विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 703, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः ६८१
उषाकी यह बात सुनकर चित्रलेखा बोली--'कल्याणि ! पवित्र मुसकानवालीुषे ! पहले मेरी बात तो सुनो। ॥८०॥
यथा बाणस्य नगरी रक्ष्यते देवि सर्वशः।
द्वारकापि तथा भीरु दुराधर्षा सुरैरपि ॥ ८१ ॥
'देवि ! जैसे बाणासुरकी नगरी सब ओरसे सुरक्षित है, भीरु ! उसी प्रकार द्वारकापुरी भी है। देवता भी उसका पराभव नहीं कर सकते ॥ ८१ ॥
अयस्मयप्रतीच्छन्ना गुप्तद्वारा च सा पुरी।
गुप्ता वृष्णिकुमारैश्च तथा द्वारकवासिभिः ॥ ८२ ॥
'वह लोहेके किवाड़ोंसे ढकी हुई है। उस पुरीका प्रवेश-द्वार पूर्णतः गुप्त (सुरक्षित) है। वृष्णिवंशीकुमार तथा अन्य द्वारकावासी उस नगरीकी रक्षा करते हैं ॥ ८२ ॥
प्रान्ते सलिलसंयुक्ता विहिता विश्वकर्मणा।
रक्ष्यते पुरुषैर्घोरैः पद्मनाभस्य शासनात् ॥ ८३ ॥
'विश्वकर्माने उस पुरीका निर्माण किया है। उसके प्रान्त-भागमें समुद्रकी जलराशि ही खाईके रूपमे विद्यमान है। पद्मनाभ श्रीकृष्णके आदेशसे बड़े भयंकर पुरुष उसकी रक्षा करते हैं ॥ ८३ ॥
शैलप्राकारपरिखादुर्गमार्गप्रवेशिनी ।
सप्तप्राकाररचिता पर्वतैर्धातुमण्डितैः ॥ ८४ ॥
'पर्वत ही उसके परकोटे हैं। समुद्र ही खाई है। दुर्गके मार्गसे ही उसमे प्रवेश होता है। धातुमण्डित पर्वतोंके बने हुए सात परकोटोंसे वह पुरी घिरी हुई है ॥ ८४ ॥
न च शक्यमविज्ञातैः प्रवेष्टुं द्वारकां पुरीम्।
आत्मानं मां च रक्षस्व पितरं च विशेषतः ॥ ८५ ॥
'अपरिचित व्यक्ति द्वारकापुरीमें कभी प्रवेश नहीं कर सकते, अतः अनिरुद्धको लानेका हठ छोड़कर तुम अपनी, मेरी और विशेषतः अपने पिताकी रक्षा करो' ॥ ८५ ॥
उषोवाच
तव योगप्रभावेण शक्यं तत्र प्रवेशनम्।
बहुना किं प्रलापेन प्रतिज्ञा श्रूयतां मम ॥ ८६ ॥
उषा बोली--सखि ! योगशक्तिके प्रभावसे तुम्हारा द्वारकापुरीमें प्रवेश हो सकता है। अधिक प्रलाप करनेसे क्या लाभ ? मेरी प्रतिज्ञा सुन लो ॥ ८६ ॥
अनिरुद्धस्य वदनं पूर्णचन्द्रसमप्रभम्।
यद्यहं तन्न पश्यामि यास्यामि यमसादनम् ॥ ८७ ॥
यदि मैं अनिरुद्धका पूर्ण चन्द्रमाके समान कान्तिमान् वह मनोहर मुख नहीं देखूँगी तो यमलोकको चली जाऊँगी ॥ ८७ ॥
दूतमसाद्य कार्याणां सिद्धिर्भवति भामिनि।
तस्माद् दौत्येन मे गच्छ जीवन्तीं मां यदीच्छसि ॥ ८८ ॥
भामिनि ! अच्छे दूतको पाकर कार्योंकी सिद्धि हो जाती है; अतः यदि तुम मुझे जीवित रखना चाहती हो तो मेरी दूती बनकर द्वारकाको चली जाओ ॥ ८८ ॥
यदि त्वं मे विजानासि सख्यं प्रेम्णा च भाषितम्।
क्षिप्रमानय मे कान्तं तवास्मि शरणं गता ॥ ८९ ॥
यदि तुम मेरे सखित्वको जानती हो और प्रेमपूर्वक कही हुई मेरी बातपर विश्वास करती हो तो मेरे प्रियतमको शीघ्र यहाँ ले आओ। मैं तुम्हारी शरणमें आयी हूँ ॥८९॥
जीवितस्य हि संदेहं क्षयं चैव कुलस्य च।
कामार्ता हि न पश्यन्ति कामिन्यो मदविह्वलाः ॥ ९० ॥
प्राणोंके लिये संशय उपस्थित हो और कुलका भी संहार हो जाय, किंतु कामपीड़ित मदमत्त कामिनियाँ इन बातोंकी ओर नहीं देखती हैं ॥ ९० ॥
प्रयत्नो युज्यते कार्येष्विति शास्त्रनिदर्शनम्।
त्वं च शक्ता विशालाक्षि द्वारकायां प्रवेशने ॥ ९१ ॥
संस्तुतासि मया भीरु कुरु मे प्रियदर्शनम्।
सभी कार्योंके लिये प्रयत्न करना उचित है, यह शास्त्रकी आज्ञा है। विशाललोचने ! तुम द्वारकापुरीमें प्रवेश करनेमें समर्थ हो। भीरु ! मैंने तुम्हारी बड़ी स्तुति की है। तुम मुझे मेरे प्रियतमका दर्शन करा दो ॥ ९१ १/२ ॥
चित्रलेखोवाच
सर्वथा संस्तुता तेऽहं वाक्यैरमृतसोदरैः ॥ ९२ ॥
कारिता च समुद्योगं प्रियैः कान्तैश्च भाषितैः।
एषा गच्छाम्यहं भीरु क्षिप्रं वै द्वारकां पुरीम् ॥ ९३ ॥
चित्रलेखा बोली--सखि ! तुम्हारे अमृतोपम वचनोंद्वारा मेरी सब प्रकारसे स्तुति ही की गयी है। तुम्हारे इन प्रिय एवं मनोरम वचनोंने मुझे इस कार्यके लिये उद्योग करनेको विवश कर दिया है। भीरु ! यह देखो, अब मैं शीघ्र ही द्वारकापुरीको जाती हूँ ॥ ९२-९३ ॥
भर्तारमानयिष्याद्य तव वृष्णिकुलोद्भवम्।
अनिरुद्धं महाबाहुं प्रविश्य द्वारकां पुरीम् ॥ ९४ ॥
आज तुम्हारे पति वृष्णिवंशावतंस महाबाहु अनिरुद्धको मैं द्वारकापुरीमें प्रवेश करके ले आऊँगी ॥ ९४ ॥
सा वचस्तथ्यमशिवं दानवानां भयावहम्।
उक्त्वा चान्तर्हिता क्षिप्रं चित्रलेखा मनोजवा ॥ ९५ ॥
यह वचन यथार्थ होनेके साथ ही दानवोंके लिये अमङ्गलकारक और भयावह था। इसे कहकर मनके समान वेगशालिनी चित्रलेखा तत्काल अन्तर्धान हो गयी ॥ ९५ ॥
सखीभिः सहिता ह्युषा चिन्तयन्ती तु सा स्थिता।
तृतीये तु मुहूर्ते सा नष्टा बाणपुरात् तदा ॥ ९६ ॥
उषा अपनी सखियोंके साथ अभीष्ट कार्यका चिन्तन