विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 691, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णु० पर्व १]
देवें। मेरे मनमें युद्धकी बड़ी अभिलाषा हो रही है। क्या मैं कभी ऐसा युद्ध प्राप्त करूँगा, जो मेरे मनके उद्वेगको दूर करनेवाला हो' ॥ ५३ ॥
ततोऽहं देवदेवेन हरेणाविशतासिना ।
प्रहस्य सुचिरं कालमुक्तोऽस्मि वचनं प्रियम् ।
प्राप्स्यसे सुमहद् युद्धं त्वं वानाप्रतिमं महत् ॥ ५४ ॥
मेरी यह बात सुनकर धनुर्धारी देवोंके देव महादेवने देरतक हँसकर मुझसे यह प्रिय वचन कहा—'बाणासुर ! तुम्हें ऐसा महान् युद्ध प्राप्त होगा; जिसकी कहीं तुलना नहीं है ॥
मयूरध्वजभङ्गेस्ते भविष्यति यदासुर ।
तदा त्वं प्राप्स्यसे युद्धं सुमहद् दितिनन्दन ॥ ५५ ॥
'दितिनन्दन असुर ! जब तुम्हारा मयूरध्वज टूटकर गिर जायगा, तब तुम्हें महान् युद्धका अवसर प्राप्त होगा' ॥ ५५ ॥
ततोऽहं परमप्रीतो भगवन्तं वृषध्वजम् ।
प्रणम्य शिरसा देवं तवान्तिकमुपागतः ॥ ५६ ॥
तब मैं अत्यन्त प्रसन्न हो भगवान् वृषध्वज देवको सिर झुकाकर प्रणाम करके तुम्हारे पास आया हूँ ॥ ५६ ॥
इत्येवमुक्तः कुम्भाण्डः प्रोवाच नृपतिं तदा ।
अहो न शोभनं राजन् यदेवं भाषसे वचः ॥ ५७ ॥
बाणासुरके ऐसा कहनेपर कुम्भाण्डने उस असुरराजसे कहा—'अहो राजन् ! आप जो ऐसी बात कह रहे हैं, इसका परिणाम अच्छा नहीं है' ॥ ५७ ॥
एवं कथयतोस्तत्र तयोरन्योन्यमुच्छ्रितः ।
ध्वजः पपात वेगेन शक्राशनिसमाहतः ॥ ५८ ॥
वे दोनों वहाँ आपसमें ऐसी बातें कर रहे थे कि इतनेमें ही बाणासुरका ऊँचा ध्वज इन्द्रके वज्रसे आहत हो बड़े वेगसे गिर पड़ा ॥ ५८ ॥
तं तथा पतितं दृष्ट्वा सोऽसुरो ध्वजमुत्तमम् ।
प्रहर्षमतुलं लेभे मेने चाहवमागतम् ॥ ५९ ॥
अपने उस उत्तम ध्वजको टूटकर गिरा हुआ देख बाणासुरको अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ और उसे यह विश्वास हो गया कि अब युद्धका अवसर आना ही चाहता है ॥ ५९ ॥
ततश्चकम्पे वसुधा शक्राशनिसमाहता ।
ननादान्तर्हितो भूमौ वृषदंशो जगर्ज च ॥ ६० ॥
तदनन्तर इन्द्रके वज्रके आघातसे पीड़ित हो पृथ्वी काँपने लगी। भूमिमें छिपा हुआ बिलाव आर्तनाद एवं गर्जना करने लगा ॥ ६० ॥
देवानापि यो देवः सोऽप्यवर्षत वासवः ।
शोणितं शोणितपुरे सर्वतः परमं ततः ॥ ६१ ॥
जो देवताओंके भी देवता हैं, वे इन्द्र शोणितपुरमें सब ओर बहुत रक्तकी वर्षा करने लगे ॥ ६१ ॥
उन्हें गिरा हुआ देखकर वह अत्यन्त भयभीत ले।
खरदंष्ट्रो घोरिकां खड्गीं भरणीं सप्तमीमथ ॥ ५२॥
आकाशसे दुर्लक्षणोंका दर्शन करके बहुत बड़ी उल्का धरतीपर गिरी। अपने रथके देवियोंसे वेष्ठित हुए सूर्यदेव अपनी दाहक सहस्रों किरणोंको छोड़ने लगे ॥ ५१ ॥
चैत्यवृक्षेषु सहसा धाराः शतसहस्रशः ।
शोणितस्य स्रवन् घोरा निपेतुस्तारका भृशम् ॥ ६३ ॥
चैत्य-वृक्षोंपर सहसा शोणितकी सैकड़ों-हजारों धाराएँ गिरने लगीं, जो बड़ी भयंकर प्रतीत होती थीं। आकाशसे बारंबार तारे टूटकर गिरने लगे ॥ ६३ ॥
राहुरग्रसदादित्यमपर्वणि विशांपते ।
लोकक्षयकरे काले निर्घाताश्चापतन्महान् ॥ ६४ ॥
प्रजानाथ ! राहुने बिना पर्वके ही सूर्यको ग्रस लिया। वह लोकविनाशक समय प्राप्त होनेपर भारी गड़गड़ाहटके साथ वज्रपात होने लगा ॥ ६४ ॥
दक्षिणां दिशमाश्रित्य धूमकेतुः स्थितोऽभवत् ।
अनिशं चाप्यविच्छिन्ना ववुर्वाताः सुदारुणाः ॥ ६५ ॥
धूमकेतु दक्षिण दिशा में आकर स्थित हो गया। निरन्तर अविच्छिन्नभावसे अत्यन्त दारुण वायु चलने लगी ॥ ६५ ॥
श्वेतलोहितपर्यन्तः कृष्णग्रीवस्तडिद्युतिः ।
त्रिवर्णपरिवो भानुः संध्यारागमथावृणोत् ॥ ६६ ॥
सूर्यपर तीन रंगके घेरे पड़ गये। किनारे-किनारे तो सफेद और लाल रंगके घेरे थे; किंतु कण्ठभागमें काले रंगका घेरा था। उसमें सूर्यकी कान्ति विद्युत् के समान प्रतीत होती थी। उन्होंने अपनी उस दीप्तिसे संध्याकालकी लालीको ढक दिया ॥ ६६ ॥
वक्रमङ्गारकमग्नो कृत्तिकासु भयंकरः ।
बाणस्य जन्म नक्षत्रं भरणीमभि दारुणः ॥ ६७ ॥
मङ्गल वक्रगतिसे कृत्तिका में आकर स्थित हो गये, जो भयकी सूचना दे रहे थे। ये सब प्रकारसे बाणासुरके जन्मनक्षत्र रोहिणीकी भरणीनामी पर रहे थे ॥ ६७ ॥
अनेकशाखाढ्यश्चाग्र्य निपपात महीतले ।
अर्चितः सर्वकन्याभिर्दानवानां महात्मनाम् ॥ ६८ ॥
बहुत-सी शाखाओंसे युक्त चैत्यवृक्ष, जो महापराक्रमी दानवोंकी समस्त कन्याओं द्वारा पूजित होता था, सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ६८ ॥
एवं विविधरूपाणि निमित्तानि विभावयन् ।
बाणो बलमदोन्मत्तो निश्चयं नाधिवच्छति ॥ ६९ ॥
इस प्रकार भाँति-भाँतिके उत्पातोंको देखता हुआ बाण बाणासुर किसी निश्चयपर नहीं ...