भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 690

६६८ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे


शितिकण्ठविसृष्टस्तु बाणः परपुरंजयः।
ययौ स्वभवनं तत्र यत्र ध्वजगृहं महत् ॥ ३७ ॥
तदनन्तर भगवान् नीलकण्ठसे विदा लेकर शत्रुनगरीपर विजय पानेवाला बाणासुर अपने घरको गया, जहाँ विशाल ध्वजगृह बना हुआ था ॥ ३७ ॥

तत्रोपविष्टः प्रहसन् कुम्भाण्डमिदमब्रवीत् ।
प्रियमावेदयिष्यामि भवतो यन्मनोगतम् ॥ ३८ ॥
वहाँ बैठकर हँसते हुए बाणने अपने मन्त्री कुम्भाण्डसे इस प्रकार कहा—‘मन्त्रिप्रवर ! मैं तुम्हें प्रिय समाचार निवेदन करूँगा, जो तुम्हारे मनको अभीष्ट है’ ॥ ३८ ॥

इत्येवमुक्तः प्रहसन् बाणमप्रतिमं रणे।
प्रोवाच राजन् किं त्वेतद्वक्तुकामोऽसि मत्प्रियम्॥३९॥
उसका ऐसा कथन सुनकर हँसते हुए कुम्भाण्डने युद्धमें अनुपम वीरता प्रकट करनेवाले बाणासुरसे कहा—‘राजन् ! यह क्या बात है ? आप मेरे किस प्रिय समाचारको बताना चाहते हैं ? ॥ ३९ ॥

विस्मयोत्फुल्लनयनः प्रहर्षादिव भाषसे।
त्वत्तः श्रोतुमिहेच्छामि वरं किं लब्धवानसि ॥ ४० ॥
देवदेवप्रसादेन स्कन्दस्य च महात्मनः।
‘आपके नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे हैं। आप अत्यन्त हर्षसे प्रेरित होकर बोल रहे हैं। मैं यहाँ आपके मुखसे सुनना चाहता हूँ कि आपने देवाधिदेव महादेवजीकी कृपा और महात्मा स्कन्दके प्रसादसे कौन-सा वर प्राप्त किया है ? ॥ ४० १/२ ॥

ईप्सितं किं त्वया प्राप्तं तन्मे ब्रूहि महासुर ॥ ४१ ॥
शितिकण्ठप्रसादेन स्कन्दगोपायनेन च।
‘महान् असुर ! आपने भगवान् नीलकण्ठके कृपा-प्रसाद और स्वामी स्कन्दके संरक्षणद्वारा कौन-सा अभीष्ट वर प्राप्त किया है, यह मुझे बताइये ॥ ४१ १/२ ॥

कच्चित्त्रैलोक्यराज्यं ते व्यादिष्टं शूलपाणिना ॥ ४२ ॥
कच्चिदिन्द्रस्तव भयात् पातालमुपयास्यति ।
‘क्या भगवान् शूलपाणिने आपको तीनों लोकोंका राज्य दे दिया ? क्या देवराज इन्द्र आपके भयसे पाताललोकको चले जायेंगे ? ॥ ४२ १/२ ॥

कच्चिद् विष्णुपरीत्रासं विमोक्ष्यन्ति दितेः सुताः॥ ४३ ॥
पातालवासमुत्सृज्य कच्चित् तव वलाश्रयात् ।
विबुधावासनिरता भविष्यन्ति महासुराः ॥ ४४ ॥
‘क्या दितिके पुत्र अब भगवान् विष्णुका भय त्याग देंगे ? क्या आपके बलका सहारा लेकर बड़े-बड़े असुर पातालका निवास छोड़कर स्वर्गलोकमें वास करेंगे ॥ ४३-४४ ॥

बलिर्विष्णु पराक्रान्तो बद्धस्तव पिता नृप।
सलिलौघाद् विनिष्क्रम्य कच्चिद् राज्यमवाप्स्यति ॥ ४५॥
‘राजन् ! क्या आपके पिता राजा बलि, जो विष्णुके पराक्रमसे अभिभूत हो पातालमें बँधे हुए हैं, समुद्रकी जल-राशिसे बाहर निकलकर पुनः त्रिलोकीका राज्य प्राप्त करेंगे ॥

दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यस्रग्गन्धलेपनम् ।
कच्चिद् वैरोचनिं तात द्रक्ष्यामः पितरं तव ॥ ४६॥
‘तात ! क्या हमलोग तुम्हारे पिता विरोचनकुमार बलि-को पुनः दिव्यमाला, दिव्यवस्त्र, दिव्यपुष्पोंके हार, दिव्य गन्ध तथा दिव्य अनुलेपन धारण किये देखेंगे ? ॥ ४६ ॥

कच्चित् त्रिभिः क्रमैः पूर्वं हृतांल्लोकानिमान् प्रभो।
पुनः प्रत्यानयिष्यामो जित्वा सर्वान् दिवौकसः ॥ ४७ ॥
‘प्रभो ! पहले विष्णुके तीन पगोंद्वारा जो हर लिये गये थे, उन्हीं इन तीनों लोकोंको क्या हम पुनः समस्त देवताओं-को पराजित करके लौटा लायेंगे ? ॥ ४७ ॥

स्निग्धगम्भीरनिर्घोषं शङ्खस्वनपुरोजवम् ।
कच्चिन्नारायणं देवं जेष्यामः समितिज्जयम् ॥ ४८ ॥
‘जिनकी वाणीका घोष मेघगर्जनाके समान स्निग्ध एवं गम्भीर है तथा जिनके आगे उनका शङ्खनाद वेगपूर्वक चलता है, उन युद्धविजयी नारायणदेवको क्या हमलोग जीत सकेंगे ? ॥ ४८ ॥

कच्चिद् वृषभध्वजस्तात प्रसादसुमुखस्तव ।
यथा ते हृदयोत्कम्पः साश्रुविन्दुः प्रवर्तते ॥ ४९ ॥
‘तात ! क्या भगवान् वृषभध्वज आपके प्रति कृपा करनेके लिये प्रसन्नमुख हुए हैं ? आपके हृदयमें जैसा कम्प हो रहा है और नेत्रोंसे जिस प्रकार आनन्दके आँसू झर रहे हैं, उनको देखते हुए पूर्वोक्त बातोंका ही अनुमान होता है ॥

कच्चिदीश्वरतोषेण कार्तिकेयमतेन च।
प्राप्तवानसि सर्वेषामस्माकं राज्यसम्पदम् ॥ ५० ॥
‘क्या भगवान् शिवके संतोष और कार्तिकेयकी सम्मतिसे आपने हम सब लोगोंके लिये राज्य-सम्पत्ति प्राप्त की है ?’ ॥

इति कुम्भाण्डवचनैश्चोदितः सोऽसुरोत्तमः ।
बाणो वाणीमसंसक्तां प्रोवाच वदतां वरः ॥ ५१ ॥
तब कुम्भाण्डकी ऐसी बातोंसे प्रेरित होकर वक्ताओंमें श्रेष्ठ असुरप्रवर बाणने अस्खलित वाणीमें कहा ॥ ५१ ॥

बाण उवाच
चिरात्प्रभृति कुम्भाण्ड न युद्धं प्राप्यते मया ।
ततो मया मुदा पृष्टः शितिकण्ठः प्रतापवान् ॥ ५२॥
बाणासुर बोला—कुम्भाण्ड ! चिरकालसे मुझे युद्ध नहीं प्राप्त हो रहा था, इसलिये मैंने प्रतापी भगवान् नीलकण्ठसे प्रसन्नतापूर्वक पूछा—॥ ५२ ॥

युद्धाभिलाषः सुमहान् देव संजायते मम ।
अभिप्राप्स्याम्यहं युद्धं मनसस्तुष्टिवर्धनम् ॥ ५३ ॥