विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 684, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें६६२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे
चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः
भगवान् श्रीकृष्णका अर्जुनको अपने यथार्थ स्वरूपका परिचय देना
अर्जुन उवाच
ततः कृष्णो भोजयित्वा शतानि सुवहूनि च ।
विप्राणामृषिकल्पानां कृतकृत्योऽभवत् तदा ॥ १ ॥
**अर्जुन कहते हैं—**राजन् ! तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्ण कई सौ ऋषितुल्य ब्राह्मणोंको भोजन कराकर कृतकृत्य हुए ॥ १ ॥
ततः सह मया भुक्त्वा वृष्णिभोजैश्च सर्वशः ।
विचित्राश्च कथा दिव्याः कथयामास भारत ॥ २ ॥
भारत ! तत्पश्चात् मेरे और वृष्णि तथा भोजवंशी वीरोंके साथ स्वयं भी भोजन करके वे सर्वथा दिव्य एवं विचित्र कथाएँ सुनाने लगे ॥ २ ॥
ततः कथान्ते तत्राहमभिगम्य जनार्दनम् ।
अपृच्छं तद् यथावृत्तं कृष्णं यद् दृष्टवानहम् ॥ ३ ॥
फिर कथाके अन्तमें जनार्दन श्रीकृष्णके पास जाकर मैंने जो कुछ देखा था, उसका यथावत् वृत्तान्त पूछा— ॥ ३ ॥
कथं समुद्रः स्तब्धोदः कृतस्तु कमलेक्षण ।
पर्वतानां च विवरं कृतं तत् कथमच्युत ॥ ४ ॥
‘कमलनयन अच्युत ! आपने समुद्रके जलको स्तम्भित कैसे कर दिया ? तथा पर्वतोंमें छेद या अवकाश किस तरह बना दिया ? ॥ ४ ॥
तमस्तच्च कथं घोरं घनं चक्रेण पाटितम् ।
तच्च यत्परमं तेजः प्रविष्टोऽसि कथं च तत् ॥ ५ ॥
‘उस घोर एवं घने अन्धकारको किस प्रकार चक्रसे विदीर्ण किया और वह जो परम उत्कृष्ट तेज था, उसमें आप किस प्रकार प्रविष्ट हुए ? ॥ ५ ॥
किमर्थं तेन ते बालास्तदा चापहृताः प्रभो ।
यच्च ते दीर्घमध्वानं संक्षिप्तं तत् कथं पुनः ॥ ६ ॥
‘प्रभो ! उस परम तेजःस्वरूप पुरुषने उस समय ब्राह्मण-बालकोंका अपहरण किस लिये किया था ? और वह जो विशाल मार्ग था, उसे आपने इतना संक्षिप्त कैसे कर दिया ? ॥
कथं चाल्पेन कालेन नस्तद्गतागतम् ।
एतत् सर्वं यथावृत्तमाचक्ष्व मम केशव ॥ ७ ॥
‘केशव ! इतने थोड़े समयमें हमलोगोंका वहाँतक जाना-आना कैसे सम्भव हुआ? यह सब वृत्तान्त मुझे यथार्थ-रूपसे बताइये’ ॥ ७ ॥
वासुदेव उवाच
मद्दर्शनार्थं ते बाला हृतास्तेन महात्मना ।
विप्रार्थमभ्येष्यते कृष्णो नागच्छेदन्यथेति ह ॥ ८ ॥
**भगवान् श्रीकृष्णने कहा—**अर्जुन ! उन महात्मा तेजस्वी पुरुषने मुझे देखनेके लिये ही उन बालकोंका अपहरण किया था। वे जानते थे कि ब्राह्मणके कार्यके लिये ही श्रीकृष्ण आयेंगे, अन्यथा नहीं ॥ ८ ॥
ब्रह्म तेजोमयं दिव्यं महत् यद् दृष्टवानसि ।
अहं स भरतश्रेष्ठ मत्तेजस्तत् सनातनम् ॥ ९ ॥
भरतश्रेष्ठ ! तुमने जिस दिव्य तेजोमय महद्-ब्रह्मका दर्शन किया था, वह मैं ही हूँ। वह मेरा सनातन तेज है ॥ ९ ॥
प्रकृतिः सा मम परा व्यक्ताव्यक्ता सनातनी ।
यां प्रविश्य भवन्तीह मुक्ता योगविदुत्तमाः ॥ १० ॥
वह मेरी व्यक्ताव्यक्तस्वरूपा सनातन परा प्रकृति है, जिसमें प्रवेश करके योगवेत्ताओंमें उत्तम पुरुष मुक्त हो जाते हैं ॥ १० ॥
सा सांख्यानां गतिः पार्थ योगिनां च तपस्विनाम् ।
तत् पदं परमं ब्रह्म सर्वं विभजते जगत् ॥ ११ ॥
पार्थ ! वही सांख्ययोगियों, कर्मयोगियों तथा तपस्वी पुरुषोंकी गति है। वही परब्रह्मपद है, जो सम्पूर्ण जगत्का विभाजन करता है—चेतनसे जड़को पृथक् करता है ॥ ११ ॥
मामेव तद् घनं तेजो ज्ञातुमर्हसि भारत ।
समुद्रः स्तब्धतोयोऽहमहं स्तम्भयिता जलम् ॥ १२ ॥
भारत ! वह जो घनीभूत तेज था, उसे मेरा ही स्वरूप समझो। जिसके जलका स्तम्भन किया गया था, वह समुद्र मैं ही हूँ और जलका स्तम्भन करनेवाला भी मैं ही हूँ ॥ १२ ॥
अहं ते पर्वताः सप्त ये दृष्टा विविधास्त्वया ।
पङ्कभूतं हि तिमिरं दृष्टवानसि यद्धि तत् ॥ १३ ॥
वे सात पर्वत जिन्हें तुमने नाना रूपोंमें देखा था, मैं ही हूँ और कीचड़के रूपमें जो अन्धकार दृष्टिगोचर हुआ था, वह भी मैं ही हूँ ॥ १३ ॥
अहं तमो घनीभूत महमेव च पाटकः ।
अहं च कालो भूतानां धर्मश्चाहं सनातनः ॥ १४ ॥
मैं ही घनीभूत अन्धकार और मैं ही उसे विदीर्ण करने-वाला हूँ। मैं ही समस्त भूतोंका काल और मैं ही उनका सनातन धर्म हूँ ॥ १४ ॥
चन्द्रादित्यौ महाशैलाः सरितश्च सरांसि च ।
चतस्रश्च दिशः सर्वा ममैवात्मा चतुर्विधः ॥ १५ ॥
चन्द्रमा, सूर्य, बड़े-बड़े पर्वत, सरिताएँ और सरोवर भी मैं ही हूँ। ये जो चारों दिशाएँ हैं, वे सब की-सब मेरा ही चतुर्विध रूप हैं ॥ १५ ॥