भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 687, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 687

विष्णुपर्व ] षोडशाधिकशततमोऽध्यायः ६६५


जरासंधकी मृत्यु करवाकर सब राजाओंको उसके बन्धनसे मुक्त किया। एकमात्र रथके द्वारा राजाओंको जीत-कर गान्धार-राजकुमारीका अपहरण किया॥ १५॥

भ्रष्टराज्याश्च शोकार्ताः पाण्डवाः परिरक्षिताः।
दाहितं च वनं घोरं पुरुहूतस्य खाण्डवम् ॥ १६॥
पाण्डव अपने राज्यसे भ्रष्ट हो चुके थे और शोकसे आतुर थे, उस अवस्थामें भगवान् श्रीकृष्णने उन सबकी रक्षा की। इन्द्रके घोर खाण्डववनको अर्जुनद्वारा दग्ध करा दिया॥

गाण्डीवं चाग्निना दत्तमर्जुनायोपपादितम् ।
दौत्यं च तत्कृतं घोरे विग्रहे जनमेजय ॥ १७॥
जनमेजय ! फिर अग्निका दिया हुआ गाण्डीव धनुष अर्जुनको अर्पित किया तथा कौरव-पाण्डवके घोर विग्रहके समय पाण्डवोंका दूतत्व किया॥ १७॥

अनेन यदुमुख्येन यदुवंशो विवर्धितः।
कुन्त्याश्च प्रमुखे प्रोक्ता प्रतिज्ञा पाण्डवान् प्रति॥ १८॥
निवृत्ते भारते युद्धे प्रतिदास्यामि तत्सुतान् ।
इन्हीं यादव-शिरोमणिने यदुवंशकी वृद्धि की और कुन्तीके सामने पाण्डवोंके विषयमें यह प्रतिज्ञा की कि 'महाभारत युद्ध समाप्त होनेपर मैं तुम्हें तुम्हारे पुत्रोंको वापस दे दूँगा'॥

मोक्षितश्च महातेजा नृगः शापात् सुदारुणात् ॥ १९॥
यवनश्च हतः संख्ये काल इत्यभिविश्रुतः ।
इन्होंने महातेजस्वी राजा नृगको अत्यन्त भयंकर शापसे मुक्त किया। कालयवनको युद्धमें मारा (मुचुकुन्दद्वारा उसका नाश करा दिया) ॥ १९ १/२ ॥

वानरौ च महावीर्यौ मैन्दो द्विविद एव च ॥ २०॥
विजितौ युधि दुर्धर्षौ जाम्बवांश्च पराजितः।
दो महापराक्रमी दुर्धर्ष वानर मैन्द और द्विविदको तथा ऋक्षराज जाम्बवान्को भी युद्धमें पराजित किया॥ २० १/२ ॥

सान्दीपनेस्तथा पुत्रस्तव चैव पिता तथा ॥ २१॥
गतौ वैवस्वतवशं जीवितौ तस्य तेजसा।
सान्दीपिनिका पुत्र तथा तुम्हारे पिता परीक्षित्—ये दोनों यमराजके वशमें हो गये थे; परंतु उन श्रीकृष्णके तेजसे जीवित हो गये॥ २१ १/२ ॥

संग्रामा बहवः प्राप्ता घोरा नरवरक्षयाः ॥ २२॥
निहताश्च नृपाः सर्वे कृत्वा तज्जयमद्भुतम् ।
जनमेजयास्य युद्धेषु यथा ते वर्णिता मया ॥ २३॥
जनमेजय ! बड़े-बड़े राजाओंका विनाश करनेवाले बहुत-से घोर संग्राम प्राप्त हुए, परंतु उन युद्धोंमें अद्भुत विजय पाकर भगवान् श्रीकृष्णने जिस प्रकार समस्त नरेशोंको मार गिराया, उसका वर्णन मैं कर चुका हूँ॥ २२-२३॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि वासुदेवमाहात्म्ये पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥११५ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें वासुदेव-माहात्म्यविषयक एक सौ पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ११५॥


षोडशाधिकशततमोऽध्यायः

भगवान् शङ्करका बाणासुरको अपने और देवी पार्वतीके पुत्रके रूपमें स्वीकार करना, बाणासुरका उनसे युद्धके लिये वर माँगना और पाना तथा इससे बाण-मन्त्री कुम्भाण्डका चिन्तित होना

जनमेजय उवाच
भूय एव महाबाहोर्यदुसिंहस्य धीमतः।
कर्माण्यपरिमेयाणि श्रुतानि द्विजसत्तम ॥ १॥
त्वत्तः श्रुतवतां श्रेष्ठ वासुदेवस्य धीमतः।
जनमेजयने कहा—विद्वानोंमें उत्तम द्विजश्रेष्ठ ! मैंने आपके मुखसे बुद्धिमान् महाबाहु यदुकुलसिंह वसुदेव-नन्दन श्रीकृष्णके अपरिमेय कर्मोंको फिरसे सुना॥ १ १/२॥

यत् त्वया कथितं पूर्वं बाणं प्रति महासुरम् ॥ २॥
तदहं श्रोतुमिच्छामि विस्तरेण तपोधन ।
तपोधन ! आपने पहले महान् असुर बाणके विषयमें जो चर्चा की है, उसको मैं विस्तारसे सुनना चाहता हूँ ॥ २ १/२ ॥

कथं च देवदेवस्य पुत्रत्वमसुरो गतः॥ ३॥
योऽभिगुप्तः स्वयं ब्रह्मञ्छङ्करेण महात्मना ।
सहवासं गतेनैव सगणेन गुहेन तु॥ ४॥
ब्रह्मन् ! वह असुर देवाधिदेव महादेवजीके पुत्रभावको कैसे प्राप्त हुआ? जिससे महात्मा भगवान् शङ्करने स्वयं उसकी रक्षा की तथा उसके सहवासमें रहनेवाले गणोंसहित भगवान् स्कन्दने भी उसका संरक्षण किया॥ ३-४॥

बलेर्बलवतः पुत्रो ज्येष्ठो भ्रातृशतस्य यः।
वृतो बाहुसहस्रेण दिव्यास्त्रशतधारिणा ॥ ५॥
बलवान् बलिक्रा पुत्र अपने सौ भाइयोंमें ज्येष्ठ था। वह सैकड़ों दिव्यास्त्र धारण करनेवाली सहस्र भुजाओंसे युक्त था॥ ५॥

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