भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 685

[ विष्णुपर्व ] चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः ६६३

चातुर्वर्ण्यं मत्प्रसूतं चातुराश्रम्यमेव च।
चातुर्विध्यस्य कर्ताहमिति बुध्यस्व भारत ॥ १६ ॥

भारत ! चारों वर्ण तथा चारों आश्रम मुझसे ही प्रकट हुए हैं। जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज-इन चार प्रकारके प्राणियोंकी सृष्टि करनेवाला मैं ही हूँ; इस बातको तुम अच्छी तरह जान लो ॥ १६ ॥

अर्जुन उवाच

भगवन् सर्वभूतेश वेत्तुमिच्छामि ते प्रभो।
पृच्छामि त्वां प्रपन्नोऽहं नमस्ते पुरुषोत्तम ॥ १७ ॥

तब मैं (अर्जुन) ने कहा—भगवन् ! सर्वभूतेश्वर ! प्रभो ! पुरुषोत्तम ! आपको नमस्कार है। मैं आपके स्वरूपोंको भली-भाँति जानना चाहता हूँ; इसीलिये उसके विषयमें आपसे जिज्ञासा करता हूँ और आपकी शरणमें आया हूँ ॥ १७ ॥

वासुदेव उवाच

ब्रह्म च ब्राह्मणाश्चैव तपः सत्यं च भारत।
उग्रं बृहत्तमं चैव मत्तस्तद् विद्धि पाण्डव ॥ १८ ॥

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—पाण्डुनन्दन भारत ! ब्रह्म, ब्राह्मण, तप, सत्य, उग्र (संसारबन्धन) और बृहत्तम (कैवल्य)—ये सब मुझसे ही प्रकट होते हैं, ऐसा समझो ॥ १८ ॥

प्रियस्तेऽहं महाबाहो प्रियो मेऽसि धनंजय।
तेन ते कथयिष्यामि नान्यथा वक्तुमुत्सहे ॥ १९ ॥

महाबाहु धनंजय ! मैं तुम्हें प्रिय हूँ और तुम मुझे। इसीलिये मैं तुमसे इस रहस्यका वर्णन करता हूँ, अन्यथा कदापि नहीं कह सकता ॥ १९ ॥

अहं यजूंषि सामानि ऋचश्चाथर्वणानि च।
ऋषयो देवता यज्ञा मत्तेजो भरतर्षभ ॥ २० ॥

भरतश्रेष्ठ ! मैं ही यजुर्वेद, सामवेद, ऋग्वेद और अथर्ववेद हूँ। ऋषि, देवता और यज्ञ मेरे ही तेज हैं ॥ २० ॥

पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम्।
चन्द्रादित्यावहोरात्रं पक्षा मासास्तथर्तवः।
मुहूर्ताश्च कलाश्चैव क्षणाः संवत्सरास्तथा ॥ २१ ॥
मन्त्राश्च विविधाः पार्थ यानि शास्त्राणि कानिचित्।
विद्याश्च वेदितव्यं च मत्तः प्रादुर्भवन्ति हि ॥ २२ ॥

पार्थ ! पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, तेज, चन्द्रमा, सूर्य, दिन, रात, पक्ष, मास, ऋतु, मुहूर्त, कला, क्षण, संवत्सर, नाना प्रकारके मन्त्र, जो कोई भी शास्त्र, विद्या और वेदितव्य—ये सब मुझसे ही प्रकट होते हैं ॥ २१-२२ ॥

मन्मयं विद्धि कौन्तेय क्षयं सृष्टिं च भारत।
सच्चासच्च ममैवात्मा सदसच्चैव यत्परम् ॥ २३ ॥

कुन्तीनन्दन भारत ! सृष्टि और संहारको भी मेरा ही स्वरूप समझो। सत्, असत्, सदसत् तथा उससे भी विलक्षण जो तत्त्व है, वह सब मेरा ही आत्मा है ॥ २३ ॥

अर्जुन उवाच

एवमुक्तोऽस्मि कृष्णेन प्रीयमाणेन वै तदा।
तथैव च मनो नित्यमभवन्मे जनार्दने ॥ २४ ॥
एतच्छ्रुतं च दृष्टं च माहात्म्यं केशवस्य मे।
यन्मां पृच्छसि राजेन्द्र भूयांश्चातो जनार्दनः ॥ २५ ॥

अर्जुन कहते हैं—राजेन्द्र ! उस समय प्रसन्न हुए श्रीकृष्णने जब मुझे इस प्रकार उपदेश दिया, तबसे मेरा मन सदा उन्हीं जनार्दनमें संलग्न रहने लगा। इस प्रकार मैंने केशवका माहात्म्य प्रत्यक्ष देखा और सुना है; जिसके विषयमें आप मुझसे पूछ रहे थे। मैंने जो कुछ देखा और जाना है, भगवान् जनार्दन उससे भी महान् हैं ॥ २४-२५ ॥

वैशम्पायन उवाच

एतच्छ्रुत्वा कुरुश्रेष्ठो धर्मराजो युधिष्ठिरः।
पूजयामास धर्मात्मा गोविन्दं पुरुषोत्तमम् ॥ २६ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! यह सुनकर धर्मात्मा कुरुश्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिरने पुरुषोत्तम भगवान् गोविन्दका पूजन किया ॥ २६ ॥

विस्मितश्चाभवद् राजा सह सर्वैः सहोदरैः।
राजभिश्च समासीनैर्यै स्तत्रासन् समागताः ॥ २७ ॥

उस समय जो-जो राजा वहाँ पधारे और बैठे हुए थे, उनके तथा अपने समस्त भाइयोंके साथ राजा युधिष्ठिरको बड़ा आश्चर्य हुआ था ॥ २७ ॥


इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि वासुदेवमाहात्म्ये कृष्णार्जुनभाषणे
चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें वासुदेव-माहात्म्यके प्रसङ्गमें श्रीकृष्ण और अर्जुनका संवादविषयक एक सौ चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११४ ॥