भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 683, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 683

[विष्णुपर्व ] त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः ६६१

जा रहा हूँ। वहाँ जानेके लिये आज मेरे रथको मार्ग प्रदान करो' ॥ १७ ॥
ते कृष्णस्य वचः श्रुत्वा प्रतिगृह्य च पर्वताः।
प्रददुः कामतो मार्गं गच्छतो भरतर्षभ ॥ १८ ॥
भरतश्रेष्ठ ! भगवान् श्रीकृष्णका यह वचन सुनकर उनकी आज्ञा शिरोधार्य करके उन पर्वतोंनो जाते समय उन्हें इच्छानुसार मार्ग दे दिया ॥ १८ ॥
तत्रैवान्तर्हिताः सर्वे तदाश्चर्यतरं मम।
असक्तं च रथो याति मेघजालेष्विवांशुमान् ॥ १९ ॥
फिर वे सब-के-सब वहीं अन्तर्धान हो गये। वह मेरे लिये परम आश्चर्यकी बात थी। रथ बिना किसी अटक या रुकावटके आगे बढ़ता जा रहा था, मानो अंशुमाली सूर्य मेघोंकी घटाओंमें अनासक्त भावसे चले जा रहे हों ॥ १९ ॥
सप्त द्वीपान् ससिन्धूंश्च सप्त सप्त गिरींस्तथा।
लोकालोकं तथातीत्य विवेश सुमहत्तमः ॥ २० ॥
सात द्वीपों, सातों समुद्रों तथा प्रत्येक द्वीपके सात-सात कुलपर्वतोंको लाँघकर लोकालोक पर्वतको भी पार करके वह रथ बड़े भारी अन्धकारमें प्रविष्ट हुआ ॥ २० ॥
ततः कदाचिद् दुःखेन रथमूहूस्तुरङ्गमाः।
पङ्कभूतं हि तिमिरं स्पर्शाद् विज्ञायते नृप ॥ २१ ॥
तब घोड़े कभी-कभी बड़े कष्टसे रथ खींचते थे। नरेश्वर ! वह अन्धकार कीचड़के रूपमें उपलब्ध हुआ, जो स्पर्श करनेसे ज्ञात होता था ॥ २१ ॥
अथ पर्वतभूतं तत् तिमिरं समपद्यत।
तदासाद्य महाराज निष्प्रयत्ना हयाः स्थिताः ॥ २२ ॥
तत्पश्चात् वह अन्धकार पर्वतके रूपमें प्राप्त हुआ। महाराज ! उसके पास पहुँचकर रथके घोड़े निश्चेष्ट होकर खड़े हो गये ॥ २२ ॥
ततश्चक्रेण गोविन्दः पाटयित्वा तमस्तदा।
आकाशं दर्शयामास रथपन्थानमुत्तमम् ॥ २३ ॥
तब गोविन्दने अपने चक्रसे उस अन्धकारको विदीर्ण करके अवकाश दिखाया, जो रथके लिये उत्तम मार्ग था ॥ २३ ॥
निष्क्रम्य तमसस्तस्मादाकाशे दर्शिते तदा।
भविष्यामीति संज्ञा मे भयं च विगतं मम ॥ २४ ॥
उस अन्धकारसे निकलकर आकाशका दर्शन करनेपर मुझे यह ज्ञान हुआ कि अब मैं जी जाऊँगा, फिर तो मेरा सारा भय दूर हो गया ॥ २४ ॥
ततस्तेजः प्रज्वलितमपश्यं तत् तदाम्बरे।
सर्वलोकं समाविश्य स्थितं पुरुषविग्रहम् ॥ २५ ॥
इसके बाद मैंने आकाशमे एक प्रज्वलित तेजका दर्शन किया, जो पुरुषके आकारमें स्थित था। वह सम्पूर्ण लोकोंमें व्याप्त जान पड़ता था ॥ २५ ॥
तं प्रविष्टो हृषीकेशो दीप्तं तेजोनिधिं तदा।
रथ एव स्थितश्चाहं स च ब्राह्मणसत्तमः ॥ २६ ॥
उस समय भगवान् हृषीकेश उस प्रज्वलित तेजकी राशिमें समा गये, किंतु मैं और वह श्रेष्ठ ब्राह्मण रथपर ही बैठे रहे ॥ २६ ॥
स मुहूर्तात् ततः कृष्णो निष्क्रकाम तदा प्रभुः।
चतुरो बालकान् गृह्य ब्राह्मणस्यात्मजांस्तदा ॥ २७ ॥
फिर दो ही घड़ीमें भगवान् श्रीकृष्ण ब्राह्मणके चारों बालकोंको साथमें लेकर वहाँसे निकले ॥ २७ ॥
प्रददौ ब्राह्मणायाथ पुत्रान् सर्वान्नार्दनः।
त्रयः पूर्वं हृता ये च सद्योजातश्च बालकः ॥ २८ ॥
तीन तो वे बालक थे, जिनका पहले अपहरण हुआ था और चौथा वह नवजात बालक था। भगवान् जनार्दनने वे सब पुत्र ब्राह्मणको दे दिये ॥ २८ ॥
प्रहृष्टो ब्राह्मणस्तत्र पुत्रान् दृष्ट्वा पुनः प्रभो।
अहं च परमप्रीतो विस्मितश्चाभवं तदा ॥ २९ ॥
प्रभो ! वहाँ अपने पुत्रोंको पुनः देखकर ब्राह्मणको बड़ा हर्ष हुआ। मुझे भी बड़ी प्रसन्नता हुई। मैं तो उस समय आश्चर्यचकित हो गया था ॥ २९ ॥
ततो वयं पुनः सर्वे ब्राह्मणस्य च ते सुताः।
यथा गता निवृत्ताः स्म तथैव भरतर्षभ ॥ ३० ॥
भरतश्रेष्ठ ! तदनन्तर हम सब लोग और वे ब्राह्मणबालक पुनः जैसे गये थे, वैसे ही लौट आये ॥ ३० ॥
ततः स्म द्वारकां प्राप्ताः क्षणेन नृपसत्तम।
असम्प्राप्तेऽर्धदिवसे विस्मितोऽहं पुनः पुनः ॥ ३१ ॥
नृपश्रेष्ठ ! अभी दोपहरी भी नहीं हुई थी तभी हमलोग एक ही क्षणमें द्वारका आ पहुँचे। मैं तो बारंबार विस्मित हो रहा था ॥ ३१ ॥
सपुत्रं भोजयित्वा तु द्विजं कृष्णो महायशाः।
धनेन वर्षयित्वा च गृहं प्रास्थापयत् तदा ॥ ३२ ॥
इसके बाद महायशस्वी श्रीकृष्णने पुत्रोंसहित ब्राह्मणको भोजन कराकर उसके लिये धनकी वर्षा करके उसे तत्काल घर भेज दिया ॥ ३२ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि वासुदेवमाहात्म्ये ब्राह्मणपुत्रानयने त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें वासुदेवमाहात्म्यके प्रसङ्गमें ब्राह्मणपुत्रोंका आनयनविषयक एक सौ तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११३ ॥