विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
विष्णुपर्व सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः ६७३
न हि देव्या वचो मिथ्या भविष्यति कदाचन । रूपाभिजनसम्पन्नः पतिस्ते कल्पितस्तया ॥ २४ ॥
'देवीका वचन कभी मिथ्या नहीं होगा। उन्होंने तुम्हारे लिये मनोहर रूप और उत्तम कुलसे सम्पन्न पतिका निर्माण किया है' ॥ २४ ॥
उषा सखीनां तद् वाक्यं प्रतिपूज्य यथाविधि । दत्तं मनोरथं देव्या भावयन्ती व्यवस्थिता ॥ २५ ॥
'उषा सखियोंके उस कथनका विधिवत् आदर करके देवीके दिये हुए मनोरथका चिन्तन करती हुई खड़ी रही ॥ २५ ॥
ततः क्रीडाविहारं तमनुभूय सहोमया । गतेऽहनि ततः सर्वा नार्यस्ताः परमाद्भुताः ॥ २६ ॥ ययुः स्वानालयान् सर्वा देवी चादर्शनं गता ।
तत्पश्चात् पार्वतीजीके साथ उस क्रीडाविहारके सुखका अनुभव करके दिन व्यतीत होनेपर वे सब परम अद्भुत रूपवाली नारियाँ अपने-अपने घरोंको चली गयीं तथा देवी पार्वती भी अदृश्य हो गयीं ॥ २६१/२ ॥
काश्चिदश्वैस्तथा यानैर्गजैरन्यास्तथा रथैः ॥ २७ ॥ पुरं प्रविविशुर्हृष्टाः काश्चिदाकाशमास्थिताः ।
उनमेंसे कुछ तो घोड़ोंपर, कुछ पालकियोंपर, कुछ हाथियोंपर और कुछ नारियाँ रथोंपर आरूढ़ होकर बड़े हर्षके साथ नगरमे प्रविष्ट हुईं। कुछ अप्सराकोटिक़ी स्त्रियाँ आकाशमार्गसे अभीष्ट स्थानको चली गयीं ॥ २७१/२ ॥
ततः प्रभृति सा देवी काममोहं गता विभो ॥ २८ ॥ देव्यास्तु वचनं स्मृत्वा संस्मरन्ती पतिं तदा । निद्रां न भजते रात्रौ न दिवा भोजनं तथा ॥ २९ ॥
विभो ! तभीसे वह देवी उषा कामजनित मोहके वशीभूत हो गयी। पार्वतीजीके वचनको याद करके पतिका चिन्तन करती हुई उषा उन दिनों न तो रातमें नींद लेती और न दिनमे भोजन करती थी ॥ २८-२९ ॥
स्मरन्ती पतिभावं सा विललाप नृपात्मजा । निन्दन्ती शशिनं नाके सेवते न च चन्दनम् ॥ ३० ॥
वह राजकुमारी पतिभावका स्मरण करती हुई एकान्तमे विलाप किया करती थी। आकाशमे उदित हुए चन्द्रमाकी निन्दा करती और चन्दनका भी सेवन नहीं करती थी (विरहाग्नि बढ़ जानेके कारण उसे चन्द्रमा और चन्दन भी तापदायक प्रतीत होते थे।) ॥ ३० ॥
सा बाला मोहिता राजन् कामेन परिपीडिता । उपचर्यन्ति तां सख्यो विज्वरामपि सज्वराम् ॥ ३१ ॥
राजन् ! कामसे अत्यन्त पीड़ित हुई वह बाला अपनी सुध-बुध खो चुकी थी। यद्यपि उसे ज्वर आदि रोग नहीं लगे थे, तो भी उसे ज्वरग्रस्त मानकर सखियाँ उसके लिये तदनुरूप उपचार करती थीं ॥ ३१ ॥
तप्यते हृदयं तस्या लेपितं चन्दनेन च । कपोल पाण्डिमाच्छिन्नं नेत्रे जलसमन्विते ॥ ३२ ॥
चन्दनसे लिप्त होनेपर भी उसका हृदय तप्त होता रहता था। उसके गुलाबी गालमें सफेदी और पीलेपनका चिह्न प्रकट होने लगा तथा दोनों नेत्र आँसुओंसे भरे रहते थे ॥ ३२ ॥
जृम्भणं च तथा स्वापो देहे तस्या व्यवर्धत । पद्मिनीकन्दचूर्णानि शीतलानि मुहुर्मुहुः ॥ ३३ ॥ क्षिपन्ति सख्यो हृदये पीडिते मन्मथाग्निना । व्यजनानि प्रकुर्वन्ति पृच्छन्ति च पुनः पुनः ॥ ३४ ॥
उसके शरीरमें अँगड़ाई और तन्द्राकी वृद्धि होने लगी। सखियाँ कामाग्निसे पीड़ित हुए उसके वक्षःस्थलपर बारंबार कमलिनीकन्दके शीतल चूर्ण बिखेरा करती थीं। वे बारंबार व्यजन डुलातीं और इस प्रकार पूछती थीं—॥ ३३-३४ ॥
का व्यथा किं शरीरं ते किमिदं तव भामिनि । किं तुभ्यं रोचते देवि तदाचक्ष्वहि वरानने ॥ ३५ ॥
'भामिनि ! तुम्हे कौन-सी व्यथा है ? तुम्हारा शरीर कैसा हो गया ? यह तुम्हें क्या हुआ है ? देवि ! वरानने ! तुम्हे क्या अच्छा लगता है ? यह सब बताओ ॥ ३५ ॥
कस्मादिदं समुत्पन्नं दुःखसाध्यं मनोरमे । त्वन्मनोऽनुगतं वाक्यं वदन्त्येतास्तु सारिकाः ॥ ३६ ॥ शुका नीलतमाः सुभ्रु पठन्ति हि पुमानिव । प्रह्लादजननं वाक्यं किमर्थं नाद्य भाषसे ॥ ३७ ॥
'मनोरमे ! यह दुःसाध्य रोग तुम्हें कहाँसे उत्पन्न हुआ है ? देखो ! ये सारिकाएँ तुम्हारे मनके अनुकूल बोली बोलती है। सुभ्रु ! ये अत्यन्त नीले तोते पुरुषके समान पढ़ रहे हैं। आज तुम इनके प्रति आह्लादजनक वचन क्यों नहीं बोल रही हो ॥ ३६-३७ ॥
तव तातो महावीरो देवानापि दुर्जयः । तस्याग्रे तिष्ठते कोऽपि न भूमौ वरवर्णिनि ॥ ३८ ॥
'वरवर्णिनि ! तुम्हारे पिता महान् वीर हैं, देवताओंके लिये भी दुर्जय है। इस पृथ्वीपर उनके सामने कोई ठहर नहीं सकता ॥ ३८ ॥
बलेः पुत्रो महावीरो वाणो हि दुरतिक्रमः । जितामरावतीकं च नगरं शोणिताह्वयम् । यत्र संतिष्ठते देवः शूलहस्तो महेश्वरः ॥ ३९ ॥
'बलिके पुत्र महावीर वाण सर्वथा दुर्जय हैं। यह शोणितपुर नगर अपने वैभवसे अमरावतीको भी पराजित
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कर चुका है, जहाँ साक्षात् भगवान् महेश्वर हाथमें त्रिशूल धारण किये नित्य निवास करते हैं ॥ ३९ ॥
पुत्रोऽयमिति जानीहि गिरिजां योऽब्रवीद्धरः ।
त्राणं प्रति महादेवस्तव तातमुपे शृणु ॥ ४० ॥
'उषे ! सुनो ! तुम्हारे पिता बाणासुरके लिये महान् देवता भगवान् हरने पार्वती देवीसे कहा था कि 'तुम इसे अपना पुत्र जानो' ॥ ४० ॥
का व्यथा ते मुखे स्वेदो नासाग्रे च विराजते ।
नीहारविन्दवः पद्मे राजन्ते शरदागमे ॥ ४१ ॥
'तुम्हें क्या पीड़ा है ? तुम्हारे मुख और नासाग्र-भागमें पसीनेकी बूँदें सुशोभित हो रही हैं, ठीक उसी तरह जैसे शरत्काल आनेपर कमलके ऊपर ओसके कण शोभा पाते हैं ॥ ४१ ॥
सम्पूर्णचन्द्रप्रतिमं मुखं चन्द्रो यथा घने ।
न शोभते तु विच्छायं किमर्थं कारणं वद ॥ ४२ ।
'पूर्ण चन्द्रमाके समान तुम्हारा मुख आज बादलमं छिपे हुए चन्द्रमाकी भाँति कान्तिहीन दिखायी देनेके कारण शोभा नहीं पा रहा है। ऐसा किस लिये हो रहा है, कारण बताओ ? ॥ ४२ ॥
श्वासान् मुञ्चसि वाले त्वं न रतिं यासि भावतः ।
गृहाण भोजनं दिव्यं यत् ते मनसि वर्तते ॥ ४३ ॥
'बाले ! तुम लंबी साँस छोड़ रही हो, मनसे प्रसन्न नहीं हो रही हो, इसका क्या कारण है ? तुम्हारे मनमें जैसी रुचि हो, उसके अनुकूल दिव्य भोजन ग्रहण करो ॥ ४३ ॥
ताम्बूलं रोचते पूर्वं तत् किमर्थं न गृह्यते ।
मिष्टानि यानि वस्तूनि दुर्लभानीतरैर्जनैः ॥ ४४ ॥
गृहाण देवि उत्तिष्ठ वद पीडां शरीरजाम् ।
'पहले तो तुम्हें पान बहुत अच्छा लगता था, अब उसे ग्रहण क्यों नहीं करती हो ? देवि ! उठो और जो दूसरे लोगोंके लिये दुर्लभ हैं ऐसी मीठी वस्तुएँ ग्रहण करो। बताओ, कैसी पीड़ा हो रही है' ॥ ४४½ ॥
इति कोलाहलं श्रुत्वा उषावेश्मसमुद्भवम् ॥ ४५ ॥
दासीभिः कीर्तितं तत्र मातुरग्रे पृथक् पृथक् ।
उषाके महलमे होनेवाले इस कोलाहलको सुनकर दासियोंने उसकी माताके आगे पृथक्-पृथक् इस प्रकार कहना आरम्भ किया—॥ ४५½ ॥
राजपुत्री यदा देवि समायाता गृहे सती ॥ ४६ ॥
जलक्रीडाविहाराच्च मूकेव परिलक्ष्यते ।
'देवि ! सती-साध्वी राजकुमारी उषा जलक्रीड़ा और विहारसे जब घर लौटी हैं, तभीसे मौन-सी दिखायी देती हैं ॥
अतो दासीजना देवि वदामस्त्वां वयं जनाः ॥ ४७ ॥
को मोहः किमिदं मौनं कः स्वापो म्लानता कथम् ।
विचार्य भिषजो देवि दिश्यन्तां कष्टशान्तये ॥ ४८ ॥
'अतः महारानी ! हम दासियाँ आपको यह बात बता रही हैं—राजकुमारीपर यह कैसा मोह छा रहा है? उनका यह मौन किसलिये हैं ? क्या कारण है कि वे निरन्तर सोयी पड़ी रहती हैं ? उनमें म्लानता कैसे आ गयी है ? देवि ! इन सब बातोंपर विचार करके उनके इस कष्टकी शान्तिके लिये वैद्योंको नियुक्त कीजिये ॥ ४७-४८ ॥
शिरीषपुष्पसदृशं यच्छरीरं सुकोमलम् ।
तत् कथं सहते देवि व्याधिभारं वरानने ॥ ४९ ॥
'देवि ! वरानने ! जो शरीर शिरीषपुष्पके समान अत्यन्त कोमल है, वह रोगका भार कैसे सहन करता है'? ॥
इति श्रुत्वा तदा देवी सत्वरा हंसगामिनी ।
प्राप्य देशमुपा यत्र किमिदं कष्टलक्षणम् ॥ ५० ॥
यह सुनकर वे हंसगामिनी देवी उस समय बड़ी उतावलीके साथ उठीं और जहाँ उषा सोयी थी, उस स्थानमें पहुँचकर पूछने लगीं कि 'यह कैसा कष्टदायक लक्षण प्रकट हुआ है' ? ॥
पल्लवाकृतिहस्तेन कोमलं तत्करं तदा ।
स्पृष्ट्वाङ्गुलीरनायासं स्फोटयामास भामिनी ॥ ५१ ॥
उस साध्वी महारानीने अपने पल्लवाकार हाथसे उषाके कोमल हाथका स्पर्श करके अनायास ही उसकी अङ्गुलियोंको चटकाया ५१ ॥
किमस्ति तव कल्याणि का व्यथा तव वर्तते ।
एते वैद्याः समागत्य पृच्छन्ति भवतीं हि तत् ॥ ५२ ॥
फिर उन्होंने पूछा—'कल्याणि ! तुम्हें कैसा कष्ट है ? ये वैद्यलोग आकर तुमसे इस विषयमें जिज्ञासा करते हैं ॥ ५२ ॥
वैद्या ऊचुः
जलक्रीडां गता तत्र राजपुत्री सखीगणैः ।
पार्वत्याः क्रीडितं तत्र जानीमः श्रमसम्भवम् ॥ ५३ ॥
वैद्य बोले—महारानी ! हम जानते हैं, राजकुमारी अपनी सखियोंके साथ जलक्रीड़ाके लिये उस स्थानपर गयी थी, जहाँ पार्वतीदेवीका क्रीडा-विहार चल रहा था । वहाँ जो परिश्रम हुआ, उसीसे यह कष्ट बढ़ गया ॥ ५३ ॥
श्रमाद् ग्लानिः समुत्पन्ना जृम्भणं च पुनः पुनः ।
स्वापश्च जायते तेन मा भयं कर्तुमर्हसि ॥ ५४ ॥
श्रमसे ग्लानि उत्पन्न हुई है, उसीसे बारंबार अँगड़ाई आ रही है तथा परिश्रमके ही कारण सारे अङ्गोंमें शिथिलता आ गयी है, जिससे यह सो रही हैं, अतः आपको इसके लिये भय नहीं करना चाहिये ॥ ५४ ॥
विष्णुपर्व ] अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः ६७५ देव्युवाच फूँका जाय ), अभिमन्त्रित जलसे अभिषेक करनेपर इन्हें हृदये निहितं वैद्यश्चन्दनं हिमसंयुक्तम् । बड़ी शान्ति मिलेगी ॥ ५७-५८३ ॥ अमात्याः किमिदं शीघ्रं किमिदं बुद्बुदायते ॥ ५५ ॥ इत्युक्त्वा भिषजः सर्वे निवृत्ता नृपवेश्मतः ॥ ५९ ॥ महारानीने कहा-वैद्यो और मन्त्रियो! राजकुमारीके सूचयन्तः पुनः सर्वे कामाभिप्रायजां व्यथाम् । वक्षःस्थलपर बरफमिला चन्दन रखा गया है, किंतु शीघ्र ही ऐसा कहकर सभी वैद्यराज महलसे लौट गये। जाते-जाते इसमें इस प्रकार बुद्-बुद होने लगा है, मानो यह खौल रहा उन सबने यह भी सूचना दे दी कि सम्भव है यह काम- हो, यह क्या बात है ? ऐसा क्यों हुआ ? ॥ ५५ ॥ जनित वेदना हो ॥ ५९३ ॥ अतिदाहो महान् स्वेदः पिपासा न बुभुक्षते । मातृपृष्टा वरारोहा चिरकालमुवाच सा ॥ ६० ॥ प्रलाप एव किं तस्यां शास्त्रतो ब्रूत निश्चितम् ॥ ५६ ॥ लज्जावती महाभागा मातरं रुदती भृशम् । इसके शरीरमें अत्यन्त दाह हो रहा है, बहुत अधिक मातर्न रोचते नित्यं भाषणं न च भोजनम् ॥ ६१ ॥ पसीने निकलने लगे हैं। इसे प्यास भी बहुत लगती है, परंतु न चाप्युत्सवकं मातः सदाहं हृदयं शृणु । कुछ खानेकी रुचि नहीं होती। यह अधिकाधिक प्रलाप ही इत्युक्त्वा विररामाथ ह्युषा नारी वरानना ॥ ६२ ॥ कर रही है, ये सब लक्षण इसमें क्यों प्रकट हुए हैं? आपलोग तदनन्तर माताने जब बारंबार पूछा, तब सुन्दर अङ्ग- शास्त्रके अनुसार निश्चित करके बताइये ॥ ५६ ॥ वाली उस लज्जाशीला महाभागा उषाने बहुत देरके बाद मातासे वैद्या ऊचुः जोर-जोरसे रोते हुए कहा—'माँ ! सुनो ! न तो मुझे कभी क्रीडाविहारे मिलिताः स्त्रीजना देवसंनिधौ । बोलना अच्छा लगता है और न भोजन करना, कोई उत्सव रूपेणाप्रतिमा देवी राजपुत्री च भाविनी ॥ ५७ ॥ भी नहीं सुहाता है। हृदयमें निरन्तर जलन होती रहती है।' ऐसा दृष्टिपातः कृतस्ताभिस्तेन पुत्त्र्यां व्यथाभवत् । कहकर सुन्दरी नारी उषा चुप हो गयी ॥ ६०-६२ ॥ रक्षामन्त्रैस्तथा पीतैः सर्षपैस्तां कुमारिकाम् ॥ ५८ ॥ सर्वाभिः स्त्रीभिरारब्धमन्योन्यं मुखवीक्षणम् । पानीयैरभिषेकेण परा शान्तिर्भविष्यति । लज्जानुकारि नारीणां यौवनं हि भवेदिति ॥ ६३ ॥ वैद्य बोले-क्रीडा-विहारमें महादेवजीके समीप बहुत-सी इयं च राजकन्या हि भर्तृयोग्या किमुच्यते । स्त्रियाँ एकत्र हुई थीं। हमारी सती-साध्वी राजकुमारी उषा- पितुः प्रसादान्मातुश्च प्राप्नुयात् सदृशं वरम् ॥ ६४ ॥ देवी अनुपम रूपवती हैं। अतः उन सब स्त्रियोंने इनपर दृष्टि- उस समय सभी स्त्रियाँ एक दूसरीका मुख देखने लगीं पात किया है, जिससे इन्हें नजर लग गयी है। इसीसे आपकी और आपसमें कहने लगीं कि युवावस्था नारियोंके लिये प्रायः पुत्रीको यह पीड़ा हुई है। अतः रक्षासम्बन्धी मन्त्रों और लज्जाजनक हुआ करती है। यह राजकन्या भी पतिसमागमक्रे पीली सरसोंसे राजकुमारीकी रक्षा की जाय ( इन्हें झाड़ा- योग्य हो गयी है, अतः इसके लिये और क्या कहा जाय ? यह माता और पिताके प्रसादसे अपने अनुरूप पति प्राप्त करे' ॥ इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि बाणयुद्धे उषाविरहो नाम सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥११७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें बाणासुरके युद्धके प्रसङ्गमें उषाविरहविषयक एक सौ सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११७ ॥ अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः उषाका स्वप्नमें प्रियतमके साथ समागम, इससे उषाकी चिन्ता, सखियोंका उसे समझाना, कुम्भाण्डकुमारीके कहनेसे उषाका चित्रलेखाको बुलाकर उसे अपना कष्ट बताना, चित्रलेखाके बनाये हुए चित्रोंसे उषाका अनिरुद्धको पहचानना और उन्हें लानेके लिये चित्रलेखाका द्वारकाको जाना वैशम्पायन उवाच वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! शोणितपुरमें तत्रस्थाः परमा नार्यश्चित्रेण परमाद्भूताः । निवास करनेवाली परम सुन्दरी स्त्रियाँ चित्र-निर्माण-कलाकी ततो हर्म्ये शयानां तु वैशाखे मासि भामिनीम् ॥ १ ॥ दृष्टिसे बड़ी अद्भुत योग्यतावाली थीं। तदनन्तर वैशाखमास- द्वादश्यां शुक्लपक्षस्य सखीगणवृतां तदा । के शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथिको, जब सखियोंसे घिरी हुई कश्चित् पुरुषः स्वप्ने रमयामास तां शुभाम् ॥ २ ॥ मानिनी उषा अपनी अट्टालिकामें सो रही थी, उसी समय
६७६ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
स्वप्नावस्था में पार्वतीजीके बताये अनुसार एक पुरुषने आकर उस शुभलक्षणा असुरराजकुमारीके साथ रमण किया ॥ १-२॥
विचेष्टमाना रुदती देव्या वचनचोदिता।
सा स्वप्ने रमिता तेन स्त्रीभावं चापि लम्भिता ॥ ३ ॥
यद्यपि वह रो-रोकर उस पुरुषके स्पर्शसे बचनेकी विशेष चेष्टा करती रही, परंतु पार्वती देवीके वचनसे प्रेरित थी, इस कारण उसके साथ स्वप्नमें उस पुरुषने बलपूर्वक रमण किया और उसे अपनी स्त्री बना लिया ॥ ३ ॥
शोणिताक्ता प्ररुदती सहसैवोत्थिता निशि।
तां तथा रुदतीं दृष्ट्वा सखी भयसमन्विता ॥ ४ ॥
चित्रलेखा वचः स्निग्धमुवाच परमाद्भुतम्।
उस समय उस राजकन्याकी योनि रक्तसे भीग गयी। वह रातमें सहसा रोती हुई उठ बैठी। उसे इस प्रकार रोती देख उसकी सखी चित्रलेखा भयभीत हो परम अद्भुत स्निग्ध वाणीमें बोली—॥ ४ १/२ ॥
उषे मा भैः किमेवं त्वं रुदती परितप्यसे।
बलेः सुतसुता च त्वं प्रख्याता किं भयानन्विता ॥ ५ ॥
‘उषे ! भयभीत न होओ। तुम क्यों इस प्रकार रोती और संतप्त होती हो ? तुम तो महाराज बलिके पुत्रकी पुत्री हो, अपनी निर्भीकताके लिये विख्यात हो, फिर भी क्यों भयभीत होती हो ? ॥ ५ ॥
न भयं विद्यते लोके तव सुभ्रू विशेषतः।
अभयं तव वामोरु पिता देवान्तको रणे ॥ ६ ॥
‘सुभ्रु ! हम सबके लिये विशेषतः तुम्हारे लिये तो संसारमें भय है ही नहीं। वामोरु ! तुम्हें किसीसे भय नहीं है। तुम्हारे पिता बाण समराङ्गणमें देवताओंके भी काल हैं ॥
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ भद्रं ते विषादं मा कृथाः शुभे।
नैवंविधेषु वासेषु भयमस्ति वरानने ॥ ७ ॥
‘शुभे ! उठो, उठो, तुम्हारा कल्याण हो, तुम विषाद न करो। वरानने ! ऐसे निवासस्थानोंमें भय नहीं होता है ॥
असकृद् देवसहितः शचीभर्ता सुरेश्वरः।
अप्राप्त एव नगरं पित्रा ते मृदितो रणे ॥ ८ ॥
‘देवताओंके स्वामी शचीपति इन्द्रने देवताओंकी सेना साथ लेकर अनेक बार आक्रमण किया, परंतु इस नगरतक वे पहुँचने भी नहीं पाये कि तुम्हारे पिताने रणभूमिमें उन्हे रौंद डाला ॥ ८ ॥
अयं देवसमूहस्य भयदश्च पिता तव।
महासुरवरः श्रीमान् बलेः पुत्रो महाबलः ॥ ९ ॥
‘तुम्हारे ये पिता देवसमुदायको भय देनेवाले हैं, महान् असुरोंमें श्रेष्ठ हैं तथा राजा बलिके महाबली एवं कान्तिमान् पुत्र हैं’ ॥ ९ ॥
एवं साभिहिता सख्या बाणपुत्री यशस्विनी।
स्वप्ने रूपं यथा दृष्टं न्यवेदयदनिन्दिता ॥ १० ॥
सखीके ऐसा कहनेपर निन्दारहित यशस्विनी बाणपुत्री उषाने स्वप्नमें जैसा रूप देखा था, वह सब उससे निवेदन किया॥
उषोवाच
एवं संधर्षिता साध्वी कथं जीवितुमुत्सहे।
पितरं किं नु वक्ष्यामि देवशत्रुमरिंदमम् ॥ ११॥
फिर उषा बोली—मैं सती-साध्वी कुमारी थी, जब इस प्रकार मेरा सतीत्व नष्ट कर दिया गया, तब मैं कैसे जीवित रह सकती हूँ। शत्रुओंका दमन करनेवाले अपने देववैरी पितासे क्या कहूँगी ? ॥ ११ ॥
एवं संदूषणकरी वंशस्यास्य महौजसः।
श्रेयो हि मरणं मह्यं न मे श्रेयोऽथ जीवितम् ॥ १२ ॥
इस महातेजस्वी कुलको मैं इस तरह कलङ्कित करनेवाली हूँ। मेरा मर जाना ही अच्छा है। अब जीवित रहना मेरे लिये श्रेयस्कर नहीं है ॥ १२ ॥
ईप्सितो वा यथा कोऽपि पुरुषोऽधिगतो हि मे।
जाग्रतीव यथा चाहमवस्थैवं कृता मम ॥ १३ ॥
मुझे स्वप्नमें ऐसा कोई पुरुष प्राप्त हुआ था, जिसे मानो मैं बहुत चाहती थी—वह मुझे अभीष्ट था। उसने स्वप्नमें भी जाग्रत्-अवस्थाकी भाँति मेरी ऐसी दशा कर डाली है ॥ १३ ॥
निशायां जाग्रतीवाहं नीता केन दशामिमाम्।
कथमेवं कृता नाम कन्या जीवितुमुत्सहे ॥ १४ ॥
रातमें जागती हुई-सी मुझे किसने इस अवस्थाको पहुँचा दिया ? जब कन्या होकर भी मेरी ऐसी दशा कर दी गयी, तब मैं कैसे जीवित रह सकती हूँ ? ॥ १४ ॥
कुलोपक्रोशनकरी कुलाङ्गारी निराश्रया।
जीवितुं न स्पृहेन्नारी साध्वीनामग्रतः स्थिता ॥ १५ ॥
जो नारी कभी सती-साध्वी स्त्रियोंमें आगे रही हो, वह यदि कुलकलङ्किनी, कुलाङ्गारी और निराश्रया हो जाय तो उसे जीवनकी इच्छा नहीं रखनी चाहिये ॥ १५ ॥
इत्येवं वाष्पपूर्णाक्षी सखीजनवृता तदा।
विललाप चिरं कालमुषा कमललोचना ॥ १६ ॥
इस प्रकार सखियोंसे घिरी हुई कमललोचना उषा उस समय नेत्रोंमें आँसू भरकर बहुत देरतक विलाप करती रही ॥
अनाथवत् तां रुदतीं सख्यः सर्वा विचेतसः।
ऊचुश्चाश्रुपरीताक्षीमुषां सर्वाः समागताः ॥ १७ ॥
उसे अश्रुपूर्ण नेत्रोंसे अनाथकी भाँति रोती देख सारी सखियाँ घबरायी हुई-सी वहाँ आ गयीं और इस प्रकार कहने लगीं—॥ १७ ॥
विष्णुपर्व ] अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः ६७७
दुष्टेन मनसा देवि शुभं वा यदि वाशुभम् ।
क्रियते न च ते सुभ्रु किंचिद् दुष्टं मनः शुभे ॥ १८ ॥
'देवि ! दुष्ट हृदयसे यदि शुभ या अशुभ कर्म किया जाता है तो उसका कोई अनिष्टकारी फल होता है, परंतु सुभ्रु ! शुभे ! तुम्हारे मनमें तो कभी कोई दोष आया नहीं ॥ १८ ॥
प्रसह्य दैवसंयोगाद् यदि भुक्तासि भामिनि ।
स्वप्नयोगेन कल्याणि व्रतलोपो न विद्यते ॥ १९ ॥
'भामिनि ! कल्याणि ! यदि दैव-संयोगसे स्वप्नमें किसी पुरुषने बलात्कारपूर्वक तुम्हारा उपभोग कर लिया है तो इससे तुम्हारे कौमार-व्रतका लोप नहीं हुआ है ॥ १९ ॥
व्यभिचारेण ते देवि नास्ति कश्चिद् व्यतिक्रमः ।
न च स्वप्नकृतो दोषो मर्त्यलोकेऽस्ति सुन्दरि ॥ २० ॥
'देवि ! तुम्हारे इस व्यभिचारसे कोई अपराध नहीं बना है। सुन्दरि ! मर्त्यलोकमे स्वप्नावस्थामे किये गये किसी अशुभ कर्मका दोष नहीं लगता है ॥ २० ॥
एवं विप्रर्षयो देवि धर्मज्ञाः कथयन्ति वै।
मनसा चैव वाचा च कर्मणा च विशेषतः ।
दुष्टा या त्रिभिरेतैस्तु पापा सा प्रोच्यते बुधैः ॥ २१ ॥
'देवि ! धर्मज्ञ ब्रह्मर्षि प्रायः ऐसा ही कहते हैं । जो नारी मन, वाणी तथा विशेषतः क्रिया—इन तीनोंसे दूषित है, उसीको विद्वान् पुरुष 'पापिनी' कहते हैं ॥ २१ ॥
न च ते दृश्यते भीरु मनः प्रचलितं सदा ।
कथं त्वं दोषसंदुष्टा नियता ब्रह्मचारिणी ॥ २२ ॥
'भीरु ! तुम्हारा मन तो सदा ही स्थिर है, वह कभी चञ्चल होता नहीं देखा जाता है। तुम नियमपूर्वक ब्रह्मचर्य-पालनमें तत्पर रहकर भी दोषोंसे दूषित कैसे हो सकती हो ॥
यदि सुप्ता सती साध्वी शुद्धभावा मनस्विनी ।
इमामवस्थां प्राप्ता त्वं नैव धर्मो विलुप्यते ॥ २३ ॥
'तुम्हारा भाव शुद्ध है, तुम मनको वशमें रखनेवाली हो, सती-साध्वी हो । फिर भी यदि सुप्तावस्थामें तुम इस दशाको पहुँच गयी तो इससे तुम्हारे धर्मका लोप नहीं होता है ॥ २३ ॥
यस्या दुष्टं मनः पूर्वं कर्मणा चोपपादितम् ।
तामाहुरसती नाम सती त्वमसि भामिनि ॥ २४ ॥
'जिस स्त्रीका पहले मन दूषित होता है, फिर वह क्रिया-द्वारा दोषका सम्पादन करती है, उसीको असती (कुलटा) कहते हैं; भामिनि ! तुम तो सती हो ॥ २४ ॥
कुलजा रूपसम्पन्ना नियता ब्रह्मचारिणी ।
इमामवस्थां नीतासि कालो हि दुरतिक्रमः ॥ २५ ॥
'तुम उत्तम कुलमें उत्पन्न, मनोहर रूपसे सम्पन्न, संतोष आदि नियमोंका पालन करनेवाली तथा ब्रह्मचारिणी होकर भी इस दशाको पहुँचा दी गयीं; यह देखकर यही कहना पड़ता है कि काल दुर्लङ्घ्य है (वह जिसको जिस अवस्थामें चाहे डाल सकता है)' ॥ २५ ॥
इत्येवमुक्तां रुदतीं बाष्पेणावृतलोचनाम् ।
कुम्भाण्डदुहिता वाक्यं परं त्विदमब्रवीत् ॥ २६ ॥
सखियोंके ऐसा कहनेपर भी उषा रोती ही रही। उसके नेत्र आँसुओंसे भरे ही रहे। तब कुम्भाण्डकी पुत्री चित्रलेखा-ने यह उत्तम बात कही— ॥ २६ ॥
त्यज शोकं विशालाक्षि अपापा त्वं वरानने ।
श्रुतं मे यदिदं वाक्यं याथातथ्येन तच्छृणु ॥ २७ ॥
'विशाललोचने ! यह शोक छोड़ो। वरानने ! तुम सर्वथा पापरहित हो। मैंने जो यह बात सुन रखी है, उसे यथार्थ-रूपसे बताती हूँ, सुनो ॥ २७ ॥
उषे यदुक्ता देव्यासि भर्तारं ध्यायती तदा ।
समीपे देवदेवस्य स्मर भामिनि तद् वचः ॥ २८ ॥
'उषे ! भामिनि ! देवाधिदेव महादेवजीके समीप उस दिन जब तुम पतिका चिन्तन कर रही थीं, उस समय देवी पार्वतींने तुमसे जो बात कही थी, उसे याद करो ॥ २८ ॥
द्वादश्यां शुक्लपक्षस्य वैशाखे मासि यो निशि ।
हर्म्ये शयानां रुदतीं स्त्रीत्वं समुपनेष्यति ॥ २९ ॥
भविता स हि ते भर्ता शूरः शत्रुनिबर्हणः ।
'वैशाख मासके शुक्ल पक्षकी द्वादशी तिथिको रात्रिके समय अट्टालिकापर सोयी हुई तुझे तेरे रोते रहनेपर भी जो पुरुष स्वप्नमें अपनी स्त्री बना लेगा, वह शत्रुसूदन शूरवीर पुरुष ही तेरा पति होगा ॥ २९½ ॥
इत्युवाच वचो हृष्टा देवी तव मनोगतम् ॥ ३० ॥
न हि तद् वचनं मिथ्या पार्वत्या यदुदाहृतम् ।
सा त्वं किमिदमत्यर्थं रोदिषीन्दुनिभानने ॥ ३१ ॥
'हर्षमें भरी हुई पार्वती देवीने यह तुम्हारे मनके अनुरूप बात कही थी। पार्वतीजीने जो कह दिया, वह वचन कभी मिथ्या नहीं हो सकता। अतः चन्द्रमुखि ! तुम इस घटनाके लिये यह अत्यन्त रोदन क्यों कर रही हो?' ॥ ३०-३१ ॥
एवमुक्ता तया बाला स्मृत्वा देवीवचस्ततः ।
अभवन्नष्टशोका सा बाणपुत्री शुभेक्षणा ॥ ३२ ॥
चित्रलेखाके ऐसा कहनेपर पार्वती देवीके वचनका स्मरण करके वह असुरबाला शुभलोचना बाणपुत्री उषा शोकरहित हो गयी ॥ ३२ ॥
| ६७८ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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उषोवाच
स्मरामि भामिनि वचो देव्याः क्रीडागते भवे ।
यथोक्तं सर्वमखिलं प्राप्तं हर्म्यतले मया ॥ ३३ ॥
उषा बोली—भामिनि ! जब महादेवजी क्रीडामें तत्पर थे, उस समय देवी पार्वतीजीने जो बात कही थी, वह मुझे याद आ रही है। उन्होंने जो कुछ कहा था, वह सब पूर्णरूपसे इस अट्टालिकाके भीतर मैंने अनुभव किया है ॥
भर्ता तु मम यश्चैष लोकनाथस्य भार्यया ।
व्यादिष्टः स कथं ज्ञेयस्तत्र कार्ये विधीयताम् ॥ ३४ ॥
यदि भगवान् विश्वनाथकी भार्या पार्वती देवीने इसी पुरुषको मुझे पतिरूपमें प्रदान किया है तो उसका पता कैसे लगेगा ? इसके लिये कोई उपाय करो ॥ ३४ ॥
इत्येवमुक्ते वचने कुम्भाण्डदुहिता पुनः।
व्याजहार यथान्यायमर्थतत्त्वविशारदा ॥ ३५ ॥
उषाके ऐसा कहनेपर अर्थतत्त्वके ज्ञानमें कुशल कुम्भाण्ड-कुमारी चित्रलेखाने पुनः यह न्यायोचित बात कही—॥
न हि तस्य कुलं देवि न कीर्ति नापि पौरुषम् ।
कश्चिज्जानाति तत्त्वेन किमिदं त्वं विमुह्यसे ॥ ३६ ॥
'देवि ! उस पुरुषका न तो कोई कुल जानता है, न उसकी कीर्ति और पुरुषार्थका ही किसीको ठीक-ठीक पता है; फिर इस विषयको लेकर तुम क्यों मोहित हो रही हो ॥३६॥
अदृष्टाश्रुतश्चैव दृष्टः स्वप्ने च यः शुभे ।
कथं ज्ञेयो भवेद् भीरु सोऽस्माभी रतिस्करः ॥ ३७ ॥
'शुभे ! भीरु ! जिसको तुमने सपनेमें देखा है, उसे दूसरे किसीने न तो कभी देखा है और न उसके विषयमें कुछ सुना ही है, फिर हम तुम्हारे उस रति तस्करका पता कैसे लगा सकती हैं ? ॥ ३७ ॥
येन त्वमसितापाङ्गि मत्तकाशिनि विक्रमात् ।
रुदती प्रसभं भुक्ता प्रविश्यान्तःपुरं सखि ॥ ३८ ॥
न ह्यसौ प्राकृतः कश्चिद् यः प्रविष्टः प्रसह्य ते ।
नगरं लोकविख्यातमेकः शत्रुनिबर्हणः ॥ ३९ ॥
'मतवाली सी प्रतीत होनेवाली और कजरारे नेत्रोंवाली सखि ! जिसने अन्तःपुरमें घुसकर तुम्हारे रोते रहनेपर भी बलपूर्वक तुम्हारा उपभोग किया है, वह कोई साधारण मनुष्य नहीं है। जो तुम्हारे इस लोकविख्यात नगरमें बलपूर्वक अकेला ही घुस आया, वह कोई शत्रुमर्दन शूरवीर ही हो सकता है ॥ ३८-३९ ॥
आदित्या वसवो रुद्रा अश्विनौ च महौजसौ ।
न शक्ताः शोणितपुरं प्रवेष्टुं भीमविक्रमाः ॥ ४० ॥
'बारह आदित्य, आठ वसु, ग्यारह रुद्र और दोनों महाबली अश्विनीकुमार—ये भयानक पराक्रमी देवता भी शोणितपुरमें प्रवेश नहीं कर सकते ॥ ४० ॥
सोऽयमेतैः शतगुणैर्विशिष्टश्चारिसूदनः ।
प्रविष्टः शोणितपुरं बाणमाक्रम्य मूर्धनि ॥ ४१ ॥
'उपर्युक्त देवता यदि सौगुने होकर आ जायँ तो उनसे विशिष्ट यह शत्रुसूदन वीर होगा, जिसने बाणासुरके मस्तकपर पैर रखकर शोणितपुरमें प्रवेश किया है ॥ ४१ ॥
यस्या नैवंविधो भर्ता भवेद् युद्धविशारदः ।
कस्तस्या जीवितेनार्थो भोगैर्वास्त्यम्बुजेक्षणे ॥ ४२ ॥
'कमललोचने ! जिस नारीका पति ऐसा युद्धविशारद वीर न हो, उसके जीवन अथवा भोगोंसे क्या लाभ ? ॥४२॥
धन्यास्यनुगृहीतासि यस्यास्ते पतिरीदृशः ।
प्राप्तो देव्याः प्रसादेन कन्दर्पसमविक्रमः ॥ ४३ ॥
'तुम धन्य हो, तुमपर देवीका महान् अनुग्रह है; क्योंकि तुम्हें पार्वती देवीके प्रसादसे ऐसा कामदेव-तुल्य पराक्रमी पति प्राप्त हुआ है ॥ ४३ ॥
इदं तु यत् कार्यतमं शृणु त्वं तन्मयेरितम् ।
विज्ञेयो यस्य पुत्रो वै यन्नामा यत्कुलश्च सः ॥ ४४ ॥
'इस समय जो यह सबसे महान् कार्य है, वह मेरे मुखसे सुनो । पहले तुम्हें इस बातको जान लेना चाहिये कि वह किसका पुत्र है ? उसका क्या नाम है ? और वह किस कुलमें उत्पन्न हुआ है ?' ॥ ४४ ॥
इत्येवमुक्ते वचने तत्रोषा काममोहिता ।
उवाच कुम्भाण्डसुतां कथं ज्ञास्याम्यहं सखि ॥ ४५ ॥
उसके ऐसा कहनेपर वहाँ काममोहित उषा कुम्भाण्ड-कुमारीसे बोली—'सखि ! यह सब मैं कैसे जानूँगी ॥ ४५ ॥
त्वमेव चिन्तय सखि नोत्तरं प्रतिभाति मे ।
स्वकार्ये मुह्यते लोको यथा जीवं लभाम्यहम् ॥ ४६ ॥
'सखि ! तुम्हीं कोई उपाय सोचो, मुझे तो कोई उत्तर नहीं सूझता । अपने कार्यमें प्रायः सब लोग मोहित हो जाते हैं। अतः तुम्हीं कोई ऐसा उपाय करो, जिससे मुझे नूतन जीवन प्राप्त हो' ॥ ४६ ॥
उषाया वचनं श्रुत्वा रामा वाक्यमिदं पुनः ।
उवाच रुदतीं चोपां कुम्भाण्डदुहिता सखी ॥ ४७ ॥
उषाकी यह बात सुनकर उसकी सखी कुम्भाण्डकुमारी रामा (जो चित्रलेखा अप्सराके अंशसे उत्पन्न होनेके कारण चित्रलेखा भी कही जाती थी) रोती हुई उषासे पुनः इस प्रकार बोली—॥ ४७ ॥
कुशला ते विशालाक्षि सर्वथा संधिविग्रहे ।
अप्सरा चित्रलेखा वै क्षिप्रं विज्ञाप्यतां सखि ॥ ४८ ॥
[विष्णुपूर्व] अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः ६७९
'विशाल नेत्रोंवाली सखि ! तुम यह बात शीघ्र ही चित्रलेखा अप्सराको सूचित कर दो; वह तुम्हारे संधि-विग्रह (मन्त्रणा देने) के कार्यमें सर्वथा कुशल है ॥ ४८ ॥
अस्याः सर्वमशेषेण त्रैलोक्यं विदितं सदा ।
एवमुक्ता तदैवोषा हर्षेणागतविस्मया ॥ ४९ ॥
'उसे समस्त त्रिलोकीकी सारी बातें सदा ज्ञात रहती हैं।' उसके ऐसा कहनेपर उषाको तत्काल बड़ा हर्ष और विस्मय हुआ ॥ ४९ ॥
तामप्सरसमानाय्य चित्रलेखां सखीं प्रियाम् ।
कृताञ्जलिपुटा दीना उषा वचनमब्रवीत् ॥ ५० ॥
उसने अपनी प्यारी सखी चित्रलेखा नामक अप्सराको बुलवाकर दोनों हाथ जोड़ दीनभावसे अपना हार्दिक दुःख निवेदन किया ॥ ५० ॥
सा तच्छ्रुत्वा तु वचनमुषायाः परिकीर्तितम् ।
आश्वासयामास सखी बाणपुत्रीं यशस्विनीम् ॥ ५१ ॥
उषाकी कही हुई बात सुनकर सखी चित्रलेखाने उस यशस्विनी बाणपुत्रीको आश्वासन दिया ॥ ५१ ॥
ततः सा विस्मयाविष्टा वचनं प्राह दुर्वचम् ।
चित्रलेखामप्सरसं प्रणयात् तां सखीमिदम् ॥ ५२ ॥
तब आश्चर्यचकित हुई उषाने अपनी सखी चित्रलेखा नामक अप्सराको सम्बोधित करके बड़े प्यारसे यह कठिनाईसे कहनेयोग्य बात कही—॥ ५२ ॥
परमं शृणु मे वाक्यं यत्त्वां वक्ष्यामि भामिनि ।
भर्तारं यदि मेऽद्य त्वं नानयिष्यसि मत्प्रियम् ॥ ५३ ॥
कान्तं पद्मपलाशाक्षं मत्तमातङ्गगामिनम् ।
त्यक्ष्याम्यहं ततः प्राणानचिरात् तनुमध्यमे ॥ ५४ ॥
'भामिनि ! मैं तुमसे जो उत्तम बात कहती हूँ, उसे सुनो। मेरे प्रियतम पति बड़े ही कमनीय हैं, उनके नेत्र प्रफुल्ल कमलदलके समान सुन्दर हैं, वे मतवाले हाथीके समान मन्दगतिसे चलते हैं, पतली कमरवाली सखि ! यदि तुम आज मेरे उन प्राणनाथको यहाँ नहीं ले आओगी तो मैं शीघ्र ही अपने प्राणोंका परित्याग कर दूँगी' ॥ ५३-५४ ॥
चित्रलेखाब्रवीद् वाक्यमुषां हर्षयती शनैः ।
नैषोऽर्थः शक्यतेऽस्माभिर्वेत्तुं भामिनि सुव्रते ॥ ५५ ॥
यह सुनकर चित्रलेखा उषाका हर्ष बढ़ाती हुई धीरे-धीरे यों बोली—'उत्तम व्रतका पालन करनेवाली भामिनि ! तुम्हारे इस मनोरथको मैं किसी तरह जान नहीं सकती हूँ ॥
न कुलेन न वर्णेन न शीलेन न रूपतः ।
न देशाच्च विश्रुतः स हि चारो मया सखि ॥ ५६ ॥
सखि ! तुम्हारे उस चित्तचोरका कुल, वर्ण, शील, रूप और देश कुछ भी तो मुझे ज्ञात नहीं है ॥ ५६ ॥
किं तु कर्तुं यथा शक्यं बुद्धिपूर्वं मया सखि ।
प्राप्तं च शृणु मे वाक्यं यथा काममवाप्स्यसि ॥ ५७ ॥
'सखि ! फिर भी मैं बुद्धिपूर्वक जैसा जो कुछ कर सकती हूँ, करूँगी; इस समय जो कर्तव्य प्राप्त है, उसके विषयमें मेरी बात सुनो, जिससे तुम अपना मनोरथ पा लोगी ॥
देवदानवयक्षाणां गन्धर्वोरगरक्षसाम् ।
ये विशिष्टाः प्रभावेण रूपेणाभिजनेन च ॥ ५८ ॥
यथाप्रभावं तान् सर्वानलिखिष्याम्यहं सखि ।
मनुष्यलोके ये चापि प्रवरा लोकविश्रुताः ॥ ५९ ॥
'देवता, दानव, यक्ष, गन्धर्व, नाग और राक्षस—इनमें जो-जो प्रभाव, रूप और कुलकी दृष्टिसे बढ़े-चढ़े हैं, उन सबका उनके प्रभावके अनुसार ही मैं चित्र बनाऊँगी। सखि ! मनुष्य-लोकमें भी जो विश्वविख्यात श्रेष्ठ पुरुष हैं, उनका भी चित्र अङ्कित करूँगी ॥ ५८-५९ ॥
सप्तरात्रेण ते भीरु दर्शयिष्यामि तानहम् ।
ततो विज्ञाय पादस्थं भर्तारं प्रतिपत्स्यसे ॥ ६० ॥
'भीरु ! सात रातमें उन सबके चित्र बनाकर मैं तुम्हें उन सबका दर्शन कराऊँगी । तदनन्तर पहचान लेनेपर तुम मनोनीत पतिको अपने पैरोंपर पड़ा हुआ पाओगी' ॥ ६० ॥
सा चित्रलेखया प्रोक्ता उषा हितचिकीर्षया ।
क्रियतामेवमित्याह चित्रलेखां सखीं प्रियाम् ॥ ६१ ॥
चित्रलेखाने हित-साधन करनेकी इच्छासे जब पूर्वोक्त बात कही, तब उषा अपनी प्यारी सखी चित्रलेखासे बोली, 'अच्छा, ऐसा ही करो' ॥ ६१ ॥
ततः कुशलहस्तत्वाद् यथालेख्यं समन्ततः ।
इत्युक्त्वा सप्तरात्रेण कृत्वा लेख्यगतांस्तु तान् ॥ ६२ ॥
चित्रपट्टगतान् मुख्यानानयामास शोभना ।
तब 'तथास्तु' कहकर चित्रलेखाने सब ओरसे यथायोग्य चित्र तैयार किये; क्योंकि इस कलामें उसके हाथ सधे हुए थे । उसने सात रातोंमें सब प्रमुख पुरुषोंके चित्र अङ्कित कर लिये । फिर वह सुन्दरी चित्रपट्टमें स्थापित हुए उन सब लोगोंको वहाँ ले आयी ॥ ६२½ ॥
ततः प्रास्तीर्य पट्टं सा चित्रलेखा स्वयंकृतम् ॥ ६३ ॥
उषायै दर्शयामास सखीनां तु विशेषतः ।
तदनन्तर चित्रलेखाने अपने बनाये हुए उस चित्रपट्टको फैलाकर उषाको तथा विशेषतः उसकी सब सखियोंको भी दिखाया ॥ ६३½ ॥
एते देवेषु ये मुख्यास्तथा दानववंशजाः ॥ ६४ ॥
किन्नरोरगयक्षाणां राक्षसानां समन्ततः ।
गन्धर्वासुरदैत्यानां ये चान्ये भोगिनः स्मृताः ॥ ६५ ॥
| ६८० | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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वह बोली—'ये देवताओंमें जो मुख्य-मुख्य पुरुष हैं, उनके चित्र हैं तथा इस ओर दानववंशी वीर अङ्कित किये गये हैं। इनके चारों ओर किन्नर, नाग, यक्ष और राक्षसोंके चित्र हैं; गन्धर्व, असुर, दैत्य तथा अन्यान्य सर्पोंके भी चित्र हैं ॥ ६४-६५ ॥
मनुष्याणां च सर्वेषां ये विशिष्टतमा नराः।
तानेतान् पश्य सर्वांस्त्वं यथैव लिखितान् मया ॥ ६६ ॥
'समस्त मनुष्योंमें जो विशिष्टतम पुरुष हैं, वे इधर हैं। इन सबको जैसा मैंने अङ्कित किया है, देखो ॥ ६६ ॥
यस्ते भर्ता यथारूपः स मया लिखितः सखि।
तं त्वं प्रत्यभिज्ञानीहि स्वप्ने यं दृष्टवत्यसि ॥ ६७ ॥
'सखि ! जो तुम्हारा पति है और उसका जैसा रूप है, वह सब मैंने अङ्कित किया है। तुमने स्वप्नमें जिसे देखा है, उसे इस चित्रपट्टमे पहचानो' ॥ ६७ ॥
ततः क्रमेण सर्वांस्तान् दृष्ट्वा सा मत्तकाशिनी।
देवदानवगन्धर्वविद्याधरगणानथ ॥
अतीत्य च यदून् सर्वान् ददर्श यदुनन्दनम् ॥ ६८ ॥
तब मतवाली सी प्रतीत होनेवाली उषाने क्रमशः उन सबको देखकर देवता, दानव, गन्धर्व और विद्याधरगणोंको लाँघकर समस्त यदुवंशियों तथा यदुनन्दन श्रीकृष्णको देखा ॥
तत्रानिरुद्धं दृष्ट्वा सा विस्मयोत्फुल्ललोचना।
उवाच चित्रलेखां तामयं चौरः स वै सखि ॥ ६९ ॥
येनाहं दूषिता पूर्वं स्वप्ने हर्म्यगता सती।
सोऽयं विज्ञातरूपो मे कुतोऽयं रतितस्करः ॥ ७० ॥
वहीं अनिरुद्धका चित्र देखकर उसके नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे और वह चित्रलेखासे बोली—'सखि ! यही वह चोर है, जिसने अट्टालिकापर सोते समय पहले स्वप्नमें आकर मुझे दूषित किया था। इसके रूपको तो मैं खूब पहचानती हूँ, परंतु यह रतिचोर कहाँसे आया था, यह नहीं जान सकी ॥
चित्रलेखे वदस्वैनं तत्त्वतो मम शोभने।
कुलशीलाभिजनतो नाम किं चास्य भामिनि।
ततः पश्चाद् विधास्यामि कार्यस्यास्य विनिश्चयम् ॥ ७१ ॥
'शोभने ! चित्रलेखे ! मुझे इसका ठीक-ठीक परिचय दो। भामिनि ! इन चोर महोदयका कुल, शील, अभिजन और नाम क्या है ? यह सब जान लेनेके पश्चात् मैं अपने इस कर्तव्यका निश्चय करूँगी' ॥ ७१ ॥
चित्रलेखोवाच
अयं त्रैलोक्यनाथस्य नप्ता कृष्णस्य धीमतः।
भर्ता तव विशालाक्षि प्रद्युम्निर्भिमविक्रमः ॥ ७२ ॥
चित्रलेखा बोली—'विशाललोचने ! ये तुम्हारे पति साक्षात् त्रिलोकीनाथ बुद्धिमान् भगवान् श्रीकृष्णके पोते हैं और प्रद्युम्नके पुत्र हैं। इनका पराक्रम बड़ा भयङ्कर है ॥ ७२ ॥
न ह्यस्ति त्रिषु लोकेषु सदृशोऽस्य पराक्रमे।
उत्पाट्य पर्वतानेष पर्वतैरेव शातयेत् ॥ ७३ ॥
पराक्रममें इनकी समानता करनेवाला तीनों लोकोंमें कोई नहीं है। ये पर्वतोंको ही उखाड़कर उन पर्वतोंद्वारा ही शत्रुओंका संहार कर सकते हैं ॥ ७३ ॥
धन्यास्यनुगृहीतासि यस्यास्ते यदुपुङ्गवः।
त्र्यक्षपत्न्या समादिष्टः सदृशः सज्जनः पतिः ॥ ७४ ॥
तुम धन्य हो, तुमपर देवीका बड़ा अनुग्रह है, जिससे तुम्हारे लिये पार्वतीजीने परमयोग्य यदुकुलतिलक अनिरुद्धको पतिरूपमें प्रदान किया है। इनके पूर्वज श्रेष्ठतम पुरुष हैं॥
उपोवाच
त्वमेवात्र विशालाक्षि योग्या भव वरानने।
न शक्या हि गतिश्चान्या अगंत्या मे गतिर्भव ॥ ७५ ॥
उषा बोली--वरानने ! विशाललोचने ! तुम ही इस कार्यको करने योग्य हो। मुझे तुम्हारे सिवा दूसरा कोई सहारा नहीं मिल सकता। तुम मुझ अशरणको शरण देनेवाली बनो ॥
अन्तरिक्षचरा च त्वं योगिनी कामरूपिणी।
उपायस्यास्य कुशला क्षिप्रमानय मे प्रियम् ॥ ७६ ॥
तुम आकाशमें विचरनेवाली और इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली योगिनी हो, इस उपायके ज्ञानमें भी कुशल हो, अतः मेरे प्रियतमको शीघ्र ले आओ ॥ ७६ ॥
उपायश्चिन्त्यतां भीरु सम्प्रतर्क्य प्रिये सुखम्।
सिद्धार्था संनिवर्तेस्व येनोपायेन सुन्दरि ॥ ७७ ॥
भीरु ! सुन्दरी ! मुझे प्रियसङ्गमका सुख कैसे मिले, इसपर भलीभाँति तर्क-वितर्क करके कोई ऐसा उपाय सोचो, जिससे सफलमनोरथ होकर लौटो ॥ ७७ ॥
भवेदापत्सु यन्मित्रं तन्मित्रं शस्यते बुधैः।
कामार्ता चास्मि सुश्रोणि भव मे प्राणधारिणी ॥ ७८ ॥
जो आपत्तिकालमे मित्र हो, उसी मित्रकी विद्वान् पुरुष प्रशंसा करते है। सुश्रोणि ! मैं कामसे पीड़ित हो रही हूँ, तुम मेरे प्राणोंकी रक्षा करनेवाली बनो ॥ ७८ ॥
यद्येनं मे विशालाक्षि भर्तारममरोपमम्।
अद्य नानयसि क्षिप्रं प्राणांस्त्यक्ष्याम्यहं शुभे ॥ ७९ ॥
शुभे ! विशाललोचने ! यदि तुम मेरे इन देवोपम पतिको आज यहाँ नहीं ले आओगी तो मैं शीघ्र ही अपने प्राणोंका परित्याग कर दूँगी ॥ ७९ ॥
उषाया वचनं श्रुत्वा चित्रलेखाब्रवीद् वचः।
श्रोतुमर्हसि कल्याणि वचनं मे शुचिस्मिते ॥ ८० ॥
विष्णुपर्व ] अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः ६८१
उषाकी यह बात सुनकर चित्रलेखा बोली--'कल्याणि ! पवित्र मुसकानवालीुषे ! पहले मेरी बात तो सुनो। ॥८०॥
यथा बाणस्य नगरी रक्ष्यते देवि सर्वशः।
द्वारकापि तथा भीरु दुराधर्षा सुरैरपि ॥ ८१ ॥
'देवि ! जैसे बाणासुरकी नगरी सब ओरसे सुरक्षित है, भीरु ! उसी प्रकार द्वारकापुरी भी है। देवता भी उसका पराभव नहीं कर सकते ॥ ८१ ॥
अयस्मयप्रतीच्छन्ना गुप्तद्वारा च सा पुरी।
गुप्ता वृष्णिकुमारैश्च तथा द्वारकवासिभिः ॥ ८२ ॥
'वह लोहेके किवाड़ोंसे ढकी हुई है। उस पुरीका प्रवेश-द्वार पूर्णतः गुप्त (सुरक्षित) है। वृष्णिवंशीकुमार तथा अन्य द्वारकावासी उस नगरीकी रक्षा करते हैं ॥ ८२ ॥
प्रान्ते सलिलसंयुक्ता विहिता विश्वकर्मणा।
रक्ष्यते पुरुषैर्घोरैः पद्मनाभस्य शासनात् ॥ ८३ ॥
'विश्वकर्माने उस पुरीका निर्माण किया है। उसके प्रान्त-भागमें समुद्रकी जलराशि ही खाईके रूपमे विद्यमान है। पद्मनाभ श्रीकृष्णके आदेशसे बड़े भयंकर पुरुष उसकी रक्षा करते हैं ॥ ८३ ॥
शैलप्राकारपरिखादुर्गमार्गप्रवेशिनी ।
सप्तप्राकाररचिता पर्वतैर्धातुमण्डितैः ॥ ८४ ॥
'पर्वत ही उसके परकोटे हैं। समुद्र ही खाई है। दुर्गके मार्गसे ही उसमे प्रवेश होता है। धातुमण्डित पर्वतोंके बने हुए सात परकोटोंसे वह पुरी घिरी हुई है ॥ ८४ ॥
न च शक्यमविज्ञातैः प्रवेष्टुं द्वारकां पुरीम्।
आत्मानं मां च रक्षस्व पितरं च विशेषतः ॥ ८५ ॥
'अपरिचित व्यक्ति द्वारकापुरीमें कभी प्रवेश नहीं कर सकते, अतः अनिरुद्धको लानेका हठ छोड़कर तुम अपनी, मेरी और विशेषतः अपने पिताकी रक्षा करो' ॥ ८५ ॥
उषोवाच
तव योगप्रभावेण शक्यं तत्र प्रवेशनम्।
बहुना किं प्रलापेन प्रतिज्ञा श्रूयतां मम ॥ ८६ ॥
उषा बोली--सखि ! योगशक्तिके प्रभावसे तुम्हारा द्वारकापुरीमें प्रवेश हो सकता है। अधिक प्रलाप करनेसे क्या लाभ ? मेरी प्रतिज्ञा सुन लो ॥ ८६ ॥
अनिरुद्धस्य वदनं पूर्णचन्द्रसमप्रभम्।
यद्यहं तन्न पश्यामि यास्यामि यमसादनम् ॥ ८७ ॥
यदि मैं अनिरुद्धका पूर्ण चन्द्रमाके समान कान्तिमान् वह मनोहर मुख नहीं देखूँगी तो यमलोकको चली जाऊँगी ॥ ८७ ॥
दूतमसाद्य कार्याणां सिद्धिर्भवति भामिनि।
तस्माद् दौत्येन मे गच्छ जीवन्तीं मां यदीच्छसि ॥ ८८ ॥
भामिनि ! अच्छे दूतको पाकर कार्योंकी सिद्धि हो जाती है; अतः यदि तुम मुझे जीवित रखना चाहती हो तो मेरी दूती बनकर द्वारकाको चली जाओ ॥ ८८ ॥
यदि त्वं मे विजानासि सख्यं प्रेम्णा च भाषितम्।
क्षिप्रमानय मे कान्तं तवास्मि शरणं गता ॥ ८९ ॥
यदि तुम मेरे सखित्वको जानती हो और प्रेमपूर्वक कही हुई मेरी बातपर विश्वास करती हो तो मेरे प्रियतमको शीघ्र यहाँ ले आओ। मैं तुम्हारी शरणमें आयी हूँ ॥८९॥
जीवितस्य हि संदेहं क्षयं चैव कुलस्य च।
कामार्ता हि न पश्यन्ति कामिन्यो मदविह्वलाः ॥ ९० ॥
प्राणोंके लिये संशय उपस्थित हो और कुलका भी संहार हो जाय, किंतु कामपीड़ित मदमत्त कामिनियाँ इन बातोंकी ओर नहीं देखती हैं ॥ ९० ॥
प्रयत्नो युज्यते कार्येष्विति शास्त्रनिदर्शनम्।
त्वं च शक्ता विशालाक्षि द्वारकायां प्रवेशने ॥ ९१ ॥
संस्तुतासि मया भीरु कुरु मे प्रियदर्शनम्।
सभी कार्योंके लिये प्रयत्न करना उचित है, यह शास्त्रकी आज्ञा है। विशाललोचने ! तुम द्वारकापुरीमें प्रवेश करनेमें समर्थ हो। भीरु ! मैंने तुम्हारी बड़ी स्तुति की है। तुम मुझे मेरे प्रियतमका दर्शन करा दो ॥ ९१ १/२ ॥
चित्रलेखोवाच
सर्वथा संस्तुता तेऽहं वाक्यैरमृतसोदरैः ॥ ९२ ॥
कारिता च समुद्योगं प्रियैः कान्तैश्च भाषितैः।
एषा गच्छाम्यहं भीरु क्षिप्रं वै द्वारकां पुरीम् ॥ ९३ ॥
चित्रलेखा बोली--सखि ! तुम्हारे अमृतोपम वचनोंद्वारा मेरी सब प्रकारसे स्तुति ही की गयी है। तुम्हारे इन प्रिय एवं मनोरम वचनोंने मुझे इस कार्यके लिये उद्योग करनेको विवश कर दिया है। भीरु ! यह देखो, अब मैं शीघ्र ही द्वारकापुरीको जाती हूँ ॥ ९२-९३ ॥
भर्तारमानयिष्याद्य तव वृष्णिकुलोद्भवम्।
अनिरुद्धं महाबाहुं प्रविश्य द्वारकां पुरीम् ॥ ९४ ॥
आज तुम्हारे पति वृष्णिवंशावतंस महाबाहु अनिरुद्धको मैं द्वारकापुरीमें प्रवेश करके ले आऊँगी ॥ ९४ ॥
सा वचस्तथ्यमशिवं दानवानां भयावहम्।
उक्त्वा चान्तर्हिता क्षिप्रं चित्रलेखा मनोजवा ॥ ९५ ॥
यह वचन यथार्थ होनेके साथ ही दानवोंके लिये अमङ्गलकारक और भयावह था। इसे कहकर मनके समान वेगशालिनी चित्रलेखा तत्काल अन्तर्धान हो गयी ॥ ९५ ॥
सखीभिः सहिता ह्युषा चिन्तयन्ती तु सा स्थिता।
तृतीये तु मुहूर्ते सा नष्टा बाणपुरात् तदा ॥ ९६ ॥
उषा अपनी सखियोंके साथ अभीष्ट कार्यका चिन्तन
६८२ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे करती हुई वहीं खड़ी रही; किंतु चित्रलेखा उस समय द्वारा सुरक्षित द्वारकापुरीमें जा पहुँची ॥ ९७ ॥ तृतीय मुहूर्त्तमें बाणपुरसे अदृश्य हुई थी ॥ ९६ ॥ कैलासशिखराकारैः प्रासादैरुपशोभिताम् । सखीप्रियं चिकीर्षन्ती पूजयन्ती तपोधनान् । ददर्श द्वारकां रम्यां दिवि तारामिव स्थिताम् ॥ ९८ ॥ क्षणेन समनुप्राप्ता द्वारकां कृष्णपालिताम् ॥ ९७ ॥ कैलासशिखरके समान ऊँचे-ऊँचे महलोंसे सुशोभित सखीका प्रिय करनेकी इच्छा लिये तपस्वी मुनियोंका रमणीय द्वारकापुरीको उसने आकाशमें प्रकाशित होती हुई पूजन करती हुई चित्रलेखा एक ही क्षणमें श्रीकृष्ण- ताराके समान देखा ॥ ९८ ॥ इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि उषाहरणे चित्रलेखाया द्वारकागमने अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें उषाहरणके प्रसङ्गमें चित्रलेखाका द्वारकागमनविषयक एक सौ अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११८ ॥ एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः चित्रलेखा और नारदजीका संवाद, चित्रलेखाका नारदजीसे तामसी विद्या ग्रहणकर अनिरुद्धको शोणितपुर ले जाना, उषा और अनिरुद्धका गान्धर्व-विवाह, अनिरुद्धका वाणासुरके सैनिकों तथा वाणासुरके साथ युद्ध, उनका नागपाशमें बँधकर बंदी होना तथा नारदजीका द्वारका जाना वैशम्पायन उवाच तब चित्रलेखा दोनों हाथ जोड़कर लोकपूजित दिव्य अथ द्वारवतीं प्राप्य स्थिता सा भवनान्तिके । देवर्षि नारदसे इस प्रकार बोली-॥ ५ ॥ प्रवृत्तिहरणार्थाय चित्रलेखा व्यचिन्तयत् ॥ १ ॥ भगवञ्छ्रूयतां वाक्यं दौत्येनाहमिहागता । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय ! तदनन्तर अनिरुद्धं मुने नेतुं यदर्थं च शृणुष्व मे ॥ ६ ॥ द्वारकापुरीके पास पहुँचकर चित्रलेखा एक घरके पास 'भगवन् ! मेरी बात सुनिये । मैं दूती होकर यहाँ आयी खड़ी हो गयी और अनिरुद्धके पास संदेश भेजनेके लिये कोई हूँ । मुने ! मैं अनिरुद्धको यहाँसे ले जाना चाहती हूँ, किस युक्ति सोचने लगी ॥ १ ॥ लिये, यह मुझसे सुनिये ॥ ६ ॥ अथ चिन्तयती सा तु बुद्धिवुद्ध्यर्थनिश्चयम् । नगरे शोणितपुरे बाणो नाम महासुरः । अपश्यन्नारदं तत्र ध्यायन्तमुदके मुनिम् ॥ २ ॥ तस्य कन्या वरारोहा नाम्नोपेति च विश्रुता ॥ ७ ॥ बुद्धिसे बोद्धव्य विषयका जो निश्चय होता है, उसीका 'शोणितपुर नगरमें जो बाण नामसे प्रसिद्ध महान् असुर विचार करती हुई चित्रलेखाने वहाँ नारदमुनिको देखा, है, उसके एक सुन्दर अङ्गवाली कन्या है, जो उषाके नामसे जो समुद्रके जलमें ध्यान लगाये बैठे थे ॥ २ ॥ विख्यात है ॥ ७ ॥ तं दृष्ट्वा चित्रलेखा तु हर्षोत्फुल्ललोचना । भगवन् सानुरक्ता च प्रद्युम्निं पुरुषोत्तमम् । उपसृत्याभिवाद्याथ तत्रैवाधोमुखी स्थिता ॥ ३ ॥ देव्या वरविसर्गेण तस्य भर्ता विनिर्मितः ॥ ८ ॥ उन्हें देखकर चित्रलेखाके नेत्र हर्षसे खिल उठे। वह 'भगवन् ! वह प्रद्युम्नकुमार पुरुषोत्तम अनिरुद्धके उनके पास गयी और उन्हें प्रणाम करके वहीं नीचे मुँह प्रति अनुरक्त है; देवी पार्वतीके वरदानके अनुसार अनिरुद्ध किये खड़ी हो गयी ॥ ३ ॥ ही उसके पति नियत हुए हैं ॥ ८ ॥ नारदस्त्वारिशपं दत्त्वा चित्रलेखामथाब्रवीत् । तं च नेतुं समायाता तत्र सिद्धिं विधत्स्व मे । किमर्थमिह सम्प्राप्ता श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ ४ ॥ मया नीतेऽनिरुद्धे तु नगरं शोणिताह्वयम् ॥ ९ ॥ नारदजीने आशीर्वाद देकर चित्रलेखासे कहा-'यहाँ प्रवृत्तिः पुण्डरीकाक्षे त्वयाऽऽख्येया महामुने । किसलिये आयी हो, यह मैं ठीक-ठीक सुनना चाहता हूँ' ॥४॥ 'मैं उन्हींको ले जानेके लिये आयी हूँ। मेरे उद्देश्यकी देवर्षिमथ तं दिव्यं नारदं लोकपूजितम् । सिद्धिका कोई उपाय कीजिये । महामुने ! जब मैं अनिरुद्धको कृताञ्जलिपुटा भूत्वा चित्रलेखा त्वथाम्रवीत् ॥ ५ ॥ शोणितपुर नगरमें पहुँचा दूँ, तब आप कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णको यह समाचार बतावें ॥ ९३ ॥
विष्णुपर्व ] एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ६८२
अवश्यं भविता चैव कृष्णेन सह विग्रहः।
बाणस्य सुमहान् संख्ये दिव्यो हि स महासुरः॥ १०॥
'अवश्य ही भगवान् श्रीकृष्णके साथ वाणासुरका महान् युद्ध होगा। वह महान् असुर समराङ्गणमें दिव्य शक्तिसे सम्पन्न होता है॥ १०॥
न च शक्तोऽनिरुद्धस्तं युद्धे जेतुं महासुरम्।
सहस्रबाहुमायान्तं जयेत् कृष्णो महाभुजः॥ ११॥
'वह महान् असुर जब सहस्र भुजाओंसे युक्त होकर युद्धभूमिमें पदार्पण करेगा, उस समय अनिरुद्ध उसे नहीं जीत सकते; महाबाहु श्रीकृष्ण ही उसपर विजय पा सकते हैं॥ ११॥
भगवन् संनिकर्षे ते यदर्थमहमागता।
कथं हि पुण्डरीकाक्षो ज्ञापितस्तदिदं भवेत्॥ १२॥
'भगवन् ! मैं आपके निकट जिस अभिप्रायसे आयी हूँ, वह यह है कि कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णको यह बात कैसे बतायी जाय ?॥ १२॥
त्वत्प्रसादाच्च भगवन्न मे कृष्णाद् भयं भवेत्।
स हि तत्त्वार्थदृष्टिस्तु अनिरुद्धः कथं ह्रियेत्॥ १३॥
'भगवन् ! आपकी कृपासे मुझे भगवान् श्रीकृष्णसे कोई भय नहीं है; क्योंकि वे तत्त्वार्थदर्शी हैं। परंतु अनिरुद्धका अपहरण कैसे किया जाय ?॥ १३॥
क्रुद्धो हि स महाबाहुस्त्रैलोक्यमपि निर्दहेत्।
पौत्रशोकाभिसंतप्तः शापेन स दहेत माम्॥ १४॥
'महाबाहु श्रीकृष्ण यदि क्रुद्ध हो जायँ तो समस्त त्रिलोकीको भी दग्ध कर सकते हैं। पौत्रशोकसे संतप्त होकर अपने शापसे मुझे जला सकते हैं॥ १४॥
तत्रोपायं च भगवंश्चिन्तितुं वै त्वमर्हसि।
यथा ह्यवा लभेत् कान्तं मम चैवाभयं भवेत्॥ १५॥
'अतः भगवन् ! इस विषयमें आप ही कोई ऐसा उपाय सोचिये, जिससे उषा अपने प्रियतमको प्राप्त कर ले और मुझे भी कोई भय न हो'॥ १५॥
इत्येवमुक्तो भगवांश्चित्रलेखां स नारदः।
उवाच स शुभं वाक्यं मा भैस्त्वमभयं शृणु॥ १६॥
उसके ऐसा कहनेपर ऐश्वर्यशाली नारद मुनिने चित्रलेखासे यह शुभ वचन कहा—'चित्रलेखे ! तुम डरो मत ! मैं भयके निवारणका उपाय बताता हूँ, सुनो॥ १६॥
त्वया नीतेऽनिरुद्धे तु कन्यावेश्मप्रवेशिते।
यदि युद्धं भवेत् तत्र स्मर्त्तव्योऽहं शुचिस्मिते॥ १७॥
'शुचिस्मिते ! तुम जब अनिरुद्धको ले जाओ और उनका कन्याके महलमें प्रवेश हो जाय, तब यदि युद्ध होनेकी सम्भावना हो तो मुझे भी स्मरण करना॥ १७॥
ममैष परमः कामो युद्धं द्रष्टुं मनोरमे।
तद् दृष्ट्वा च महाप्रीतिः प्रवृत्तिश्च दृढा भवेत्॥ १८॥
'मनोरमे ! युद्ध देखनेके लिये मुझे बड़ी अभिलाषा रहती है और उसे देखकर बहुत प्रसन्नता होती है। साथ ही युद्ध करानेकी मेरी प्रवृत्ति और दृढ़ होती है॥ १८॥
गृह्यतां तामसी विद्या सर्वलोकप्रमोहिनी।
कृतकृत्यस्तु ते देवि एष विद्यां ददाम्यहम्॥ १९॥
'तुम मुझसे तामसी विद्या ग्रहण कर लो, जो सब लोगोंको मोहमें डालनेवाली है। देवि ! इस विद्याकी सिद्धिके लिये जो पुरश्चरण आदि कार्य करने पड़ते हैं, वे सब मैंने ही कर दिये हैं। इस प्रकार यह सिद्ध की हुई विद्या मैं तुम्हें दे रहा हूँ'॥ १९॥
एवमुक्ते तु वचने नारदेन महर्षिणा।
तथेति वचनं प्राह चित्रलेखा मनोजवा॥ २०॥
महर्षि नारदके ऐसा कहनेपर मनके समान वेगवाली चित्रलेखान 'तथास्तु' कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार कर ली॥ २०॥
अभिवाद्य महात्मानमृषीणां नारदं वरम्।
सा जगामानिरुद्धस्य गृहं चैवान्तरिक्षगा॥ २१॥
इसके बाद ऋषियोंमें श्रेष्ठ महात्मा नारदको प्रणाम करके वह आकाशमार्गसे अनिरुद्धके घरकी ओर चली॥ २१॥
ततो द्वारवतीमध्ये कामस्य भवनं शुभम्।
तत्समीपेऽनिरुद्धस्य भवनं सा विवेश ह॥ २२॥
द्वारकाके मध्यभागमें कामावतार प्रद्युम्नका सुन्दर भवन था और उसीके समीप अनिरुद्धका महल था, जिसमें चित्रलेखाने प्रवेश किया॥ २२॥
सौवर्णवेदिकास्तम्भं रुक्मवैडूर्यतोरणम्।
माल्यदामावसक्तं च पूर्णकुम्भोपशोभितम्॥ २३॥
बर्हिण्कण्ठनिभग्रीवं प्रासादैरेक संचयैः।
मणिप्रवालविस्तीर्णं देवगन्धर्वनादितम्॥ २४॥
उस भवनमें सोनेकी वेदियाँ बनी थीं और सोनेके ही खम्भ लगे थे। उसके फाटक सोने और वैदूर्यमणिसे बनाये गये थे। वहाँ फूल-मालाओंकी वंदनवारें लगी थीं। भरे हुए कलश उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। एक ही विशालकाष्ठ या पाषाणपर बिना खंभेके बने हुए प्रासादोंके कारण वह भवन मोरके कण्ठभागकी भाँति शोभा पाता था। उस भवनमें मणि और मूँगे इस प्रकार जड़े गये थे, मानो उन्हींके बने हुए बिछौने बिछे हुए हों। वहाँ देवगन्धर्वोंके संगीतकी ध्वनि गूँज रही थी॥ २३-२४॥
| ६८४ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
ददर्श भवनं यत्र प्रद्युम्निरवसत् सुखम्।
ततः प्रविश्य सहसा भवनं तस्य तन्महत् ॥ २५॥
तत्रानिरुद्धं सापश्यच्चित्रलेखा वराप्सराः।
मध्ये परमनारीणां तारापतिमिवोदितम् ॥ २६॥
चित्रलेखाने उस भवनको देखा, जहाँ प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्ध सुखपूर्वक निवास करते थे। उनके उस विशाल भवनमें सहसा प्रवेश करके श्रेष्ठ अप्सरा चित्रलेखाने सुन्दरी नारियोंके मध्यभागमें अनिरुद्धको देखा, मानो ताराओंके बीच तारापति चन्द्रमा उदित हुए हों॥ २५-२६ ॥
क्रीडाविहारे नारीभिः सेव्यमानमितस्ततः।
पिबन्तं मधु माध्वीकं श्रिया परमया युतम् ॥ २७॥
क्रीड़ाविहारके स्थानमें इधर-उधर बहुत-सी सुन्दरियाँ उनकी सेवामें लगी थीं। वे मधुर मधुका पान करते हुए उत्कृष्ट शोभासे प्रकाशित हो रहे थे॥ २७॥
वरासनगतं तत्र यथा चैडविडं तथा।
वाद्यते समतालं च गीयते मधुरं तथा ॥ २८॥
धनाध्यक्ष कुबेरके समान वे एक श्रेष्ठ सिंहासनपर विराजमान थे। उनके सामने समतालमें वाद्य बज रहा था और मधुर स्वरमें गान हो रहा था॥ २८॥
न च तस्य मनस्तत्र तमेवार्थमचिन्तयत्।
स्त्रियः सर्वगुणोपेता नृत्यन्ते तत्र तत्र वै ॥ २९॥
किंतु उस वाद्य और गानमें उनका मन नहीं लगता था। वे उसी विषयका (उषाके समागमका) चिन्तन कर रहे थे। सर्वगुणसम्पन्न सुन्दरी स्त्रियाँ जहाँ-तहाँ नृत्य कर रही थीं॥
न चास्य मनसस्तुष्टिं चित्रलेखा प्रपश्यति।
न चाभिरमते भोगैर्न चापि मधु सेवते ॥ ३०॥
परंतु चित्रलेखाने देखा, अनिरुद्धके मनको कहीं भी संतोष नहीं प्राप्त होता है। ये न तो भोगोंके साथ रमते हैं और न मधुका ही सेवन करते हैं॥ ३०॥
व्यक्तमस्य हि तत्स्वप्नो हृदये परिवर्तते।
इति तत्रैव बुद्ध्या च निश्चिता गतसाध्वसा ॥ ३१॥
निश्चय ही इनके हृदयमें भी वही स्वप्न चक्कर लगा रहा है। वह अपनी बुद्धिसे वहीं इस निश्चयपर पहुँच गयी और उसका भय दूर हो गया॥ ३१॥
सा दृष्ट्वा परमस्त्रीणां मध्ये शक्रध्वजोपमम्।
चिन्तयाविष्टहृदया चित्रलेखा मनस्विनी ॥ ३२॥
श्रेष्ठ एवं सुन्दरी स्त्रियोंके बीचमें इन्द्रध्वजके समान शोभा पानेवाले अनिरुद्धको देखकर मनस्विनी चित्रलेखा मन-ही-मन इस प्रकार चिन्ता करने लगी॥ ३२॥
कथं कार्यमिदं कार्यं कथं स्वस्ति भवेदिति।
सान्तर्हिता चिन्तयित्वा चित्रलेखा यशस्विनी ॥ ३३॥
तामस्या च्छादयामास विद्यया शुभलोचना।
'यह कार्य कैसे करना चाहिये, किस तरह करनेसे कल्याण प्राप्त होगा' इस तरह विचार करके सुन्दर नेत्रोंवाली यशस्विनी चित्रलेखाने अदृश्य होकर तामसी विद्याके द्वारा अनिरुद्धके सिवा अन्य सबको आच्छादित कर दिया॥
ततोऽन्तरिक्षादेवाशु प्रासादोपर्यधिष्ठिता ॥ ३४॥
प्रद्युम्निं वचनं प्राह श्लक्ष्णं मधुरया गिरा।
फिर आकाशसे ही शीघ्र आकर वह महलकी छतपर खड़ी हो गयी और प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्धसे मधुर वाणीमें यह स्नेहयुक्त वचन बोली॥ ३४॥
चक्षुर्द्दत्त्वा तु सा तस्मै कृत्वा चात्मनिदर्शनम् ॥३५॥
विविक्ते सा च वै देशे तं वाक्यमिदमब्रवीत्।
पहले दिव्यदृष्टि देकर उसने उन्हें अपने स्वरूपका दर्शन कराया, फिर एकान्त प्रदेशमें उनसे इस प्रकार कहना आरम्भ किया—॥ ३५॥
अपि ते कुशलं वीर सर्वत्र यदुनन्दन ॥ ३६॥
अहस्तावत् प्रदोपो वा कच्चिद् गच्छति ते सुखम्।
शृणुष्व त्वं महाबाहो विज्ञप्तिं मे रतीसुत ॥ ३७॥
'वीर यदुनन्दन ! आपके लिये सर्वत्र कुशल तो है न ? आपका दिन और प्रदोषकाल सुखसे बीतता है न ? महाबाहु रतिकुमार ! मैं तुम्हारे लिये एक सूचना लायी हूँ, तुम इसे सुनो॥ ३६-३७॥
उपाया मम सख्यास्तु वाक्यं वक्ष्यामि तत्त्वतः।
स्वप्ने तु या त्वया दृष्टा स्त्रीभावं चापि भाविता ॥ ३८॥
'मैं अपनी सखी उषाकी बात ठीक-ठीक बताऊँगी, जिसको आपने सपनेमें देखा और अपनी पत्नी बना लिया॥
बिभर्ति हृदये या त्वामुषया प्रेषिता त्वहम्।
रुदन्ती जृम्भती चैव निःश्वसन्ती मुहुर्मुहुः ॥ ३९॥
'वह आपको ही अपने हृदयमें धारण करती है। उषाके भेजनेपर ही मैं यहाँ आयी हूँ। वह बेचारी बार-बार रोती, अँगड़ाई लेती और लंबी साँस खींचती है॥ ३९॥
त्वद्दर्शनपरा सौम्य कामिनी परितप्यते।
यदि त्वं यास्यसे वीर धारयिष्यति जीवितम् ॥ ४०॥
'सौम्य ! वह आपके दर्शनकी बाट जोहती हुई कामके अधीन हो बड़ा कष्ट पा रही है। वीर ! यदि आप उसके पास जायें और मिलें, तभी वह जीवन धारण कर सकेगी॥ ४०॥
अदर्शनेन मरणं तस्या नास्त्यत्र संशयः।
यदि नारीसहस्रं ते हृदिस्थं यदुनन्दन ॥ ४१॥
स्त्रियाः कामयमानायाः कर्तव्या हस्तधारणा।
विष्णुपर्व ] एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ६८५
'यदि आपका दर्शन उसे नहीं मिला तो उसकी मृत्यु निश्चित है, इसमें कोई संशय नहीं है। यदुनन्दन ! यदि आपके हृदयमें सहस्रों नारियोंने स्थान बना लिया हो तो भी आपको चाहनेवाली एक अनुरक्त स्त्रीका हाथ आपको अवश्य पकड़ना चाहिये ॥ ४१½ ॥'
त्वं च तस्या वरोत्सङ्गे दत्तो देव्या मनोरथः ॥ ४२ ॥ चित्रपट्टं मया दत्तं त्वच्चिह्नं दृश्य जीवति।
'देवी पार्वती ने वरदान देते समय आपका ही उसका मनो-वाञ्छित पति प्रदान किया है; मैंने उसे आपका चित्रपट दिया है। उसीमें आपके चिह्नका अवलोकन करके वह जी रही है ॥'
सानुक्रोशो यदुश्रेष्ठ भव तस्या मनोरथे ॥ ४३ ॥ उषा ते पतते मूर्ध्ना वयं च यदुनन्दन ।
'यदुश्रेष्ठ ! आप उसका मनोरथ पूर्ण करनेके लिये दयालु बनें। यदुनन्दन ! उषा आपके चरणोंमें सिर रखकर प्रणाम करती है। हम सखियाँ भी आपको माथ नवाती हैं ॥४३½॥'
श्रूयतां चोद्भवस्तस्याः कुलशीलं च यादृशम् ॥ ४४ ॥ संस्थानं प्रकृतिं चास्याः पितरं च ब्रवीमि ते ।
'आप उषाकी उत्पत्ति सुन लें। उसका कुल और शील जैसा है, उसे भी जान लें; उसकी आकृति, स्वभाव और पिताका भी परिचय आपको देती हूँ ॥ ४४½ ॥'
वैरोचनिसुतो वीरो बाणो नाम महासुरः ॥ ४५ ॥ स राजा शोणितपुरे तस्य त्वामिच्छते सुता । त्वद्भावगतचित्ता सा तन्मयं चापि जीवितम् ॥ ४६ ॥
'विरोचनकुमार बलिके वीर पुत्र बाण नामक महान् असुर शोणितपुरका राजा है। उसकी पुत्री उषा आपको पति बनाना चाहती है। उसका चित्त सदा आपके ही चिन्तनमें लगा रहता है, उसका जीवन भी आप ही हैं ॥ ४५-४६ ॥'
मनोरथकृतो भर्त्ता देव्या दत्तो न संशयः । त्वत्सङ्गमात् सा सुश्रोणी प्राणान् धारयते शुभा ॥ ४७ ॥
'देवी पार्वती ने आपको ही उसके लिये मनके अनुरूप पति दिया है, इसमें संशय नहीं। सुन्दर कटिप्रदेशवाली शुभलक्षणा उषा आपके समागमकी आशा लेकर ही प्राणोंको धारण करती है' ॥ ४७ ॥
चित्रलेखावचः श्रुत्वा सोऽनिरुद्धोऽब्रवीदिदम् । दृष्टा स्वप्ने मया सा हि तन्मत्तः शृणु शोभन ॥ ४८ ॥ रूपं कान्तिं मतिं चैव संयोगं रुदितं तथा । एवं सर्वमहोरात्रं मुह्यामि परिचिन्तयन् ॥ ४९ ॥
चित्रलेखाकी बात सुनकर अनिरुद्धने उससे इस प्रकार कहा—'शोभने ! मैंने उसे सपनेमें देखा है। उसका परिणाम क्या हुआ ? यह मुझसे सुनो। मैं दिन-रात उसके रूप, कान्ति, मति, संयोगसुख तथा रोदन आदि सभी बातोंका इसी तरह चिन्तन करता हुआ मोहमें पड़ा रहता हूँ ॥ ४८-४९ ॥'
यद्यहं समुपाग्राह्यो यदि सख्यं त्वमिच्छसि । नयस्व चित्रलेखे मां द्रष्टुमिच्छाम्यहं प्रियाम् ॥ ५० ॥
'चित्रलेखे ! यदि मैं तुम्हारे अनुग्रहका पात्र हूँ और यदि तुम मुझसे मैत्री चाहती हो तो मुझे अपने साथ ले चलो। मैं प्राणप्यारी उषाको देखना चाहता हूँ ॥ ५० ॥'
कामसंतापसन्तप्तः प्रियासङ्गमकामतः । एषोऽञ्जलिर्मया बद्धः सत्यं स्वप्नं कुरुष्व मे ॥ ५१ ॥
'मैं कामजनित तापसे संतप्त हूँ; अतः प्रियतमाके सङ्गमकी कामनासे मैंने तुम्हारे सामने यह अञ्जलि बाँध रखी है, मेरे स्वप्नको सत्य कर दिखाओ' ॥ ५१ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा चित्रलेखा वराप्सराः । सफलोऽद्य मम क्लेशः सख्या मे यत् प्रयाचितम् ॥ ५२ ॥
अनिरुद्धकी यह बात सुनकर श्रेष्ठ अप्सरा चित्रलेखा मन-ही-मन यह कहने लगी कि आज मेरा क्लेश उठाना सफल हो गया। मेरी सखीने जो वस्तु माँगी थी, वह मुझे मिल गयी ॥
वैशम्पायन उवाच
ईप्सितं तस्य विज्ञाय अनिरुद्धस्य भामिनी । चित्रलेखा ततस्तुष्टा तथेति च तमब्रवीत् ॥ ५३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! अनिरुद्धका मनोरथ जानकर भामिनी चित्रलेखा बहुत प्रसन्न हुई और बोली, 'अच्छा ऐसा ही करूँगी' ॥ ५३ ॥
हर्म्ये स्त्रीगणमध्यस्थं कृत्वा चान्तर्हितं तदा । उत्पपात गृहीत्वा सा प्राद्युम्निं युद्धदुर्मदम् ॥ ५४ ॥
अट्टालिकामें स्त्रियोंके बीचमें बैठे हुए रणदुर्मद प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्धको अदृश्य करके उन्हें साथ ले चित्रलेखा आकाशमें उड़ चली ॥ ५४ ॥
सा तमध्वानमागम्य सिद्धचारणसेवितम् । सहसा शोणितपुरं प्रविवेश मनोजवा ॥ ५५ ॥
वह मनके समान वेगशालिनी थी। उसने सिद्धों और चारणोंसे सेवित आकाशमार्गमे आकर सहसा शोणितपुरमें प्रवेश किया ॥ ५५ ॥
अदर्शनं तमानीय मायया कामरूपिणी । अनिरुद्धं महाभागा यत्रोषा तत्र गच्छति ॥ ५६ ॥
वह कामरूपिणी अप्सरा अनिरुद्धको मायासे अदृश्य करके जहाँ महाभागा उषा थी, वहाँ गयी ॥ ५६ ॥
उषाया दर्शयच्चैनं चित्राभरणभूषितम् । चित्राम्बरधरं वीरं रहस्यममररूपिणम् ॥ ५७ ॥
वहाँ उसने उषाको एकान्तमें विचित्र आभूषणोंसे विभूषित तथा विचित्र वस्त्रधारी देवतुल्य रूपवाले वीर अनिरुद्धका दर्शन कराया ॥ ५७ ॥
| ६८६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंश |
|---|
तत्रोषा विस्मिता दृष्ट्वा हर्म्यस्था सखिसंनिधौ।
प्रवेशयामास च तं तदा सा स्वगृहं ततः॥ ५८॥
वहाँ अट्टालिकामें सखियोंके समीप बैठी हुई उषा अनि-
रुद्धको देखकर चकित हो उठी। उसने तत्काल उन्हें अपने
महलके भीतर प्रवेश कराया॥ ५८॥
प्रहर्षोत्फुल्लनयना प्रियं दृष्ट्वार्थकोविदा।
सा हर्म्यस्था तमर्घ्येण यादवं समपूजयत्॥ ५९॥
प्रियतमका दर्शन करके उषाके नेत्र हर्षसे खिल उठे।
स्वार्थसाधनमें कुशल उषाने अट्टालिकामें ही स्थित हो
अर्घ्य निवेदन करके यदुकुलनन्दन अनिरुद्धका पूजन किया॥
चित्रलेखां परिष्वज्य प्रियाख्यानैस्तोषयत्।
त्वरिता कामिनी प्राह चित्रलेखां भयातुरा॥ ६०॥
फिर चित्रलेखाको हृदयसे लगाकर प्रिय वचनोंके द्वारा
उसे संतुष्ट किया। इसके बाद कामिनी उषा भयसे व्याकुल
हो तुरंत ही चित्रलेखासे बोली—॥ ६०॥
सखीदं वै कथं कार्यं गुह्यकार्यविशारदे।
गुह्ये कृते भवेत् स्वस्ति प्रकाशे जीवितक्षयः॥ ६१॥
'कार्यसाधनमें कुशल सखि ! इस कार्यको गुप्त कैसे
रखा जाय ? गुप्त रखनेपर ही कल्याण हो सकता है। इसे
प्रकाशित कर देनेपर प्राणोंपर संकट आ सकता है, ॥ ६१॥
चित्रलेखाब्रवीद् वाक्यं शृणु त्वं निश्चयं सखि।
कृतं पुरुषकारेण दैवं नाशयते क्षणात्॥ ६२॥
तब चित्रलेखा बोली—'सखि ! मेरा निश्चय सुनो !
पुरुषार्थद्वारा किये गये कार्यको दैव क्षणभरमें नष्ट कर
देता है॥ ६२॥
यदि देव्याः प्रसादस्ते ह्यनुकूलो भविष्यति।
अद्य मायाकृतं गुह्यं न कश्चिज्ज्ञास्यते नरः॥ ६३॥
'यदि पार्वतीदेवीका कृपाप्रसाद तुम्हारे अनुकूल
होगा तो आज मायाद्वारा छिपाकर किये गये इस गुप्त कार्य-
को कोई नहीं जान सकेगा'॥ ६३॥
सख्या वै एवमुक्ता सा पर्यवस्थितचेतना।
एवमेतदिति प्राह सानिरुद्धमिदं वचः॥ ६४॥
सखीके ऐसा कहनेपर उषाकी चित्तवृत्ति स्थिर हुई।
वह बोली, 'तुम्हारा कहना ठीक है'; फिर उसने अनिरुद्ध-
से कहा--॥ ६४॥
दिष्ट्या स्वप्नगतश्चौरो दृश्यते सुभगः पतिः।
यत्कृते तु वयं खिन्ना दुर्लभप्रियकाङ्क्षया॥ ६५॥
'सौभाग्यकी बात है कि सपनेमें आया हुआ वह चोर
आज सुन्दर पतिके रूपमें प्रत्यक्ष दिखायी देता है; जिसके-
लिये हम सब लोग खिन्न हो रही थीं, दुर्लभ प्रियतमक
आकाङ्क्षा रखनेके कारण भारी चिन्तामें पड़ गयी थीं ॥६५॥
कच्चित् तव महाबाहो कुशलं सर्वतोगतम्।
हृदयं हि मृदु स्त्रीणां तेन पृच्छाम्यहं तव ॥ ६६ ॥
'महाबाहो ! आपके लिये सर्वत्र कुशल तो है न ?
स्त्रियोंका हृदय कोमल होता है, इसलिये मैं आपका कुशल-
समाचार पूछ रही हूँ' ॥ ६६ ॥
तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा उषायाः श्लक्ष्णमर्थवत्।
सोऽप्याह यदुशार्दूलः शुभाक्षरतरं वचः ॥ ६७ ॥
उषाका वह अर्थभरा स्नेहयुक्त वचन सुनकर यदुकुल-
सिंह अनिरुद्ध भी सुन्दर अक्षरोंसे युक्त बात बोले ॥ ६७ ॥
हर्षविप्लुतनेत्रायाः पाणिनाश्रु' प्रमृज्य च।
प्रहस्य सस्मितं प्राह हृदयग्राहकं वचः ॥ ६८॥
पहले उन्होंने अपने हाथसे आनन्दके आँसुओंसे भरे
हुए नेत्रवाली उषाके आँसू पोंछे, फिर हँसकर मुसकराते
हुए वे ऐसी बात बोले, जो चित्तको चुराये लेती थी—॥६८॥
कुशलं मे वरारोहे सर्वत्र मितभाषिणि।
त्वत्प्रसादेन मे देवि प्रियमावेदयामि ते ॥ ६९ ॥
'वरारोहे ! तुम्हारे प्रसादसे मेरे लिये सर्वत्र कुशल है।
बहुत कम बोलनेवाली देवि ! मैं तुम्हें यह प्रिय संवाद
निवेदन करता हूँ ॥ ६९ ॥
अदृष्टपूर्वश्च मया देशोऽयं शुभदर्शने।
निशि स्वप्ने यथा दृष्टः सकृत्कन्यापुरे तथा ॥ ७० ॥
'शुभदर्शने ! यह देश मेरे लिये पहलेका देखा हुआ
नहीं था, केवल एक बार रातको सपनेमें कन्याओंके अन्तः-
पुरमें इसे जैसा देखा था, वैसा ही आज भी यह दिखायी
देता है ॥ ७० ॥
एवमेवमहं भीरु त्वत्प्रसादादिहागतः।
न च तद् रुद्रपत्न्या वै मिथ्या वाक्यं भविष्यति ॥ ७१ ॥
'भीरु ! तुम्हारे प्रसादसे ही मेरा इस प्रकार यहाँ आग-
मन हुआ है। रुद्रपत्नी उमा देवीकी बात कभी मिथ्या नहीं
होगी ॥ ७१ ॥
देव्यास्ते प्रीतिमाज्ञाय त्वत्प्रियार्थं च भामिनि।
अनुप्राप्तोऽस्मि चाद्यैव प्रसीद शरणं गतः ॥ ७२ ॥
'भामिनि ! पार्वतीदेवीका तुमपर बड़ा प्रेम है—यह
जानकर तुम्हारा प्रिय करनेके लिये ही मैं आज यहाँ आया
हूँ। मुझपर प्रसन्न होओ, मैं तुम्हारी शरणमें आया
हूँ, ॥ ७२ ॥
इत्युक्ता त्वरमाणा सा गुह्यदेशे स्वलंकृता।
कान्तेन सह संयुक्ता स्थिता वै भीतभीतवत्॥ ७३॥
| [ विष्णुपर्व ] | एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः | ६८७ |
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अनिरुद्धके ऐसा कहनेपर सुन्दर अलंकारोंसे अलंकृत हुई उषा अपने प्रियतमके साथ संयुक्त हो तुरंत ही गुप्त-स्थानमें जा पहुँची। उस समय वह भयभीत-सी जान पड़ती थी॥ ७३॥
ततश्चोद्वाहधर्मेण गान्धर्वेण समीयुतुः।
अन्योन्यं रमतुस्तौ तु चक्रवाकौ यथा दिवा॥ ७४॥
तदनन्तर वे दोनों गान्धर्व विवाहके नियमसे परस्पर दाम्पत्यभाव स्वीकार करके एक दूसरेसे मिले, जैसे चकवे दिनमें समागम करते हैं, उसी प्रकार उन दोनोंने परस्पर रमण किया॥ ७४॥
पतिना सानिरुद्धेन मुमुदे तु वराङ्गना।
कान्तेन सह संयुक्ता दिव्यवस्त्रानुलेपना॥ ७५॥
दिव्य वस्त्र और अनुलेपन धारण करनेवाली श्रेष्ठ नारी उषा अपने प्रियतम पति अनिरुद्धसे मिलकर बहुत ही प्रसन्न हुई॥ ७५॥
रममाणानिरुद्धेन अविज्ञाता सुता तदा।
तस्मिन्नेव क्षणे प्राप्ते यदूनामृषभो हि सः॥ ७६॥
दिव्यमाल्याम्बरधरो दिव्यस्रगनुलेपनः।
उषया सह संयुक्तो विज्ञातो वाणरक्षिभिः॥ ७७॥
अनिरुद्धके साथ रमण करती हुई अपनी पुत्रीके विषयमें उस समय बाणासुरको कोई समाचार ज्ञात नहीं हुआ। परंतु बाणासुरके द्वारा नियुक्त हुए जो गुप्त पहरेदार थे, उन्होंने उसी क्षण यह जान लिया कि दिव्य माल्य, दिव्य वस्त्र, दिव्य हार और दिव्य अनुलेपन धारण करनेवाले यदुकुलतिलक अनिरुद्धने उषाके साथ समागम किया है॥ ७६-७७॥
ततस्तैश्चारपुरुषैर्वाणस्यावेदितं द्रुतम्।
यथा दृष्टमशेषेण कन्यायास्तदतिक्रमम्॥ ७८॥
तब उन गुप्तचरोंने कन्याका अपराध जिस तरह देखा था, वह सब शीघ्र ही बाणासुरको निवेदन कर दिया॥ ७८॥
ततः किङ्करसैन्यं तु व्यादिष्टं भीमकर्मणा।
बलेः पुत्रेण वीरेण बाणेनामित्रघातिना॥ ७९॥
तब भयानक कर्म करनेवाले शत्रुघाती बलिपुत्र वीर बाणासुरने किङ्करोंकी सेनाको आदेश दिया—॥ ७९॥
गच्छध्वं सहिताः सर्वे हन्यतामेव दुर्मतिः।
येन नः कुलचारित्रं दूषितं दूषितात्मना॥ ८०॥
'सैनिको ! तुम सब लोग एक साथ जाओ और उस दुर्बुद्धि मनुष्यको मार डालो, जिसने अपने हृदयको तो दूषित कर ही लिया था, हमारे कुलके सदाचारको भी कलङ्कित कर दिया॥ ८०॥
उषायां धर्षितायां हि कुलं नो धर्षितं महत्।
असम्प्रदत्तां योऽस्माभिः स्वयंग्राहमधर्षयत्॥ ८१॥
'उषाके कलङ्कित हो जानेसे हमारा महान् कुल कलङ्कित हो गया। इस दुष्ट मनुष्यने हमारे दिये बिना ही स्वयं उषाको ग्रहण कर लिया और उसकी पवित्रता नष्ट कर दी॥ ८१॥
अहो वीर्यमहो धैर्यमहो धाष्टर्यं च दुर्मतेः।
यः पुरं भवनं चेदं प्रविष्टो नः स बालिशः॥ ८२॥
'अहो! इस दुष्ट बुद्धिवाले पुरुषका पराक्रम अद्भुत है, धैर्य और धृष्टता भी अद्भुत है, जिससे यह नादान न केवल हमारे नगरमें अपितु हमारे इस घरमें भी घुस आया'॥
एवमुक्त्वा पुनस्तांस्तु किङ्करांश्चोदयद् भृशम्।
ते तस्याज्ञामथो गृह्य सुसंनद्धा विनिर्ययुः॥ ८३॥
यत्रानिरुद्धो ह्यभवत् तत्रागच्छन् महाबलाः॥ ८४॥
ऐसा कहकर बाणासुरने पुनः किंकरोंको विशेषरूपसे प्रेरित किया। उसकी आज्ञा पाकर वे कवच आदिसे सुसज्जित हो युद्धके लिये निकल पड़े। वे सब-के-सब बड़े बलवान् थे; अतः जहाँ अनिरुद्ध थे, वहाँ बेखटके जा पहुँचे॥
नानाशस्त्रोद्यतकरा नानारूपा भयंकराः।
दानवाः समभिक्रुद्धाः प्राद्युम्निवधकांक्षिणः॥ ८५॥
उनके हाथोंमें नाना प्रकारके शस्त्र उठे हुए थे, उनके रूप अनेक प्रकारके थे, वे भय उत्पन्न करनेवाले दानव अनिरुद्धके वधकी इच्छासे अत्यन्त कुपित हो उठे॥ ८५॥
रुरोद तद्द्बलं दृष्ट्वा वाष्पेणावृतलोचना।
प्राद्युम्निवधभीता सा बाणपुत्री यशस्विनी॥ ८६॥
किङ्करोंकी उस सेनाको देखकर यशस्विनी बाणपुत्री उषाके नेत्रोंमें आँसू भर आये। वह अनिरुद्धके मारे जानेके भयसे भीत हो रोने लगी॥ ८६॥
ततस्तु रुदतीं दृष्ट्वा तामूषां मृगलोचनाम्।
हा हा कान्तेति वेपन्तीमनिरुद्धोऽभ्यभाषत॥ ८७॥
वह 'हा प्रियतम ! हा प्राणनाथ !' कहकर काँप रही थी। मृगनयनी उषाको रोती देख अनिरुद्धने उससे कहा—॥८७॥
अभयं तेऽस्तु सुश्रोणि मा भैस्त्वं हि मयि स्थिते।
सम्प्राप्तो हर्षकालस्ते नेहास्ति भयकारणम्॥ ८८॥
'सुश्रोणि ! तुम्हे भय नहीं होना चाहिये। मेरे रहते हुए तुम डरो मत। यह तो तुम्हारे लिये हर्षका समय आया है। इसमें भयका कोई कारण नहीं है॥ ८८॥
कृत्स्नोऽयं यदि बाणस्य भृत्यवर्गो यशस्विनि।
आगच्छति न मे चिन्ता भीरु पश्याद्य विक्रमम्॥ ८९॥
'यशस्विनि! यदि बाणासुरका सारा सेवकसमुदाय आ
६८८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे जाय तो भी मेरे लिये चिन्ताकी बात नहीं है । भीरु ! तुम आज मेरा पराक्रम देखो' ॥ ८९ ॥ तस्य सैन्यस्य निनदं श्रुत्वाभ्यागच्छतस्ततः । सहसैवोत्थितः श्रीमान् प्रद्युम्निः किमिति ब्रुवन् ॥ ९०॥ अपनी ओर आती हुई उस सेनाका कोलाहल सुनकर प्रद्युम्नकुमार श्रीमान् अनिरुद्ध 'यह क्या है ?' ऐसा कहते हुए सहसा उठकर खड़े हो गये ॥ ९० ॥ अथ सोऽपश्यत बलं नानाप्रहरणोद्यतम् । स्थितं समन्ततस्तत्र परिवार्य गृहं महत् ॥ ९१ ॥ तदनन्तर उन्होंने देखा कि उस विशाल गृहको चारों ओरसे घेरकर नाना प्रकारके आयुधोंसे सुसज्जित हुई सेना खड़ी है ॥ ९१ ॥ ततोऽभ्यगच्छत् त्वरितो यत्र तद्वेष्टितं बलम् । क्रुद्धः स्वबलमास्थाय अदशद् दशनच्छदम् ॥ ९२ ॥ तब वे तुरंत ही कुपित हो अपने बलका भरोसा करके उस स्थानकी ओर चल दिये, जहाँ वह सेना घेरा डालकर खड़ी थी । उस समय उन्होंने अपने ओठको दाँतों तले दबा लिया था ॥ ९२ ॥ ततो योद्धमपोढानां बाणेयानां निशम्य तु । सा चित्रलेखास्मरत नारदं देवदर्शनम् ॥ ९३ ॥ इतनेमें ही बाणासुरके सैनिकोंको युद्धके लिये उपस्थित देख चित्रलेखाने देवदर्शी नारदजीका स्मरण किया ॥ ९३ ॥ ततो निमेषमात्रेण सम्प्राप्तो मुनिपुङ्गवः । स्मृतोऽथ चित्रलेखायाः पुरं शोणितसाह्वयम् ॥ ९४ ॥ फिर तो चित्रलेखाके स्मरण करनेपर मुनिवर नारदजी पलक मारते-मारते शोणितपुरमें आ पहुँचे ॥ ९४ ॥ अन्तरिक्षे स्थितस्तत्र सोऽनिरुद्धमथाब्रवीत् । मा भयं स्वस्ति ते वीर प्राप्तोऽस्म्यद्य पुरं तव ॥ ९५ ॥ वहाँ आकाशमें स्थित होकर उन्होंने अनिरुद्धसे कहा— 'वीर ! तुम्हारा कल्याण हो । तुम डरना मत । मैं भी अब तुम्हारे नगरमें आ पहुँचा हूँ' ॥ ९५ ॥ ततश्च नारदं दृष्ट्वा सोऽभिवाद्य महाबलः । प्रहृष्टमानसो भूत्वा युद्धार्थमभिवर्तत ॥ ९६ ॥ नारदजीको उपस्थित देख महाबली अनिरुद्धने उन्हें प्रणाम किया और प्रसन्नचित्त होकर वे युद्धके लिये तैयार हो गये ॥ ९६ ॥ ततस्तेषां स्वनं श्रुत्वा सर्वेषामेव गर्जताम् । सहसैवोत्थितः शूरस्तोत्रार्दित इव द्विपः ॥ ९७ ॥ उस समय गर्जना करते हुए उन सभी सैनिकोंका कोला- हल सुनकर शूरवीर अनिरुद्ध अङ्कुशसे पीड़ित हुए हाथीकी भाँति सहसा उठकर चल दिये ॥ ९७ ॥ तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य संदष्टौष्ठं महाभुजम् । प्रासादाच्चावरोहन्तं भयार्ता विप्रदुद्रुवुः ॥ ९८ ॥ ओठको दाँतोंसे दबाकर महलसे उतरते और अपनी ओर आते हुए महाबाहु अनिरुद्धको देखकर कितने ही सैनिक भयसे व्याकुल होकर भाग खड़े हुए ॥ ९८ ॥ अन्तःपुरद्वारगतं परिघं गृह्य चातुलम् । वधाय तेषां चिक्षेप नानायुद्धविशारदः ॥ ९९ ॥ अन्तःपुरके द्वारपर रखे हुए अनुपम परिघको हाथमें लेकर नाना प्रकारके युद्धोंमें कुशल अनिरुद्धने उन सैनिकोंके वधके लिये उसे चलाया ॥ ९९ ॥ ते सर्वे बाणवर्षेण गदाभिर्मुशलैस्तथा । असिभिः शक्तिभिः शूलैर्निजघ्नु रणगोचरे ॥ १००॥ तब वे समस्त सैनिक रणभूमिमें दिखायी देनेवाले अनिरुद्धपर बाण, गदा, मूसल, खड्ग, शक्ति और शूलोंद्वारा प्रहार करने लगे ॥ १०० ॥ स हन्यमानो नाराचैः परिघैश्च समन्ततः । दानवैः समभिक्रुद्धैः प्रद्युम्निः शस्त्रकोविदैः ॥१०१॥ नाक्षुभ्यत् सर्वभूतात्मा नदन् मेघ इवोष्णगे । आविध्य परिघं घोरं तेषां मध्ये व्यतिष्ठत । सूर्यो दिवि चरन् मध्ये मेघानामिव सर्वशः ॥१०२॥ क्रोधमें भरे हुए शस्त्रकुशल दानवोंद्वारा चारों ओरसे नाराचों और परिघोंका प्रहार होनेपर भी प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्ध क्षुब्ध नहीं हुए; क्योंकि वे सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा हैं । वे वर्षाकालके मेघकी भाँति गर्जना करते और भयंकर परिघ घुमाते हुए उन शत्रुओंके बीचमें खड़े हो गये । मानो आकाशमें मेघमण्डलीके भीतर सब ओर विचरते हुए सूर्य शोभा पा रहे हों ॥ १०१-१०२ ॥ दण्डकृष्णाजिनधरो नारदो हृष्टमानसः । साधु साध्विति वै तत्र सोऽनिरुद्धमभाषत ॥१०३॥ उस समय दण्ड और काला मृगचर्म धारण करनेवाले नारदजी मनमें हर्ष भरकर अनिरुद्धसे बोले—'वीर ! बहुत अच्छा ! बहुत अच्छा !!' ॥ १०३ ॥ ते हन्यमाना रौद्रेण परिघेणामितौजसा । प्राद्रवन्त भयात् सर्वे मेघा वातेरिता यथा ॥१०४॥ उस अमित ओजवाले भयंकर परिघकी मार खाकर वे समस्त सैनिक भयसे भाग खड़े हुए । मानो हवाके वेगसे बादल छिन्न-भिन्न हो गये हों ॥ १०४ ॥ विद्राव्य दानवान् वीरः परिघेण सुविक्रमः । अनिरुद्धो रणे हृष्टः सिंहनादं ननाद च ॥१०५॥
विष्णुपर्व ] एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः [ ६८९
उत्तम पराक्रमी वीर अनिरुद्ध अपने परिघकी मारसे दानवोंको भगाकर रणभूमिमें बड़े हर्षके साथ सिंहनाद करने लगे ॥ १०५ ॥
घर्मान्ते तोयदो व्योम्नि नदन्निव महास्वनः ।
तिष्ठध्वमिति चुक्रोश दानवान् युद्धदुर्मदान् ॥ १०६॥
प्राद्युम्निर्व्यहनञ्चापि सर्व्वाञ्छत्रुनिवर्हणः ।
जैसे वर्षाकालमें आकाशके भीतर छाये हुए मेघ बड़े जोर-जोरसे गर्जना करते हैं, उसी प्रकार शत्रुसूदन प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्धने गर्जना करके उन रणदुर्मद दानवोंसे चिल्लाकर कहा—'अरे ! खड़े रहो।' साथ ही उन्होंने सबका संहार आरम्भ कर दिया ॥ १०६½ ॥
तेन ते समरे सर्वे हन्यमाना महात्मना ॥ १०७॥
यतो बाणस्ततो भीता ययुर्युद्धपराङ्मुखाः ।
उन महामनस्वी वीरके द्वारा समराङ्गणमें मारे जाते हुए वे समस्त सैनिक युद्धसे विमुख हो गये और भयभीत होकर उस स्थानपर गये, जहाँ बाणासुर विद्यमान था ॥ १०७½ ॥
ततो बाणसमीपस्थाः श्वसन्तो रुधिरोक्षिताः ॥ १०८॥
न शर्म लेभिरे दैत्या भयविप्लवचेतसः ।
बाणासुरके समीप खड़े होकर वे सभी दानव लंबी साँस खींचने लगे; उन सबके शरीर रक्तसे रँग गये थे; भयके कारण उनका चित्त व्याकुल हो गया था, अतः उन दैत्योंको चैन नहीं मिलता था ॥ १०८½ ॥
मा भैष्ट मा भैष्ट इति राज्ञा ते तेन चोदिताः ॥ १०९॥
त्रासमुत्सृज्य चैकस्था युध्यध्वं दानवर्षभाः ।
तब राजा बाणासुरने उन्हें आदेश देते हुए कहा—'दानवशिरोमणियो ! डरो मत ! डरो मत !! त्रास छोड़ एक साथ खड़े होकर युद्ध करो' ॥ १०९½ ॥
तानुवाच पुनर्बाणो भयविह्वललोचनान् ॥ ११०॥
किमिदं लोकविख्यातं यश उत्सृज्य दूरतः ।
भवन्तो यान्ति वैक्लव्यं क्लीबा इव विचेतसः ॥ १११॥
उसके इतना कहनेपर भी उनकी आँखें भयसे व्याकुल ही बनी रहीं यह देख बाणासुरने पुनः उनसे कहा—'यह क्या बात है कि तुमलोग अपने विश्वविख्यात यशको दूरसे ही त्यागकर कायरोंके समान व्याकुल और अचेत हो रहे हो ? ॥
कोऽयं यस्य भयत्रस्ता भवन्तो यान्त्यनेकंशः ।
कुलापदेशिनः सर्वे नानायुद्धविशारदाः ॥ ११२॥
'यह कौन है, जिसके भयसे डरकर, तुमलोग झुंड-के-झुंड भागे जा रहे हो। तुम सब लोगोंका कुल विख्यात है तथा तुम नाना प्रकारके युद्धोंकी कलामें निपुण हो (तो भी तुममें यह कायरता कैसे आयी ?) ॥ ११२ ॥
भवद्भिर्न हि मे कार्यं युद्धसाहाय्यमद्य वै।
अब्रवीद् ध्वंसतेत्येवं मत्समीपाच्च नश्यत ॥ ११३॥
'अच्छा, भाग जाओ ! अब तुमलोगोंसे मुझे युद्धविषयक सहायता नहीं लेनी है, मेरे पाससे दूर हो जाओ' ॥ ११३ ॥
अथ तान् वाग्भिरुग्राभित्रासयन् बहुधा बली।
व्यादिदेश रणे शूरानन्यानयुतशः पुनः ॥ ११४॥
इस प्रकार बलवान् बाणासुरने अपने कठोर वचनोंद्वारा उनको बारंबार त्रास देते हुए दूसरे रणवीर योद्धाओंको, जिनकी संख्या दस हजारके लगभग थी, पुनः युद्धके लिये आज्ञा दी ॥ ११४ ॥
प्रमाथगणभूयिष्ठं व्यादिष्टं तस्य निग्रहे ।
अनीकं सुमहद्रौद्रं नानाप्रहरणोद्यतम् ॥ ११५॥
तत्पश्चात् उसने अनिरुद्धको बंदी बनानेके लिये एक महाभयंकर सेनाको आदेश दिया, जिसमें अधिकांश प्रमथगण थे। वह सेना नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित थी ॥
अथान्तरिक्षं बहुधा विद्युत्वद्भिरिवाम्बुदैः ।
बाणानीकैः समभवद् व्याप्तं संदीप्तलोचनैः ॥ ११६॥
फिर तो बिजलीवाले मेघोंकी भाँति चमकीले नेत्रोंवाले बाणासुरके सैनिकोंसे आकाशका बहुत बड़ा भाग व्याप्त हो गया ॥ ११६ ॥
केचित् क्षितिस्थाः प्राक्रोशन् गजा इव समन्ततः ।
अन्तरिक्षे व्यराजन्त घर्मान्त इव तोयदाः ॥ ११७॥
कुछ सैनिक पृथिवीपर ही खड़े हो सब ओर हाथियोंकी भाँति चिग्घाड़ रहे थे तथा कुछ लोग वर्षाकालके बादलोंकी भाँति आकाशमें ही शोभा पाते थे ॥ ११७ ॥
ततस्तत् सुमहत् सैन्यं समेतमभवत् पुनः ।
तिष्ठ तिष्ठेति च तदा वाचोऽश्रूयन्त सर्वशः ॥ ११८॥
तदनन्तर वह विशाल सेना फिर एकत्र हो गयी। उस समय उसमें सब ओर 'ठहरो, खड़े रहो' ये ही बातें सुनायी देती थीं ॥ ११८ ॥
अनिरुद्धो रणे वीरः स च तानभ्यवर्तत ।
तदाश्चर्यं समभवद् यदेकस्तु समागतः ॥ ११९॥
वीर अनिरुद्ध अकेले ही उन सबका सामना कर रहे थे। एकने ही जो उस विशाल सेनाका सामना किया, यह उस समय एक महान् आश्चर्यकी बात हुई ॥ ११९ ॥
अयुध्यत महावीर्यैर्दानवैः सह संयुगे ।
तेषामेव च जग्राह परिघांस्तोमरानपि ॥ १२०॥
वे रणभूमिमें उन महापराक्रमी दानवोंके साथ युद्ध करने लगे। उन्होंने शत्रुओंके ही परिघों तथा तोमरोंको ले लिया ॥ १२० ॥
| ६९० | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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तैरेव च तदा युद्धे ताञ्जघान महाबलः।
पुनः परिघमुत्सृज्य प्रगृह्य रणमूर्धनि ॥१२१॥
उन महाबली वीरने उन्हीं परिघोंद्वारा उस समय युद्धमें उन शत्रुओंका संहार किया। वे युद्धके मुहानेपर बारंबार परिघको छोड़ते और ग्रहण करते थे ॥ १२१ ॥
स तेन विचरन् मार्गानैकः शत्रुनिबर्हणः।
भ्रान्तमुद्भ्रान्तमाविद्धमाप्लुतं विप्लुतं प्लुतम् ॥१२२॥
इति प्रकाराद् द्वात्रिंशद् विचरन्नाभ्यदृश्यत।
शत्रुसूदन अनिरुद्ध उस परिघसे अनेक पैंतरे दिखाते हुए युद्धमें अकेले ही विचरते थे। वे भ्रान्त, उद्भ्रान्त, आविद्ध, आप्लुत, विप्लुत और प्लुत आदि बत्तीस प्रकारके पैंतरोंसे विचरते हुए दिखायी दिये ॥ १२२ १/२॥
एकं सहस्रशश्चात्र ददृशू रणमूर्धनि ॥१२३॥
क्रीडन्तं बहुधा युद्धे व्यादितास्यमिवान्तकम्।
रणभूमिमें युद्धके मुहानेपर मुँह बाये हुए कालके समान अनेक प्रकारसे परिघ चलानेकी क्रीडा करते हुए एक ही अनिरुद्धको शत्रुओंने सहस्रोंकी संख्यामें देखा ॥ १२३ १/२ ॥
ततस्तेनाभिसंतप्ता रुधिरौघपरिप्लुताः ॥१२४॥
पुनर्भग्नाः प्राद्रवन्त यत्र बाणो व्यवस्थितः।
उस समय उनसे संतप्त हो रक्तके प्रवाहमें डूबे हुए दानव फिर अपना व्यूह भग्न करके भाग खड़े हुए और जहाँ बाणासुर खड़ा था, वहाँ जा पहुँचे ॥ १२४ १/२ ॥
गजत्राजिरथौघैस्ते चोद्यमानाः समन्ततः ॥१२५॥
कृत्वा चार्तस्वरं घोरं दिशो जग्मुर्हतौजसः।
हाथी, घोड़े तथा रथसमूह उन्हें चारों ओर लिये जा रहे थे। वे हतोत्साह दानव घोर आर्त्तनाद करके सम्पूर्ण दिशाओंमें भागे जा रहे थे ॥ १२५ १/२ ॥
एकैकस्योपरि तदा तेऽन्योन्यं भयपीडिताः ॥१२६॥
वमन्तः शोणितं जग्मुर्विषादाद् विमुखा रणे।
वे उस समय भयसे पीड़ित हो भागते समय परस्पर एक-एकके ऊपर चढ़ जाते थे तथा अधिक खेदके कारण युद्धसे विमुख हो रक्त वमन करते हुए पलायन कर रहे थे ॥
न बभूव पुरा देवैर्युध्यतां तादृशं भयम् ॥१२७॥
यादृशं युध्यमानानामनिरुद्धेन संयुगे।
पूर्वकालमें देवताओंके साथ युद्ध करते समय भी उन दानवोंको वैसा भय नहीं हुआ था, जैसा समराङ्गणमें अनिरुद्धके साथ युद्ध करते समय हुआ था १२७ १/२ ॥
केचिद् वमन्तो रुधिरं ह्यपतन् वसुधातले ॥१२८॥
दानवा गिरिशृङ्गाभा गदाशूलासिपाणयः।
कितने ही पर्वत-शिखरके समान विशालकाय दानव हाथोंमें गदा, शूल और तलवार लिये रक्त वमन करते हुए पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ १२८ १/२ ॥
ते बाणमुत्सृज्य रणे जग्मुर्भयसमाकुलाः ॥१२९॥
विशालमाकाशतलं दानवा निर्जितास्तदा।
उस समय रणभूमिमें पराजित हुए दानव भयसे व्याकुल हो बाणासुरको वहीं छोड़कर विशाल आकाशमें भाग गये ॥
निःशेषभग्नां महतीं दृष्ट्वा तां वाहिनीं तदा ॥१३०॥
बाणः क्रोधात्प्रजज्वाल समिद्धोऽग्निरिवाध्वरे।
जैसे यज्ञमें समिधा पाकर अग्नि प्रज्वलित हो उठती है, उसी प्रकार उस समय अपनी विशाल सेनाको पूर्णरूपसे भग्न हुई देख बाणासुर क्रोधसे जल उठा ॥ १३० १/२ ॥
अन्तरिक्षचरो भूत्वा साधुवादी समन्ततः ॥१३१॥
नारदो नृत्यति प्रीतो ह्यनिरुद्धस्य संयुगे।
इधर युद्धमें अनिरुद्धके पराक्रमसे प्रसन्न हुए नारदजी आकाशमें सब ओर विचरते और उन्हें साधुवाद देते हुए नृत्य करने लगे ॥ १३१ १/२ ॥
एतस्मिन्नन्तरे चैव बाणः परमकोपनः ॥१३२॥
कुम्भाण्डसंगृहीतं तु रथमास्थाय वीर्यवान्।
ययौ यत्रानिरुद्धो वै उद्यतासी रथे स्थितः ॥१३३॥
इसी बीचमें अत्यन्त क्रोधी और बलवान् बाणासुर कुम्भाण्डद्वारा नियन्त्रित रथपर आरूढ़ हो उसी रथपर
१. तलवार या परिघको गोलाकार घुमाना भ्रान्त कहलाता है, इससे शत्रुके प्रहारको निष्फल किया जाता है।
२. तलवार या परिघ चलानेका दूसरा पैंतरा--जिसमें हाथको ऊँचा करके उसे घुमाया जाता है।
३. तलवार या परिघ चलानेके बत्तीस हाथोंमेंसे एक, जिसमें तलवार या परिघको अपने चारों ओर घुमाकर दूसरेके चलाये हुए वारको व्यर्थ या खाली करते हैं।
४. सब ओर घूम-घूमकर उछलते हुए परिघ या तलवारको चलाना।
५. विशिष्ट रूपसे परिघका सञ्चालन करके शत्रु-सेनामें विप्लव मचा देना।
६. सामान्यतः कूद-कूदकर शत्रुके सम्मुख परिघ या तलवारको चलाना।
७. तलवार या परिघ चलानेके बत्तीस हाथ गिनाये गये हैं, जिनके नाम ये हैं—भ्रान्त, उद्भ्रान्त, आविद्ध, आप्लुत, विप्लुत, प्लुत, सृत, संचान्त, समुदीर्ण, निग्रह, प्रग्रह, पदावकर्षण, संधान, मस्तक आमण, भुजत्राणण, पाश, पाद, विबन्ध, भूमि, उद्भ्रमण, गति, प्रत्यागति, आक्षेप, पातन, उत्थानकप्लुति, लघुता, सौष्ठव, क्षोभा, स्थेय, दृढमुष्टिता, तिर्यक्प्रचार और ऊर्ध्वप्रचार ।
विष्णुपर्व ] एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ६५१
बैठा हुआ उस स्थानपर गया, जहाँ अनिरुद्ध तलवार हाथमें लिये खड़े थे ॥ १३२-१३३ ॥
पट्टिशासिगदाशूलमुद्यम्य च परश्वधान् ।
बभौ बाहुसहस्रेण शक्रो ध्वजशतैरिव ॥ १३४॥
बद्धगोधाङ्गुलित्रैश्च बाहुभिः स महाभुजः।
नानाप्रहरणोपेतः शुशुभे दानवोत्तमः ॥१३५॥
बाणासुर अपनी सहस्र भुजाओंसे पट्टिश, खड्ग, गदा, शूल और फरसे उठा सैकड़ों ध्वजोंसे युक्त देवराज इन्द्रके समान शोभा पाता था। जिनकी अँगुलियोंमें गोधाचर्मके दस्ताने बँधे हुए थे, उन भुजाओंसे नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लिये वह महाबाहु दानवराज बड़ी शोभा पा रहा था ॥
सिंहनादं नदन् क्रुद्धो विस्फारितमहाधनुः।
अब्रवीत् तिष्ठ तिष्ठेति क्रोधसंरक्तलोचनः ॥१३६॥
उसके नेत्र क्रोधसे लाल हो रहे थे; वह क्रोधमें भरकर सिंहके समान दहाड़ता और अपने विशाल धनुषको खींचता हुआ बोला—'अरे खड़ा रह ! खड़ा रह !!' ॥ १३६ ॥
वचनं तस्य संश्रुत्य प्रद्युम्निरपराजितः ।
बाणस्य वदनं संख्ये समुद्वीक्ष्य ततोऽहसत् ॥१३७॥
बाणासुरकी बात सुनकर और युद्धस्थलमें उसके मुखपर दृष्टि डालकर अपराजित वीर प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्ध हँसने लगे ॥ १३७ ॥
किङ्किणीशतनिर्घोषं रक्तध्वजपताकिनम्।
ऋष्यचर्मावनद्धाङ्गं दशनल्वं महारथम् ॥१३८॥
बाणासुरका विशाल रथ दस नल्व ( चार हजार हाथ ) के बराबर था; उसमें सैकड़ों छोटी-छोटी घंटियाँ लगी थीं; जिनकी ध्वनि सब ओर गूँजती रहती थी; उस रथकी ध्वजा-पताकाएँ लाल रङ्गकी थीं तथा उस रथके प्रत्येक अवयवपर ऋष्यनामक मृगविशेषका चमड़ा मढ़ा हुआ था ॥ १३८ ॥
तस्य वाजसहस्रं तु रथे युक्तं महात्मनः।
पुरा देवासुरे युद्धे हिरण्यकशिपोरिव ॥१३९॥
उस महाकाय दानवके रथमें एक सहस्र घोड़े जुते हुए थे; ठीक उसी तरह जैसे पूर्वकालमें देवासुर संग्रामके अवसरपर हिरण्यकशिपुके रथमें जोते गये थे ॥ १३९ ॥
तमापतन्तं ददृशे दानवं यदुपुङ्गवः।
सम्पहृष्टस्ततो युद्धे तेजसा चाप्यपूर्यत ॥१४०॥
यदुकुलतिलक अनिरुद्धने जब उस दानवको आक्रमण करते देखा; तब वे युद्धके लिये हर्ष और उत्साहसे भर गये तथा महान् तेजसे सम्पन्न हो गये ॥ १४० ॥
असिचर्मधरो वीरः स्वस्थः संग्रामलालसः ।
नरसिंहो यथा पूर्वमादिदैत्यवधोद्यतः ॥१४१॥
जैसे पूर्वकालमें आदिदैत्य हिरण्यकशिपुका वध करनेके लिये उद्यत हुए भगवान् नरसिंह शोभा पाते थे, उसी प्रकार संग्रामकी लालसासे ढाल और तलवार धारण किये स्वस्थभावसे खड़े हुए वीर अनिरुद्ध सुशोभित होते थे ॥ १४१ ॥
आपतन्तं ददर्शार्थ खड्गचर्मधरं तदा।
खड्गचर्मधरं तं तु दृष्ट्वा बाणः पदातिनम् ॥१४२॥
प्रहर्षमतुलं लेभे प्रद्युम्निवधकाङ्क्षया।
उस समय बाणासुरने अनिरुद्धको ढाल और तलवार लिये अपने सामने आते देखा। उन्हें केवल ढाल और तलवार धारण किये पैदल आते देख उन्हें मार डालनेकी इच्छासे बाणासुरको अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ ॥ १४२½ ॥
तनुत्रेण विहीनश्च खड्गपाणिश्च यादवः ॥१४३॥
अजेय इति तं मत्वा युद्धायाभिमुखः स्थितः ।
कवचसे रहित तथा केवल खड्ग हाथमें लिये होनेपर भी यादववीर अनिरुद्ध बाणासुरको 'यह अजेय है' ऐसा मानते हुए भी निःशङ्क हो उसके सामने युद्धके लिये खड़े हुए ॥ १४३½ ॥
अनिरुद्धं रणे बाणो जितकाशी महाबलः ॥१४४॥
वाचं चोवाच संक्रुद्धो गृह्यतां हन्यतामिति ।
विजयसे सुशोभित होनेवाला महाबली बाणासुर कुपित हो रणभूमिमें अनिरुद्धसे बोला—'इसे पकड़ो, मारो' ॥
वाचं च ब्रुवतस्तस्य श्रुत्वा प्रद्युम्निराहवे ॥१४५॥
बाणस्य ब्रुवतः क्रोधाद्धसमानोऽभ्युदैक्षत ।
उस समराङ्गणमें इस तरह बोलते हुए बाणासुरकी बात सुनकर हँसते हुए प्रद्युम्नकुमारने क्रोधपूर्वक उसकी ओर देखा॥
उषां भयपरित्रस्तां रुदतीं तत्र भामिनीम् ॥१४६॥
अनिरुद्धः प्रहस्याथ समाश्वास्य च तां स्थितः ।
वहाँ भयसे संत्रस्त हो रोती हुई भामिनी उषाको सान्त्वना देकर अनिरुद्ध हँसते हुए युद्धके लिये खड़े हो गये॥
अथ बाणः शरौघाणां क्षुद्रकाणां समन्ततः ॥१४७॥
विक्षेप समरे क्रुद्धो ह्यनिरुद्धवधेप्सया ।
अनिरुद्धस्तु चिच्छेद काङ्क्षंस्तस्य पराजयम् ॥ १४८॥
तदनन्तर समरभूमिमें कुपित हुए बाणासुरने अनिरुद्धके वधकी इच्छासे उनपर चारों ओरसे क्षुद्रक नामक बाणसमूहोंका प्रहार आरम्भ किया। किंतु अनिरुद्धने उसे पराजित करनेकी इच्छा रखकर उसके सारे बाणोंको तलवारसे ही काट डाला॥
ववर्ष शरजालानि क्षुद्रकाणां समन्ततः ।
बाणोऽनिरुद्धशिरसि काङ्क्षंस्तस्य रणे वधम् ॥१४९॥
तब बाणासुरने पुनः रणभूमिमें अनिरुद्धके वधकी
६५२ -श्रीमहाभारते खिलभागे- [ हरिवंशे अभिलाषासे उनके सिरपर सब ओरसे क्षुद्रक नामवाले दान- हरसेको काट दिया और युद्धके मुहानेपर तलवारसे ही उसके समूहोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ १४९ ॥ घोड़ोंको मार डाला ॥ १५७ ॥ ततो बाणसहस्राणि चर्मणा व्यवधूय सः । तं पुनः शरवर्षेण पट्टिशैस्तोमरैरपि । बभौ प्रमुखतस्तस्य स्थितः सूर्य इवोदये ॥१५०॥ चकाराऽन्तर्हितं बाणो युद्धमार्गविशारदः ॥१५८॥ उस समय उसके हजारों बाणोंको ढालसे ही इधर-उधर तब युद्धमार्गके ज्ञानमें निपुण बाणासुरने पुनः पट्टिशों, करके अनिरुद्ध उसके सामने खड़े हो उदयकालके सूर्यकी तोमरों और बाणोंकी वर्षा करके अनिरुद्धको ढँक दिया ॥ भाँति शोभा पाने लगे ॥ १५० ॥ हतोऽयमिति विज्ञाय प्राणदन् नैर्ऋता गणाः । सोऽभिभूय रणे बाणमास्थितो यदुनन्दनः । ततोऽवप्लुत्य सहसा रथपार्श्वे व्यवस्थितः ॥१५९॥ सिंहः प्रमुखतो दृष्ट्वा गजमेकं यथा वने ॥१५१॥ अब यह मारा गया ऐसा जानकर वे दैत्य गर्जना करने रणभूमिमें बाणासुरका तिरस्कार करके यदुनन्दन लगे; इतनेमें ही अनिरुद्ध सहसा कूदकर रथके पार्श्वभागमें अनिरुद्ध उसी तरह निर्भय खड़े रहे, जैसे वनमें सिंह अपने खड़े हो गये ॥ १५९ ॥ सामने एक हाथीको देखकर निर्भय खड़ा रहता है ॥ १५१॥ शक्तिं वाणस्ततः क्रुद्धो घोररूपां भयानकाम् । ततो वाणः स बाणौघैर्मर्मभेदिभिराशुगैः । जग्राह ज्वलितां घोरां घण्टामालाकुलां रणे ॥१६०॥ विव्याध निशितैस्तीक्ष्णैः प्रद्युम्निमपराजितम् ॥१५२॥ ज्वलनादित्यसंकाशां यमदण्डोग्रदर्शनाम् । तदनन्तर बाणासुरने अपराजित वीर प्रद्युम्नकुमारको प्राहिणोत् तामसङ्गेन महोल्कां ज्वलितामिव ॥१६१॥ मर्मभेदी, शीघ्रगामी, तेज किये हुए, पैने बाणसमूहोंद्वारा तब कुपित हुए बाणासुरने रणभूमिमें एक घोर एवं घायल कर दिया ॥ १५२ ॥ भयानक शक्ति हाथमें ली, जो अग्निके समान प्रज्वलित हो समाहतस्ततो बाणैः खड्गचर्मधरोऽपतत् । रही थी; वह घोर शक्ति घंटाओंकी मालाओंसे व्याप्त थी। तमापतन्तं निशितैरभ्यहन् सायकैस्तथा ॥१५३॥ उसका तेज अग्नि और सूर्यके समान जान पड़ता था तथा उन बाणोंसे घायल होनेपर अनिरुद्ध ढाल और तलवार वह यमदण्डके समान भयानक दिखायी देती थी; उस दैत्यने लिये बाणासुरपर टूट पड़े । उन्हें आक्रमण करते देख उस निर्भय होकर जलती हुई उल्काके समान वह शक्ति अनिरुद्ध- असुरने तीखे सायकोंसे उनपर और भी चोट की ॥ १५३ ॥ पर चला दी ॥ १६०-१६१ ॥ सोऽतिविद्धो महाबाहुर्बाणैः संनतपर्वभिः । तामापतन्तीं सम्प्रेक्ष्य जीवितान्तकरीं तदा । क्रोधेनाभिप्रजज्वाल चिकीर्षुः कर्म दुष्करम् ॥१५४॥ सोऽभिप्लुत्य तदा शक्तिं जग्राह पुरुषोत्तमः ॥१६२॥ झुकी हुई गाँठवाले बाणोंसे अत्यन्त घायल होनेपर निर्विभेद ततो बाणं तया शक्त्या महाबलः । महाबाहु अनिरुद्ध क्रोधसे जल उठे और दुष्कर कर्म करनेकी सा भित्त्वा तस्य देहं वै प्राविशद् धरणीतलम् ॥१६३॥ इच्छा करने लगे ॥ १५४ ॥ उस समय जीवनका अन्त कर देनेवाली उस शक्तिको रुधिरौघप्लुतैर्गात्रैर्बाणवर्षैः समाहितः । अपने ऊपर आती देख पुरुषप्रवर महाबली अनिरुद्धने अभिभूतः सुसंक्रुद्धो ययौ बाणरथं प्रति ॥१५५॥ उछलकर तत्काल उसे हाथसे पकड़ लिया और उसी शक्तिसे असिभिर्मुसलैः शूलैः पट्टिशैस्तोमरैस्तथा । बाणासुरको विदीर्ण कर डाला; वह शक्ति उसके शरीरको सोऽतिविद्धः शरौघैश्च प्रद्युम्निर्न व्यकम्पत ॥१५६॥ विदीर्ण करती हुई पृथ्वीमें समा गयी ॥ १६२-१६३ ॥ बाणोंकी वर्षासे आच्छादित हो अनिरुद्धके सारे अङ्ग स गाढविद्धो व्यथितो ध्वजयष्टिं समाश्रितः । खूनसे लथपथ हो गये, इस तरह पराभव प्राप्त होनेसे ततो मूर्च्छाभिभूतं तं कुम्भाण्डो वाक्यमब्रवीत् ॥१६४॥ अनिरुद्धका क्रोध बहुत बढ़ गया और वे बाणासुरके रथकी उस शक्तिकी गहरी चोटसे पीड़ित हो बाणासुरने ध्वज- ओर चल दिये। उस समय तलवारों, मूसलों, शूलों, पट्टिशों, दण्डका सहारा ले लिया। उसे मूर्च्छित हुआ देख कुम्भाण्डने तोमरों और बाणसमूहोंसे अत्यन्त घायल होनेपर भी प्रद्युम्न- उससे कहा-॥ १६४ ॥ कुमार कम्पित नहीं हुए ॥ १५५-१५६ ॥ उपेक्षसे दानवेन्द्र किमेवं शत्रुमुद्यतम् । आप्लुत्य सहसा क्रुद्धो रथेषां तस्य सोऽच्छिनत्। लब्धलक्षो ह्ययं वीरो निर्विकारोऽद्य दृश्यते ॥१६५॥ जघान चाश्वान् खड्गेन बाणस्य रणमूर्धनि ॥१५७॥ 'दानवराज ! इस प्रकार उद्यत हुए शत्रु की उपेक्षा किस सहसा क्रोधपूर्वक उछलकर उन्होंने बाणासुरके रथके लिये करते हो । इस वीरने अपना लक्ष्य पा लिया है, अतः आज निर्विकार दिखायी देता है ॥ १६५ ॥