विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 693, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः ६७१
यदि विष्णुपुरोगानामिन्द्रादीनां दिवौकसाम्।
भवित्री घनवत् प्राप्तिर्महस्तात् कृता भवेत् ॥ ८५ ॥
यदि भगवान् विष्णुको आगे करके इन्द्र आदि देवता मेघोंकी घटाके समान यहाँ छा जायँ तो भी भगवान् शङ्करके हाथसे उनके उस आक्रमणका प्रतीकार हो सकता है ॥८५॥
पतयोश्च हि को युद्धं कुमारभवयोरिह।
शक्तो दातुं समागम्य बाणसाहाय्यकाङ्क्षिणोः ॥ ८६ ॥
बाणासुरकी सहायताकी इच्छा रखनेवाले इन भगवान् शङ्कर और कुमार कार्तिकेयके सामने आकर कौन इन्हें युद्धका अवसर दे सकता है ? ॥ ८६ ॥
न च देववचो मिथ्या भविष्यति कदाचन ।
भविष्यति महत् युद्धं सर्वदैत्यविनाशनम् ॥
परंतु महादेवजीका वचन कभी मिथ्या नहीं होगा । (जब उन्होंने महान् युद्ध होनेकी बात कही है, तब) समस्त दैत्योंका विनाश करनेवाला महायुद्ध होकर ही रहेगा ॥ ८७ ॥
स एवं चिन्तयाविष्टः कुम्भाण्डस्तत्त्वदर्शिवान्।
स्वस्तिप्रणिहितां बुद्धिं चकार स महासुरः ॥ ८८ ॥
इस प्रकार चिन्तामग्न होकर महान् असुर तत्त्वदर्शी कुम्भाण्डने अपनी बुद्धिको कल्याणचिन्तनमें लगाया ॥८८॥
ये हि देवैर्विरुध्यन्ते पुण्यकर्मभिराहवे।
यथा बलिर्नियमितस्तथा ते यान्ति संक्षयम् ॥ ८९ ॥
जो युद्धमें पुण्यकर्मा देवताओंके साथ विरोध रखते हैं अथवा वे देवता ही जिनके विरोधमे खड़े हो जाते हैं, वे जिस प्रकार राजा बलि बाँधे गये थे, उसी प्रकार बन्धनमें पड़कर नष्ट हो जाते हैं ॥ ८९ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि बाणयुद्धे षोडशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें बाणासुरका युद्धविषयक एक सौ सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११६ ॥
सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः
शिव-पार्वतीका क्रीड़ाविहार, पार्वतीका उषाको पतिसमागमक्रे लिये वर देना तथा उषाकी विरह-व्यथाका वर्णन
वैशम्पायन उवाच
क्रीडाविहारोपगतः कदाचिदभवद् भवः।
देव्या सह नदीतीरे रम्ये श्रीमति स प्रभुः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय ! किसी समय प्रभावशाली भगवान् शङ्कर गङ्गा नदीके शोभासम्पन्न रमणीय तटपर देवी पार्वतीके साथ क्रीड़ा-विहारके लिये गये ॥ १ ॥
शतानि तत्राप्सरसां चिक्रीडुश्च समन्ततः ।
सर्वर्तुकवने रम्ये गन्धर्वपतयस्तथा ॥ २ ॥
वहाँ सभी ऋतुओंकी शोभासे सुशोभित सर्वर्तुक वनमें सब ओर सैकड़ों अप्सराएँ तथा गन्धर्वराज क्रीडा कर रहे थे ॥ २ ॥
कुसुमैः पारिजातस्य पुष्पैः संतानकस्य च।
गन्धोद्दाममिवाकाशं नदीतीरं तु सर्वशः ॥ ३ ॥
पारिजात और संतानक नामक कल्पवृक्षके पुष्पोंद्वारा उस नदी-तटका सारा आकाश उद्दाम सुगन्धसे व्याप्त हो रहा था ॥ ३ ॥
वेणुवीणामृदङ्गैश्च पणवैश्च सहस्रशः।
वाद्यमानैः स शुश्राव गीतमप्सरसां तदा ॥ ४ ॥
वेणु, वीणा, मृदङ्ग और पणव आदि सहस्रों वाद्योंकी मधुर ध्वनिके साथ अप्सराओंका मनोहर गीत उन्होंने सुना ॥ ४ ॥
सूतमागधकल्पैश्चास्तुवन्नप्सरसां गणाः।
देवदेवं सुवपुषं स्रग्विणं रक्तवाससम् ॥ ५ ॥
श्रीमहेशं देवदेवमर्चयन्ति मनोरमम्।
अप्सराओंके समुदाय सूत और मागधोंके-से वचनोंद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति करते थे। सुन्दर शरीरधारी देवाधिदेव महादेव फूलोंके हार धारण किये लाल रङ्गके वस्त्रसे सुशोभित थे। उन श्रीमहेश्वरका रूप बड़ा ही मनोरम था। सब अप्सराएँ वहाँ उन देवाधिदेवकी पूजा करती थीं ॥५॥
ततस्तु देव्या । रूपेण चित्रलेखा वराप्सराः ॥ ६ ॥
भवं प्रसादयामास देवी च प्राहसत् तदा ।
प्रसादयन्तीमीशानं प्रहसन्त्यप्सरोगणाः ॥ ७ ॥
इसी समय चित्रलेखा नामवाली श्रेष्ठ अप्सरा देवी पार्वतीका रूप धारण करके महादेवजीको रिझाने लगी। यह देख देवी पार्वती उस समय जोर-जोरसे हँसने लगीं। महादेवजीको रिझानेमें लगी हुई उस चित्रलेखाको लक्ष्य करके दूसरी अप्सराएँ भी हँसने लगीं ॥ ६-७ ॥
भवस्य पार्षदा दिव्या नानारूपा महौजसः।
देव्या ह्यानुज्ञया सर्वे क्रीडन्ते तत्र तत्र ह ॥ ८ ॥