भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 686, कुल 1169 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 686

६६४ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंश


पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः भगवान् श्रीकृष्णके पराक्रमोंका संक्षेपसे वर्णन

जनमेजय उवाच भूय एव द्विजश्रेष्ठ यदुसिंहस्य धीमतः । कर्माण्यपरिमेयाणि श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ १ ॥

जनमेजयने कहा-द्विजश्रेष्ठ ! मैं परम बुद्धिमान् यदुसिंह श्रीकृष्णके अपरिमेय कर्मोंका तात्त्विक वर्णन पुनः सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥

श्रूयन्ते विविधानि स्म अद्भुतानि महाद्युतेः । असंख्येयानि दिव्यानि प्रकृतान्वपि सर्वशः ॥ २ ॥

महातेजस्वी भगवान् श्रीकृष्णके अनेक प्रकारके अद्भुत, असंख्य एवं दिव्य चरित्र सुने जाते हैं, जो सर्वथा उनके द्वारा उत्कृष्ट रूपसे किये गये हैं ॥ २ ॥

यान्यहं विविधान्यस्य श्रुत्वा प्रीये महामुने । प्रब्रूयाः सर्वशस्तात तानि मे श्रृण्वतोऽनघ ॥ ३ ॥

निष्पाप महामुने ! तात ! मैं भगवान्‌के जिन-जिन विविध चरित्रोंको सुनकर प्रसन्न होता हूँ, उनका सम्पूर्ण रूपसे वर्णन कीजिये। मैं उन्हें ध्यानसे सुनूँगा ॥ ३ ॥

वैशम्पायन उवाच बहून्याश्चर्यभूतानि केशवस्य महात्मनः । कथितानि महाबाहो नान्तं शक्यं हि कर्मणाम् ॥ ४ ॥ गन्तुं हि भरतश्रेष्ठ विस्तरेण समन्ततः । अवश्यं हि मया वाच्यं लेशमात्रेण भारत ॥ ५ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—भरतश्रेष्ठ ! महाबाहो ! महात्मा केशवके बहुत-से आश्चर्यजनक चरित्र बताये गये। सब ओरसे विस्तारके साथ वर्णन करनेपर उनके कर्मोंका पार पाना असम्भव है। अतः भारत ! मैं संक्षेपसे ही उनके उन कर्मोंका अवश्य वर्णन करूँगा ॥ ४-५ ॥

विष्णोरमितवीर्यस्य प्रथितोदारकर्मणः । आनुपूर्व्या प्रवक्ष्यामि शृणुष्वैकमना नृप ॥ ६ ॥

नरेश्वर ! अपरिमित पराक्रमी तथा सुविख्यात उदार कर्मवाले भगवान् विष्णुके चरित्रोंका मैं क्रमशः वर्णन करूँगा, एकाग्रचित्त होकर सुनो ॥ ६ ॥

द्वारवत्यां निवंसता यदुसिंहेन धीमता । राष्ट्राणि नृपमुख्यानां क्षोभितानि महात्मनाम् ॥ ७ ॥

द्वारकामें निवास करते हुए यदुकुलसिंह बुद्धिमान् श्रीकृष्णने मुख्य-मुख्य महामनस्वी नरेशोंके राष्ट्रोंमें हलचल मचा दिया था ॥ ७ ॥

यदूनामन्तरप्रेप्सुर्विचक्रो दानवो हतः । पुरं प्राग्ज्योतिषं गत्वा पुनस्तेन महात्मना ॥ ८ ॥ समुद्रमध्ये दुष्टात्मा नरको दानवो हतः ।

उन दिनों एक विचक नामक दानव था, जो यादवोंके छिद्र ही ढूँढ़ा करता था । श्रीकृष्णने उसका वध कर डाला । फिर उन महात्माने प्राग्ज्योतिषपुरमे जाकर समुद्रके भीतर रहनेवाले दुष्टात्मा नरक नामक दानवका संहार किया ॥८॥

वासवं च रणे जित्वा पारिजातो हृतो बलात् ॥ ९ ॥ वरुणश्चैव भगवान् निर्जितो लोहिते ह्रदे ।

एक बार श्रीकृष्णने इन्द्रको भी युद्धमें हराकर बलपूर्वक पारिजात वृक्षका अपहरण कर लिया था । इसी प्रकार लोहितह्रदमें भगवान् वरुणको पराजित किया था ॥ ९½ ॥

दन्तवक्त्रश्च कारूषो निहतो दक्षिणापथे ॥ १० ॥ शिशुपालश्च सम्पूर्णे किल्बिषैकशते हतः ।

करूषदेशका राजा दन्तवक्त्र दक्षिणापथमें उनके द्वारा मारा गया । एक सौ अपराध पूर्ण होनेपर शिशुपालको भी उन्होंने कालके गालमें भेज दिया ॥ १०½ ॥

गत्वा च शोणितपुरं शंकरेणाभिरक्षितः ॥ ११ ॥ बलेः सुतो महावीर्यो बाणो बाहुसहस्रभृत् । महामृधे महाराज जित्वा जीवन् विसर्जितः ॥ १२ ॥

महाराज ! बलिका महापराक्रमी पुत्र बाण एक सहस्र भुजाएँ धारण करता था और भगवान् शङ्करके द्वारा वह सर्वथा सुरक्षित था; किंतु भगवान् श्रीकृष्णने शोणितपुरमें जाकर महासमरमें उसे पराजित किया और जीवित छोड़ दिया ॥

निर्जितः पावकश्चैव गिरिमध्ये महात्मना । शाल्वश्च विजितः संख्ये सौभश्च विनिपातितः ॥ १३ ॥

उन महात्माने मेरु गिरिमें अग्निदेवपर विजय पायी तथा युद्धमें सौभ विमानके अधिपति राजा शाल्वको जीता और मार गिराया ॥ १३ ॥

विक्षोभ्य सागरं चैव पाञ्चजन्यो वशीकृतः । हयग्रीवश्च निहतो नृपाश्चान्ये महाबलाः ॥ १४ ॥

फिर सागरमें क्षोभ पैदा करके पञ्चजनको मारकर पाञ्चजन्य शङ्खपर अधिकार किया । हयग्रीवका वध किया और अन्य महाबली नरेशोंको भी कालके गालमें डाल दिया ॥

जरासंधस्य निधने मोक्षिताः सर्वपार्थिवाः । रथेन जित्वा नृपतीन् गान्धारतनया हृता ॥ १५ ॥