भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 692, कुल 1169 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 692

६७० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


विचेतास्त्वभवत् प्राज्ञः कुम्भाण्डस्तत्त्वदर्शिवान्।
बाणस्य सचिवस्तत्र कीर्तयन् बहु किल्बिषम् ॥ ७० ॥
परंतु बाणासुरकें विद्वान् मन्त्री तत्त्वदर्शी कुम्भाण्ड नाना प्रकारके दुष्परिणामोंका वर्णन करते हुए अचेत-से हो गये ॥ ७० ॥

उत्पाता ह्यत्र दृश्यन्ते कथयन्तो न शोभनम् ।
तव राज्यविनाशाय भविष्यन्ति न संशयः ॥ ७१ ॥
वे बोले—‘असुरराज ! यहाँ बहुत-से उत्पात दिखायी देते हैं, जो शुभ परिणामके सूचक नहीं हैं। वे आपके राज्यका विनाश करनेमें सहायक होंगे, इसमें संदेह नहीं है ॥ ७१ ॥

वयं चान्ये च सचिवा भृत्यास्ते च तवानुगाः ।
क्षयं यास्यन्ति नचिरात् सर्वे पार्थिव दुर्नयात् ॥ ७२ ॥
‘पृथ्वीनाथ ! आपकी दुर्नीतिसे हम तथा दूसरे मन्त्री और आपके अनुगामी सेवक—ये सब-के-सब शीघ्र ही नष्ट हो जायेंगे ॥ ७२ ॥

यथा शक्रध्वजवरोः स्वदर्पात् पतनं भवेत् ।
बलमाकाङ्क्षतो मोहात् तथा बाणस्य नर्दतः ॥ ७३ ॥
‘आपके अपने ही दर्पसे जिस तरह पूर्वोक्त चैत्यवृक्षका जो अपनी ऊँचाईसे इन्द्रध्वजको छू लेता था, पतन हो गया, उसी प्रकार बलकी आकाङ्क्षा रखकर गर्जना करनेवाले आप बाणासुरका भी अपने ही मोहवश अभिमानसे पतन हो जायगा ॥ ७३ ॥

देवदेवप्रसादात् तु त्रैलोक्यविजयं गतः ।
उत्सेकाद् दृश्यते नाशो युद्धाकाङ्क्षी ननर्द ह ॥ ७४ ॥
‘देवाधिदेव महादेवजीके प्रसादसे जिन्होंने तीनों लोकोंपर विजय प्राप्त कर ली, उन्हीं असुरराजका अब अभिमानवश विनाश दिखायी देता है, तभी तो आप युद्धकी अभिलाषा लेकर गर्जना करने लगे हैं' ॥ ७४ ॥

बाणः प्रीतमनास्त्वेवं पपौ पानमनुत्तमम् ।
दैत्यदानवनारीभिः सार्धमुत्तमविक्रमः ॥ ७५ ॥
परंतु बाणासुरको इसकी परवा नहीं थी, वह उत्तम पराक्रमी असुर प्रसन्नचित्त होकर दैत्यों और दानवोंकी स्त्रियोंके साथ उत्तम मधुपान करने लगा ॥ ७५ ॥

कुम्भाण्डश्चिन्तयाविष्टो राजवेश्माभ्ययात् तदा ।
अचिन्तयच्च तत्त्वार्थं तैस्तैरुत्पातदर्शनैः ॥ ७६ ॥
मन्त्री कुम्भाण्ड उस समय चिन्तित होकर राजभवनको चले गये तथा भिन्न-भिन्न उत्पातोंको देखकर तात्त्विक अर्थका चिन्तन करने लगे ॥ ७६ ॥

राजा प्रमादी दुर्बुद्धिर्जितकाशी महासुरः ।
युद्धमेवाभिलषते न दोषान्मम्यते मदात् ॥ ७७ ॥
वे मन-ही-मन सोचने लगे, यह असुरोंका राजा महान् असुर बाण प्रमादी हो गया है। इसकी बुद्धि बिगड़ गयी है। यह विजयश्रीसे उल्लसित हो बारंबार युद्धकी ही अभिलाषा रखने लगा है। बलके मदसे उन्मत्त होकर इसमें दोष नहीं मान रहा है ॥ ७७ ॥

महोत्पातभयं चैव न तन्मिथ्या भविष्यति ।
अपीदानीं भवेन्मिथ्या सर्वमुत्पातदर्शनम् ॥ ७८ ॥
महान् उत्पातोंसे जिस भयकी सूचना मिल रही है। वह मिथ्या नहीं होगा। क्या कोई ऐसा उपाय है, जिससे इस समय यह सारा उत्पात-दर्शन मिथ्या हो जाय ? ॥ ७८ ॥

इह त्वास्ते त्रिनयनः कार्तिकेयश्च वीर्यवान् ।
तेनोत्पन्नोऽपिदोषोनः कच्चिद् गच्छेत् पराभवम् ॥ ७९ ॥
यहाँ साक्षात् त्रिनेत्रधारी भगवान् शिव रहते हैं। पराक्रमी कार्तिकेय भी यहीं विराजमान हैं, इससे हमारे लिये उत्पन्न हुआ यह दोष भी क्या शान्त हो जायगा ? ॥ ७९ ॥

उत्पन्नदोषप्रभवः क्षयोऽयं भविता महान् ।
दोषाणां न भवेन्नाश इति मे धीयते मतिः ॥ ८० ॥
इन उत्पन्न हुए उत्पातरूपी दोषोंसे यह सूचित होता है कि यहाँ महान् संहार होनेवाला है। मेरा तो यही निश्चय है कि अब इन दोषोंका नाश नहीं हो सकता ॥ ८० ॥

नियतो दोष एवायं भविष्यति न संशयः ।
दौरात्म्यान्नृपतेरस्य दोषभूता हि दानवाः ॥ ८१ ॥
इस राजाका जो यह दुरात्मभाव है, यही हमारे लिये नियत दोष होगा, इसमें संशय नहीं है; क्योंकि समस्त दानव ही इस दोषसे युक्त हैं ॥ ८१ ॥

देवदानवसंघानां यः कर्ता भुवनप्रभुः ।
भगवान् कार्तिकेयश्च कृतवाँल्लोहिते पुरे ॥ ८२ ॥
जो देवताओं और दानवोंके समुदायोंकी सृष्टि करनेवाले तथा समस्त भुवनोंके प्रभु हैं, उन भगवान् शिव तथा कार्तिकेयने बाणासुरको शोणितपुरमें बसा दिया था ॥ ८२ ॥

प्राणैः प्रियतरो नित्यं भविष्यति गुहः सदा ।
तद्विशिष्टश्च बाणोऽपि शिवस्य सततं प्रियः ॥ ८३ ॥
स्कन्द तो सदा भगवान् शिवके लिये प्राणोंसे भी अधिक प्रिय होंगे और उनके साथ रहकर बाणासुर भी निरन्तर उनका प्रिय बना रहेगा ॥ ८३ ॥

दर्पोत्सेकात् तु नाशाय वरं याचितवान् भवम् ।
युद्धहेतोः स लुब्धस्तु सर्वथा न भविष्यति ॥ ८४ ॥
परंतु इसने बलके घमंडमें आकर अपने ही विनाशके लिये भगवान् शङ्करसे युद्धके लिये वर माँग लिया। युद्धलोलुप होनेके कारण यह सर्वथा अपना अस्तित्व खो देगा ॥ ८४ ॥

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित) · पृष्ठ 692, कुल 1169 में से · BharatKosha