विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 694, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| १७२ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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भगवान् शङ्करके जो नाना रूपधारी दिव्य एवं महाबली पार्षद थे, वे सब देवी पार्वतीकी आज्ञासे विभिन्न स्थानोंमें क्रीडा कर रहे थे ॥ ८ ॥
अथ ते पार्षदस्तत्र रहस्ये सुविपश्चितः।
महादेवस्य रूपेण तच्चिह्नं रूपमास्थिताः ॥ ९ ॥
ततो देव्याः सुरूपेण लीलया वदनेन च।
तदनन्तर वे विद्वान् पार्षद एकान्तमें जाकर महादेवजीके रूपसे उन्हींके समान ध्वज आदि चिह्न तथा आकार धारण करके खड़े हो गये। फिर तो अप्सराएँ भी महादेवीके समान सुन्दर रूप, लीला और मुख एवं वार्तालापसे युक्त हो उनके साथ क्रीडा करने लगीं ॥ ९½ ॥
देवी प्रहासं मुमुचे ताश्चैवाप्सरसस्तदा।
ततः किलकिलाशब्दः प्रादुर्भूतः समन्ततः ॥ १० ॥
यह देख उस समय देवी पार्वती तथा वे अप्सराएँ जोर-जोरसे ठहाका मारकर हँसने लगीं। इससे वहाँ चारों ओर किलकिलाहट का शब्द गूँज उठा ॥ १० ॥
प्रहर्षमतुलं लेभे भवः प्रीतमनास्तदा।
बाणस्य दुहिता कन्या तत्रोषा नाम भामिनी ॥ ११ ॥
उस समय भगवान् शङ्करको अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ। उनका मन प्रसन्न हो गया। उस अवसरपर बाणासुरकी पुत्री भामिनी उषा भी वहीं थी ॥ ११ ॥
देवं संक्रीडितं दृष्ट्वा देव्या सह नदीगतम्।
दीप्यमानं महादेवं द्वादशादित्यतेजसम् ॥ १२ ॥
उसने देखा, बारह सूर्योंके समान तेजस्वी महादेवजी अपनी दीप्तिसे देदीप्यमान हैं और नदीके तटपर देवी पार्वतीके साथ मधुर क्रीडामें आसक्त हो रहे हैं ॥ १२ ॥
नानारूपं वपुः कृत्वा देव्याः प्रियचिकीर्षया।
उषा मनोरथं चक्रे पार्वत्याः संनिधौ तथा ॥ १३ ॥
वे देवीका प्रिय करनेकी इच्छासे नाना रूप धारण करके क्रीड़ा कर रहे हैं। यह देख उषाने देवी पार्वतीके समीप ही मनमें यह संकल्प किया ॥ १३ ॥
धन्या हि भर्तृसहिता रमत्येवं समागता।
मनसा त्वथ संकल्पमुषया भाषितं तथा ॥ १४ ॥
'वह नारी धन्य है, जो पतिके साथ इस तरह मिलकर रमण करती है।' अपने इस मानसिक संकल्पको उषाने मन-ही-मन दुहराया ॥ १४ ॥
विज्ञाय तमभिप्रायमुपायाः पर्वतात्मजा।
प्राह देवी ततो वाक्यमुषां हर्षयती शनैः ॥ १५ ॥
उषाके उस अभिप्रायको जानकर पार्वती देवी उसे हर्ष प्रदान करती हुई धीरेसे बोलीं—॥ १५ ॥
उपे त्वं शीघ्रमप्येवं भर्त्रा सह रमिष्यसि।
यथा देवो मया सार्धं शङ्करः शत्रुनाशनः ॥ १६ ॥
'उपे ! तुम भी शीघ्र ही पतिके साथ इसी तरह रमण करोगी, जैसे शत्रुनाशन भगवान् शङ्कर मेरे साथ रमण करते हैं' ॥ १६ ॥
एवमुक्ते तदा देव्या वाक्ये चिन्ताविलेक्षणा।
उषा भावं तदा चक्रे भर्त्रा रंस्ये कदा सह ॥ १७ ॥
देवीके ऐसा कहनेपर उषाकी आँखें इस चिन्तासे मुँद गयीं कि पता नहीं, यह सौभाग्य कब प्राप्त होगा ? उस समय उसने मन-ही-मन यह अभिलाषा की कि मैं पतिके साथ कब रमण करूँगी ॥ १७ ॥
तदा हैमवती वाक्यं सम्प्रहस्येदमब्रवीत्।
उपे शृणुष्व वाक्यं मे यदा संयोगमेष्यसि ॥ १८ ॥
तब हिमवान्-कुमारीने हँसकर उससे यह बात कही— 'उपे ! मेरी बात सुनो, तुम्हें पतिका संयोग कब प्राप्त होगा, यह बताती हूँ ॥ १८ ॥
वैशाखे मासि हर्म्यस्था द्वादश्यां त्वां दिनक्षये।
रमयिष्यति यः स्वप्ने स ते भर्ता भविष्यति ॥ १९ ॥
'वैशाख मासकी द्वादशी तिथिको प्रदोषकालमें अट्टालिकापर सोयी हुई तुम्हारे साथ जो पुरुष स्वप्नमें आकर रमण करेगा, वही तुम्हारा पति होगा' ॥ १९ ॥
एवमुक्ता दैत्यसुता कन्यागणसमावृता।
अपाक्रामत हर्षेण रममाणा यथासुखम् ॥ २० ॥
देवीने जब ऐसी बात कही, तब कन्याओंके समुदायसे घिरी हुई दैत्यराजकुमारी उषा बड़े हर्षमें भरकर वहाँसे हट गयी और सुखपूर्वक इधर-उधर विचरने लगी ॥ २० ॥
ततः सखीभिर्हस्यन्ती हर्षेणोत्फुल्ललोचना।
तालिकासंनिपातैश्च ह्यन्योन्यं जघ्नुरूर्जिताः ॥ २१ ॥
फिर तो सखियाँ उसके साथ परिहास करने लगीं। उषाके नेत्र हर्षसे खिल उठे। वे सब उत्साहमें भरकर एक दूसरीके हाथपर तालियाँ देने लगीं ॥ २१ ॥
किन्नर्यो यक्षकन्याश्च नानादैत्यकन्यकाः।
अप्सरोगणकन्याश्च उपायाः सखितां गताः ॥ २२ ॥
किन्नरियाँ, यक्षकन्याएँ, अनेकानेक दैत्योंकी कुमारियाँ तथा अप्सराओंकी पुत्रियाँ भी उषाकी सखी हो गयी थीं ॥ २२ ॥
उक्ता च तत्र ताभिश्च भर्ता तव वरानने।
भविष्यत्यचिरेणैव देव्या वचनकल्पितः ॥ २३ ॥
उन सबने उषासे कहा—'सुमुखि ! अब तो पार्वती देवीके कथनानुसार शीघ्र ही तुम्हें पतिकी प्राप्ति होगी ॥ २३ ॥