विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 708, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ६८६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंश |
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तत्रोषा विस्मिता दृष्ट्वा हर्म्यस्था सखिसंनिधौ।
प्रवेशयामास च तं तदा सा स्वगृहं ततः॥ ५८॥
वहाँ अट्टालिकामें सखियोंके समीप बैठी हुई उषा अनि-
रुद्धको देखकर चकित हो उठी। उसने तत्काल उन्हें अपने
महलके भीतर प्रवेश कराया॥ ५८॥
प्रहर्षोत्फुल्लनयना प्रियं दृष्ट्वार्थकोविदा।
सा हर्म्यस्था तमर्घ्येण यादवं समपूजयत्॥ ५९॥
प्रियतमका दर्शन करके उषाके नेत्र हर्षसे खिल उठे।
स्वार्थसाधनमें कुशल उषाने अट्टालिकामें ही स्थित हो
अर्घ्य निवेदन करके यदुकुलनन्दन अनिरुद्धका पूजन किया॥
चित्रलेखां परिष्वज्य प्रियाख्यानैस्तोषयत्।
त्वरिता कामिनी प्राह चित्रलेखां भयातुरा॥ ६०॥
फिर चित्रलेखाको हृदयसे लगाकर प्रिय वचनोंके द्वारा
उसे संतुष्ट किया। इसके बाद कामिनी उषा भयसे व्याकुल
हो तुरंत ही चित्रलेखासे बोली—॥ ६०॥
सखीदं वै कथं कार्यं गुह्यकार्यविशारदे।
गुह्ये कृते भवेत् स्वस्ति प्रकाशे जीवितक्षयः॥ ६१॥
'कार्यसाधनमें कुशल सखि ! इस कार्यको गुप्त कैसे
रखा जाय ? गुप्त रखनेपर ही कल्याण हो सकता है। इसे
प्रकाशित कर देनेपर प्राणोंपर संकट आ सकता है, ॥ ६१॥
चित्रलेखाब्रवीद् वाक्यं शृणु त्वं निश्चयं सखि।
कृतं पुरुषकारेण दैवं नाशयते क्षणात्॥ ६२॥
तब चित्रलेखा बोली—'सखि ! मेरा निश्चय सुनो !
पुरुषार्थद्वारा किये गये कार्यको दैव क्षणभरमें नष्ट कर
देता है॥ ६२॥
यदि देव्याः प्रसादस्ते ह्यनुकूलो भविष्यति।
अद्य मायाकृतं गुह्यं न कश्चिज्ज्ञास्यते नरः॥ ६३॥
'यदि पार्वतीदेवीका कृपाप्रसाद तुम्हारे अनुकूल
होगा तो आज मायाद्वारा छिपाकर किये गये इस गुप्त कार्य-
को कोई नहीं जान सकेगा'॥ ६३॥
सख्या वै एवमुक्ता सा पर्यवस्थितचेतना।
एवमेतदिति प्राह सानिरुद्धमिदं वचः॥ ६४॥
सखीके ऐसा कहनेपर उषाकी चित्तवृत्ति स्थिर हुई।
वह बोली, 'तुम्हारा कहना ठीक है'; फिर उसने अनिरुद्ध-
से कहा--॥ ६४॥
दिष्ट्या स्वप्नगतश्चौरो दृश्यते सुभगः पतिः।
यत्कृते तु वयं खिन्ना दुर्लभप्रियकाङ्क्षया॥ ६५॥
'सौभाग्यकी बात है कि सपनेमें आया हुआ वह चोर
आज सुन्दर पतिके रूपमें प्रत्यक्ष दिखायी देता है; जिसके-
लिये हम सब लोग खिन्न हो रही थीं, दुर्लभ प्रियतमक
आकाङ्क्षा रखनेके कारण भारी चिन्तामें पड़ गयी थीं ॥६५॥
कच्चित् तव महाबाहो कुशलं सर्वतोगतम्।
हृदयं हि मृदु स्त्रीणां तेन पृच्छाम्यहं तव ॥ ६६ ॥
'महाबाहो ! आपके लिये सर्वत्र कुशल तो है न ?
स्त्रियोंका हृदय कोमल होता है, इसलिये मैं आपका कुशल-
समाचार पूछ रही हूँ' ॥ ६६ ॥
तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा उषायाः श्लक्ष्णमर्थवत्।
सोऽप्याह यदुशार्दूलः शुभाक्षरतरं वचः ॥ ६७ ॥
उषाका वह अर्थभरा स्नेहयुक्त वचन सुनकर यदुकुल-
सिंह अनिरुद्ध भी सुन्दर अक्षरोंसे युक्त बात बोले ॥ ६७ ॥
हर्षविप्लुतनेत्रायाः पाणिनाश्रु' प्रमृज्य च।
प्रहस्य सस्मितं प्राह हृदयग्राहकं वचः ॥ ६८॥
पहले उन्होंने अपने हाथसे आनन्दके आँसुओंसे भरे
हुए नेत्रवाली उषाके आँसू पोंछे, फिर हँसकर मुसकराते
हुए वे ऐसी बात बोले, जो चित्तको चुराये लेती थी—॥६८॥
कुशलं मे वरारोहे सर्वत्र मितभाषिणि।
त्वत्प्रसादेन मे देवि प्रियमावेदयामि ते ॥ ६९ ॥
'वरारोहे ! तुम्हारे प्रसादसे मेरे लिये सर्वत्र कुशल है।
बहुत कम बोलनेवाली देवि ! मैं तुम्हें यह प्रिय संवाद
निवेदन करता हूँ ॥ ६९ ॥
अदृष्टपूर्वश्च मया देशोऽयं शुभदर्शने।
निशि स्वप्ने यथा दृष्टः सकृत्कन्यापुरे तथा ॥ ७० ॥
'शुभदर्शने ! यह देश मेरे लिये पहलेका देखा हुआ
नहीं था, केवल एक बार रातको सपनेमें कन्याओंके अन्तः-
पुरमें इसे जैसा देखा था, वैसा ही आज भी यह दिखायी
देता है ॥ ७० ॥
एवमेवमहं भीरु त्वत्प्रसादादिहागतः।
न च तद् रुद्रपत्न्या वै मिथ्या वाक्यं भविष्यति ॥ ७१ ॥
'भीरु ! तुम्हारे प्रसादसे ही मेरा इस प्रकार यहाँ आग-
मन हुआ है। रुद्रपत्नी उमा देवीकी बात कभी मिथ्या नहीं
होगी ॥ ७१ ॥
देव्यास्ते प्रीतिमाज्ञाय त्वत्प्रियार्थं च भामिनि।
अनुप्राप्तोऽस्मि चाद्यैव प्रसीद शरणं गतः ॥ ७२ ॥
'भामिनि ! पार्वतीदेवीका तुमपर बड़ा प्रेम है—यह
जानकर तुम्हारा प्रिय करनेके लिये ही मैं आज यहाँ आया
हूँ। मुझपर प्रसन्न होओ, मैं तुम्हारी शरणमें आया
हूँ, ॥ ७२ ॥
इत्युक्ता त्वरमाणा सा गुह्यदेशे स्वलंकृता।
कान्तेन सह संयुक्ता स्थिता वै भीतभीतवत्॥ ७३॥