विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 706, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ६८४ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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ददर्श भवनं यत्र प्रद्युम्निरवसत् सुखम्।
ततः प्रविश्य सहसा भवनं तस्य तन्महत् ॥ २५॥
तत्रानिरुद्धं सापश्यच्चित्रलेखा वराप्सराः।
मध्ये परमनारीणां तारापतिमिवोदितम् ॥ २६॥
चित्रलेखाने उस भवनको देखा, जहाँ प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्ध सुखपूर्वक निवास करते थे। उनके उस विशाल भवनमें सहसा प्रवेश करके श्रेष्ठ अप्सरा चित्रलेखाने सुन्दरी नारियोंके मध्यभागमें अनिरुद्धको देखा, मानो ताराओंके बीच तारापति चन्द्रमा उदित हुए हों॥ २५-२६ ॥
क्रीडाविहारे नारीभिः सेव्यमानमितस्ततः।
पिबन्तं मधु माध्वीकं श्रिया परमया युतम् ॥ २७॥
क्रीड़ाविहारके स्थानमें इधर-उधर बहुत-सी सुन्दरियाँ उनकी सेवामें लगी थीं। वे मधुर मधुका पान करते हुए उत्कृष्ट शोभासे प्रकाशित हो रहे थे॥ २७॥
वरासनगतं तत्र यथा चैडविडं तथा।
वाद्यते समतालं च गीयते मधुरं तथा ॥ २८॥
धनाध्यक्ष कुबेरके समान वे एक श्रेष्ठ सिंहासनपर विराजमान थे। उनके सामने समतालमें वाद्य बज रहा था और मधुर स्वरमें गान हो रहा था॥ २८॥
न च तस्य मनस्तत्र तमेवार्थमचिन्तयत्।
स्त्रियः सर्वगुणोपेता नृत्यन्ते तत्र तत्र वै ॥ २९॥
किंतु उस वाद्य और गानमें उनका मन नहीं लगता था। वे उसी विषयका (उषाके समागमका) चिन्तन कर रहे थे। सर्वगुणसम्पन्न सुन्दरी स्त्रियाँ जहाँ-तहाँ नृत्य कर रही थीं॥
न चास्य मनसस्तुष्टिं चित्रलेखा प्रपश्यति।
न चाभिरमते भोगैर्न चापि मधु सेवते ॥ ३०॥
परंतु चित्रलेखाने देखा, अनिरुद्धके मनको कहीं भी संतोष नहीं प्राप्त होता है। ये न तो भोगोंके साथ रमते हैं और न मधुका ही सेवन करते हैं॥ ३०॥
व्यक्तमस्य हि तत्स्वप्नो हृदये परिवर्तते।
इति तत्रैव बुद्ध्या च निश्चिता गतसाध्वसा ॥ ३१॥
निश्चय ही इनके हृदयमें भी वही स्वप्न चक्कर लगा रहा है। वह अपनी बुद्धिसे वहीं इस निश्चयपर पहुँच गयी और उसका भय दूर हो गया॥ ३१॥
सा दृष्ट्वा परमस्त्रीणां मध्ये शक्रध्वजोपमम्।
चिन्तयाविष्टहृदया चित्रलेखा मनस्विनी ॥ ३२॥
श्रेष्ठ एवं सुन्दरी स्त्रियोंके बीचमें इन्द्रध्वजके समान शोभा पानेवाले अनिरुद्धको देखकर मनस्विनी चित्रलेखा मन-ही-मन इस प्रकार चिन्ता करने लगी॥ ३२॥
कथं कार्यमिदं कार्यं कथं स्वस्ति भवेदिति।
सान्तर्हिता चिन्तयित्वा चित्रलेखा यशस्विनी ॥ ३३॥
तामस्या च्छादयामास विद्यया शुभलोचना।
'यह कार्य कैसे करना चाहिये, किस तरह करनेसे कल्याण प्राप्त होगा' इस तरह विचार करके सुन्दर नेत्रोंवाली यशस्विनी चित्रलेखाने अदृश्य होकर तामसी विद्याके द्वारा अनिरुद्धके सिवा अन्य सबको आच्छादित कर दिया॥
ततोऽन्तरिक्षादेवाशु प्रासादोपर्यधिष्ठिता ॥ ३४॥
प्रद्युम्निं वचनं प्राह श्लक्ष्णं मधुरया गिरा।
फिर आकाशसे ही शीघ्र आकर वह महलकी छतपर खड़ी हो गयी और प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्धसे मधुर वाणीमें यह स्नेहयुक्त वचन बोली॥ ३४॥
चक्षुर्द्दत्त्वा तु सा तस्मै कृत्वा चात्मनिदर्शनम् ॥३५॥
विविक्ते सा च वै देशे तं वाक्यमिदमब्रवीत्।
पहले दिव्यदृष्टि देकर उसने उन्हें अपने स्वरूपका दर्शन कराया, फिर एकान्त प्रदेशमें उनसे इस प्रकार कहना आरम्भ किया—॥ ३५॥
अपि ते कुशलं वीर सर्वत्र यदुनन्दन ॥ ३६॥
अहस्तावत् प्रदोपो वा कच्चिद् गच्छति ते सुखम्।
शृणुष्व त्वं महाबाहो विज्ञप्तिं मे रतीसुत ॥ ३७॥
'वीर यदुनन्दन ! आपके लिये सर्वत्र कुशल तो है न ? आपका दिन और प्रदोषकाल सुखसे बीतता है न ? महाबाहु रतिकुमार ! मैं तुम्हारे लिये एक सूचना लायी हूँ, तुम इसे सुनो॥ ३६-३७॥
उपाया मम सख्यास्तु वाक्यं वक्ष्यामि तत्त्वतः।
स्वप्ने तु या त्वया दृष्टा स्त्रीभावं चापि भाविता ॥ ३८॥
'मैं अपनी सखी उषाकी बात ठीक-ठीक बताऊँगी, जिसको आपने सपनेमें देखा और अपनी पत्नी बना लिया॥
बिभर्ति हृदये या त्वामुषया प्रेषिता त्वहम्।
रुदन्ती जृम्भती चैव निःश्वसन्ती मुहुर्मुहुः ॥ ३९॥
'वह आपको ही अपने हृदयमें धारण करती है। उषाके भेजनेपर ही मैं यहाँ आयी हूँ। वह बेचारी बार-बार रोती, अँगड़ाई लेती और लंबी साँस खींचती है॥ ३९॥
त्वद्दर्शनपरा सौम्य कामिनी परितप्यते।
यदि त्वं यास्यसे वीर धारयिष्यति जीवितम् ॥ ४०॥
'सौम्य ! वह आपके दर्शनकी बाट जोहती हुई कामके अधीन हो बड़ा कष्ट पा रही है। वीर ! यदि आप उसके पास जायें और मिलें, तभी वह जीवन धारण कर सकेगी॥ ४०॥
अदर्शनेन मरणं तस्या नास्त्यत्र संशयः।
यदि नारीसहस्रं ते हृदिस्थं यदुनन्दन ॥ ४१॥
स्त्रियाः कामयमानायाः कर्तव्या हस्तधारणा।