विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 689, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] षोडशाधिकशततमोऽध्यायः ६६७
ध्वजं चास्य ददौ प्रीतः कुमारो ह्यग्नितेजसम्।
वाहनं चैव बाणस्य मयूरं दीप्ततेजसम् ॥ २२॥
बाणासुरपर प्रसन्न हुए कुमार कार्तिकेयने उसे अग्नि-के तुल्य तेजस्वी ध्वज तथा तेजसे प्रकाशित मयूर वाहन-रूपमें प्रदान किया ॥ २२ ॥
न देवा न च गन्धर्वा न यक्षा नापि पन्नगाः।
तस्य युद्धे व्यतिष्ठन्त देवदेवस्य तेजसा ॥ २३॥
देवाधिदेव महादेवजीके तेजसे सुरक्षित हुए बाणासुरके सामने युद्धमें न तो देवता ठहर पाते थे, न गन्धर्व, न यक्ष टिक पाते थे, न नाग ॥ २३ ॥
त्र्यम्बकेनाभिगुप्तश्च दर्पोत्सिक्तो महासुरः।
भूयो मृगयते युद्धं शूलिनं सोऽभ्यगच्छत ॥ २४॥
त्रिनेत्रधारी शिवके द्वारा सुरक्षित हुआ वह महान् असुर बलके घमंडमें भर गया और वारंवार युद्धका ही अवसर ढूँढ़ने लगा। एक दिन वह त्रिशूलधारी भगवान् शङ्करके पास गया ॥ २४ ॥
स रुद्रमभिगम्याथ प्रणिपत्याभिवाद्य च।
बलिसूनुरिदं वाक्यं पप्रच्छ वृषभध्वजम् ॥ २५॥
वृषभध्वज रुद्रदेवके पास जाकर उन्हें प्रणाम और अभिवादन करनेके पश्चात् बलिपुत्र बाणने उनसे यह बात पूछी—॥ २५ ॥
असकृन्निर्जिता देवाः ससाध्याः समरुद्गणाः।
मया मदबलोत्सेकात् ससैन्येन तवाश्रयात् ॥ २६॥
'प्रभो ! आपका सहारा पाकर सेनासहित मैंने बलके मद और अभिमानपूर्वक साध्यों और मरुद्गणोंसहित देवताओं-को अनेक बार परास्त किया है ॥ २६ ॥
इमं देशं समागम्य वसन्ति स्म पुरे सुखम्।
ते पराजयसंत्रस्ता निराशा मत्पराजये ॥ २७॥
'वे मुझे पराजित करनेकी ओरसे तो निराश हैं; परंतु मेरे द्वारा पुनः पराजित होनेके भयसे डरे हुए हैं, अतः इस देशमें आकर इसी नगरमें सुखपूर्वक निवास करते हैं ॥ २७ ॥
नाकपृष्ठमुपागम्य निवसन्ति यथासुखम्।
सोऽहं निराशो युद्धस्य जीवितं नाद्य कामये ॥ २८ ॥
'साथ ही मेरी आज्ञा ले स्वर्गमें भी जाकर वहाँ सुख-पूर्वक रहते हैं, अतः मैं युद्धसे निराश हो गया हूँ। अब युद्ध न मिलनेसे मुझे जीवित रहनेकी इच्छा नहीं होती ॥ २८ ॥
अयुध्यतो वृथा ह्येषां बाहूनां धारणं मम।
तद् ब्रूहि मम युद्धस्य कश्चिदागमनं भवेत्।
न मे युद्धं विना देव रतिरस्ति प्रसीद मे ॥ २९ ॥
'यदि युद्धका सुयोग न मिला तो मेरे लिये इन सहस्र भुजाओंका बोझ ढोना व्यर्थ है; अतः बताइये, क्या मुझे युद्धका अवसर प्राप्त हो सकता है ? देव ! युद्धके बिना मेरा मन कहीं नहीं लग रहा है। अतः इसके लिये मुझपर कृपा कीजिये' ॥ २९ ॥
ततः प्रहस्य भगवानब्रवीद् वृषभध्वजः।
भविता बाण युद्धं वै यथा तच्छृणु दानव ॥ ३०॥
यह सुनकर भगवान् वृषभध्वज ठठाकर हँस पड़े और इस प्रकार बोले—'बाणासुर ! जिस प्रकार तुम्हें युद्धका अवसर प्राप्त होगा, वह सुनो ॥ ३० ॥
ध्वजस्यास्य यदा भङ्गस्तव तात भविष्यति।
स्वस्थाने स्थापितस्याथ तदा युद्धं भविष्यति ॥ ३१॥
'तात ! अपने स्थानपर स्थापित हुआ तुम्हारा यह ध्वज जब खण्डित होकर गिर जायगा, तब तुम्हें युद्ध प्राप्त होगा' ॥ ३१ ॥
इत्येवमुक्तः प्रहसन् बाणस्तु बहुशो मुदा।
प्रसन्नवदनो भूत्वा पादयोः पतितोऽब्रवीत् ॥ ३२॥
उनके ऐसा कहनेपर बाणासुरका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा। वह आनन्दमें मग्न हो बारंबार जोर-जोरसे हँसने लगा और भगवान् शिवके चरणोंमें गिरकर इस प्रकार बोला—॥
दिष्ट्या बाहुसहस्रस्य न वृथा धारणं मम।
दिष्ट्या सहस्राक्षमहं विजेता पुनराहवे ॥ ३३ ॥
'प्रभो ! बड़े सौभाग्यकी बात है कि मेरे लिये इन सहस्र भुजाओंको धारण करना व्यर्थ नहीं होगा। सौभाग्यसे मैं पुनः युद्धमें सहस्रलोचन इन्द्रको परास्त करूँगा' ॥ ३३ ॥
आनन्देनाश्रुपूर्णाभ्यां नेत्राभ्यामरिमर्दनः।
पञ्चाङ्गलिशतैर्देवं पूजयन् पतितो भुवि ॥ ३४॥
ऐसा कहकर शत्रुमर्दन बाण आनन्दाँसुओंसे परिपूर्ण नेत्रों तथा पाँच सौ अञ्जलियोंद्वारा महादेवजीकी पूजा करता हुआ पुनः पृथ्वीपर उनके चरणोंमें पड़ गया ॥ ३४ ॥
ईश्वर उवाच
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ बाहूनामात्मनः स्वकुलस्य तु।
सदृशं प्राप्स्यसे वीर युद्धमप्रतिमं महत् ॥ ३५॥
तब महादेवजी बोले— वीर ! उठो, उठो ! तुम अपनी इन भुजाओं तथा कुलके अनुरूप ऐसा महान् युद्ध प्राप्त करोगे, जिसकी कहीं तुलना नहीं है ॥ ३५ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्ततो बाणस्त्र्यम्बकेन महात्मना।
हर्षेणात्युच्छ्रितः शीघ्रं ननाम वृषभध्वजम् ॥ ३६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन् ! महात्मा त्र्यम्बकके ऐसा कहनेपर हर्षसे उत्फुल्ल हुए बाणासुरने भगवान् वृषभध्वजको शीघ्र नमस्कार किया ॥ ३६ ॥