भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 695

विष्णुपर्व सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः ६७३

न हि देव्या वचो मिथ्या भविष्यति कदाचन । रूपाभिजनसम्पन्नः पतिस्ते कल्पितस्तया ॥ २४ ॥

'देवीका वचन कभी मिथ्या नहीं होगा। उन्होंने तुम्हारे लिये मनोहर रूप और उत्तम कुलसे सम्पन्न पतिका निर्माण किया है' ॥ २४ ॥

उषा सखीनां तद् वाक्यं प्रतिपूज्य यथाविधि । दत्तं मनोरथं देव्या भावयन्ती व्यवस्थिता ॥ २५ ॥

'उषा सखियोंके उस कथनका विधिवत् आदर करके देवीके दिये हुए मनोरथका चिन्तन करती हुई खड़ी रही ॥ २५ ॥

ततः क्रीडाविहारं तमनुभूय सहोमया । गतेऽहनि ततः सर्वा नार्यस्ताः परमाद्भुताः ॥ २६ ॥ ययुः स्वानालयान् सर्वा देवी चादर्शनं गता ।

तत्पश्चात् पार्वतीजीके साथ उस क्रीडाविहारके सुखका अनुभव करके दिन व्यतीत होनेपर वे सब परम अद्भुत रूपवाली नारियाँ अपने-अपने घरोंको चली गयीं तथा देवी पार्वती भी अदृश्य हो गयीं ॥ २६१/२ ॥

काश्चिदश्वैस्तथा यानैर्गजैरन्यास्तथा रथैः ॥ २७ ॥ पुरं प्रविविशुर्हृष्टाः काश्चिदाकाशमास्थिताः ।

उनमेंसे कुछ तो घोड़ोंपर, कुछ पालकियोंपर, कुछ हाथियोंपर और कुछ नारियाँ रथोंपर आरूढ़ होकर बड़े हर्षके साथ नगरमे प्रविष्ट हुईं। कुछ अप्सराकोटिक़ी स्त्रियाँ आकाशमार्गसे अभीष्ट स्थानको चली गयीं ॥ २७१/२ ॥

ततः प्रभृति सा देवी काममोहं गता विभो ॥ २८ ॥ देव्यास्तु वचनं स्मृत्वा संस्मरन्ती पतिं तदा । निद्रां न भजते रात्रौ न दिवा भोजनं तथा ॥ २९ ॥

विभो ! तभीसे वह देवी उषा कामजनित मोहके वशीभूत हो गयी। पार्वतीजीके वचनको याद करके पतिका चिन्तन करती हुई उषा उन दिनों न तो रातमें नींद लेती और न दिनमे भोजन करती थी ॥ २८-२९ ॥

स्मरन्ती पतिभावं सा विललाप नृपात्मजा । निन्दन्ती शशिनं नाके सेवते न च चन्दनम् ॥ ३० ॥

वह राजकुमारी पतिभावका स्मरण करती हुई एकान्तमे विलाप किया करती थी। आकाशमे उदित हुए चन्द्रमाकी निन्दा करती और चन्दनका भी सेवन नहीं करती थी (विरहाग्नि बढ़ जानेके कारण उसे चन्द्रमा और चन्दन भी तापदायक प्रतीत होते थे।) ॥ ३० ॥

सा बाला मोहिता राजन् कामेन परिपीडिता । उपचर्यन्ति तां सख्यो विज्वरामपि सज्वराम् ॥ ३१ ॥

राजन् ! कामसे अत्यन्त पीड़ित हुई वह बाला अपनी सुध-बुध खो चुकी थी। यद्यपि उसे ज्वर आदि रोग नहीं लगे थे, तो भी उसे ज्वरग्रस्त मानकर सखियाँ उसके लिये तदनुरूप उपचार करती थीं ॥ ३१ ॥

तप्यते हृदयं तस्या लेपितं चन्दनेन च । कपोल पाण्डिमाच्छिन्नं नेत्रे जलसमन्विते ॥ ३२ ॥

चन्दनसे लिप्त होनेपर भी उसका हृदय तप्त होता रहता था। उसके गुलाबी गालमें सफेदी और पीलेपनका चिह्न प्रकट होने लगा तथा दोनों नेत्र आँसुओंसे भरे रहते थे ॥ ३२ ॥

जृम्भणं च तथा स्वापो देहे तस्या व्यवर्धत । पद्मिनीकन्दचूर्णानि शीतलानि मुहुर्मुहुः ॥ ३३ ॥ क्षिपन्ति सख्यो हृदये पीडिते मन्मथाग्निना । व्यजनानि प्रकुर्वन्ति पृच्छन्ति च पुनः पुनः ॥ ३४ ॥

उसके शरीरमें अँगड़ाई और तन्द्राकी वृद्धि होने लगी। सखियाँ कामाग्निसे पीड़ित हुए उसके वक्षःस्थलपर बारंबार कमलिनीकन्दके शीतल चूर्ण बिखेरा करती थीं। वे बारंबार व्यजन डुलातीं और इस प्रकार पूछती थीं—॥ ३३-३४ ॥

का व्यथा किं शरीरं ते किमिदं तव भामिनि । किं तुभ्यं रोचते देवि तदाचक्ष्वहि वरानने ॥ ३५ ॥

'भामिनि ! तुम्हे कौन-सी व्यथा है ? तुम्हारा शरीर कैसा हो गया ? यह तुम्हें क्या हुआ है ? देवि ! वरानने ! तुम्हे क्या अच्छा लगता है ? यह सब बताओ ॥ ३५ ॥

कस्मादिदं समुत्पन्नं दुःखसाध्यं मनोरमे । त्वन्मनोऽनुगतं वाक्यं वदन्त्येतास्तु सारिकाः ॥ ३६ ॥ शुका नीलतमाः सुभ्रु पठन्ति हि पुमानिव । प्रह्लादजननं वाक्यं किमर्थं नाद्य भाषसे ॥ ३७ ॥

'मनोरमे ! यह दुःसाध्य रोग तुम्हें कहाँसे उत्पन्न हुआ है ? देखो ! ये सारिकाएँ तुम्हारे मनके अनुकूल बोली बोलती है। सुभ्रु ! ये अत्यन्त नीले तोते पुरुषके समान पढ़ रहे हैं। आज तुम इनके प्रति आह्लादजनक वचन क्यों नहीं बोल रही हो ॥ ३६-३७ ॥

तव तातो महावीरो देवानापि दुर्जयः । तस्याग्रे तिष्ठते कोऽपि न भूमौ वरवर्णिनि ॥ ३८ ॥

'वरवर्णिनि ! तुम्हारे पिता महान् वीर हैं, देवताओंके लिये भी दुर्जय है। इस पृथ्वीपर उनके सामने कोई ठहर नहीं सकता ॥ ३८ ॥

बलेः पुत्रो महावीरो वाणो हि दुरतिक्रमः । जितामरावतीकं च नगरं शोणिताह्वयम् । यत्र संतिष्ठते देवः शूलहस्तो महेश्वरः ॥ ३९ ॥

'बलिके पुत्र महावीर वाण सर्वथा दुर्जय हैं। यह शोणितपुर नगर अपने वैभवसे अमरावतीको भी पराजित

म० ह० २२ -