भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 704

६८२ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे करती हुई वहीं खड़ी रही; किंतु चित्रलेखा उस समय द्वारा सुरक्षित द्वारकापुरीमें जा पहुँची ॥ ९७ ॥ तृतीय मुहूर्त्तमें बाणपुरसे अदृश्य हुई थी ॥ ९६ ॥ कैलासशिखराकारैः प्रासादैरुपशोभिताम् । सखीप्रियं चिकीर्षन्ती पूजयन्ती तपोधनान् । ददर्श द्वारकां रम्यां दिवि तारामिव स्थिताम् ॥ ९८ ॥ क्षणेन समनुप्राप्ता द्वारकां कृष्णपालिताम् ॥ ९७ ॥ कैलासशिखरके समान ऊँचे-ऊँचे महलोंसे सुशोभित सखीका प्रिय करनेकी इच्छा लिये तपस्वी मुनियोंका रमणीय द्वारकापुरीको उसने आकाशमें प्रकाशित होती हुई पूजन करती हुई चित्रलेखा एक ही क्षणमें श्रीकृष्ण- ताराके समान देखा ॥ ९८ ॥ इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि उषाहरणे चित्रलेखाया द्वारकागमने अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें उषाहरणके प्रसङ्गमें चित्रलेखाका द्वारकागमनविषयक एक सौ अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११८ ॥ एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः चित्रलेखा और नारदजीका संवाद, चित्रलेखाका नारदजीसे तामसी विद्या ग्रहणकर अनिरुद्धको शोणितपुर ले जाना, उषा और अनिरुद्धका गान्धर्व-विवाह, अनिरुद्धका वाणासुरके सैनिकों तथा वाणासुरके साथ युद्ध, उनका नागपाशमें बँधकर बंदी होना तथा नारदजीका द्वारका जाना वैशम्पायन उवाच तब चित्रलेखा दोनों हाथ जोड़कर लोकपूजित दिव्य अथ द्वारवतीं प्राप्य स्थिता सा भवनान्तिके । देवर्षि नारदसे इस प्रकार बोली-॥ ५ ॥ प्रवृत्तिहरणार्थाय चित्रलेखा व्यचिन्तयत् ॥ १ ॥ भगवञ्छ्रूयतां वाक्यं दौत्येनाहमिहागता । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय ! तदनन्तर अनिरुद्धं मुने नेतुं यदर्थं च शृणुष्व मे ॥ ६ ॥ द्वारकापुरीके पास पहुँचकर चित्रलेखा एक घरके पास 'भगवन् ! मेरी बात सुनिये । मैं दूती होकर यहाँ आयी खड़ी हो गयी और अनिरुद्धके पास संदेश भेजनेके लिये कोई हूँ । मुने ! मैं अनिरुद्धको यहाँसे ले जाना चाहती हूँ, किस युक्ति सोचने लगी ॥ १ ॥ लिये, यह मुझसे सुनिये ॥ ६ ॥ अथ चिन्तयती सा तु बुद्धिवुद्ध्यर्थनिश्चयम् । नगरे शोणितपुरे बाणो नाम महासुरः । अपश्यन्नारदं तत्र ध्यायन्तमुदके मुनिम् ॥ २ ॥ तस्य कन्या वरारोहा नाम्नोपेति च विश्रुता ॥ ७ ॥ बुद्धिसे बोद्धव्य विषयका जो निश्चय होता है, उसीका 'शोणितपुर नगरमें जो बाण नामसे प्रसिद्ध महान् असुर विचार करती हुई चित्रलेखाने वहाँ नारदमुनिको देखा, है, उसके एक सुन्दर अङ्गवाली कन्या है, जो उषाके नामसे जो समुद्रके जलमें ध्यान लगाये बैठे थे ॥ २ ॥ विख्यात है ॥ ७ ॥ तं दृष्ट्वा चित्रलेखा तु हर्षोत्फुल्ललोचना । भगवन् सानुरक्ता च प्रद्युम्निं पुरुषोत्तमम् । उपसृत्याभिवाद्याथ तत्रैवाधोमुखी स्थिता ॥ ३ ॥ देव्या वरविसर्गेण तस्य भर्ता विनिर्मितः ॥ ८ ॥ उन्हें देखकर चित्रलेखाके नेत्र हर्षसे खिल उठे। वह 'भगवन् ! वह प्रद्युम्नकुमार पुरुषोत्तम अनिरुद्धके उनके पास गयी और उन्हें प्रणाम करके वहीं नीचे मुँह प्रति अनुरक्त है; देवी पार्वतीके वरदानके अनुसार अनिरुद्ध किये खड़ी हो गयी ॥ ३ ॥ ही उसके पति नियत हुए हैं ॥ ८ ॥ नारदस्त्वारिशपं दत्त्वा चित्रलेखामथाब्रवीत् । तं च नेतुं समायाता तत्र सिद्धिं विधत्स्व मे । किमर्थमिह सम्प्राप्ता श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ ४ ॥ मया नीतेऽनिरुद्धे तु नगरं शोणिताह्वयम् ॥ ९ ॥ नारदजीने आशीर्वाद देकर चित्रलेखासे कहा-'यहाँ प्रवृत्तिः पुण्डरीकाक्षे त्वयाऽऽख्येया महामुने । किसलिये आयी हो, यह मैं ठीक-ठीक सुनना चाहता हूँ' ॥४॥ 'मैं उन्हींको ले जानेके लिये आयी हूँ। मेरे उद्देश्यकी देवर्षिमथ तं दिव्यं नारदं लोकपूजितम् । सिद्धिका कोई उपाय कीजिये । महामुने ! जब मैं अनिरुद्धको कृताञ्जलिपुटा भूत्वा चित्रलेखा त्वथाम्रवीत् ॥ ५ ॥ शोणितपुर नगरमें पहुँचा दूँ, तब आप कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णको यह समाचार बतावें ॥ ९३ ॥