भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 688, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 688

६६६ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे असंख्येयैश्च महाकायैर्महाबलशतैर्वृतः। ततोऽग्लपयदात्मानं तपसा श्लाघते च सः। वासुदेवेन स कथं वाणः संख्ये पराजितः ॥ ६ ॥ देवश्च परमं तोषं जगाम च सहोमया ॥ १४ ॥ संरब्धश्चैव युद्धार्थी जीवन्मुक्तः कथं च सः। तदनन्तर उसने तपस्याके द्वारा अपने शरीरको गलाना वह असंख्य विशालकाय तथा सैकड़ों महाबली असुरोंसे आरम्भ किया। उसे अपनी तपस्यापर गर्व भी होता था घिरा रहता था तो भी जब वह युद्धकी इच्छासे रोष अर्थात् वह यह समझता था कि मैं ही महान् तपस्वी हूँ और आवेशमें भरकर आया, तब भगवान् वासुदेवने युद्धमें तथा पार्वतीसहित महादेवजी उसपर बहुत संतुष्ट हुए ॥१४॥ उसे पराजित कैसे कर दिया ? तथा किस प्रकार उन्होंने नीलकण्ठः परां प्रीतिं गत्वा चासुरमब्रवीत् । उसे जीवित छोड़ा था ? ॥ ६३ ॥ वरं वरय भद्रं ते यत् ते मनसि वर्तते ॥ १५ ॥ वैशम्पायन उवाच परम प्रसन्नताको प्राप्त होकर भगवान् नीलकण्ठने उस शृणुष्वावहितो राजन् कृष्णस्यामिततेजसः ॥ ७ ॥ असुरसे कहा- 'बाण ! तुम्हारा कल्याण हो । तुम्हारे मनमें मनुष्यलोके बाणेन यथाभूद् विग्रहो महान् । जो इच्छा हो, उसके अनुसार वर माँगो' ॥ १५ ॥ वैशम्पायनजी बोले- राजन् ! मानवलोकमें अमित- अथ वाणोऽब्रवीद् वाक्यं देवदेवं महेश्वरम् । तेजस्वी भगवान् श्रीकृष्णका बाणासुरके साथ जिस तरह देव्याः पुत्रत्वमिच्छामि त्वया दत्तं त्रिलोचन ॥ १६ ॥ महान् संग्राम हुआ था, उसे ध्यान देकर सुनो ॥ ७३ ॥ तब बाणने देवाधिदेव महेश्वरसे कहा- 'त्रिलोचन ! मैं वासुदेवेन यत्रासौ रुद्रस्कन्दसहायवान् ॥ ८ ॥ आपका दिया हुआ देवी पार्वतीका पुत्रत्व चाहता हूँ' ॥१६॥ बलिपुत्रो रणश्लाघी जित्वा जीवन् विसर्जितः । शंकरस्तु तथेत्युक्त्वा रुद्राणीमिदमब्रवीत् । जहाँ रुद्र और स्कन्दकी सहायतासे सम्पन्न हुए युद्ध- कनीयान् कार्त्तिकेयस्य पुत्रोऽयं प्रतिगृह्यताम् ॥ १७ ॥ श्लाघी बलिपुत्र बाणासुरको भगवान् श्रीकृष्णने जीतकर तब भगवान् शङ्करने 'तथास्तु' कहकर देवी रुद्राणीसे भी जीवित छोड़ दिया ॥ ८३ ॥ इस प्रकार कहा - 'देवि ! तुम इसे पुत्रके रूपमें स्वीकार यथा चास्य वरो दत्तः शंकरेण महात्मना ॥ ९ ॥ करो। यह कार्त्तिकेयका छोटा भाई होगा ॥ १७ ॥ नित्यं सांनिध्यतां चैव गाणपत्यं तथाक्षयम् । यत्रोत्थितो महासेनः सोऽग्निजो रुधिरे पुरे । यथा बाणस्य तद् युद्धं जीवन्मुक्तो यथा च सः ॥ १०॥ तत्रोद्देशे पुरं चास्य भविष्यति न संशयः ॥ १८ ॥ यथा च देवदेवस्य पुत्रत्वं सोऽसुरो गतः । 'जहाँ रुधिरपुरमें अग्निकुमार महासेनका प्रादुर्भाव यदर्थं च महत् युद्धं तद् सर्वमखिलं शृणु ॥ ११ ॥ हुआ था, उस स्थानपर इसकी राजधानी होगी। इसमें महात्मा शङ्करने जिस प्रकार बाणासुरको सदा अपने संशय नहीं है ॥ १८ ॥ समीप रहने और अक्षयभावसे गणपति-पदपर प्रतिष्ठित नाम्ना तच्छोणितपुरं भविष्यति पुरोत्तमम् । होनेका वरदान दिया था। जिस प्रकार बाणासुरका वह मयाभिगुप्तं श्रीमन्तं न कश्चित् प्रसहिष्यति ॥ १९ ॥ युद्ध हुआ, जिस प्रकार श्रीकृष्णने उसे जीवित छोड़ा, जिस 'वह उत्तम नगर शोणितपुरके नामसे विख्यात होगा । तरह वह असुर देवाधिदेव महादेवजीके पुत्रभावको प्राप्त मेरे द्वारा सुरक्षित हुए इस तेजस्वी बाणासुरका वेग कोई हुआ तथा जिस निमित्तसे उस महान् युद्धकी घटना घटित नहीं सह सकेगा' ॥ १९ ॥ हुई, वह सारा वृत्तान्त सम्पूर्ण रूपसे सुनो ॥ ९-११ ॥ ततः स निवसन् बाणः पुरे शोणितसाह्वये । दृष्ट्वा वपुः कुमारस्य क्रीडतश्च महात्मनः । राज्यं प्रशासते नित्यं क्षोभयन् सर्वदेवताः ॥ २० ॥ बलिपुत्रो महावीर्यो विस्मयं परमं गतः ॥ १२ ॥ तदनन्तर शोणितपुरमें निवास करता हुआ बाण सदा एक समय क्रीड़ामें लगे हुए महामनस्वी कुमार स्कन्दके अपने राज्यका शासन करने लगा। वह सम्पूर्ण देवताओंको सुन्दर शरीरको देखकर महापराक्रमी बलिपुत्र बाणासुरको क्षोभमें डाले रहता था ॥ २० ॥ बड़ा विस्मय हुआ ॥ १२ ॥ अथ वीर्यमदोन्मत्तो बाणो बाहुसहस्रवान् । तस्य बुद्धिः समुत्पन्ना तपश्चर्तुं सुदुष्करम् । अचिन्तयन् देवगणान् युद्धमाकाङ्क्षते सदा ॥ २१ ॥ रुद्रस्याराधनार्थाय देवस्य स्यां यथा सुतः ॥ १३ ॥ इसके बाद सहस्रबाहु बाणासुर अपने बल-पराक्रमके उस समय उसके मनमें रुद्रदेवकी आराधनाके लिये मदसे उन्मत्त हो देवताओंको कुछ भी न समझकर सदा अत्यन्त दुष्कर तपस्या करनेका विचार उत्पन्न हुआ। उस सबके साथ युद्धकी आकाङ्क्षा रखने लगा ॥ २१ ॥ तपका उद्देश्य यही था कि मैं किसी प्रकार महादेवजीका पुत्र हो जाऊँ ॥ १३ ॥