विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 707, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ६८५
'यदि आपका दर्शन उसे नहीं मिला तो उसकी मृत्यु निश्चित है, इसमें कोई संशय नहीं है। यदुनन्दन ! यदि आपके हृदयमें सहस्रों नारियोंने स्थान बना लिया हो तो भी आपको चाहनेवाली एक अनुरक्त स्त्रीका हाथ आपको अवश्य पकड़ना चाहिये ॥ ४१½ ॥'
त्वं च तस्या वरोत्सङ्गे दत्तो देव्या मनोरथः ॥ ४२ ॥ चित्रपट्टं मया दत्तं त्वच्चिह्नं दृश्य जीवति।
'देवी पार्वती ने वरदान देते समय आपका ही उसका मनो-वाञ्छित पति प्रदान किया है; मैंने उसे आपका चित्रपट दिया है। उसीमें आपके चिह्नका अवलोकन करके वह जी रही है ॥'
सानुक्रोशो यदुश्रेष्ठ भव तस्या मनोरथे ॥ ४३ ॥ उषा ते पतते मूर्ध्ना वयं च यदुनन्दन ।
'यदुश्रेष्ठ ! आप उसका मनोरथ पूर्ण करनेके लिये दयालु बनें। यदुनन्दन ! उषा आपके चरणोंमें सिर रखकर प्रणाम करती है। हम सखियाँ भी आपको माथ नवाती हैं ॥४३½॥'
श्रूयतां चोद्भवस्तस्याः कुलशीलं च यादृशम् ॥ ४४ ॥ संस्थानं प्रकृतिं चास्याः पितरं च ब्रवीमि ते ।
'आप उषाकी उत्पत्ति सुन लें। उसका कुल और शील जैसा है, उसे भी जान लें; उसकी आकृति, स्वभाव और पिताका भी परिचय आपको देती हूँ ॥ ४४½ ॥'
वैरोचनिसुतो वीरो बाणो नाम महासुरः ॥ ४५ ॥ स राजा शोणितपुरे तस्य त्वामिच्छते सुता । त्वद्भावगतचित्ता सा तन्मयं चापि जीवितम् ॥ ४६ ॥
'विरोचनकुमार बलिके वीर पुत्र बाण नामक महान् असुर शोणितपुरका राजा है। उसकी पुत्री उषा आपको पति बनाना चाहती है। उसका चित्त सदा आपके ही चिन्तनमें लगा रहता है, उसका जीवन भी आप ही हैं ॥ ४५-४६ ॥'
मनोरथकृतो भर्त्ता देव्या दत्तो न संशयः । त्वत्सङ्गमात् सा सुश्रोणी प्राणान् धारयते शुभा ॥ ४७ ॥
'देवी पार्वती ने आपको ही उसके लिये मनके अनुरूप पति दिया है, इसमें संशय नहीं। सुन्दर कटिप्रदेशवाली शुभलक्षणा उषा आपके समागमकी आशा लेकर ही प्राणोंको धारण करती है' ॥ ४७ ॥
चित्रलेखावचः श्रुत्वा सोऽनिरुद्धोऽब्रवीदिदम् । दृष्टा स्वप्ने मया सा हि तन्मत्तः शृणु शोभन ॥ ४८ ॥ रूपं कान्तिं मतिं चैव संयोगं रुदितं तथा । एवं सर्वमहोरात्रं मुह्यामि परिचिन्तयन् ॥ ४९ ॥
चित्रलेखाकी बात सुनकर अनिरुद्धने उससे इस प्रकार कहा—'शोभने ! मैंने उसे सपनेमें देखा है। उसका परिणाम क्या हुआ ? यह मुझसे सुनो। मैं दिन-रात उसके रूप, कान्ति, मति, संयोगसुख तथा रोदन आदि सभी बातोंका इसी तरह चिन्तन करता हुआ मोहमें पड़ा रहता हूँ ॥ ४८-४९ ॥'
यद्यहं समुपाग्राह्यो यदि सख्यं त्वमिच्छसि । नयस्व चित्रलेखे मां द्रष्टुमिच्छाम्यहं प्रियाम् ॥ ५० ॥
'चित्रलेखे ! यदि मैं तुम्हारे अनुग्रहका पात्र हूँ और यदि तुम मुझसे मैत्री चाहती हो तो मुझे अपने साथ ले चलो। मैं प्राणप्यारी उषाको देखना चाहता हूँ ॥ ५० ॥'
कामसंतापसन्तप्तः प्रियासङ्गमकामतः । एषोऽञ्जलिर्मया बद्धः सत्यं स्वप्नं कुरुष्व मे ॥ ५१ ॥
'मैं कामजनित तापसे संतप्त हूँ; अतः प्रियतमाके सङ्गमकी कामनासे मैंने तुम्हारे सामने यह अञ्जलि बाँध रखी है, मेरे स्वप्नको सत्य कर दिखाओ' ॥ ५१ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा चित्रलेखा वराप्सराः । सफलोऽद्य मम क्लेशः सख्या मे यत् प्रयाचितम् ॥ ५२ ॥
अनिरुद्धकी यह बात सुनकर श्रेष्ठ अप्सरा चित्रलेखा मन-ही-मन यह कहने लगी कि आज मेरा क्लेश उठाना सफल हो गया। मेरी सखीने जो वस्तु माँगी थी, वह मुझे मिल गयी ॥
वैशम्पायन उवाच
ईप्सितं तस्य विज्ञाय अनिरुद्धस्य भामिनी । चित्रलेखा ततस्तुष्टा तथेति च तमब्रवीत् ॥ ५३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! अनिरुद्धका मनोरथ जानकर भामिनी चित्रलेखा बहुत प्रसन्न हुई और बोली, 'अच्छा ऐसा ही करूँगी' ॥ ५३ ॥
हर्म्ये स्त्रीगणमध्यस्थं कृत्वा चान्तर्हितं तदा । उत्पपात गृहीत्वा सा प्राद्युम्निं युद्धदुर्मदम् ॥ ५४ ॥
अट्टालिकामें स्त्रियोंके बीचमें बैठे हुए रणदुर्मद प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्धको अदृश्य करके उन्हें साथ ले चित्रलेखा आकाशमें उड़ चली ॥ ५४ ॥
सा तमध्वानमागम्य सिद्धचारणसेवितम् । सहसा शोणितपुरं प्रविवेश मनोजवा ॥ ५५ ॥
वह मनके समान वेगशालिनी थी। उसने सिद्धों और चारणोंसे सेवित आकाशमार्गमे आकर सहसा शोणितपुरमें प्रवेश किया ॥ ५५ ॥
अदर्शनं तमानीय मायया कामरूपिणी । अनिरुद्धं महाभागा यत्रोषा तत्र गच्छति ॥ ५६ ॥
वह कामरूपिणी अप्सरा अनिरुद्धको मायासे अदृश्य करके जहाँ महाभागा उषा थी, वहाँ गयी ॥ ५६ ॥
उषाया दर्शयच्चैनं चित्राभरणभूषितम् । चित्राम्बरधरं वीरं रहस्यममररूपिणम् ॥ ५७ ॥
वहाँ उसने उषाको एकान्तमें विचित्र आभूषणोंसे विभूषित तथा विचित्र वस्त्रधारी देवतुल्य रूपवाले वीर अनिरुद्धका दर्शन कराया ॥ ५७ ॥