भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 705

विष्णुपर्व ] एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ६८२


अवश्यं भविता चैव कृष्णेन सह विग्रहः।
बाणस्य सुमहान् संख्ये दिव्यो हि स महासुरः॥ १०॥

'अवश्य ही भगवान् श्रीकृष्णके साथ वाणासुरका महान् युद्ध होगा। वह महान् असुर समराङ्गणमें दिव्य शक्तिसे सम्पन्न होता है॥ १०॥

न च शक्तोऽनिरुद्धस्तं युद्धे जेतुं महासुरम्।
सहस्रबाहुमायान्तं जयेत् कृष्णो महाभुजः॥ ११॥

'वह महान् असुर जब सहस्र भुजाओंसे युक्त होकर युद्धभूमिमें पदार्पण करेगा, उस समय अनिरुद्ध उसे नहीं जीत सकते; महाबाहु श्रीकृष्ण ही उसपर विजय पा सकते हैं॥ ११॥

भगवन् संनिकर्षे ते यदर्थमहमागता।
कथं हि पुण्डरीकाक्षो ज्ञापितस्तदिदं भवेत्॥ १२॥

'भगवन् ! मैं आपके निकट जिस अभिप्रायसे आयी हूँ, वह यह है कि कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णको यह बात कैसे बतायी जाय ?॥ १२॥

त्वत्प्रसादाच्च भगवन्न मे कृष्णाद् भयं भवेत्।
स हि तत्त्वार्थदृष्टिस्तु अनिरुद्धः कथं ह्रियेत्॥ १३॥

'भगवन् ! आपकी कृपासे मुझे भगवान् श्रीकृष्णसे कोई भय नहीं है; क्योंकि वे तत्त्वार्थदर्शी हैं। परंतु अनिरुद्धका अपहरण कैसे किया जाय ?॥ १३॥

क्रुद्धो हि स महाबाहुस्त्रैलोक्यमपि निर्दहेत्।
पौत्रशोकाभिसंतप्तः शापेन स दहेत माम्॥ १४॥

'महाबाहु श्रीकृष्ण यदि क्रुद्ध हो जायँ तो समस्त त्रिलोकीको भी दग्ध कर सकते हैं। पौत्रशोकसे संतप्त होकर अपने शापसे मुझे जला सकते हैं॥ १४॥

तत्रोपायं च भगवंश्चिन्तितुं वै त्वमर्हसि।
यथा ह्यवा लभेत् कान्तं मम चैवाभयं भवेत्॥ १५॥

'अतः भगवन् ! इस विषयमें आप ही कोई ऐसा उपाय सोचिये, जिससे उषा अपने प्रियतमको प्राप्त कर ले और मुझे भी कोई भय न हो'॥ १५॥

इत्येवमुक्तो भगवांश्चित्रलेखां स नारदः।
उवाच स शुभं वाक्यं मा भैस्त्वमभयं शृणु॥ १६॥

उसके ऐसा कहनेपर ऐश्वर्यशाली नारद मुनिने चित्रलेखासे यह शुभ वचन कहा—'चित्रलेखे ! तुम डरो मत ! मैं भयके निवारणका उपाय बताता हूँ, सुनो॥ १६॥

त्वया नीतेऽनिरुद्धे तु कन्यावेश्मप्रवेशिते।
यदि युद्धं भवेत् तत्र स्मर्त्तव्योऽहं शुचिस्मिते॥ १७॥

'शुचिस्मिते ! तुम जब अनिरुद्धको ले जाओ और उनका कन्याके महलमें प्रवेश हो जाय, तब यदि युद्ध होनेकी सम्भावना हो तो मुझे भी स्मरण करना॥ १७॥

ममैष परमः कामो युद्धं द्रष्टुं मनोरमे।
तद् दृष्ट्वा च महाप्रीतिः प्रवृत्तिश्च दृढा भवेत्॥ १८॥

'मनोरमे ! युद्ध देखनेके लिये मुझे बड़ी अभिलाषा रहती है और उसे देखकर बहुत प्रसन्नता होती है। साथ ही युद्ध करानेकी मेरी प्रवृत्ति और दृढ़ होती है॥ १८॥

गृह्यतां तामसी विद्या सर्वलोकप्रमोहिनी।
कृतकृत्यस्तु ते देवि एष विद्यां ददाम्यहम्॥ १९॥

'तुम मुझसे तामसी विद्या ग्रहण कर लो, जो सब लोगोंको मोहमें डालनेवाली है। देवि ! इस विद्याकी सिद्धिके लिये जो पुरश्चरण आदि कार्य करने पड़ते हैं, वे सब मैंने ही कर दिये हैं। इस प्रकार यह सिद्ध की हुई विद्या मैं तुम्हें दे रहा हूँ'॥ १९॥

एवमुक्ते तु वचने नारदेन महर्षिणा।
तथेति वचनं प्राह चित्रलेखा मनोजवा॥ २०॥

महर्षि नारदके ऐसा कहनेपर मनके समान वेगवाली चित्रलेखान 'तथास्तु' कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार कर ली॥ २०॥

अभिवाद्य महात्मानमृषीणां नारदं वरम्।
सा जगामानिरुद्धस्य गृहं चैवान्तरिक्षगा॥ २१॥

इसके बाद ऋषियोंमें श्रेष्ठ महात्मा नारदको प्रणाम करके वह आकाशमार्गसे अनिरुद्धके घरकी ओर चली॥ २१॥

ततो द्वारवतीमध्ये कामस्य भवनं शुभम्।
तत्समीपेऽनिरुद्धस्य भवनं सा विवेश ह॥ २२॥

द्वारकाके मध्यभागमें कामावतार प्रद्युम्नका सुन्दर भवन था और उसीके समीप अनिरुद्धका महल था, जिसमें चित्रलेखाने प्रवेश किया॥ २२॥

सौवर्णवेदिकास्तम्भं रुक्मवैडूर्यतोरणम्।
माल्यदामावसक्तं च पूर्णकुम्भोपशोभितम्॥ २३॥
बर्हिण्कण्ठनिभग्रीवं प्रासादैरेक संचयैः।
मणिप्रवालविस्तीर्णं देवगन्धर्वनादितम्॥ २४॥

उस भवनमें सोनेकी वेदियाँ बनी थीं और सोनेके ही खम्भ लगे थे। उसके फाटक सोने और वैदूर्यमणिसे बनाये गये थे। वहाँ फूल-मालाओंकी वंदनवारें लगी थीं। भरे हुए कलश उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। एक ही विशालकाष्ठ या पाषाणपर बिना खंभेके बने हुए प्रासादोंके कारण वह भवन मोरके कण्ठभागकी भाँति शोभा पाता था। उस भवनमें मणि और मूँगे इस प्रकार जड़े गये थे, मानो उन्हींके बने हुए बिछौने बिछे हुए हों। वहाँ देवगन्धर्वोंके संगीतकी ध्वनि गूँज रही थी॥ २३-२४॥