तात् ततः कृष्णो निष्क्रकाम तदा प्रभुः।
चतुरो बालकान् गृह्य ब्राह्मणस्यात्मजांस्तदा ॥ २७ ॥
फिर दो ही घड़ीमें भगवान् श्रीकृष्ण ब्राह्मणके चारों बालकोंको साथमें लेकर वहाँसे निकले ॥ २७ ॥
प्रददौ ब्राह्मणायाथ पुत्रान् सर्वान्नार्दनः।
त्रयः पूर्वं हृता ये च सद्योजातश्च बालकः ॥ २८ ॥
तीन तो वे बालक थे, जिनका पहले अपहरण हुआ था और चौथा वह नवजात बालक था। भगवान् जनार्दनने वे सब पुत्र ब्राह्मणको दे दिये ॥ २८ ॥
प्रहृष्टो ब्राह्मणस्तत्र पुत्रान् दृष्ट्वा पुनः प्रभो।
अहं च परमप्रीतो विस्मितश्चाभवं तदा ॥ २९ ॥
प्रभो ! वहाँ अपने पुत्रोंको पुनः देखकर ब्राह्मणको बड़ा हर्ष हुआ। मुझे भी बड़ी प्रसन्नता हुई। मैं तो उस समय आश्चर्यचकित हो गया था ॥ २९ ॥
ततो वयं पुनः सर्वे ब्राह्मणस्य च ते सुताः।
यथा गता निवृत्ताः स्म तथैव भरतर्षभ ॥ ३० ॥
भरतश्रेष्ठ ! तदनन्तर हम सब लोग और वे ब्राह्मणबालक पुनः जैसे गये थे, वैसे ही लौट आये ॥ ३० ॥
ततः स्म द्वारकां प्राप्ताः क्षणेन नृपसत्तम।
असम्प्राप्तेऽर्धदिवसे विस्मितोऽहं पुनः पुनः ॥ ३१ ॥
नृपश्रेष्ठ ! अभी दोपहरी भी नहीं हुई थी तभी हमलोग एक ही क्षणमें द्वारका आ पहुँचे। मैं तो बारंबार विस्मित हो रहा था ॥ ३१ ॥
सपुत्रं भोजयित्वा तु द्विजं कृष्णो महायशाः।
धनेन वर्षयित्वा च गृहं प्रास्थापयत् तदा ॥ ३२ ॥
इसके बाद महायशस्वी श्रीकृष्णने पुत्रोंसहित ब्राह्मणको भोजन कराकर उसके लिये धनकी वर्षा करके उसे तत्काल घर भेज दिया ॥ ३२ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि वासुदेवमाहात्म्ये ब्राह्मणपुत्रानयने त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें वासुदेवमाहात्म्यके प्रसङ्गमें ब्राह्मणपुत्रोंका आनयनविषयक एक सौ तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११३ ॥

६६२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे

चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः

भगवान् श्रीकृष्णका अर्जुनको अपने यथार्थ स्वरूपका परिचय देना

अर्जुन उवाच

ततः कृष्णो भोजयित्वा शतानि सुवहूनि च ।
विप्राणामृषिकल्पानां कृतकृत्योऽभवत् तदा ॥ १ ॥

**अर्जुन कहते हैं—**राजन् ! तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्ण कई सौ ऋषितुल्य ब्राह्मणोंको भोजन कराकर कृतकृत्य हुए ॥ १ ॥

ततः सह मया भुक्त्वा वृष्णिभोजैश्च सर्वशः ।
विचित्राश्च कथा दिव्याः कथयामास भारत ॥ २ ॥

भारत ! तत्पश्चात् मेरे और वृष्णि तथा भोजवंशी वीरोंके साथ स्वयं भी भोजन करके वे सर्वथा दिव्य एवं विचित्र कथाएँ सुनाने लगे ॥ २ ॥

ततः कथान्ते तत्राहमभिगम्य जनार्दनम् ।
अपृच्छं तद् यथावृत्तं कृष्णं यद् दृष्टवानहम् ॥ ३ ॥

फिर कथाके अन्तमें जनार्दन श्रीकृष्णके पास जाकर मैंने जो कुछ देखा था, उसका यथावत् वृत्तान्त पूछा— ॥ ३ ॥

कथं समुद्रः स्तब्धोदः कृतस्तु कमलेक्षण ।
पर्वतानां च विवरं कृतं तत् कथमच्युत ॥ ४ ॥

‘कमलनयन अच्युत ! आपने समुद्रके जलको स्तम्भित कैसे कर दिया ? तथा पर्वतोंमें छेद या अवकाश किस तरह बना दिया ? ॥ ४ ॥

तमस्तच्च कथं घोरं घनं चक्रेण पाटितम् ।
तच्च यत्परमं तेजः प्रविष्टोऽसि कथं च तत् ॥ ५ ॥

‘उस घोर एवं घने अन्धकारको किस प्रकार चक्रसे विदीर्ण किया और वह जो परम उत्कृष्ट तेज था, उसमें आप किस प्रकार प्रविष्ट हुए ? ॥ ५ ॥

किमर्थं तेन ते बालास्तदा चापहृताः प्रभो ।
यच्च ते दीर्घमध्वानं संक्षिप्तं तत् कथं पुनः ॥ ६ ॥

‘प्रभो ! उस परम तेजःस्वरूप पुरुषने उस समय ब्राह्मण-बालकोंका अपहरण किस लिये किया था ? और वह जो विशाल मार्ग था, उसे आपने इतना संक्षिप्त कैसे कर दिया ? ॥

कथं चाल्पेन कालेन नस्तद्गतागतम् ।
एतत् सर्वं यथावृत्तमाचक्ष्व मम केशव ॥ ७ ॥

‘केशव ! इतने थोड़े समयमें हमलोगोंका वहाँतक जाना-आना कैसे सम्भव हुआ? यह सब वृत्तान्त मुझे यथार्थ-रूपसे बताइये’ ॥ ७ ॥

वासुदेव उवाच

मद्दर्शनार्थं ते बाला हृतास्तेन महात्मना ।
विप्रार्थमभ्येष्यते कृष्णो नागच्छेदन्यथेति ह ॥ ८ ॥

**भगवान् श्रीकृष्णने कहा—**अर्जुन ! उन महात्मा तेजस्वी पुरुषने मुझे देखनेके लिये ही उन बालकोंका अपहरण किया था। वे जानते थे कि ब्राह्मणके कार्यके लिये ही श्रीकृष्ण आयेंगे, अन्यथा नहीं ॥ ८ ॥

ब्रह्म तेजोमयं दिव्यं महत् यद् दृष्टवानसि ।
अहं स भरतश्रेष्ठ मत्तेजस्तत् सनातनम् ॥ ९ ॥

भरतश्रेष्ठ ! तुमने जिस दिव्य तेजोमय महद्-ब्रह्मका दर्शन किया था, वह मैं ही हूँ। वह मेरा सनातन तेज है ॥ ९ ॥

प्रकृतिः सा मम परा व्यक्ताव्यक्ता सनातनी ।
यां प्रविश्य भवन्तीह मुक्ता योगविदुत्तमाः ॥ १० ॥

वह मेरी व्यक्ताव्यक्तस्वरूपा सनातन परा प्रकृति है, जिसमें प्रवेश करके योगवेत्ताओंमें उत्तम पुरुष मुक्त हो जाते हैं ॥ १० ॥

सा सांख्यानां गतिः पार्थ योगिनां च तपस्विनाम् ।
तत् पदं परमं ब्रह्म सर्वं विभजते जगत् ॥ ११ ॥

पार्थ ! वही सांख्ययोगियों, कर्मयोगियों तथा तपस्वी पुरुषोंकी गति है। वही परब्रह्मपद है, जो सम्पूर्ण जगत्‌का विभाजन करता है—चेतनसे जड़को पृथक् करता है ॥ ११ ॥

मामेव तद् घनं तेजो ज्ञातुमर्हसि भारत ।
समुद्रः स्तब्धतोयोऽहमहं स्तम्भयिता जलम् ॥ १२ ॥

भारत ! वह जो घनीभूत तेज था, उसे मेरा ही स्वरूप समझो। जिसके जलका स्तम्भन किया गया था, वह समुद्र मैं ही हूँ और जलका स्तम्भन करनेवाला भी मैं ही हूँ ॥ १२ ॥

अहं ते पर्वताः सप्त ये दृष्टा विविधास्त्वया ।
पङ्कभूतं हि तिमिरं दृष्टवानसि यद्धि तत् ॥ १३ ॥

वे सात पर्वत जिन्हें तुमने नाना रूपोंमें देखा था, मैं ही हूँ और कीचड़के रूपमें जो अन्धकार दृष्टिगोचर हुआ था, वह भी मैं ही हूँ ॥ १३ ॥

अहं तमो घनीभूत महमेव च पाटकः ।
अहं च कालो भूतानां धर्मश्चाहं सनातनः ॥ १४ ॥

मैं ही घनीभूत अन्धकार और मैं ही उसे विदीर्ण करने-वाला हूँ। मैं ही समस्त भूतोंका काल और मैं ही उनका सनातन धर्म हूँ ॥ १४ ॥

चन्द्रादित्यौ महाशैलाः सरितश्च सरांसि च ।
चतस्रश्च दिशः सर्वा ममैवात्मा चतुर्विधः ॥ १५ ॥

चन्द्रमा, सूर्य, बड़े-बड़े पर्वत, सरिताएँ और सरोवर भी मैं ही हूँ। ये जो चारों दिशाएँ हैं, वे सब की-सब मेरा ही चतुर्विध रूप हैं ॥ १५ ॥