विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
| ६८६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंश |
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तत्रोषा विस्मिता दृष्ट्वा हर्म्यस्था सखिसंनिधौ।
प्रवेशयामास च तं तदा सा स्वगृहं ततः॥ ५८॥
वहाँ अट्टालिकामें सखियोंके समीप बैठी हुई उषा अनि-
रुद्धको देखकर चकित हो उठी। उसने तत्काल उन्हें अपने
महलके भीतर प्रवेश कराया॥ ५८॥
प्रहर्षोत्फुल्लनयना प्रियं दृष्ट्वार्थकोविदा।
सा हर्म्यस्था तमर्घ्येण यादवं समपूजयत्॥ ५९॥
प्रियतमका दर्शन करके उषाके नेत्र हर्षसे खिल उठे।
स्वार्थसाधनमें कुशल उषाने अट्टालिकामें ही स्थित हो
अर्घ्य निवेदन करके यदुकुलनन्दन अनिरुद्धका पूजन किया॥
चित्रलेखां परिष्वज्य प्रियाख्यानैस्तोषयत्।
त्वरिता कामिनी प्राह चित्रलेखां भयातुरा॥ ६०॥
फिर चित्रलेखाको हृदयसे लगाकर प्रिय वचनोंके द्वारा
उसे संतुष्ट किया। इसके बाद कामिनी उषा भयसे व्याकुल
हो तुरंत ही चित्रलेखासे बोली—॥ ६०॥
सखीदं वै कथं कार्यं गुह्यकार्यविशारदे।
गुह्ये कृते भवेत् स्वस्ति प्रकाशे जीवितक्षयः॥ ६१॥
'कार्यसाधनमें कुशल सखि ! इस कार्यको गुप्त कैसे
रखा जाय ? गुप्त रखनेपर ही कल्याण हो सकता है। इसे
प्रकाशित कर देनेपर प्राणोंपर संकट आ सकता है, ॥ ६१॥
चित्रलेखाब्रवीद् वाक्यं शृणु त्वं निश्चयं सखि।
कृतं पुरुषकारेण दैवं नाशयते क्षणात्॥ ६२॥
तब चित्रलेखा बोली—'सखि ! मेरा निश्चय सुनो !
पुरुषार्थद्वारा किये गये कार्यको दैव क्षणभरमें नष्ट कर
देता है॥ ६२॥
यदि देव्याः प्रसादस्ते ह्यनुकूलो भविष्यति।
अद्य मायाकृतं गुह्यं न कश्चिज्ज्ञास्यते नरः॥ ६३॥
'यदि पार्वतीदेवीका कृपाप्रसाद तुम्हारे अनुकूल
होगा तो आज मायाद्वारा छिपाकर किये गये इस गुप्त कार्य-
को कोई नहीं जान सकेगा'॥ ६३॥
सख्या वै एवमुक्ता सा पर्यवस्थितचेतना।
एवमेतदिति प्राह सानिरुद्धमिदं वचः॥ ६४॥
सखीके ऐसा कहनेपर उषाकी चित्तवृत्ति स्थिर हुई।
वह बोली, 'तुम्हारा कहना ठीक है'; फिर उसने अनिरुद्ध-
से कहा--॥ ६४॥
दिष्ट्या स्वप्नगतश्चौरो दृश्यते सुभगः पतिः।
यत्कृते तु वयं खिन्ना दुर्लभप्रियकाङ्क्षया॥ ६५॥
'सौभाग्यकी बात है कि सपनेमें आया हुआ वह चोर
आज सुन्दर पतिके रूपमें प्रत्यक्ष दिखायी देता है; जिसके-
लिये हम सब लोग खिन्न हो रही थीं, दुर्लभ प्रियतमक
आकाङ्क्षा रखनेके कारण भारी चिन्तामें पड़ गयी थीं ॥६५॥
कच्चित् तव महाबाहो कुशलं सर्वतोगतम्।
हृदयं हि मृदु स्त्रीणां तेन पृच्छाम्यहं तव ॥ ६६ ॥
'महाबाहो ! आपके लिये सर्वत्र कुशल तो है न ?
स्त्रियोंका हृदय कोमल होता है, इसलिये मैं आपका कुशल-
समाचार पूछ रही हूँ' ॥ ६६ ॥
तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा उषायाः श्लक्ष्णमर्थवत्।
सोऽप्याह यदुशार्दूलः शुभाक्षरतरं वचः ॥ ६७ ॥
उषाका वह अर्थभरा स्नेहयुक्त वचन सुनकर यदुकुल-
सिंह अनिरुद्ध भी सुन्दर अक्षरोंसे युक्त बात बोले ॥ ६७ ॥
हर्षविप्लुतनेत्रायाः पाणिनाश्रु' प्रमृज्य च।
प्रहस्य सस्मितं प्राह हृदयग्राहकं वचः ॥ ६८॥
पहले उन्होंने अपने हाथसे आनन्दके आँसुओंसे भरे
हुए नेत्रवाली उषाके आँसू पोंछे, फिर हँसकर मुसकराते
हुए वे ऐसी बात बोले, जो चित्तको चुराये लेती थी—॥६८॥
कुशलं मे वरारोहे सर्वत्र मितभाषिणि।
त्वत्प्रसादेन मे देवि प्रियमावेदयामि ते ॥ ६९ ॥
'वरारोहे ! तुम्हारे प्रसादसे मेरे लिये सर्वत्र कुशल है।
बहुत कम बोलनेवाली देवि ! मैं तुम्हें यह प्रिय संवाद
निवेदन करता हूँ ॥ ६९ ॥
अदृष्टपूर्वश्च मया देशोऽयं शुभदर्शने।
निशि स्वप्ने यथा दृष्टः सकृत्कन्यापुरे तथा ॥ ७० ॥
'शुभदर्शने ! यह देश मेरे लिये पहलेका देखा हुआ
नहीं था, केवल एक बार रातको सपनेमें कन्याओंके अन्तः-
पुरमें इसे जैसा देखा था, वैसा ही आज भी यह दिखायी
देता है ॥ ७० ॥
एवमेवमहं भीरु त्वत्प्रसादादिहागतः।
न च तद् रुद्रपत्न्या वै मिथ्या वाक्यं भविष्यति ॥ ७१ ॥
'भीरु ! तुम्हारे प्रसादसे ही मेरा इस प्रकार यहाँ आग-
मन हुआ है। रुद्रपत्नी उमा देवीकी बात कभी मिथ्या नहीं
होगी ॥ ७१ ॥
देव्यास्ते प्रीतिमाज्ञाय त्वत्प्रियार्थं च भामिनि।
अनुप्राप्तोऽस्मि चाद्यैव प्रसीद शरणं गतः ॥ ७२ ॥
'भामिनि ! पार्वतीदेवीका तुमपर बड़ा प्रेम है—यह
जानकर तुम्हारा प्रिय करनेके लिये ही मैं आज यहाँ आया
हूँ। मुझपर प्रसन्न होओ, मैं तुम्हारी शरणमें आया
हूँ, ॥ ७२ ॥
इत्युक्ता त्वरमाणा सा गुह्यदेशे स्वलंकृता।
कान्तेन सह संयुक्ता स्थिता वै भीतभीतवत्॥ ७३॥
| [ विष्णुपर्व ] | एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः | ६८७ |
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अनिरुद्धके ऐसा कहनेपर सुन्दर अलंकारोंसे अलंकृत हुई उषा अपने प्रियतमके साथ संयुक्त हो तुरंत ही गुप्त-स्थानमें जा पहुँची। उस समय वह भयभीत-सी जान पड़ती थी॥ ७३॥
ततश्चोद्वाहधर्मेण गान्धर्वेण समीयुतुः।
अन्योन्यं रमतुस्तौ तु चक्रवाकौ यथा दिवा॥ ७४॥
तदनन्तर वे दोनों गान्धर्व विवाहके नियमसे परस्पर दाम्पत्यभाव स्वीकार करके एक दूसरेसे मिले, जैसे चकवे दिनमें समागम करते हैं, उसी प्रकार उन दोनोंने परस्पर रमण किया॥ ७४॥
पतिना सानिरुद्धेन मुमुदे तु वराङ्गना।
कान्तेन सह संयुक्ता दिव्यवस्त्रानुलेपना॥ ७५॥
दिव्य वस्त्र और अनुलेपन धारण करनेवाली श्रेष्ठ नारी उषा अपने प्रियतम पति अनिरुद्धसे मिलकर बहुत ही प्रसन्न हुई॥ ७५॥
रममाणानिरुद्धेन अविज्ञाता सुता तदा।
तस्मिन्नेव क्षणे प्राप्ते यदूनामृषभो हि सः॥ ७६॥
दिव्यमाल्याम्बरधरो दिव्यस्रगनुलेपनः।
उषया सह संयुक्तो विज्ञातो वाणरक्षिभिः॥ ७७॥
अनिरुद्धके साथ रमण करती हुई अपनी पुत्रीके विषयमें उस समय बाणासुरको कोई समाचार ज्ञात नहीं हुआ। परंतु बाणासुरके द्वारा नियुक्त हुए जो गुप्त पहरेदार थे, उन्होंने उसी क्षण यह जान लिया कि दिव्य माल्य, दिव्य वस्त्र, दिव्य हार और दिव्य अनुलेपन धारण करनेवाले यदुकुलतिलक अनिरुद्धने उषाके साथ समागम किया है॥ ७६-७७॥
ततस्तैश्चारपुरुषैर्वाणस्यावेदितं द्रुतम्।
यथा दृष्टमशेषेण कन्यायास्तदतिक्रमम्॥ ७८॥
तब उन गुप्तचरोंने कन्याका अपराध जिस तरह देखा था, वह सब शीघ्र ही बाणासुरको निवेदन कर दिया॥ ७८॥
ततः किङ्करसैन्यं तु व्यादिष्टं भीमकर्मणा।
बलेः पुत्रेण वीरेण बाणेनामित्रघातिना॥ ७९॥
तब भयानक कर्म करनेवाले शत्रुघाती बलिपुत्र वीर बाणासुरने किङ्करोंकी सेनाको आदेश दिया—॥ ७९॥
गच्छध्वं सहिताः सर्वे हन्यतामेव दुर्मतिः।
येन नः कुलचारित्रं दूषितं दूषितात्मना॥ ८०॥
'सैनिको ! तुम सब लोग एक साथ जाओ और उस दुर्बुद्धि मनुष्यको मार डालो, जिसने अपने हृदयको तो दूषित कर ही लिया था, हमारे कुलके सदाचारको भी कलङ्कित कर दिया॥ ८०॥
उषायां धर्षितायां हि कुलं नो धर्षितं महत्।
असम्प्रदत्तां योऽस्माभिः स्वयंग्राहमधर्षयत्॥ ८१॥
'उषाके कलङ्कित हो जानेसे हमारा महान् कुल कलङ्कित हो गया। इस दुष्ट मनुष्यने हमारे दिये बिना ही स्वयं उषाको ग्रहण कर लिया और उसकी पवित्रता नष्ट कर दी॥ ८१॥
अहो वीर्यमहो धैर्यमहो धाष्टर्यं च दुर्मतेः।
यः पुरं भवनं चेदं प्रविष्टो नः स बालिशः॥ ८२॥
'अहो! इस दुष्ट बुद्धिवाले पुरुषका पराक्रम अद्भुत है, धैर्य और धृष्टता भी अद्भुत है, जिससे यह नादान न केवल हमारे नगरमें अपितु हमारे इस घरमें भी घुस आया'॥
एवमुक्त्वा पुनस्तांस्तु किङ्करांश्चोदयद् भृशम्।
ते तस्याज्ञामथो गृह्य सुसंनद्धा विनिर्ययुः॥ ८३॥
यत्रानिरुद्धो ह्यभवत् तत्रागच्छन् महाबलाः॥ ८४॥
ऐसा कहकर बाणासुरने पुनः किंकरोंको विशेषरूपसे प्रेरित किया। उसकी आज्ञा पाकर वे कवच आदिसे सुसज्जित हो युद्धके लिये निकल पड़े। वे सब-के-सब बड़े बलवान् थे; अतः जहाँ अनिरुद्ध थे, वहाँ बेखटके जा पहुँचे॥
नानाशस्त्रोद्यतकरा नानारूपा भयंकराः।
दानवाः समभिक्रुद्धाः प्राद्युम्निवधकांक्षिणः॥ ८५॥
उनके हाथोंमें नाना प्रकारके शस्त्र उठे हुए थे, उनके रूप अनेक प्रकारके थे, वे भय उत्पन्न करनेवाले दानव अनिरुद्धके वधकी इच्छासे अत्यन्त कुपित हो उठे॥ ८५॥
रुरोद तद्द्बलं दृष्ट्वा वाष्पेणावृतलोचना।
प्राद्युम्निवधभीता सा बाणपुत्री यशस्विनी॥ ८६॥
किङ्करोंकी उस सेनाको देखकर यशस्विनी बाणपुत्री उषाके नेत्रोंमें आँसू भर आये। वह अनिरुद्धके मारे जानेके भयसे भीत हो रोने लगी॥ ८६॥
ततस्तु रुदतीं दृष्ट्वा तामूषां मृगलोचनाम्।
हा हा कान्तेति वेपन्तीमनिरुद्धोऽभ्यभाषत॥ ८७॥
वह 'हा प्रियतम ! हा प्राणनाथ !' कहकर काँप रही थी। मृगनयनी उषाको रोती देख अनिरुद्धने उससे कहा—॥८७॥
अभयं तेऽस्तु सुश्रोणि मा भैस्त्वं हि मयि स्थिते।
सम्प्राप्तो हर्षकालस्ते नेहास्ति भयकारणम्॥ ८८॥
'सुश्रोणि ! तुम्हे भय नहीं होना चाहिये। मेरे रहते हुए तुम डरो मत। यह तो तुम्हारे लिये हर्षका समय आया है। इसमें भयका कोई कारण नहीं है॥ ८८॥
कृत्स्नोऽयं यदि बाणस्य भृत्यवर्गो यशस्विनि।
आगच्छति न मे चिन्ता भीरु पश्याद्य विक्रमम्॥ ८९॥
'यशस्विनि! यदि बाणासुरका सारा सेवकसमुदाय आ
६८८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे जाय तो भी मेरे लिये चिन्ताकी बात नहीं है । भीरु ! तुम आज मेरा पराक्रम देखो' ॥ ८९ ॥ तस्य सैन्यस्य निनदं श्रुत्वाभ्यागच्छतस्ततः । सहसैवोत्थितः श्रीमान् प्रद्युम्निः किमिति ब्रुवन् ॥ ९०॥ अपनी ओर आती हुई उस सेनाका कोलाहल सुनकर प्रद्युम्नकुमार श्रीमान् अनिरुद्ध 'यह क्या है ?' ऐसा कहते हुए सहसा उठकर खड़े हो गये ॥ ९० ॥ अथ सोऽपश्यत बलं नानाप्रहरणोद्यतम् । स्थितं समन्ततस्तत्र परिवार्य गृहं महत् ॥ ९१ ॥ तदनन्तर उन्होंने देखा कि उस विशाल गृहको चारों ओरसे घेरकर नाना प्रकारके आयुधोंसे सुसज्जित हुई सेना खड़ी है ॥ ९१ ॥ ततोऽभ्यगच्छत् त्वरितो यत्र तद्वेष्टितं बलम् । क्रुद्धः स्वबलमास्थाय अदशद् दशनच्छदम् ॥ ९२ ॥ तब वे तुरंत ही कुपित हो अपने बलका भरोसा करके उस स्थानकी ओर चल दिये, जहाँ वह सेना घेरा डालकर खड़ी थी । उस समय उन्होंने अपने ओठको दाँतों तले दबा लिया था ॥ ९२ ॥ ततो योद्धमपोढानां बाणेयानां निशम्य तु । सा चित्रलेखास्मरत नारदं देवदर्शनम् ॥ ९३ ॥ इतनेमें ही बाणासुरके सैनिकोंको युद्धके लिये उपस्थित देख चित्रलेखाने देवदर्शी नारदजीका स्मरण किया ॥ ९३ ॥ ततो निमेषमात्रेण सम्प्राप्तो मुनिपुङ्गवः । स्मृतोऽथ चित्रलेखायाः पुरं शोणितसाह्वयम् ॥ ९४ ॥ फिर तो चित्रलेखाके स्मरण करनेपर मुनिवर नारदजी पलक मारते-मारते शोणितपुरमें आ पहुँचे ॥ ९४ ॥ अन्तरिक्षे स्थितस्तत्र सोऽनिरुद्धमथाब्रवीत् । मा भयं स्वस्ति ते वीर प्राप्तोऽस्म्यद्य पुरं तव ॥ ९५ ॥ वहाँ आकाशमें स्थित होकर उन्होंने अनिरुद्धसे कहा— 'वीर ! तुम्हारा कल्याण हो । तुम डरना मत । मैं भी अब तुम्हारे नगरमें आ पहुँचा हूँ' ॥ ९५ ॥ ततश्च नारदं दृष्ट्वा सोऽभिवाद्य महाबलः । प्रहृष्टमानसो भूत्वा युद्धार्थमभिवर्तत ॥ ९६ ॥ नारदजीको उपस्थित देख महाबली अनिरुद्धने उन्हें प्रणाम किया और प्रसन्नचित्त होकर वे युद्धके लिये तैयार हो गये ॥ ९६ ॥ ततस्तेषां स्वनं श्रुत्वा सर्वेषामेव गर्जताम् । सहसैवोत्थितः शूरस्तोत्रार्दित इव द्विपः ॥ ९७ ॥ उस समय गर्जना करते हुए उन सभी सैनिकोंका कोला- हल सुनकर शूरवीर अनिरुद्ध अङ्कुशसे पीड़ित हुए हाथीकी भाँति सहसा उठकर चल दिये ॥ ९७ ॥ तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य संदष्टौष्ठं महाभुजम् । प्रासादाच्चावरोहन्तं भयार्ता विप्रदुद्रुवुः ॥ ९८ ॥ ओठको दाँतोंसे दबाकर महलसे उतरते और अपनी ओर आते हुए महाबाहु अनिरुद्धको देखकर कितने ही सैनिक भयसे व्याकुल होकर भाग खड़े हुए ॥ ९८ ॥ अन्तःपुरद्वारगतं परिघं गृह्य चातुलम् । वधाय तेषां चिक्षेप नानायुद्धविशारदः ॥ ९९ ॥ अन्तःपुरके द्वारपर रखे हुए अनुपम परिघको हाथमें लेकर नाना प्रकारके युद्धोंमें कुशल अनिरुद्धने उन सैनिकोंके वधके लिये उसे चलाया ॥ ९९ ॥ ते सर्वे बाणवर्षेण गदाभिर्मुशलैस्तथा । असिभिः शक्तिभिः शूलैर्निजघ्नु रणगोचरे ॥ १००॥ तब वे समस्त सैनिक रणभूमिमें दिखायी देनेवाले अनिरुद्धपर बाण, गदा, मूसल, खड्ग, शक्ति और शूलोंद्वारा प्रहार करने लगे ॥ १०० ॥ स हन्यमानो नाराचैः परिघैश्च समन्ततः । दानवैः समभिक्रुद्धैः प्रद्युम्निः शस्त्रकोविदैः ॥१०१॥ नाक्षुभ्यत् सर्वभूतात्मा नदन् मेघ इवोष्णगे । आविध्य परिघं घोरं तेषां मध्ये व्यतिष्ठत । सूर्यो दिवि चरन् मध्ये मेघानामिव सर्वशः ॥१०२॥ क्रोधमें भरे हुए शस्त्रकुशल दानवोंद्वारा चारों ओरसे नाराचों और परिघोंका प्रहार होनेपर भी प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्ध क्षुब्ध नहीं हुए; क्योंकि वे सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा हैं । वे वर्षाकालके मेघकी भाँति गर्जना करते और भयंकर परिघ घुमाते हुए उन शत्रुओंके बीचमें खड़े हो गये । मानो आकाशमें मेघमण्डलीके भीतर सब ओर विचरते हुए सूर्य शोभा पा रहे हों ॥ १०१-१०२ ॥ दण्डकृष्णाजिनधरो नारदो हृष्टमानसः । साधु साध्विति वै तत्र सोऽनिरुद्धमभाषत ॥१०३॥ उस समय दण्ड और काला मृगचर्म धारण करनेवाले नारदजी मनमें हर्ष भरकर अनिरुद्धसे बोले—'वीर ! बहुत अच्छा ! बहुत अच्छा !!' ॥ १०३ ॥ ते हन्यमाना रौद्रेण परिघेणामितौजसा । प्राद्रवन्त भयात् सर्वे मेघा वातेरिता यथा ॥१०४॥ उस अमित ओजवाले भयंकर परिघकी मार खाकर वे समस्त सैनिक भयसे भाग खड़े हुए । मानो हवाके वेगसे बादल छिन्न-भिन्न हो गये हों ॥ १०४ ॥ विद्राव्य दानवान् वीरः परिघेण सुविक्रमः । अनिरुद्धो रणे हृष्टः सिंहनादं ननाद च ॥१०५॥
विष्णुपर्व ] एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः [ ६८९
उत्तम पराक्रमी वीर अनिरुद्ध अपने परिघकी मारसे दानवोंको भगाकर रणभूमिमें बड़े हर्षके साथ सिंहनाद करने लगे ॥ १०५ ॥
घर्मान्ते तोयदो व्योम्नि नदन्निव महास्वनः ।
तिष्ठध्वमिति चुक्रोश दानवान् युद्धदुर्मदान् ॥ १०६॥
प्राद्युम्निर्व्यहनञ्चापि सर्व्वाञ्छत्रुनिवर्हणः ।
जैसे वर्षाकालमें आकाशके भीतर छाये हुए मेघ बड़े जोर-जोरसे गर्जना करते हैं, उसी प्रकार शत्रुसूदन प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्धने गर्जना करके उन रणदुर्मद दानवोंसे चिल्लाकर कहा—'अरे ! खड़े रहो।' साथ ही उन्होंने सबका संहार आरम्भ कर दिया ॥ १०६½ ॥
तेन ते समरे सर्वे हन्यमाना महात्मना ॥ १०७॥
यतो बाणस्ततो भीता ययुर्युद्धपराङ्मुखाः ।
उन महामनस्वी वीरके द्वारा समराङ्गणमें मारे जाते हुए वे समस्त सैनिक युद्धसे विमुख हो गये और भयभीत होकर उस स्थानपर गये, जहाँ बाणासुर विद्यमान था ॥ १०७½ ॥
ततो बाणसमीपस्थाः श्वसन्तो रुधिरोक्षिताः ॥ १०८॥
न शर्म लेभिरे दैत्या भयविप्लवचेतसः ।
बाणासुरके समीप खड़े होकर वे सभी दानव लंबी साँस खींचने लगे; उन सबके शरीर रक्तसे रँग गये थे; भयके कारण उनका चित्त व्याकुल हो गया था, अतः उन दैत्योंको चैन नहीं मिलता था ॥ १०८½ ॥
मा भैष्ट मा भैष्ट इति राज्ञा ते तेन चोदिताः ॥ १०९॥
त्रासमुत्सृज्य चैकस्था युध्यध्वं दानवर्षभाः ।
तब राजा बाणासुरने उन्हें आदेश देते हुए कहा—'दानवशिरोमणियो ! डरो मत ! डरो मत !! त्रास छोड़ एक साथ खड़े होकर युद्ध करो' ॥ १०९½ ॥
तानुवाच पुनर्बाणो भयविह्वललोचनान् ॥ ११०॥
किमिदं लोकविख्यातं यश उत्सृज्य दूरतः ।
भवन्तो यान्ति वैक्लव्यं क्लीबा इव विचेतसः ॥ १११॥
उसके इतना कहनेपर भी उनकी आँखें भयसे व्याकुल ही बनी रहीं यह देख बाणासुरने पुनः उनसे कहा—'यह क्या बात है कि तुमलोग अपने विश्वविख्यात यशको दूरसे ही त्यागकर कायरोंके समान व्याकुल और अचेत हो रहे हो ? ॥
कोऽयं यस्य भयत्रस्ता भवन्तो यान्त्यनेकंशः ।
कुलापदेशिनः सर्वे नानायुद्धविशारदाः ॥ ११२॥
'यह कौन है, जिसके भयसे डरकर, तुमलोग झुंड-के-झुंड भागे जा रहे हो। तुम सब लोगोंका कुल विख्यात है तथा तुम नाना प्रकारके युद्धोंकी कलामें निपुण हो (तो भी तुममें यह कायरता कैसे आयी ?) ॥ ११२ ॥
भवद्भिर्न हि मे कार्यं युद्धसाहाय्यमद्य वै।
अब्रवीद् ध्वंसतेत्येवं मत्समीपाच्च नश्यत ॥ ११३॥
'अच्छा, भाग जाओ ! अब तुमलोगोंसे मुझे युद्धविषयक सहायता नहीं लेनी है, मेरे पाससे दूर हो जाओ' ॥ ११३ ॥
अथ तान् वाग्भिरुग्राभित्रासयन् बहुधा बली।
व्यादिदेश रणे शूरानन्यानयुतशः पुनः ॥ ११४॥
इस प्रकार बलवान् बाणासुरने अपने कठोर वचनोंद्वारा उनको बारंबार त्रास देते हुए दूसरे रणवीर योद्धाओंको, जिनकी संख्या दस हजारके लगभग थी, पुनः युद्धके लिये आज्ञा दी ॥ ११४ ॥
प्रमाथगणभूयिष्ठं व्यादिष्टं तस्य निग्रहे ।
अनीकं सुमहद्रौद्रं नानाप्रहरणोद्यतम् ॥ ११५॥
तत्पश्चात् उसने अनिरुद्धको बंदी बनानेके लिये एक महाभयंकर सेनाको आदेश दिया, जिसमें अधिकांश प्रमथगण थे। वह सेना नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित थी ॥
अथान्तरिक्षं बहुधा विद्युत्वद्भिरिवाम्बुदैः ।
बाणानीकैः समभवद् व्याप्तं संदीप्तलोचनैः ॥ ११६॥
फिर तो बिजलीवाले मेघोंकी भाँति चमकीले नेत्रोंवाले बाणासुरके सैनिकोंसे आकाशका बहुत बड़ा भाग व्याप्त हो गया ॥ ११६ ॥
केचित् क्षितिस्थाः प्राक्रोशन् गजा इव समन्ततः ।
अन्तरिक्षे व्यराजन्त घर्मान्त इव तोयदाः ॥ ११७॥
कुछ सैनिक पृथिवीपर ही खड़े हो सब ओर हाथियोंकी भाँति चिग्घाड़ रहे थे तथा कुछ लोग वर्षाकालके बादलोंकी भाँति आकाशमें ही शोभा पाते थे ॥ ११७ ॥
ततस्तत् सुमहत् सैन्यं समेतमभवत् पुनः ।
तिष्ठ तिष्ठेति च तदा वाचोऽश्रूयन्त सर्वशः ॥ ११८॥
तदनन्तर वह विशाल सेना फिर एकत्र हो गयी। उस समय उसमें सब ओर 'ठहरो, खड़े रहो' ये ही बातें सुनायी देती थीं ॥ ११८ ॥
अनिरुद्धो रणे वीरः स च तानभ्यवर्तत ।
तदाश्चर्यं समभवद् यदेकस्तु समागतः ॥ ११९॥
वीर अनिरुद्ध अकेले ही उन सबका सामना कर रहे थे। एकने ही जो उस विशाल सेनाका सामना किया, यह उस समय एक महान् आश्चर्यकी बात हुई ॥ ११९ ॥
अयुध्यत महावीर्यैर्दानवैः सह संयुगे ।
तेषामेव च जग्राह परिघांस्तोमरानपि ॥ १२०॥
वे रणभूमिमें उन महापराक्रमी दानवोंके साथ युद्ध करने लगे। उन्होंने शत्रुओंके ही परिघों तथा तोमरोंको ले लिया ॥ १२० ॥
| ६९० | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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तैरेव च तदा युद्धे ताञ्जघान महाबलः।
पुनः परिघमुत्सृज्य प्रगृह्य रणमूर्धनि ॥१२१॥
उन महाबली वीरने उन्हीं परिघोंद्वारा उस समय युद्धमें उन शत्रुओंका संहार किया। वे युद्धके मुहानेपर बारंबार परिघको छोड़ते और ग्रहण करते थे ॥ १२१ ॥
स तेन विचरन् मार्गानैकः शत्रुनिबर्हणः।
भ्रान्तमुद्भ्रान्तमाविद्धमाप्लुतं विप्लुतं प्लुतम् ॥१२२॥
इति प्रकाराद् द्वात्रिंशद् विचरन्नाभ्यदृश्यत।
शत्रुसूदन अनिरुद्ध उस परिघसे अनेक पैंतरे दिखाते हुए युद्धमें अकेले ही विचरते थे। वे भ्रान्त, उद्भ्रान्त, आविद्ध, आप्लुत, विप्लुत और प्लुत आदि बत्तीस प्रकारके पैंतरोंसे विचरते हुए दिखायी दिये ॥ १२२ १/२॥
एकं सहस्रशश्चात्र ददृशू रणमूर्धनि ॥१२३॥
क्रीडन्तं बहुधा युद्धे व्यादितास्यमिवान्तकम्।
रणभूमिमें युद्धके मुहानेपर मुँह बाये हुए कालके समान अनेक प्रकारसे परिघ चलानेकी क्रीडा करते हुए एक ही अनिरुद्धको शत्रुओंने सहस्रोंकी संख्यामें देखा ॥ १२३ १/२ ॥
ततस्तेनाभिसंतप्ता रुधिरौघपरिप्लुताः ॥१२४॥
पुनर्भग्नाः प्राद्रवन्त यत्र बाणो व्यवस्थितः।
उस समय उनसे संतप्त हो रक्तके प्रवाहमें डूबे हुए दानव फिर अपना व्यूह भग्न करके भाग खड़े हुए और जहाँ बाणासुर खड़ा था, वहाँ जा पहुँचे ॥ १२४ १/२ ॥
गजत्राजिरथौघैस्ते चोद्यमानाः समन्ततः ॥१२५॥
कृत्वा चार्तस्वरं घोरं दिशो जग्मुर्हतौजसः।
हाथी, घोड़े तथा रथसमूह उन्हें चारों ओर लिये जा रहे थे। वे हतोत्साह दानव घोर आर्त्तनाद करके सम्पूर्ण दिशाओंमें भागे जा रहे थे ॥ १२५ १/२ ॥
एकैकस्योपरि तदा तेऽन्योन्यं भयपीडिताः ॥१२६॥
वमन्तः शोणितं जग्मुर्विषादाद् विमुखा रणे।
वे उस समय भयसे पीड़ित हो भागते समय परस्पर एक-एकके ऊपर चढ़ जाते थे तथा अधिक खेदके कारण युद्धसे विमुख हो रक्त वमन करते हुए पलायन कर रहे थे ॥
न बभूव पुरा देवैर्युध्यतां तादृशं भयम् ॥१२७॥
यादृशं युध्यमानानामनिरुद्धेन संयुगे।
पूर्वकालमें देवताओंके साथ युद्ध करते समय भी उन दानवोंको वैसा भय नहीं हुआ था, जैसा समराङ्गणमें अनिरुद्धके साथ युद्ध करते समय हुआ था १२७ १/२ ॥
केचिद् वमन्तो रुधिरं ह्यपतन् वसुधातले ॥१२८॥
दानवा गिरिशृङ्गाभा गदाशूलासिपाणयः।
कितने ही पर्वत-शिखरके समान विशालकाय दानव हाथोंमें गदा, शूल और तलवार लिये रक्त वमन करते हुए पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ १२८ १/२ ॥
ते बाणमुत्सृज्य रणे जग्मुर्भयसमाकुलाः ॥१२९॥
विशालमाकाशतलं दानवा निर्जितास्तदा।
उस समय रणभूमिमें पराजित हुए दानव भयसे व्याकुल हो बाणासुरको वहीं छोड़कर विशाल आकाशमें भाग गये ॥
निःशेषभग्नां महतीं दृष्ट्वा तां वाहिनीं तदा ॥१३०॥
बाणः क्रोधात्प्रजज्वाल समिद्धोऽग्निरिवाध्वरे।
जैसे यज्ञमें समिधा पाकर अग्नि प्रज्वलित हो उठती है, उसी प्रकार उस समय अपनी विशाल सेनाको पूर्णरूपसे भग्न हुई देख बाणासुर क्रोधसे जल उठा ॥ १३० १/२ ॥
अन्तरिक्षचरो भूत्वा साधुवादी समन्ततः ॥१३१॥
नारदो नृत्यति प्रीतो ह्यनिरुद्धस्य संयुगे।
इधर युद्धमें अनिरुद्धके पराक्रमसे प्रसन्न हुए नारदजी आकाशमें सब ओर विचरते और उन्हें साधुवाद देते हुए नृत्य करने लगे ॥ १३१ १/२ ॥
एतस्मिन्नन्तरे चैव बाणः परमकोपनः ॥१३२॥
कुम्भाण्डसंगृहीतं तु रथमास्थाय वीर्यवान्।
ययौ यत्रानिरुद्धो वै उद्यतासी रथे स्थितः ॥१३३॥
इसी बीचमें अत्यन्त क्रोधी और बलवान् बाणासुर कुम्भाण्डद्वारा नियन्त्रित रथपर आरूढ़ हो उसी रथपर
१. तलवार या परिघको गोलाकार घुमाना भ्रान्त कहलाता है, इससे शत्रुके प्रहारको निष्फल किया जाता है।
२. तलवार या परिघ चलानेका दूसरा पैंतरा--जिसमें हाथको ऊँचा करके उसे घुमाया जाता है।
३. तलवार या परिघ चलानेके बत्तीस हाथोंमेंसे एक, जिसमें तलवार या परिघको अपने चारों ओर घुमाकर दूसरेके चलाये हुए वारको व्यर्थ या खाली करते हैं।
४. सब ओर घूम-घूमकर उछलते हुए परिघ या तलवारको चलाना।
५. विशिष्ट रूपसे परिघका सञ्चालन करके शत्रु-सेनामें विप्लव मचा देना।
६. सामान्यतः कूद-कूदकर शत्रुके सम्मुख परिघ या तलवारको चलाना।
७. तलवार या परिघ चलानेके बत्तीस हाथ गिनाये गये हैं, जिनके नाम ये हैं—भ्रान्त, उद्भ्रान्त, आविद्ध, आप्लुत, विप्लुत, प्लुत, सृत, संचान्त, समुदीर्ण, निग्रह, प्रग्रह, पदावकर्षण, संधान, मस्तक आमण, भुजत्राणण, पाश, पाद, विबन्ध, भूमि, उद्भ्रमण, गति, प्रत्यागति, आक्षेप, पातन, उत्थानकप्लुति, लघुता, सौष्ठव, क्षोभा, स्थेय, दृढमुष्टिता, तिर्यक्प्रचार और ऊर्ध्वप्रचार ।
विष्णुपर्व ] एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ६५१
बैठा हुआ उस स्थानपर गया, जहाँ अनिरुद्ध तलवार हाथमें लिये खड़े थे ॥ १३२-१३३ ॥
पट्टिशासिगदाशूलमुद्यम्य च परश्वधान् ।
बभौ बाहुसहस्रेण शक्रो ध्वजशतैरिव ॥ १३४॥
बद्धगोधाङ्गुलित्रैश्च बाहुभिः स महाभुजः।
नानाप्रहरणोपेतः शुशुभे दानवोत्तमः ॥१३५॥
बाणासुर अपनी सहस्र भुजाओंसे पट्टिश, खड्ग, गदा, शूल और फरसे उठा सैकड़ों ध्वजोंसे युक्त देवराज इन्द्रके समान शोभा पाता था। जिनकी अँगुलियोंमें गोधाचर्मके दस्ताने बँधे हुए थे, उन भुजाओंसे नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लिये वह महाबाहु दानवराज बड़ी शोभा पा रहा था ॥
सिंहनादं नदन् क्रुद्धो विस्फारितमहाधनुः।
अब्रवीत् तिष्ठ तिष्ठेति क्रोधसंरक्तलोचनः ॥१३६॥
उसके नेत्र क्रोधसे लाल हो रहे थे; वह क्रोधमें भरकर सिंहके समान दहाड़ता और अपने विशाल धनुषको खींचता हुआ बोला—'अरे खड़ा रह ! खड़ा रह !!' ॥ १३६ ॥
वचनं तस्य संश्रुत्य प्रद्युम्निरपराजितः ।
बाणस्य वदनं संख्ये समुद्वीक्ष्य ततोऽहसत् ॥१३७॥
बाणासुरकी बात सुनकर और युद्धस्थलमें उसके मुखपर दृष्टि डालकर अपराजित वीर प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्ध हँसने लगे ॥ १३७ ॥
किङ्किणीशतनिर्घोषं रक्तध्वजपताकिनम्।
ऋष्यचर्मावनद्धाङ्गं दशनल्वं महारथम् ॥१३८॥
बाणासुरका विशाल रथ दस नल्व ( चार हजार हाथ ) के बराबर था; उसमें सैकड़ों छोटी-छोटी घंटियाँ लगी थीं; जिनकी ध्वनि सब ओर गूँजती रहती थी; उस रथकी ध्वजा-पताकाएँ लाल रङ्गकी थीं तथा उस रथके प्रत्येक अवयवपर ऋष्यनामक मृगविशेषका चमड़ा मढ़ा हुआ था ॥ १३८ ॥
तस्य वाजसहस्रं तु रथे युक्तं महात्मनः।
पुरा देवासुरे युद्धे हिरण्यकशिपोरिव ॥१३९॥
उस महाकाय दानवके रथमें एक सहस्र घोड़े जुते हुए थे; ठीक उसी तरह जैसे पूर्वकालमें देवासुर संग्रामके अवसरपर हिरण्यकशिपुके रथमें जोते गये थे ॥ १३९ ॥
तमापतन्तं ददृशे दानवं यदुपुङ्गवः।
सम्पहृष्टस्ततो युद्धे तेजसा चाप्यपूर्यत ॥१४०॥
यदुकुलतिलक अनिरुद्धने जब उस दानवको आक्रमण करते देखा; तब वे युद्धके लिये हर्ष और उत्साहसे भर गये तथा महान् तेजसे सम्पन्न हो गये ॥ १४० ॥
असिचर्मधरो वीरः स्वस्थः संग्रामलालसः ।
नरसिंहो यथा पूर्वमादिदैत्यवधोद्यतः ॥१४१॥
जैसे पूर्वकालमें आदिदैत्य हिरण्यकशिपुका वध करनेके लिये उद्यत हुए भगवान् नरसिंह शोभा पाते थे, उसी प्रकार संग्रामकी लालसासे ढाल और तलवार धारण किये स्वस्थभावसे खड़े हुए वीर अनिरुद्ध सुशोभित होते थे ॥ १४१ ॥
आपतन्तं ददर्शार्थ खड्गचर्मधरं तदा।
खड्गचर्मधरं तं तु दृष्ट्वा बाणः पदातिनम् ॥१४२॥
प्रहर्षमतुलं लेभे प्रद्युम्निवधकाङ्क्षया।
उस समय बाणासुरने अनिरुद्धको ढाल और तलवार लिये अपने सामने आते देखा। उन्हें केवल ढाल और तलवार धारण किये पैदल आते देख उन्हें मार डालनेकी इच्छासे बाणासुरको अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ ॥ १४२½ ॥
तनुत्रेण विहीनश्च खड्गपाणिश्च यादवः ॥१४३॥
अजेय इति तं मत्वा युद्धायाभिमुखः स्थितः ।
कवचसे रहित तथा केवल खड्ग हाथमें लिये होनेपर भी यादववीर अनिरुद्ध बाणासुरको 'यह अजेय है' ऐसा मानते हुए भी निःशङ्क हो उसके सामने युद्धके लिये खड़े हुए ॥ १४३½ ॥
अनिरुद्धं रणे बाणो जितकाशी महाबलः ॥१४४॥
वाचं चोवाच संक्रुद्धो गृह्यतां हन्यतामिति ।
विजयसे सुशोभित होनेवाला महाबली बाणासुर कुपित हो रणभूमिमें अनिरुद्धसे बोला—'इसे पकड़ो, मारो' ॥
वाचं च ब्रुवतस्तस्य श्रुत्वा प्रद्युम्निराहवे ॥१४५॥
बाणस्य ब्रुवतः क्रोधाद्धसमानोऽभ्युदैक्षत ।
उस समराङ्गणमें इस तरह बोलते हुए बाणासुरकी बात सुनकर हँसते हुए प्रद्युम्नकुमारने क्रोधपूर्वक उसकी ओर देखा॥
उषां भयपरित्रस्तां रुदतीं तत्र भामिनीम् ॥१४६॥
अनिरुद्धः प्रहस्याथ समाश्वास्य च तां स्थितः ।
वहाँ भयसे संत्रस्त हो रोती हुई भामिनी उषाको सान्त्वना देकर अनिरुद्ध हँसते हुए युद्धके लिये खड़े हो गये॥
अथ बाणः शरौघाणां क्षुद्रकाणां समन्ततः ॥१४७॥
विक्षेप समरे क्रुद्धो ह्यनिरुद्धवधेप्सया ।
अनिरुद्धस्तु चिच्छेद काङ्क्षंस्तस्य पराजयम् ॥ १४८॥
तदनन्तर समरभूमिमें कुपित हुए बाणासुरने अनिरुद्धके वधकी इच्छासे उनपर चारों ओरसे क्षुद्रक नामक बाणसमूहोंका प्रहार आरम्भ किया। किंतु अनिरुद्धने उसे पराजित करनेकी इच्छा रखकर उसके सारे बाणोंको तलवारसे ही काट डाला॥
ववर्ष शरजालानि क्षुद्रकाणां समन्ततः ।
बाणोऽनिरुद्धशिरसि काङ्क्षंस्तस्य रणे वधम् ॥१४९॥
तब बाणासुरने पुनः रणभूमिमें अनिरुद्धके वधकी
६५२ -श्रीमहाभारते खिलभागे- [ हरिवंशे अभिलाषासे उनके सिरपर सब ओरसे क्षुद्रक नामवाले दान- हरसेको काट दिया और युद्धके मुहानेपर तलवारसे ही उसके समूहोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ १४९ ॥ घोड़ोंको मार डाला ॥ १५७ ॥ ततो बाणसहस्राणि चर्मणा व्यवधूय सः । तं पुनः शरवर्षेण पट्टिशैस्तोमरैरपि । बभौ प्रमुखतस्तस्य स्थितः सूर्य इवोदये ॥१५०॥ चकाराऽन्तर्हितं बाणो युद्धमार्गविशारदः ॥१५८॥ उस समय उसके हजारों बाणोंको ढालसे ही इधर-उधर तब युद्धमार्गके ज्ञानमें निपुण बाणासुरने पुनः पट्टिशों, करके अनिरुद्ध उसके सामने खड़े हो उदयकालके सूर्यकी तोमरों और बाणोंकी वर्षा करके अनिरुद्धको ढँक दिया ॥ भाँति शोभा पाने लगे ॥ १५० ॥ हतोऽयमिति विज्ञाय प्राणदन् नैर्ऋता गणाः । सोऽभिभूय रणे बाणमास्थितो यदुनन्दनः । ततोऽवप्लुत्य सहसा रथपार्श्वे व्यवस्थितः ॥१५९॥ सिंहः प्रमुखतो दृष्ट्वा गजमेकं यथा वने ॥१५१॥ अब यह मारा गया ऐसा जानकर वे दैत्य गर्जना करने रणभूमिमें बाणासुरका तिरस्कार करके यदुनन्दन लगे; इतनेमें ही अनिरुद्ध सहसा कूदकर रथके पार्श्वभागमें अनिरुद्ध उसी तरह निर्भय खड़े रहे, जैसे वनमें सिंह अपने खड़े हो गये ॥ १५९ ॥ सामने एक हाथीको देखकर निर्भय खड़ा रहता है ॥ १५१॥ शक्तिं वाणस्ततः क्रुद्धो घोररूपां भयानकाम् । ततो वाणः स बाणौघैर्मर्मभेदिभिराशुगैः । जग्राह ज्वलितां घोरां घण्टामालाकुलां रणे ॥१६०॥ विव्याध निशितैस्तीक्ष्णैः प्रद्युम्निमपराजितम् ॥१५२॥ ज्वलनादित्यसंकाशां यमदण्डोग्रदर्शनाम् । तदनन्तर बाणासुरने अपराजित वीर प्रद्युम्नकुमारको प्राहिणोत् तामसङ्गेन महोल्कां ज्वलितामिव ॥१६१॥ मर्मभेदी, शीघ्रगामी, तेज किये हुए, पैने बाणसमूहोंद्वारा तब कुपित हुए बाणासुरने रणभूमिमें एक घोर एवं घायल कर दिया ॥ १५२ ॥ भयानक शक्ति हाथमें ली, जो अग्निके समान प्रज्वलित हो समाहतस्ततो बाणैः खड्गचर्मधरोऽपतत् । रही थी; वह घोर शक्ति घंटाओंकी मालाओंसे व्याप्त थी। तमापतन्तं निशितैरभ्यहन् सायकैस्तथा ॥१५३॥ उसका तेज अग्नि और सूर्यके समान जान पड़ता था तथा उन बाणोंसे घायल होनेपर अनिरुद्ध ढाल और तलवार वह यमदण्डके समान भयानक दिखायी देती थी; उस दैत्यने लिये बाणासुरपर टूट पड़े । उन्हें आक्रमण करते देख उस निर्भय होकर जलती हुई उल्काके समान वह शक्ति अनिरुद्ध- असुरने तीखे सायकोंसे उनपर और भी चोट की ॥ १५३ ॥ पर चला दी ॥ १६०-१६१ ॥ सोऽतिविद्धो महाबाहुर्बाणैः संनतपर्वभिः । तामापतन्तीं सम्प्रेक्ष्य जीवितान्तकरीं तदा । क्रोधेनाभिप्रजज्वाल चिकीर्षुः कर्म दुष्करम् ॥१५४॥ सोऽभिप्लुत्य तदा शक्तिं जग्राह पुरुषोत्तमः ॥१६२॥ झुकी हुई गाँठवाले बाणोंसे अत्यन्त घायल होनेपर निर्विभेद ततो बाणं तया शक्त्या महाबलः । महाबाहु अनिरुद्ध क्रोधसे जल उठे और दुष्कर कर्म करनेकी सा भित्त्वा तस्य देहं वै प्राविशद् धरणीतलम् ॥१६३॥ इच्छा करने लगे ॥ १५४ ॥ उस समय जीवनका अन्त कर देनेवाली उस शक्तिको रुधिरौघप्लुतैर्गात्रैर्बाणवर्षैः समाहितः । अपने ऊपर आती देख पुरुषप्रवर महाबली अनिरुद्धने अभिभूतः सुसंक्रुद्धो ययौ बाणरथं प्रति ॥१५५॥ उछलकर तत्काल उसे हाथसे पकड़ लिया और उसी शक्तिसे असिभिर्मुसलैः शूलैः पट्टिशैस्तोमरैस्तथा । बाणासुरको विदीर्ण कर डाला; वह शक्ति उसके शरीरको सोऽतिविद्धः शरौघैश्च प्रद्युम्निर्न व्यकम्पत ॥१५६॥ विदीर्ण करती हुई पृथ्वीमें समा गयी ॥ १६२-१६३ ॥ बाणोंकी वर्षासे आच्छादित हो अनिरुद्धके सारे अङ्ग स गाढविद्धो व्यथितो ध्वजयष्टिं समाश्रितः । खूनसे लथपथ हो गये, इस तरह पराभव प्राप्त होनेसे ततो मूर्च्छाभिभूतं तं कुम्भाण्डो वाक्यमब्रवीत् ॥१६४॥ अनिरुद्धका क्रोध बहुत बढ़ गया और वे बाणासुरके रथकी उस शक्तिकी गहरी चोटसे पीड़ित हो बाणासुरने ध्वज- ओर चल दिये। उस समय तलवारों, मूसलों, शूलों, पट्टिशों, दण्डका सहारा ले लिया। उसे मूर्च्छित हुआ देख कुम्भाण्डने तोमरों और बाणसमूहोंसे अत्यन्त घायल होनेपर भी प्रद्युम्न- उससे कहा-॥ १६४ ॥ कुमार कम्पित नहीं हुए ॥ १५५-१५६ ॥ उपेक्षसे दानवेन्द्र किमेवं शत्रुमुद्यतम् । आप्लुत्य सहसा क्रुद्धो रथेषां तस्य सोऽच्छिनत्। लब्धलक्षो ह्ययं वीरो निर्विकारोऽद्य दृश्यते ॥१६५॥ जघान चाश्वान् खड्गेन बाणस्य रणमूर्धनि ॥१५७॥ 'दानवराज ! इस प्रकार उद्यत हुए शत्रु की उपेक्षा किस सहसा क्रोधपूर्वक उछलकर उन्होंने बाणासुरके रथके लिये करते हो । इस वीरने अपना लक्ष्य पा लिया है, अतः आज निर्विकार दिखायी देता है ॥ १६५ ॥
विष्णुपर्व ] एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः [ ६९३
मायामाश्रित्य युध्यस्व नायं वध्योऽन्यथा भवेत्।
आत्मानं मां च रक्षस्व प्रमादात् किमुपेक्षसे ॥१६६॥
‘मायाका आश्रय लेकर युद्ध करो, अन्यथा यह मारा नहीं जा सकेगा। तुम अपनी और मेरी भी रक्षा करो। प्रमादवश उपेक्षा क्यों करते हो ॥ १६६ ॥
वध्यतामयमद्यैव न नः सर्वान् विनाशयेत्।
अन्यांश्च शतशो हत्वा उषां नीत्वा व्रजिष्यति ॥१६७॥
‘इसको अभी मार डालो; कहीं ऐसा न हो यह हम सब लोगोंका नाश कर डाले; यदि तुम सावधान नहीं हुए तो यह अन्य सैकड़ों वीरोंको मारकर उषाको भी लेकर चला जायगा’ ॥ १६७ ॥
कुम्भाण्डवचनैरेवं दानवेन्द्रः प्रनोदितः।
वाचं रूक्षामभिक्रुद्धः प्रोवाच वदतां वरः ॥१६८॥
कुम्भाण्डके वचनोंसे इस प्रकार प्रेरित हुआ वक्ताओंमें श्रेष्ठ दानवराज बाण अत्यन्त कुपित हो यह रूखी बात बोला—॥
एषोऽहमस्य विद्धे मृत्युं प्राणहरं रणे।
आदास्याम्यहमेतं वै गरुत्मानिव पन्नगम् ॥१६९॥
‘यह लो ! मैं अभी रणभूमिमें इसे मौतके हवाले कर देता हूँ, जो इसके प्राण हर लेगी। जैसे गरुड़ सर्पको दबोच लेता है, उसी प्रकार मैं भी इसे अपने काबूमें कर लूँगा’ ॥
इत्येवमुक्त्वा सरथः सध्वजः साश्वसारथिः।
गन्धर्वनगराकारस्तत्रैवान्तरधीयत ॥१७०॥
ऐसा कहकर रथ, ध्वज, घोड़े और सारथिसहित बाणासुर गन्धर्वनगरके समान वहीं अन्तर्धान हो गया ॥१७०॥
मुमोच निशितान् बाणांश्छन्नो मायाधरो बली।
विद्यायान्तर्हितं बाणं प्रद्युम्निरपराजितः ॥१७१॥
पौरुषेण समायुक्तः सम्प्रैक्षत दिशो दश।
वह मायाधारी बलवान् दानव स्वयं छिपकर अनिरुद्धपर पैने बाणोंकी वर्षा करने लगा। बाणासुरको अदृश्य हुआ जान अपराजित वीर अनिरुद्ध पुरुषार्थसे युक्त हो दसों दिशाओंकी ओर देखने लगे ॥ १७१½ ॥
आस्थाय तामसीं विद्यां तदा क्रुद्धो बलेः सुतः ॥१७२॥
मुमोच विशिखांस्तीक्ष्णांश्छन्नो मायाधरो बली।
तब क्रोधमें भरे हुए मायाधारी बलिपुत्र बलवान् बाणासुरने तामसी विद्याका आश्रय ले छिपे रहकर तीखे बाणोंका प्रहार आरम्भ किया ॥ १७२ ॥
प्रायुम्निः शरविद्धैर्बद्धः सर्पभूतैः समन्ततः ॥१७३॥
वेष्टितो बहुधा तस्य देहः पन्नगराशिभिः।
उस समय प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्ध सर्पाकार बाणोंद्वारा चारों ओरसे बँध गये। उनका शरीर सर्पसमूहोंसे बारंबार आवेष्टित हो गया ॥ १७३½ ॥
स तु वेष्टितसर्वाङ्गो बद्धः प्रद्युम्निराहवे ॥१७४॥
निष्प्रयत्नः कृतस्तस्थौ मैनाक इव पर्वतः।
युद्धमें सारे अङ्ग सर्पोंसे वेष्टित एवं बद्ध हो जानेके कारण प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्ध निश्चेष्ट कर दिये गये और वे मैनाक पर्वतकी भाँति अचलभावसे खड़े हो गये ॥ १७४½ ॥
ज्वालावलीढवदनैः सर्पभोगैर्विचेष्टितः ॥१७५॥
अभितः पर्वताकारः प्रद्युम्निरभवद् रणे।
मुखसे आग उगलनेवाले सर्पोंके शरीरोंद्वारा सब ओरसे आवेष्टित एवं चेष्टाहीन हुए अनिरुद्ध उस रणभूमिमें पर्वतके समान प्रतीत होते थे ॥ १७५½ ॥
निष्प्रयत्नगतिश्चापि सर्पवक्त्रमयैः शरैः ॥१७६॥
न विव्यथे स भूतात्मा सर्वतः परिवेष्टितः।
सर्पमुख बाणोंद्वारा सब ओरसे परिवेष्टित हो अपना प्रयत्न और गति अवरुद्ध हो जानेपर भी सर्वभूतात्मा अनिरुद्ध मनमें व्यथित नहीं हुए ॥ १७६½ ॥
ततस्तं वाग्भिरुग्राभिः संरब्धः समतर्जयत् ॥१७७॥
बाणो ध्वजं समाश्रित्य प्रोवाचामर्षितो वचः।
तब रोषमें भरे हुए बाणासुरने कठोर वचनोंद्वारा अनिरुद्धको फटकारा; फिर उसने ध्वजका सहारा लेकर अमर्षयुक्त हो यह बात कही—॥ १७७½ ॥
कुम्भाण्ड वध्यतां शीघ्रमयं वै कुलपांसनः ॥१७८॥
चारित्रं येन मे लोके दूषितं दूषितात्मना।
‘कुम्भाण्ड ! इस कुलाङ्गारका शीघ्र वध कर डालो, जिस दूषित हृदयवाले दुष्टने संसारमें मेरे यशको कलङ्कित कर दिया’ ॥
इत्येवमुक्ते वचने कुम्भाण्डो वाक्यमब्रवीत् ॥१७९॥
राजन् वक्ष्याम्यहं किंचित् तन्मे शृणु यदिच्छसि।
बाणासुरके ऐसा कहनेपर मन्त्री कुम्भाण्डने कहा—‘राजन् ! इस विषयमें मैं कुछ कहना चाहता हूँ। यदि आपकी इच्छा हो तो मेरी उस बातको सुन लें ॥ १७९½ ॥
अयं विज्ञायतां कस्य कुतो वायमिहागतः ॥१८०॥
केन चायमिहानीतः शक्रतुल्यपराक्रमः।
‘पहले इस बातको जान लीजिये, यह किसका पुत्र है और कहाँसे यहाँ आया है अथवा इस इन्द्रतुल्य पराक्रमी वीरको कौन यहाँ ले आया है ? ॥ १८०½ ॥
मयायं बहुशो राजन् दृष्टो युध्यन् महारणै ॥१८१॥
क्रीडन्निव च युद्धेषु दृश्यते देवसूनुवत्।
‘राजन् ! मैंने इस महासमरमें युद्ध करते समय इसकी ओर बारंबार देखा है। यह युद्धभूमिमें देवकुमारके समान क्रीड़ा करता-सा दिखायी देता था ॥ १८१½ ॥
६९४ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
बलवान् सत्त्वसम्पन्नः सर्वशस्त्रविशारदः ॥ १८२॥
नायं वधकृतं दोषमर्हते दैत्यसत्तम।
'दैत्यप्रवर ! यह बलवान्, धैर्यसम्पन्न तथा सम्पूर्ण शस्त्रविद्यामें प्रवीण है। अतः वधरूप दोषका पात्र नहीं है॥
गान्धर्वेण विवाहेन कन्येयं तव संगता ॥ १८३॥
अदेया ह्यप्रतिग्राह्या अतश्चिन्त्य वधं कुरु ।
'आपकी कन्याने गान्धर्व विवाहके द्वारा इसके साथ समागम किया है। अतः न तो अब वह दूसरेको देने योग्य रह गयी है और न दूसरेके द्वारा ग्रहण करने योग्य ही; अतः खूब सोच-विचारकर इसका वध कीजिये ॥ १८३ १/२ ॥'
विज्ञाय च वधं वास्य पूजां वास्य करिष्यसि ॥ १८४॥
वधे ह्यस्य महान् दोषो रक्षणे सुमहान् गुणः।
'पहले इसका परिचय प्राप्त करके फिर वध अथवा पूजन कीजियेगा। इसका वध करनेमें महान् दोष है और रक्षा करनेमें महान् गुण ॥ १८४ १/२ ॥'
अयं हि पुरुषोत्कृष्टः सर्वथा मानमर्हति ॥ १८५॥
सर्वतो वेष्टितस्तूर्णं व्यथत्येष भोगिभिः ।
कुलशौण्डीर्यवीर्यैश्च सत्त्वेन च समन्वितः ॥ १८६॥
'यह पुरुषोंमें श्रेष्ठ होनेके कारण सर्वथा सम्मानके योग्य है। देखिये ! सर्पोंने सब ओरसे इसके शरीरको जकड़ लिया है तो भी यह व्यथित नहीं होता है। अपने कुलके अभिमान, बल-पराक्रम तथा धैर्यसे सम्पन्न है ॥ १८५-१८६ ॥
पश्य राजन् महावीर्यैरन्वितः पुरुषोत्तमः ।
न नो गणयते सर्वान् वधं प्राप्तोऽप्ययं बली ॥ १८७॥
'राजन् ! देखिये तो सही ! महाबली सर्पोंसे बद्ध होकर वधावस्थाको प्राप्त होनेपर भी यह बलवान् पुरुषोत्तम वीर हम सब लोगोंको कुछ भी नहीं गिनता है ॥ १८७ ॥
यदि मायाप्रभावेण नात्र बद्धो भवेदयम्।
सर्वान् सुरगणान् संख्ये योधयेन्नात्र संशयः ॥ १८८॥
'यदि यह मायाके प्रभावसे बाँधा न गया होता तो रणभूमिमें केवल असुरोंसे ही नहीं, समस्त देवताओंसे भी युद्ध कर सकता था, इसमें संशय नहीं है ॥ १८८ ॥
सर्वसंग्राममार्गज्ञो भवेद् वीर्याधिकस्तव ।
शोणितौघप्लुवैर्गात्रैर्नागभोगैश्च वेष्टितः ॥ १८९॥
त्रिशिखां भ्रुकुटिं कृत्वा न चिन्तयति नः स्थितान्।
'यह युद्धके सभी मागोंका ज्ञाता तथा बल-पराक्रममें आपसे भी बढ़कर है। इसके सारे अङ्ग खूनसे लथपथ हो गये हैं। इसे सर्पके शरीरोंसे जकड़ दिया गया है तो भी यह भौंहोंको तीन जगहसे टेढ़ी करके यहाँ खड़े हुए हमलोगोंको कुछ भी नहीं समझता है ॥ १८९ १/२ ॥
इमामवस्थां नीतोऽपि स्वबाहुबलमाश्रितः ॥ १९०॥
न चिन्तयति राजंस्त्वां वीर्यवान् कोऽप्यसौ युवा।
'राजन् ! इस अवस्थाको पहुँच जानेपर भी यह अपने बाहुबलका भरोसा करके आपकी कोई परवा नहीं करता है। वास्तवमें यह युवक कोई अद्भुत पराक्रमी वीर है ॥ १९० १/२ ॥'
सहस्रबाहोः समरे द्विबाहुः समवस्थितः ।
न चिन्तयति ते वीर्यमयं वीर्यमदान्वितः ॥ १९१॥
उचितं यदि ते राजन् ज्ञेयो वीर्यबलान्वितः ।
'सहस्रबाहुके साथ समरभूमिमें यह दो ही बाँहोंका वीर खड़ा है, किंतु अपने बल-पराक्रमके मदसे उन्मत्त हो आपके बल-वीर्यको कुछ नहीं समझता ॥ १९१ १/२ ॥'
कन्या चेयं न चान्यस्य निर्यात्ये तेन संगता ॥ १९२॥
यदि चेष्टतमः कश्चिदयं वंशे महात्मनाम् ।
ततः पूजामयं वीरः प्राप्स्यते चासुरोत्तम ॥ १९३॥
'असुरप्रवर ! आपकी यह कन्या इसके साथ सम्बन्ध स्थापित कर चुकी है, अतः अब दूसरेको नहीं दी जा सकती। यदि यह किन्हीं महात्मा पुरुषोंके कुलमें उत्पन्न हो तो हमारे लिये परम अभीष्ट है। उस दशामें यह वीर हमसे पूजा प्राप्त करेगा ॥ १९२-१९३ ॥
रक्ष्यतामिति चोक्त्वैव तथास्त्विति च तस्थिवान् ।
एवमुक्ते तु वचने कुम्भाण्डेन महात्मना ॥ १९४॥
तथेत्याह च कुम्भाण्डं बाणः शत्रुनिषूदनः ।
'अतः आप इसकी रक्षा कीजिये।' इतना कहकर ही कुम्भाण्ड चुप हो गये। महात्मा कुम्भाण्डके ऐसी बात कहने-पर शत्रुसूदन बाणासुर भी उनसे 'तथास्तु' कहकर चुपचाप बैठा रहा ॥ १९४ १/२ ॥'
संरक्षिणस्ततो दत्त्वा अनिरुद्धस्य धीमतः ॥ १९५॥
ययौ स्वमेव भवनं बलेः पुत्रो महायशाः ।
तदनन्तर ! बुद्धिमान् अनिरुद्धके लिये पहरेदार देकर महायशस्वी बलिपुत्र बाणासुर अपने घरको ही चला गया ॥
संयतं मायया दृष्ट्वा अनिरुद्धं महाबलम् ॥ १९६॥
ऋषीणां नारदः श्रेष्ठोऽव्रजद् द्वारवतीं प्रति ।
ततो ह्याकाशमार्गेण मुनिर्द्वारवतीं गतः ॥ १९७॥
महाबली अनिरुद्धको मायाद्वारा बँधा हुआ देख मुनिश्रेष्ठ नारद आकाशमार्गसे द्वारकापुरीकी ओर चल दिये ॥ १९६-१९७॥
गते ऋषीणां प्रवरे सोऽनिरुद्धो व्यचिन्तयत् ।
नष्टोऽयं दानवः क्रूरो युद्धमेष्यत्यसंशयः ॥ १९८॥
मुनिप्रवर नारदजीके चले जानेपर अनिरुद्ध मन-ही-मन इस प्रकार विचार करने लगे—यह क्रूर दानव कहीं छिप गया है। पुनः युद्धके लिये आयेगा, इसमें संशय नहीं है ॥१९८॥
विष्णुपर्व ] विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ६९५
स गत्वा नारदस्तत्र शङ्खचक्रगदाधरम्।
ज्ञापयिष्यति तत्त्वेन इममर्थं न संशयः ॥१९९॥
नारदजी वहाँ जाकर शङ्ख-चक्र-गदाधर भगवान् श्रीकृष्णसे यह सब समाचार ठीक-ठीक बतायेंगे, इसमें कोई संदेह नहीं है ॥ १९९ ॥
नागैर्विचेष्टितं दृष्ट्वा उषा प्राद्युम्निमातुरा।
रुरोद बाष्परुद्धाक्षी तामाह रुदतीं पुनः ॥२००॥
साँपोंसे बँधकर अनिरुद्ध चेष्टहीन हो गये हैं, यह देख व्याकुल हुई उषा फूट-फूटकर रोने लगी। उसके नेत्र आँसुओंसे भर गये, तब उस रोती हुई उषासे अनिरुद्धने कहा—॥
किमिदं रुद्यते भीरु मा भैस्त्वं मृगलोचने।
पश्य सुश्रोणि सम्प्राप्तं मत्कृते मधुसूदनम् ॥२०१॥
यस्य शङ्खध्वनिं श्रुत्वा बाहुशब्दं बलस्य च।
दानवा नाशमेष्यन्ति गर्भाश्चासुरयोषिताम् ॥२०२॥
'भीरु ! तुम इस तरह रोती क्यों हो ? मृगलोचने ! भय-भीत न हो। सुश्रोणि ! देखो, भगवान् मधुसूदन मेरे लिये यहाँ आना ही चाहते हैं। जिनके शङ्खनादको, भुजाओंके शब्दको और बलकी चर्चाको सुनकर दानव नष्ट हो जायेंगे और असुरोंकी स्त्रियोंके गर्भ गिर जायँगे' ॥ २०१-२०२ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तानिरुद्धेन उषा विश्रम्भमागता।
नृशंसं पितरं चैव शोचते सा सुमध्यमा ॥२०३॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! अनिरुद्धके ऐसा कहनेपर उषाको विश्वास हो गया। वह सुन्दर कटिप्रदेशवाली सुन्दरी अब अपने निर्दय पिताके लिये शोक करने लगी ॥ २०३ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि बाणानिरुद्धयुद्धे एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें बाणासुर और अनिरुद्धका युद्धविषयक एक सौ उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११९ ॥
विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
अनिरुद्धके द्वारा आर्यादेवीकी स्तुति और देवीका प्रसन्न होकर उन्हें बन्धनके कष्टसे मुक्त करना
वैशम्पायन उवाच
यदा बाणपुरे वीरः सोऽनिरुद्धः सहोषया।
संनिरुद्धो नरेन्द्रण बाणेन बलिसूनुना ॥ १ ॥
तदा देवीं कोटवर्तीं रक्षार्थं शरणं गतः।
यद् गीतममिरुद्धेन देव्याः स्तोत्रमिदं शृणु ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! जब उषाके साथ वीर अनिरुद्ध बलिकुमार राजा बाणासुरके द्वारा बाण-नगरमें बंदी बना लिये गये, तब वे अपनी रक्षाके लिये कोटवती देवीकी शरणमें गये। उस समय अनिरुद्धने जिस स्तोत्रका गान किया था, वह इस प्रकार है; सुनो ॥ १-२ ॥
अनन्तमक्षयं दिव्यमादिदेवं सनातनम्।
नारायणं नमस्कृत्य प्रवरं जगतां प्रभुम् ॥ ३ ॥
चण्डीं कात्यायनीं देवीमार्या लोकनमस्कृताम्।
वरदां कीर्तयिष्यामि नामभिर्हरिसंस्तुतैः ॥ ४ ॥
जो अनन्त, अक्षय, दिव्य, आदिदेव और सनातन हैं, उन सर्वश्रेष्ठ जगदीश्वर नारायणदेवको नमस्कार करके विश्ववन्दित वरदायिनी चण्डी कात्यायनी आर्या देवीका मैं श्रीहरिके द्वारा प्रशंसित नामोंसे कीर्तन करूँगा ॥ ३-४ ॥
ऋषिभिर्देवैस्तैश्चैव वाक्पुष्पैरर्चितां शुभाम्।
तां देवीं सर्वदेहस्थां सर्वदेवनमस्कृताम् ॥ ५ ॥
ऋषियों और देवताओंने वाणीरूपी पुष्पोंद्वारा जिन मङ्गलमयी देवीकी पूजा की है, जो सबके शरीरमें विराजमान हैं तथा सम्पूर्ण देवता जिन्हें नमस्कार करते हैं, उन आर्या देवीका मैं गुणगान करूँगा ॥ ५ ॥
अनिरुद्ध उवाच
महेन्द्रविष्णुभगिनीं नमस्यामि हिताय वै।
मनसा भावशुद्धेन शुचिः स्तोष्ये कृताञ्जलिः॥ ६ ॥
अनिरुद्धने कहा—जो देवराज इन्द्र और भगवान् विष्णुकी बहिन हैं, उन देवीको मैं अपने हितके लिये नमस्कार करता हूँ तथा हाथ जोड़कर पवित्र हो भावशुद्ध हृदयसे उनकी स्तुति करना चाहता हूँ ॥ ६ ॥
गौतमीं कंसभयदां यशोदानन्दवर्द्धिनीम् ।
मेध्यां गोकुलसम्भृतां नन्दगोपस्य नन्दिनीम् ॥ ७ ॥
जो गौतमी (गोदावरी)स्वरूपा, कंसको भय देनेवाली, यशोदाका आनन्द बढ़ानेवाली, पवित्र, गोकुलमें आविर्भूत तथा नन्दगोपकी नन्दिनी हैं, उन आर्यादेवीको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ७ ॥
६९६ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
प्राज्ञां दक्षां शिवां सौम्यां दनुपुत्रविमर्दिनीम् ।
तां देवीं सर्वदेहस्थां सर्वभूतनमस्कृताम् ॥ ८ ॥
जो प्राज्ञा (बुद्धिमती एवं विदुषी), दक्षा, कल्याणस्वरूपा, सौम्या, दानवमर्दिनी, सबके शरीरमें विद्यमान तथा सम्पूर्ण भूत द्वारा वन्दित हैं, उन आर्यादेवीका मेरा प्रणाम है॥
दर्शनीं पूरणीं मायां वह्न्यर्कशशिप्रभाम् ।
शान्तिं ध्रुवां च जननीं मोहिनीं शोषणीं तथा ॥ ९ ॥
सेव्यां देवैः सर्षिगणैः सर्वदेवनमस्कृताम् ।
कालीं कात्यायनीं देवीं भयदां भयनाशिनीम् ॥१०॥
जो दर्शनी (दृष्टिशक्ति), पूरणी (मनोरथोंकी पूर्ति करनेवाली), मायास्वरूपा, अग्नि, सूर्य और चन्द्रमाके समान कान्तिवाली, शान्तिमयी, ध्रुवा (अविनाशिनी), सबकी जननी, मोहिनी तथा शोषणी हैं, ऋषियोंसहित सम्पूर्ण देवता जिनकी सेवा करते हैं, समस्त देवता जिनके चरणोंमें शीश झुकाते हैं, जो काली, कात्यायनी देवी, भयदायिनी तथा भयनाशिनी हैं, उनका मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ९-१० ॥
कालरात्रिं कामगमां त्रिनेत्रां ब्रह्मचारिणीम् ।
सौदामिनीं मेघरवां वेतालीं विपुलाननाम् ॥ ११ ॥
जो कालरात्रि, इच्छानुसार सर्वत्र जा सकनेवाली, त्रिनेत्रधारिणी और ब्रह्मचारिणी हैं, जो विद्युत्स्वरूपा, मेघके समान गर्जना करनेवाली, वेताली और विशाल मुखवाली हैं, उन देवीको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ११ ॥
यूथस्याद्यां महाभागां शकुनीं रेवतीं तथा ।
तिथीनां पञ्चमीं षष्ठीं पूर्णमासीं चतुर्दशीम् ॥ १२ ॥
जो यूथकी प्रधान अध्यक्षा, महासौभाग्यशालिनी, शकुनि, रेवती आदि ग्रहरूप तथा तिथियोंमें पञ्चमी, षष्ठी, पूर्णमासी और चतुर्दशीस्वरूपा हैं, उन देवीको नमस्कार है॥
सप्तविंशतिन्नक्षत्राणि नद्यः सर्वा दिशो दश ।
नगरोपवनोद्यानद्वारारट्टालकवासिनीम् ॥ १३ ॥
सत्ताईस नक्षत्र, सम्पूर्ण नदियाँ और दसों दिशाएँ— ये जिनके स्वरूप हैं, जो नगरों, उपवनों, उद्यानों और अट्टालिकाओंमें उनकी अधिष्ठात्रा देवीके रूपमें निवास करती हैं, उन आर्यादेवीको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ १३ ॥
ह्रीं श्रीं गङ्गां च गन्धर्वी योगिनीं योगदां सताम् ।
कीर्तिमाशां दिशं स्पर्शा नमस्यामि सरस्वतीम् ॥१४॥
जो ह्री (लज्जा), श्री (लक्ष्मी या सम्पत्ति), गङ्गा, गन्धर्वी (श्रीराधा), योगिनी तथा सत्पुरुषोंको योग प्रदान करनेवाली हैं, उन कीर्ति, आशा, दिशा, स्पर्धा एवं सरस्वती नामवाली देवीको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ १४ ॥
वेदानां मातरं चैव सावित्रीं भक्तवत्सलाम् ।
तपस्विनीं शान्तिकरीमेकानंशां सनातनाम् ॥ १५ ॥
जो वेदोंकी माता, भक्तवत्सला सावित्री, तपस्विनी, शान्तिकरी, एकानंशा एवं सनातनस्वरूपा हैं, उन आर्यादेवीको नमस्कार है ॥ १५ ॥
कौटीर्यां मदिरां चण्डामिलां मलयवासिनीम् ।
भूतधात्रीं भयंकरीं कूष्माण्डीं कुसुमप्रियाम् ॥ १६ ॥
जो कुटीरवासिनी, मत्त बना देनेवाली, अत्यन्त कोपना, इला, मलयवासिनी, सम्पूर्ण भूतोंको धारण करनेवाली, भयंकरी, कूष्माण्डी और कुसुमप्रिया हैं, उन देवीको मेरा नमस्कार है ॥
दारुणीं मदिरावासां विन्ध्यकैलासवासिनीम् ।
वराङ्गनां सिंहरथीं बहुरूपां वृषध्वजाम् ॥ १७ ॥
जिनका स्वभाव दारुण है, आवासस्थान भी मत्त बना देनेवाला है, जो विन्ध्य और कैलास पर्वतपर निवास करती हैं, श्रेष्ठ अङ्गना हैं, सिंह जिनका रथ या वाहन है, जो बहुत से रूप धारण करनेवाली तथा वृषभ-चिह्नसे चिह्नित ध्वजवाली हैं, उन देवीको नमस्कार है ॥ १७ ॥
दुर्लभां दुर्जयां दुर्गां निशुम्भभयदर्शिनीम् ।
सुरप्रियां सुरां देवीं वज्रपाण्यनुजां शिवाम् ॥ १८ ॥
जो दुर्लभ, दुर्जय, दुर्गम, निशुम्भासुरको भय दिखानेवाली, देवप्रिया, सुरस्वरूपा तथा वज्रपाणि इन्द्रकी अनुजा हैं, उन कल्याणमयी देवीको नमस्कार है ॥ १८ ॥
किरातीं चीरवसनां चौरसेनानमस्कृताम् ।
आज्यपां सोमपां सौम्यां सर्वपर्वतवासिनीम् ॥ १९ ॥
जो किरात-वेष धारण करनेवाली, चीर-वस्त्रधारिणी तथा चोरोंकी सेनासे नमस्कृत हैं तथा जो घृत पीनेवाली, सोमरसका पान करनेवाली, सौम्यस्वरूपा तथा समस्त पर्वतोंमें निवास करनेवाली हैं, उन देवीको मैं नमस्कार करता हूँ ॥
निशुम्भशुम्भमथनीं गजकुम्भोपमस्तनीम् ।
जननीं सिद्धसेनस्य सिद्धचारणसेविताम् ॥ २० ॥
चरां कुमारप्रभवां पार्वतीं पर्वतात्मजाम् ।
जो निशुम्भ और शुम्भका संहार करनेवाली हैं, जिनके स्तन हाथीके कुम्भस्थलके समान जान पड़ते हैं तथा सिद्ध और चारण जिनकी सेवामें लगे रहते हैं, जो कार्तिकेयकी जननी हैं, जिनसे कुमारकी उत्पत्ति हुई है तथा जो पर्वतकी पुत्री होनेपर भी सर्वत्र विचरनेवाली हैं, उन पार्वती देवीको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ २०½ ॥
पञ्चाशद्देवकन्यानां पत्न्यो देवगणस्य च ॥ २१ ॥
कद्रुपुत्रसहस्रस्य पुत्रपौत्रवरस्त्रियः ।
माता पिता जगन्मान्या दिवि देवाप्सरोगणैः ॥ २२ ॥
ऋषिपत्नीगणानां च यक्षगन्धर्वयोषिताम् ।
विद्याधराणां नारीषु साध्वीषु मनुजासु च ॥ २३ ॥
विष्णुपर्व ] विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ६९७
एवमेतासु नारीषु सर्वभूताश्रया ह्यसि । नमस्कृतासि त्रैलोक्ये किन्नरोद्गीतसेविते ॥ २४ ॥
पचास देवकन्याओंमें, जो देवताओंकी पत्नियां हैं उनमें, कद्रूके जो हजारों पुत्र हैं—उनके पुत्रों और पौत्रोंकी जो सुन्दरी स्त्रियां हैं—उनमें, माता और पितामें, स्वर्गके देवताओं और अप्सराओंसहित ऋषिपत्नियोंमें, यक्षों और गन्धर्वोंकी स्त्रियोंमें, विद्याधरोंकी नारियोंमें और सती-साध्वी मानवी स्त्रियोंमें, इस प्रकार इन उपर्युक्त महिलाओंमें आप जगन्माता देवीका निवास है; क्योंकि आप सम्पूर्ण भूतोंका आश्रय हैं। तीनों लोकोंमें सर्वत्र आपके चरणोंमें मस्तक झुकाया जाता है। किन्नरलोग उच्च स्वरसे गीत गाकर आपकी सेवा करते हैं ॥ २१-२४ ॥
अचिन्त्या ह्यप्रमेयासि यासि सासि नमोऽस्तु ते । एभिर्नामभिरन्यैश्च कीर्तिता ह्यसि गौतमि ॥ २५ ॥
आप अचिन्त्य और अप्रमेय हैं, जो हैं सो हैं, आपको नमस्कार है। गौतमनन्दिनी ! इन पूर्वोक्त नामोंसे और दूसरे नामोंसे भी आपका ही कीर्तन होता है ॥ २५ ॥
त्वत्प्रसादादविघ्नेन क्षिप्रं मुच्येय बन्धनात् । अवेक्षस्व विशालाक्षि पादौ ते शरणं व्रजे ॥ २६ ॥ सर्वेषामेव बन्धानां मोक्षणं कर्तुमर्हसि ।
विशाललोचने ! मैं आपकी कृपासे बिना किसी विघ्न-बाधाके शीघ्र बन्धनमुक्त हो जाऊँ। आप मेरे ऊपर कृपादृष्टि करें; मैं आपके चरणोंकी शरण लेता हूँ। आप मुझे सभी बन्धनोंसे छुड़ाने योग्य हैं ॥ २६ १/२ ॥
ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च चन्द्रसूर्याग्निमारुताः ॥ २७ ॥ अश्विनौ वसवश्चैव विश्वेसाध्यास्तथैव च । मरुता सह पर्जन्यो धाता भूमिर्दिशो दश ॥ २८ ॥ गावो नक्षत्रवंशाश्च ग्रहा नद्यो ह्रदास्तथा । सरितः सागराश्चैव नानाविद्याधरोरगाः ॥ २९ ॥ तथा नागाः सुपर्णाणो गन्धर्वाप्सरसां गणाः । कृत्स्नं जगदिदं प्रोक्तं देव्या नामानुकीर्तनात् ॥ ३० ॥
ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, चन्द्रमा, सूर्य, अग्नि, वायु, अश्विनीकुमार, वसु, विश्वेदेव, साध्यगण, मरुद्गण, पर्जन्य, धाता, भूमि, दसों दिशाएँ, गौ, नक्षत्रसमूह, ग्रहगण, नदियाँ, सरोवर, सरिताएँ, समुद्र, नाना विद्याधर, सर्प, नाग, गरुड़, गन्धर्व और अप्सराओंके समूह—इस प्रकार देवीके नामोंका वारंवार कीर्तन करनेसे इस सम्पूर्ण जगत्का कीर्तन हो जाता है ॥ २७-३० ॥
देव्याः स्तवमिमं पुण्यं यः पठेत् सुसमाहितः । सा तस्मै सप्तमे मासि वरमग्र्यं प्रयच्छति ॥ ३१ ॥
जो एकाग्रचित्त होकर देवीके इस पवित्र स्तोत्रका पाठ करता है, देवी उसे सातवें महीनेमें उत्तम वर प्रदान करती हैं।
अष्टादशभुजा देवी दिव्याभरणभूषिता । हारशोभितसर्वाङ्गी मुकुटोज्ज्वलभूषणा ॥ ३२ ॥
देवीकी अठारह भुजाएँ हैं। वे दिव्य आभरणोंसे विभूषित हैं। हारसे उनके सारे अङ्ग सुशोभित हैं। मुकुटकी आभासे उनके आभूषण चमक उठे हैं ॥ ३२ ॥
कात्यायनि स्तूयसे त्वं वरमग्र्यं प्रयच्छसि । अतः स्तवीमि त्वां देवीं वरदे वामलोचने ॥ ३३ ॥
कात्यायनि ! जब आपकी स्तुति की जाती है, तब आप उत्तम वर प्रदान करती हैं। अतः वरदायिनि वामलोचने ! मैं आप देवीकी स्तुति करता हूँ ॥ ३३ ॥
नमोऽस्तु ते महादेवि सुप्रीता मे सदा भव । प्रयच्छ त्वं वरं ह्यायुः पुष्टिं चैव क्षमां धृतिम् ॥ ३४ ॥ बन्धनस्थो विमुच्येयं सत्यमेतद् भवेदिति ।
महादेवि ! आपको नमस्कार है। आप सदा मुझपर सुप्रसन्न रहें और मुझे श्रेष्ठ आयु, पुष्टि, क्षमा और धैर्य प्रदान करें। मैं बन्धनमें पड़ा हुआ हूँ, किंतु इससे मुक्त हो जाऊँ—मेरा यह संकल्प सत्य हो ॥ ३४ १/२ ॥
वैशम्पायन उवाच एवं स्तुता महादेवी दुर्गा दुर्गपराक्रमा ॥ ३५ ॥ सांनिध्यं कल्पयामास अनिरुद्धस्य बन्धने ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! इस प्रकार स्तुति की जानेपर दुर्गम पराक्रम प्रकट करनेवाली महादेवी दुर्गाने बन्धनागारमें अनिरुद्धके पास आकर उन्हें दर्शन दिया ॥ ३५ १/२ ॥
अनिरुद्धहितार्थाय देवी शरणवत्सला ॥ ३६ ॥ बद्धं बाणपुरे वीरमनिरुद्धं व्यमोक्षयत् । सान्त्वयामास तं वीरमनिरुद्धममर्षणम् ॥ ३७ ॥
उस शरणागतवत्सला देवीने बाणनगरमें बँधे हुए वीर अनिरुद्धको उनका हित-साधन करनेके लिये बन्धनसे मुक्त कर दिया। साथ ही उन अमर्षशील वीर अनिरुद्धको सान्त्वना प्रदान की ॥ ३६-३७ ॥
पूजयामास तां वीरः सोऽनिरुद्धः प्रतापवान् । प्रसादं दर्शयामास अनिरुद्धस्य बन्धने ॥ ३८ ॥
उस समय प्रतापी वीर अनिरुद्धने देवीका पूजन किया। देवीने बन्धनागारमें अनिरुद्धको अपनी कृपाका प्रत्यक्ष दर्शन कराया ॥ ३८ ॥
१. पचास देवकन्याएँ यहाँ दक्ष प्रजापतिकी पुत्रियाँ हैं। इनमेंसे २७ सोमको, १३ कश्यपको और १० धर्मको ब्याही गयी थीं। इस प्रकार इनकी संख्या पचास है।
६९८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंश
नागपाशेन बद्धस्य तस्योपाहृतचेतसः।
स्फोटयित्वा कराग्रेण पञ्जरं वज्रसंनिभम् ॥ ३९ ॥
बद्धं बाणपुरे वीरं सानिरुद्धमभाषत ।
सान्त्वयन्ती वचो देवी प्रसादाभिमुखी तदा ॥ ४० ॥
जो नागपाशमें बँधे हुए थे और उषाने जिनके चित्तको चुरा लिया था, उन अनिरुद्धके वज्रतुल्य पिंजरेको अपने हाथके अग्रभागसे तोड़-फोड़कर देवीने बाणपुरमें अवरुद्ध हुए वीर अनिरुद्धको मुक्त कर दिया और कृपा करनेके लिये उद्यत हो उन्हें सान्त्वना देते हुए इस प्रकार कहा ॥ ३९-४० ॥
श्रीदेव्युवाच
चक्रायुधो मोक्षयितानिरुद्ध
त्वां बन्धनादाशु सहस्व कालम्।
छित्त्वा स बाणस्य सहस्रबाहुं
पुरीं निजां नेष्यति दैत्यसूदनः ॥ ४१ ॥
श्रीदेवीने कहा—अनिरुद्ध ! चक्रधारी भगवान् श्रीकृष्ण शीघ्र आकर तुम्हें पूर्णतः इस बन्धनसे छुड़ायेंगे, तबतक कुछ कालतक इस कष्टको सहन करो। वे दैत्य-सूदन श्रीहरि बाणासुरकी सहस्र भुजाओंका छेदन करके तुम्हें अपनी पुरीको ले जायेंगे ॥ ४१ ॥
ततोऽनिरुद्धः पुनरेव देवीं
तुष्टाव हृष्टः शशिकान्तवक्त्रः ।
तदनन्तर चन्द्रमाके समान कमनीय मुखवाले अनिरुद्धने प्रसन्न होकर पुनः देवीका स्तवन किया ॥ ४१ ½ ॥
अनिरुद्ध उवाच
नमोऽस्तु ते देवि वरप्रदे शिवे
नमोऽस्तु ते देवि सुरारिनाशिनी ॥ ४२ ॥
अनिरुद्ध बोले—कल्याणस्वरूपे ! वरदायिनि देवि ! आपको नमस्कार है। देवशत्रुओंका नाश करनेवाली देवि ! आपको प्रणाम है ॥ ४२ ॥
नमोऽस्तु ते कामचरे सदाशिवे
नमोऽस्तु ते सर्वहितैषिणि प्रिये ।
नमोऽस्तु ते भीतिकरि द्विषां सदा
नमोऽस्तु ते बन्धनमोक्षकारिणि ॥ ४३ ॥
इच्छानुसार विचरनेवाली सदाशिवे ! आपको नमस्कार है। सबका हित चाहनेवाली सर्वप्रिये ! आपको नमस्कार है। शत्रुओंको सदा भय देनेवाली देवि ! आपको प्रणाम है तथा बन्धनसे छुड़ानेवाली देवि ! आपको नमस्कार है ॥ ४३ ॥
ब्रह्माणीन्द्राणि रुद्राणि भूतभव्यभवे शिवे ।
त्राहि मां सर्वभीतिभ्यो नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ ४४ ॥
ब्रह्माणि ! इन्द्राणि ! रुद्राणि ! भूत, वर्तमान और भविष्य-स्वरूपे शिवे ! सब प्रकारके भयोंसे मेरी रक्षा करें। नारायणि ! आपको नमस्कार है ॥ ४४ ॥
नमोऽस्तु ते जगद्धात्रे प्रिये दान्ते महाव्रते ।
भक्तिप्रिये जगन्मातः शैलपुत्रि वसुन्धरे ॥ ४५ ॥
त्राहि मां त्वं विशालाक्षि नारायणि नमोऽस्तु ते ।
त्रायस्व सर्वदुःखेभ्यो दानवानां भयङ्करि ॥ ४६ ॥
जगत्की रक्षा करनेवाली प्रिय देवि ! आपको नमस्कार है। मन और इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाली महाव्रतधारिणी भक्तिप्रिये ! जगन्मातः ! गिरिराजनन्दिनि ! वसुन्धरे ! विशाल नेत्रोंवाली नारायणि ! आप मेरी रक्षा कीजिये ! आपको नमस्कार है। दानवोंको भय देनेवाली देवि ! सब प्रकारके दुःखोंसे मेरा परित्राण कीजिये ॥ ४५-४६ ॥
रुद्रप्रिये महाभागे भक्तानामार्तिनाशिनि ।
नमामि शिरसा देवीं बन्धनस्थो विमोक्षितः ॥ ४७ ॥
रुद्रप्रिये ! भक्तोंकी पीड़ा दूर करनेवाली महाभागे ! मैं चरणोंमें मस्तक झुकाकर आप देवीको नमस्कार करता हूँ। आपने मुझे बन्धनमें रहते हुए भी मुक्त कर दिया ॥ ४७ ॥
वैशम्पायन उवाच
आर्यास्तवमिदं पुण्यं यः पठेत् सुसमाहितः ।
सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति ।
बन्धनस्थो विमुच्येत सत्यं व्यासवचो यथा ॥ ४८ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! जो एकाग्रचित्त होकर इस पवित्र आर्यास्तोत्रका पाठ करता है, वह सब पापोंसे मुक्त होकर विष्णुलोकमें जाता है और यदि बन्धनमें पड़ा हो तो उससे मुक्त हो जाता है। जैसा कि व्यासजीका सत्य वचन है ॥ ४८ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि अनिरुद्धकृत आर्यास्तवो
नाम विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२० ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें आर्यास्तवविषयक एक सौ बीसवाँ
अध्याय पूरा हुआ ॥ १२० ॥
| विष्णुपर्व ] | एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः | ६९९ |
|---|
एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
अनिरुद्धके अपहरणसे रनवासमें शोक, श्रीकृष्ण और यादवोंकी चिन्ता, गुप्तचरोंकी नियुक्ति और उनकी विफलता, नारदजीका आगमन और अनिरुद्धका समाचार-निवेदन, श्रीकृष्णके द्वारा गरुड़ का आवाहन और स्तवन, गरुड़द्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति और श्रीकृष्णका शोणितपुरको प्रस्थान
वैशम्पायन उवाच
ततोऽनिरुद्धस्य गृहे रुरुदुः सर्वयोषितः ।
प्रियं नाथमपश्यन्त्यः कुरर्य इव संघशः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! तदनन्तर अनिरुद्धके महलमें रहनेवाली समस्त सुन्दरियाँ अपने प्रिय स्वामीको न देखकर झुंड-की-झुंड एकत्र हो कुररियोंकी भाँति विलाप करने लगीं— ॥ १ ॥
अहो धिकिमिदं नाथनाथे कृष्णे व्यवस्थिते ।
अनाथा इव संत्रस्ता रुदिमो भयपीडिताः ॥ २ ॥
'अहो ! धिक्कार है, यह क्या हुआ ? नाथोंके भी नाथ श्रीकृष्णके रहते हुए हमलोग अनाथकी भाँति संत्रस्त और भयसे पीड़ित हो रोदन करती हैं ॥ २ ॥
यस्येन्द्रप्रमुखा देवाः सादित्याः समरुद्गणाः ।
बाहुच्छायामुपाश्रित्य वसन्ति दिवि निर्वृताः ॥ ३ ॥
तस्योत्पन्नमिदं लोके भयदस्य महाभयम् ।
तस्यानिरुद्धः पौत्रस्तु वीरः केनापि नो हृतः ॥ ४ ॥
'जिनकी भुजाओंकी छायाका आश्रय ले आदित्यों और मरुद्गणोंसहित इन्द्र आदि सभी देवता स्वर्गमें सुखपूर्वक निवास करते हैं। लोकमैं भय देनेवाले ( या दूसरोंके भयका निवारण करनेवाले ) उन्हीं भगवान् श्रीकृष्णके समक्ष आज यह महान् भय उत्पन्न हो गया। उनके वीर पौत्र हमारे स्वामी अनिरुद्धको आज किसीने हर लिया ॥ ३-४ ॥
अहो नास्ति भयं नूनं तस्य लोके सुदुर्मतेः ।
वासुदेवस्य यः क्रोधमुत्पादयति दुःसहम् ॥ ५ ॥
'अहो ! उस दुर्बुद्धिको निश्चय ही संसारमें कोई भय नहीं है, जो भगवान् वासुदेवके हृदयमें दुःसह क्रोध उत्पन्न कर रहा है ॥ ५ ॥
व्यादितास्यस्य यो मृत्योर्दंष्ट्राग्रे परिवर्तते ।
स वासुदेवं समरे मोहादभ्युदियाद् रिपुः ॥ ६ ॥
'जो मुँह बाकर खड़ी हुई मौतकी दाढ़ोंके सामने चक्कर लगाता है, वही मोहवश समराङ्गणमें शत्रुभावसे भगवान् वासुदेवके सामने जा सकता है ॥ ६ ॥
इदमेवंविधं कृत्वा विप्रियं यदुपूङ्गवे ।
कथं जीवन् विमुच्येत साक्षादपि शचीपतिः ॥ ७ ॥
'यदुकुलतिलक श्रीकृष्णके प्रति यह ऐसा अप्रिय बर्ताव करके साक्षात् शचीपति इन्द्र भी कैसे जीवित छूट सकता है ? ॥
हृतनाथाः स्म शोच्याः स्म वयं नाथं विना कृताः ।
विप्रयोगेण नाथस्य कृतान्तवशगाः कृताः ॥ ८ ॥
'हाय ! हमारे नाथका अपहरण हो जानेसे हम सब-की-सब अनाथ एवं शोचनीय हो गयीं। अपने स्वामीके वियोगसे हम कालके अधीन कर दी गयीं' ॥ ८ ॥
इत्येवं ता वदन्त्यश्च रुदन्त्यश्च पुनः पुनः ।
नेत्रजं वारि मुमुचुरशिवं परमाङ्गनाः ॥ ९ ॥
वे सुन्दरी अङ्गनाएँ इस प्रकार बारंबार विलाप करती और रोती हुई अपने नेत्रोंसे अमङ्गलसूचक आँसू बहाने लगीं ॥
तासां बाष्पाम्बुपूर्णानि नयनानि चकाशिरे ।
सलिलेनाप्लुतानीव पङ्कजानि जलागमे ॥ १० ॥
उनके अश्रुजलसे भरे हुए नेत्र वर्षाकालमें जलसे भीगे हुए कमलोंके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ १० ॥
तासामरालपक्ष्मणि राजयन्ति शुभानि च ।
रुधिरेणाप्लुतानीव नयनानि चकाशिरे ॥ ११ ॥
उनके कुटिल बरौनियोंसे युक्त सुन्दर एवं लाल नेत्र खूनमें डूबे हुए-से प्रतीत होते थे ॥ ११ ॥
तासाहर्म्यतलस्थानां पूर्ण आसीन्महास्वनः ।
कुररीणामिवाकाशे रुदतीनां सहस्रशः ॥ १२ ॥
अट्टालिकाओंमें बैठकर रोती हुई उन सुन्दरियोंका सब ओर फैला हुआ वह आर्तनाद आकाशमें सहस्रों कुररियोंके करुण-क्रन्दनके समान जान पड़ता था ॥ १२ ॥
ते श्रुत्वा निनदं घोरमपूर्वं भयमागतम् ।
उत्पेतुः सहसा स्वेभ्यो गृहेभ्यः पुरुषर्षभाः ॥ १३ ॥
उस भयंकर आर्तनादको सुनकर किसी अपूर्व भयके आगमनका अनुमान करके वे पुरुषप्रवर यादव अपने-अपने घरोंसे सहसा उछल पड़े ॥ १३ ॥
कस्मादेषोऽनिरुद्धस्य श्रूयते सुमहान्स्वनः ।
गृहे कृष्णाभिगुप्तानां कुतो नो भयमागतम् ॥ १४ ॥
वे सोचने लगे 'अनिरुद्धके महलमें यह महान् कोलाहल क्यों सुनायी देता है ? श्रीकृष्णके संरक्षणमें रहने-वाले हमलोगोंके घरमें यह भय कहाँसे आ गया ?' ॥ १४ ॥
७०० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
इत्येवमूचुस्तेऽन्योन्यं स्नेहविक्लवगद्गदाः ।
अधर्षिता यथा सिंहा गुहाभ्य इव निःसृताः ॥ १५ ॥
इस प्रकार वे एक-दूसरेसे कहने लगे। उस समय उनकी वाणी स्नेहजनित विकलताके कारण गद्गद हो रही थी। जिन्हें कभी किसीका तिरस्कार नहीं सहना पड़ा हो ऐसे सिंह जैसे गुफासे निकले हों, उसी प्रकार वे यादव भी अपने घरोंसे निकल पड़े ॥ १५ ॥
सन्नाहभेरी कृष्णस्य आहता महती तदा ।
यस्याः शब्देन ते सर्वे समागम्य च धिष्ठिताः ॥ १६ ॥
भगवान् श्रीकृष्णके यहाँ युद्धकी तैयारीके लिये सूचना देनेवाला विशाल डंका तत्काल बज उठा, जिसके शब्दसे समस्त यादव वहाँ एकत्र होकर खड़े हो गये ॥ १६ ॥
किमेतदिति तेऽन्योन्यं समपृच्छन्त यादवाः ।
अन्योन्यस्य हि ते सर्वे यथावृत्तमवेदयन् ॥ १७ ॥
वे यदुवंशी परस्पर पूछने लगे कि 'क्या बात है?' फिर जो जानकार थे, उन सबने एक दूसरेको यथार्थ बात बता दी ॥ १७ ॥
ततस्ते बाष्पपूर्णाक्षाः क्रोधसंरक्तलोचनाः ।
निःश्वसन्तो व्यतिष्ठन्त यादवा युद्धदुर्मदाः ॥ १८ ॥
तब वे रणदुर्मद यादव नेत्रोंमें आँसू भरकर क्रोधसे लाल आँखें किये लंबी साँस खींचते हुए खड़े हो गये ॥ १८ ॥
तूष्णींभूतेषु सर्वेषु विपृथुर्वाक्यमब्रवीत् ।
कृष्णं प्रहरतां श्रेष्ठं निःश्वसन्तं मुहुर्मुहुः ॥ १९ ॥
समस्त यादव वहाँ आकर चुपचाप खड़े हो गये। तब विपृथुने बारंबार दीर्घ निःश्वास लेते हुए योद्धाओंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा—॥ १९ ॥
किमिदं चिन्तयाविष्टः पुरुषेन्द्र भवानिह ।
तव बाहुबलप्राणाः स्वास्थिताः सर्वयादवाः ॥ २० ॥
'पुरुषोत्तम ! आप यहाँ इस प्रकार चिन्तामग्न क्यों हैं ? समस्त यादव आपके ही बाहुबलके भरोसे जीवन धारण करके यहाँ सुखपूर्वक रहते हैं ॥ २० ॥
भवन्तमाश्रिताः कृष्ण संविभक्ताश्च सर्वशः ।
तथैव बलवाञ्शक्रस्त्वय्यावेद्य जयाजयौ ॥ २१ ॥
सुखं स्वपिति निःशङ्कः कथं त्वं चिन्तयान्वितः ।
शोकसागरमक्षोभ्यं सर्वे ते ज्ञातयो गताः ॥ २२ ॥
'श्रीकृष्ण ! ये सब आपकी शरणमें हैं और आपने सबको पृथक्-पृथक् सुख-सुविधा प्रदान की है। इसी प्रकार बलवान् इन्द्र भी आपपर ही जय-पराजयका भार रखकर बिना किसी डर-भयके सुखपूर्वक सोते हैं। फिर आप कैसे चिन्तामें डूबे हुए हैं। आपके ये समस्त बन्धु-बान्धव आपकी यह दशा देखकर शोकके अक्षोभ्य समुद्रमें मग्न हो गये हैं ॥ २१-२२ ॥
तान् मज्जमानानकस्त्वं समुद्धर महाभुज ।
किमेदं चिन्तयाविष्टो न किंचिदपि भाषसे ॥ २३ ॥
चिन्तां कर्तुं वृथा देव न त्वमर्हसि माधव ।
'महाबाहो ! आप अकेले ही इन डूबते हुए कुटुम्बी-जनोंका उद्धार कीजिये। इस तरह चिन्तामग्न होकर आप क्यों कुछ भी नहीं बोल रहे हैं ? देव ! माधव ! आपको व्यर्थ चिन्ता नहीं करनी चाहिये' ॥ २३ १/२ ॥
इत्येवमुक्तः कृष्णस्तु निःश्वस्य सुचिरं बहु ॥ २४ ॥
प्राह वाक्यं स वाक्यज्ञो वृहस्पतिरिव स्वयम् ।
विपृथुके ऐसा कहनेपर बातचीतके मर्मको समझनेवाले श्रीकृष्णने बहुत देरतक लंबी साँस खींचकर साक्षात् वृहस्पतिके समान यह बात कही ॥ २४ १/२ ॥
श्रीकृष्ण उवाच
विपृथो चिन्तयाविष्टो ह्येतत्कार्यमचिन्तयम् ॥ २५ ॥
विचिन्तयंस्त्वहं चास्य कार्यस्यानं लभे गतिम् ।
श्रीकृष्ण बोले--विपृथु ! मैं चिन्तामग्न होकर इसी कार्यके विषयमें विचार कर रहा था; किंतु बहुत सोचनेपर भी मैं इस कार्यका कोई निश्चित आधार न पा सका ॥ २५ १/२ ॥
तथाहं भवताप्युक्तो नोत्तरं विदधे क्वचित् ॥ २६ ॥
इसीलिये तुम्हारे पूछनेपर भी मैंने कोई उत्तर नहीं दिया ॥ २६ ॥
दाशार्हगणमध्येऽहं वदाम्यर्थवतीं गिरम् ।
शृणुध्वं यादवाः सर्वे यया चिन्तान्वितो ह्यहम् ॥ २७ ॥
आज समस्त दाशार्हगणोंके बीच मैं यह अभिप्रायपूर्ण बात कह रहा हूँ। यादवो ! तुम सब लोग सुन लो कि मैं क्यों चिन्तित हो उठा हूँ ॥ २७ ॥
अनिरुद्धे हृते वीरे पृथिव्यां सर्वपार्थिवाः ।
अशक्ता इति मंस्यन्ते सर्वानस्मान् सबान्धवान् ॥ २८ ॥
वीर अनिरुद्धका इस तरह अपहरण हो जानेपर भूमण्डलके समस्त भूपाल बन्धु बान्धवोंसहित हम सब लोगोंको शक्तिहीन समझेंगे ॥ २८ ॥
आहुकश्चैव नो राजा हृतः शाल्वेन वै पुरा ।
प्रत्यानीतः स चास्माभिर्युद्धं कृत्वा सुदारुणम् ॥ २९ ॥
पूर्वकालमें शाल्वने हमारे राजा उग्रसेनको हर लिया था; तब हमने अत्यन्त दारुण युद्ध करके उन्हें वापस लौटाया था ॥ २९ ॥
प्रद्युम्नश्चापि मो बालः शम्बरेण हतो ह्यभूत् ।
स तं निहत्य समरे प्राप्तो रुक्मिणिनन्दनः ॥ ३० ॥
हमारे प्रद्युम्नको भी बाल्यावस्थामें शम्बरासुरने चुरा
विष्णुपर्व ] एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः [ ७०१
लिया था, परंतु रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न समराङ्गणमें उस असुरका वध करके स्वयं चले आये ॥ ३० ॥
इदं तु सुमहत् कष्टं प्रद्युम्निः क्व प्रवासितः ।
एवंविधमहं दोषं न स्मरे मनुजर्षभाः ॥ ३१ ॥
किंतु यह तो सबसे बढ़कर महान् कष्टकी बात है कि प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्ध कहीं परदेशमें पहुँचा दिये गये और हमें पतातक नहीं चला। नरश्रेष्ठ यादवो ! ऐसा दोष कभी प्राप्त हुआ हो, इसका मुझे स्मरण नहीं है ॥ ३१ ॥
भस्मना गुण्ठितः पादो येन मे मूर्ध्नि पातितः ।
तस्याहं सानुबन्धस्य हरिष्ये जीवितं रणे ॥ ३२ ॥
जिसने मेरे मस्तकपर अपना राखसे लिपटा हुआ पैर रखा है, सगे-सम्बन्धियोंसहित उस दुरात्माके प्राणोंको मैं रणभूमिमें अवश्य हर लूँगा ॥ ३२ ॥
इत्येवमुक्ते कृष्णेन सात्यकिर्वाक्यमब्रवीत् ।
चाराः कृष्ण प्रणीयन्तामनिरुद्धस्य मार्गणे ।
सपर्वतवनोद्देशां मार्गन्तु वसुधामिमाम् ॥ ३३ ॥
श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर सात्यकि बोले—'श्रीकृष्ण ! अनिरुद्धकी खोजके लिये गुप्तचर भेजे जायें तथा वे पर्वत और वनस्थलीसहित इस सारी पृथ्वीमें उनका अनुसंधान करें' ॥
आहुकं प्राह कृष्णस्तु स्मितं कृत्वा वचस्तदा ।
आभ्यन्तराश्च बाह्याश्च व्यादिश्यन्तां चरा नृप ॥ ३४ ॥
तब श्रीकृष्णने मुसकराकर राजा उग्रसेनसे कहा—'नरेश्वर ! आप बाह्य और आभ्यन्तर (प्रकट और गुप्त) चरोंको इस कार्यके लिये नियुक्त कीजिये' ॥ ३४ ॥
वैशम्पायन उवाच
केशवस्य वचः श्रुत्वा आहुकस्त्वरितोऽभवत् ।
अन्वेषणेऽनिरुद्धस्य स चारान् दिष्टवांस्तदा ॥ ३५ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! भगवान् श्रीकृष्णका यह वचन सुनकर राजा उग्रसेन बड़ी उतावलीके साथ उठे । उन्होंने अनिरुद्धकी खोजके लिये तत्काल प्रकट एवं गुप्त चर नियुक्त कर दिये ॥ ३५ ॥
ततश्चारास्तु व्यादिष्टाः पार्थिवेन यशस्विना ।
हया रथाश्च व्यादिष्टाः पार्थिवेन महात्मना ।
अभ्यन्तरं च मार्गध्वं बाह्यतश्च समन्ततः ॥ ३६ ॥
यशस्वी भूपाल महामना उग्रसेनने चरोंको नियुक्त करके उनके लिये घोड़े और रथ भी दे दिये और यह आज्ञा दी—'तुमलोग भीतर-बाहर सब ओर अनिरुद्धको ढूँढो ॥ ३६ ॥
वेणुमन्तं लताविष्टं तथा रैवतकं गिरिम् ।
ऋक्षवन्तं गिरिं चैव मार्गध्वं त्वरिता हयैः ॥ ३७ ॥
'घोड़ोंपर सवार हो शीघ्रतापूर्वक जाकर वेणुमान्, लताविष्ट, रैवतक तथा ऋक्षवान् पर्वतपर उनकी खोज करो ॥
एकैकं तत्र चोद्यानं मार्गध्वं काननानि च ।
यातव्यं चापि निःशङ्कमुद्यानानि समन्ततः ॥ ३८ ॥
हयानां च सहस्राणि रथानां चाप्यनेकशः ।
आरुह्य त्वरिताः सर्वे मार्गध्वं यदुनन्दनम् ॥ ३९ ॥
'वहाँका एक-एक उद्यान और जंगल-झाड़ी छान डालो, उद्यानोंमें सब ओर बेखटके चले जाना, हजारों घोड़ों और बहुसंख्यक रथोंपर आरूढ़ हो तुम सब लोग बड़ी उतावलीके साथ यदुनन्दन अनिरुद्धका पता लगाओ' ॥ ३८-३९ ॥
सेनापतिरनाधृष्टिरिदं वचनमब्रवीत् ।
कृष्णमक्लिष्टकर्माणमच्युतं भीतभीतवत् ॥ ४० ॥
तदनन्तर सेनापति अनाधृष्टि ने अनायास ही महान् कर्म करनेवाले अच्युत श्रीकृष्णसे डरते-डरते-से इस प्रकार कहा—॥
शृणु कृष्ण वचो मह्यं रोचते यदि ते प्रभो ।
चिरात् प्रभृति मे वक्तुं भवन्तं जायते मतिः ॥ ४१ ॥
'प्रभो ! श्रीकृष्ण ! यदि आपको जँचे तो मेरी बात भी सुनें । बड़ी देरसे मेरे मनमें यह बात आ रही थी कि मैं आपसे कुछ कहूँ ॥ ४१ ॥
असिलोमा पुलोमा च निसुन्दनरकौ हतौ ।
सौभः शाल्वश्च निहतौ मैन्दो द्विविद एव च ॥ ४२ ॥
'आपके द्वारा असिलोमा और पुलोमा मारे गये । निसुन्द और नरक कालके गालमें डाल दिये गये । सौभ विमान और उसके स्वामी राजा शाल्व भी नष्ट कर दिये गये । मैन्द और द्विविद भी मारे गये ॥ ४२ ॥
हयग्रीवश्च सुमहान् सानुबन्धस्त्वया हतः ।
तादृशे विग्रहे वृत्ते देवहेतोः सुदारुणे ॥ ४३ ॥
सर्वाण्येतानि कर्माणि निःशेषाणि रणे रणे ।
कृतवानसि गोविन्द पार्ष्णिग्राहश्च नास्ति ते ॥ ४४ ॥
'महान् असुर हयग्रीव सगे सम्बन्धियोंसहित आपके हाथसे मारा गया । देवताओंके लिये वैसे-वैसे अत्यन्त भयङ्कर युद्ध आपने किये हैं । गोविन्द ! प्रत्येक रणक्षेत्रमें आपने ये सारे कर्म पूर्णरूपसे सम्पन्न किये हैं, किंतु आपका साथ देनेवाला कोई नहीं है ॥ ४३-४४ ॥
इदं कर्म त्वया कृष्ण सानुबन्धं महत् कृतम् ।
पारिजातस्य हरणे यत् कृतं कर्म दुष्करम् ॥ ४५ ॥
'श्रीकृष्ण ! पारिजातका हरण करते समय आपने जो दुष्कर कर्म किया था, वह सचमे महान् था । आपके द्वारा किया गया यह पारिजात-हरणरूपी कर्म परिणामसहित सबसे उत्कृष्ट है ॥ ४५ ॥
| ७०२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
तत्र शक्रस्त्वया कृष्ण ऐरावतशिरोगतः।
निर्जितो बाहुवीर्येण त्वया युद्धविशारदः ॥ ४६ ॥
‘श्रीकृष्ण ! उस समय आपने अपने बाहुबलसे ऐरावतकी पीठपर बैठे हुए युद्धविशारद इन्द्रको भी पराजित कर दिया॥
तेन वैरं त्वया सार्धं कर्तव्यं नात्र संशयः।
वैरानुबन्धश्च महांस्तेन कार्यस्त्वया सह ॥ ४७ ॥
‘अतः इसमें कोई संशय नहीं कि देवराज इन्द्र आपके साथ वैर कर सकते हैं । उनका आपके साथ महान् वैर बाँधना अवश्य सम्भव है ॥ ४७ ॥
तत्रानिरुद्धहरणं कृतं मघवता स्वयम्।
न ह्यन्यस्य भवेच्छक्तिर्वैरनिर्यातनं प्रति ॥ ४८ ॥
‘अतः अनिरुद्धका अपहरण स्वतः इन्द्रने ही किया है। दूसरे किसीमें इस तरह वैरका बदला लेनेकी शक्ति नहीं हो सकती’ ॥ ४८ ॥
इत्येवमुक्ते वचने कृष्णो नाग इव श्वसन्।
उवाच वचनं धीमानानधृष्टिं महाबलम् ॥ ४९ ॥
उनके ऐसी बात कहनेपर बुद्धिमान् भगवान् श्रीकृष्णने हाथीके समान उच्छ्वास लेकर महाबली अनाधृष्टिके इस प्रकार कहा—॥ ४९ ॥
सेनानीस्तात मा मैवं न देवाः क्षुद्रकर्माणः।
नाकृतज्ञा न च क्लीबा नावल्लिप्ता न बालिशाः ॥ ५० ॥
‘तात ! सेनापते ! ऐसी बात न कहो, न कहो, देवता ऐसा नीच कर्म करनेवाले नहीं होते । वे न तो अकृतज्ञ होते हैं, न कायर । न घमंडी होते हैं, न मूर्ख ॥ ५० ॥
देवार्थे च मे यत्नो महान् दानवसंक्षये।
तेषां प्रियार्थे च रणे हन्मि दृप्तान् महाबलान् ॥ ५१ ॥
‘देवताओंके लिये ही मेरा दानव-संहारके निमित्त महान् प्रयत्न होता रहता है । उन्हींका प्रिय करनेके लिये मैं रणमें अभिमानी और महाबली असुरोंका वध करता हूँ ॥ ५१ ॥
तत्परस्तन्मनाश्चास्मि तद्भक्तस्तत्प्रिये रतः।
कथं पापं करिष्यन्ति विज्ञायैवंविधं हि माम् ॥ ५२ ॥
‘मैं शरीरसे उन देवताओंके हितमें तत्पर रहता हूँ, मनसे उन्हींका हित-चिन्तन करता हूँ, उनमें भक्तिभाव रखता हूँ और उन्हींका प्रिय करनेमें लगा रहता हूँ। मुझे ऐसा जानकर भी वे मेरे साथ दुर्व्यवहार क्यों करेंगे ॥ ५२ ॥
अक्षुद्राः सत्यवन्तश्च नित्यं भक्तानुकम्पिनः।
तेभ्यो न विद्यते पापं बालिशत्वात् प्रभाषसे ॥ ५३ ॥
‘देवता क्षुद्रतासे रहित, सत्यवादी तथा भक्तोंपर सदा कृपा करनेवाले होते हैं। उनसे पाप नहीं हो सकता । तुम विवेकशून्य होनेके कारण उनके सम्बन्धमें उपर्युक्त बात कह रहे हो ॥ ५३ ॥
कदाचिदिह पुंश्चल्या अनिरुद्धो हृतो भवेत्।
देवेषु समहेन्द्रेषु नैतत् कर्म विधीयते ॥ ५४ ॥
‘कदाचित् यह सम्भव हो सकता है कि किसी पुंश्चली स्त्रीने यहाँ आकर अनिरुद्धका अपहरण किया हो । इन्द्रसहित देवताओंमेंसे किसीके द्वारा ऐसा कर्म नहीं बन सकता’ ॥ ५४ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं चिन्तयमानस्य कृष्णस्याद्भुतकर्मणः।
कृष्णस्य वचनं श्रुत्वा ततोऽक्रूरोऽब्रवीद् वचः ॥ ५५ ॥
मधुरं श्लक्ष्णया वाचा अर्थवाक्यविशारदः।
यच्छक्रस्य प्रभो कार्यं तदस्माकं विनिश्चितम् ॥ ५६ ॥
अस्माकं चापि यत्कार्यं तद्धि कार्यं शचीपतेः।
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! ऐसा विचार करते हुए अद्भुतकर्मा श्रीकृष्णका यह वचन सुनकर अर्थयुक्त वचन बोलनेमें चतुर अक्रूरने स्नेहयुक्त वाणीमें मधुर स्वरसे कहा— ‘प्रभो ! इन्द्रका जो कार्य है, वह निश्चय ही हमलोगोंका भी है। इसी प्रकार जो हमारा कार्य है, वह शचीपति इन्द्रका भी है ॥ ५५-५६ १/२ ॥
संरक्ष्याश्च वयं देवैरस्माभिश्चापि देवताः।
देवतार्थे वयं चापि मानुषत्वमुपागताः ॥ ५७ ॥
‘देवताओंको हमारी रक्षा करनी चाहिये और हमें देवताओंकी; क्योंकि हमलोग भी देवताओंके लिये ही मानव-शरीरमें आये हैं’ ॥ ५७ ॥
एवमक्रूरवचनैश्चोदितो मधुसूदनः ।
स्निग्धगम्भीरया वाचा पुनः कृष्णोऽभ्यभाषत ॥ ५८ ॥
अक्रूरके इन वचनोंसे प्रेरित होकर मधुसूदन भगवान् श्रीकृष्णने पुनः स्निग्ध गम्भीर वाणीमें कहा- ॥ ५८ ॥
नायं देवैर्न गन्धर्वैर्न यक्षैर्न च राक्षसैः।
प्रद्युम्नपुत्रोऽपहृतः पुंश्चल्या नु महायशः ॥ ५९ ॥
‘महायशस्वी अक्रूरजी ! प्रद्युम्नपुत्र अनिरुद्धका अपहरण देवताओं, गन्धर्वों, यक्षों और राक्षसों ने नहीं किया है। निश्चय ही यह किसी पुंश्चली (व्यभिचारिणी) स्त्रीका काम है ॥ ५९ ॥
मायाविदग्धाः पुंश्चल्यो दैत्यदानवयोषितः।
ताभिर्हतो न संदेहो नान्यतो विद्यते भयम् ॥ ६० ॥
‘दैत्यों और दानवोंकी जो पुंश्चली स्त्रियाँ हैं, वे मायामें निपुण होती हैं । उन्हींके द्वारा अनिरुद्धका अपहरण हुआ है। इसमें संदेह नहीं है । दूसरे किसीसे यह भय नहीं प्राप्त हुआ है’ ॥ ६० ॥
विष्णुपर्व ] एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ५०३
वैशम्पायन उवाच
इत्येवमुक्ते वचने कृष्णेन तु महात्मना ।
अथावगम्य तत्त्वेन यद् भूतं यदुमण्डले ।
उदतिष्ठन्महानादस्तदा कृष्णं प्रशंसयन् ॥ ६१ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! महात्मा श्रीकृष्णके ऐसी बात कहनेपर यदुमण्डलमें जो कुछ हुआ था, उसको ठीकसे जान लेनेपर वहाँ श्रीकृष्णकी प्रशंसासे भरा हुआ महान् शब्द प्रकट हुआ ॥ ६१ ॥
हर्षयन् स तु सर्वेषां सूतमागधवन्दिनाम् ।
मधुरः श्रूयते घोषो यादवस्य निवेशने ॥ ६२ ॥
यदुपति श्रीकृष्णके महलमें सबके हर्षको बढ़ाता हुआ सूतों, मागधों और वन्दियोंका वह मधुर घोष सबको सुनायी देने लगा ॥ ६२ ॥
ते चाराः सर्वतः सर्वे सभाद्वारमुपागताः ।
शनैर्गद्गदया वाचा इदं वचनमब्रुवन् ॥ ६३ ॥
इतनेमें ही वे सब गुप्तचर सब ओरसे खोज करके सभाद्वारपर लौट आये और धीरे-धीरे गद्गद वाणीमें इस प्रकार बोले—॥ ६३ ॥
उद्यानानि गुहाः शैलाः सभा नद्यः सरांसि च ।
एकैकं शतशो राजन् मार्गितं न च दृश्यते ॥ ६४ ॥
'राजन् ! सारे उद्यान, गुफाएँ, पर्वत, धर्मशालाएँ, नदियाँ और सरोवर छान डाले गये । एक-एक स्थानपर सौ-सौ बार खोज की गयी; परंतु कहीं अनिरुद्धका दर्शन नहीं हुआ' ॥
अन्ये कृष्णं चरा राजन्नुपागम्य तदाब्रुवन् ।
सर्वे नो विदिता देशाः प्राद्युम्निर्न च दृश्यते ॥ ६५ ॥
राजन् ! दूसरे चर भी भगवान् श्रीकृष्णके पास आकर कहने लगे—'प्रभो ! हमें सब देशोंका पता है, सर्वत्र खोज की गयी, किंतु कहीं भी प्रद्युम्नकुमारका पता नहीं लग रहा है ॥
यदन्यत् संविधातव्यं विधानं यदुनन्दन ।
तदाज्ञापय नः क्षिप्रमनिरुद्धस्य मार्गणे ॥ ६६ ॥
'यदुनन्दन ! अनिरुद्धके अन्वेषणके लिये अब और जो कुछ कार्य करना हो, उसके लिये हमें शीघ्र आज्ञा दीजिये' ॥
ततस्ते दीनमनसः सर्वे बाष्पाकुलेक्षणाः ।
अन्योन्यमभ्यभाषन्त किमतः कार्यमुत्तमम् ॥ ६७ ॥
चरोंकी ये बातें सुनकर सबका मन उदास हो गया । सबके नेत्रोंमें आँसू भर आये और सब एक-दूसरेसे कहने लगे—'इससे उत्तम कार्य अब और क्या करना चाहिये ?'॥ ६७ ॥
संदष्टौष्ठपुटाः केचित् केचिद् बाष्पाकुलेक्षणाः ।
केचिद् भ्रुकुटिमास्थाय चिन्तयन्त्यर्थसिद्धये ॥ ६८ ॥
किसीने क्रोधवश दाँतोंसे ओठ दबा लिये, किन्हींके नेत्रोंमें आँसू भर आये और कोई भौंहें टेढ़ी करके कार्यसिद्धिके उपायपर विचार करने लगे ॥ ६८ ॥
एवं चिन्तयतां तेषां बह्वर्थमभिभाषितम् ।
अनिरुद्धः कुतश्चेति सम्भ्रमः सुमहानभूत् ॥ ६९ ॥
इस प्रकार चिन्तन करते हुए उन यादवोंके मुखसे अनेक तरहकी बातें निकलीं । 'अनिरुद्ध कहाँ गये ?' इस प्रश्नको लेकर सबके हृदयमें महान् सम्भ्रम उत्पन्न हो गया ॥
अन्योन्यमभिवीक्षन्ते यादवा जातमन्यवः ।
तां निशां विमनस्कास्ते गमयेयुः कथंचन ।
अनिरुद्धो हृतश्चेति पुनः पुनररिंदम ॥ ७० ॥
शत्रुदमन नरेश ! उस समय कुपित और खिन्न हुए यादव एक दूसरेका मुँह देखने लगे । अनिरुद्धके अपहरणकी बारंबार चर्चा करते हुए उन्होंने उदास मनसे किसी तरह वह रात बितायी ॥ ७० ॥
एवं च ब्रुवतां तेषां प्रभाता रजनी तदा ।
ततस्तूर्यनिनादैश्च शङ्खानां च महास्वनैः ।
प्रबोधनं महाबाहोः कृष्णस्याक्रियतालये ॥ ७१ ॥
इस तरह आपसमें बात करते हुए ही उनकी रात बीत गयी और प्रातःकाल आ गया । तदनन्तर महाबाहु श्रीकृष्णके भवनमें सबको जगानेके लिये बड़े जोर जोरसे भाँति-भाँतिके बाजे बजने लगे और शङ्खोंकी भी गम्भीर ध्वनि होने लगी ॥७१॥
ततः प्रभाते विमले प्रादुर्भूते दिवाकरे ।
प्रविवेश सभामेको नारदः प्रहसन्निव ॥ ७२ ॥
तत्पश्चात् निर्मल प्रभातमें जब सूर्यदेवका उदय हुआ, उस समय अकेले नारदजीने हँसते हुए-से वहाँ यादवोंकी सभामें प्रवेश किया ॥ ७२ ॥
दृष्ट्वा तु यादवान् सर्वान् कृष्णेन सह संगतान् ।
ततः स जयशब्देन माधवं प्रत्यपूजयत् ॥ ७३ ॥
श्रीकृष्णके साथ एकत्र हुए समस्त यादवोंकी ओर देखकर उन्होंने 'जय हो, जय हो' कहकर माधव (श्रीकृष्ण) का समादर किया ॥ ७३ ॥
उग्रसेनादयस्ते च तमृषिं प्रत्यपूजयन् ।
अथाभ्युत्थाय विमनाः कृष्णः समितिदुर्जयः ।
मधुपर्कं च गां चैव नारदाय ददौ प्रभुः ॥ ७४ ॥
फिर उग्रसेन आदिने नारदजीका पूजन किया । इसके बाद रणदुर्जय भगवान् श्रीकृष्णने उदास मनसे उठकर नारदजीको मधुपर्क तथा एक गौ समर्पित की ॥ ७४ ॥
सोपविश्यासने शुभ्रे सर्वास्तरणसंवृते ।
सुखासीनो यथान्यायमुवाचेदं वचोऽर्थवत् ॥ ७५ ॥
| ७०४ | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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स्वागत-सत्कारके पश्चात् जब नारदजी सब प्रकारके बिछौनोंसे ढके हुए शुभ्र आसनपर सुखपूर्वक बैठ गये, तब वे यथोचित रीतिसे यह अर्थयुक्त वचन बोले ॥ ७५ ॥
नारद उवाच
किमेवं चिन्तयाविष्टा निःसङ्गा गतमानसाः ।
उत्साहहीनाः सर्वे वै क्लीवा इव समासत ॥ ७६ ॥
नारदजीने कहा—आज क्या बात है कि समस्त यादव इस तरह चिन्तामग्न, असंग, अनमने और उत्साहहीन होकर क्लीवों (कायरों) के समान चुपचाप बैठे हैं ? ॥ ७६ ॥
इत्येवमुक्ते वचने नारदेन महात्मना।
वासुदेवोऽब्रवीद् वाक्यं श्रूयतां भगवन्निदम् ॥ ७७ ॥
महात्मा नारदके इस तरह पूछनेपर भगवान् श्रीकृष्ण बोले—'भगवन् ! इसका कारण सुनिये—॥ ७७ ॥
अनिरुद्धो हृतो ब्रह्मन् केनापि निशि सुव्रत।
यस्यार्थे सर्व एवास्म चिन्तयाविष्टचेतसः ॥ ७८ ॥
'उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ब्रह्मन् ! यहाँ रात्रिके समय किसीने अनिरुद्धका अपहरण कर लिया है। उन्हींके लिये हम सब लोग यहाँ चिन्तित-चित्त होकर बैठे हैं ॥ ७८ ॥
एष ते यदि वृत्तान्तः श्रुतो दृष्टोऽपि वा मुने।
भगवन् कथ्यतां साधु प्रियमेतन्ममानघ ॥ ७९ ॥
'निष्पाप मुने ! भगवन् ! यदि यह वृत्तान्त आपने कहीं सुना या देखा हो तो अच्छी तरह बताइये, यह मेरा प्रिय विषय है' ॥ ७९ ॥
इत्येवमुक्ते वचने केशवेन महात्मना।
प्रहस्यैतद् वचः प्राह श्रूयतां मधुसूदन ॥ ८० ॥
महात्मा केशवके ऐसी बात कहनेपर नारदजी ठठाकर हँस पड़े और इस प्रकार बोले—'मधुसूदन ! सुनिये—॥
निवृत्तं सुमहद् युद्धं देवासुरसमं महत् ।
अनिरुद्धस्य चैकस्य बाणस्यापि महामृधे ॥ ८१ ॥
'एक महासमरमें एक ओर अकेले अनिरुद्ध थे और दूसरी ओर सेनासहित बाणासुर था। इन दोनोंमें महान् देवासुर-संग्रामके समान बड़ा भारी युद्ध हुआ है ॥ ८१ ॥
उषा नाम सुता तस्य बाणस्याप्रतिमौजसः।
तस्यार्थे चित्रलेखा वै जहाराशु तमप्सराः ॥ ८२ ॥
'अप्रतिम बलशाली बाणासुरकी एक पुत्री है, जिसका नाम उषा है। उसीके लिये चित्रलेखा अप्सरा शीघ्रतापूर्वक अनिरुद्धको हर ले गयी ॥ ८२ ॥
उभयोरपि तत्रासीन्महायद्धं सुदारुणम् ।
प्राद्युम्निबाणयोः संख्ये बलिवासवयोरिव ॥ ८३ ॥
'वहाँ अनिरुद्ध और बाणासुर दोनोंमें अत्यन्त भयंकर महान् युद्ध हुआ । ठीक उसी तरह, जैसे देवासुर-संग्राममें बलि और इन्द्रका युद्ध हुआ था ॥ ८३ ॥
अस्माभिश्चापि तद् युद्धं दृष्टं सुमहदद्भुतम् ।
अनिरुद्धो भयात् तेन संयुगेष्वनिवर्तिना ॥ ८४ ॥
बाणेन मायामास्थाय बद्धो नागैर्महाबलः ।
'मैंने भी उस महान् एवं अद्भुत युद्धको अपनी आँखों देखा है। युद्धसे पीछे न हटनेवाले बाणासुरने भयभीत होकर मायाका सहारा लिया और नागपाशसे महाबली अनिरुद्धको बाँध लिया ॥ ८४३ ॥
व्यादिष्टस्तु वधस्तस्य बाणेन गरुडध्वज ॥ ८५ ॥
तं निवारितवान् मन्त्री कुम्भाण्डो नाम तस्य ह ।
'गरुडध्वज ! उस समय उसने अनिरुद्धके वधकी आज्ञा दे दी, परंतु उसके मन्त्री कुम्भाण्डने उसे वैसा करनेसे रोक दिया ॥ ८५३ ॥
कुमारस्यानिरुद्धस्य तेनासक्तेन संयुगे ॥ ८६ ॥
बाणेन मायामास्थाय सर्पैनियमनं कृतम् ।
उत्तिष्ठतु भवांल्छीघ्रं यशसे विजयाय च ॥ ८७ ॥
'युद्धमें आसक्त हुए बाणासुरने मायाका सहारा लेकर सर्पमय बाणोंद्वारा कुमार अनिरुद्धको बाँधा है; अतः अब आप यश और विजयके लिये शीघ्र उठिये ॥ ८६-८७ ॥
नायं संरक्षितुं कालः प्राणांस्तात जयैषिणाम् ।
प्राणैः किंचिद्गतैर्वीरो धैर्यमालम्ब्य तिष्ठति ॥ ८८ ॥
'तात ! विजयकी अभिलाषा रखनेवाले वीरोंके लिये यह अपने प्राणोंको बचाकर बैठनेका समय नहीं है। वीर पुरुष प्राणोंके कुछ संकटमें पड़ जानेपर धैर्यका सहारा लेकर शत्रुके सामने डटा रहता है' ॥ ८८ ॥
वैशम्पायन उवाच
इत्येवमुक्ते वचने वासुदेवः प्रतापवान् ।
प्रायात्रिकान् वै सम्भारानाज्ञापयत वीर्यवान् ॥ ८९ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! उनके ऐसा कहनेपर पराक्रमी एवं प्रतापी वीर वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णने रण-यात्राके लिये उपयुक्त सामग्री तैयार करनेकी आज्ञा दे दी ॥ ८९ ॥
ततश्चन्दनचूर्णैश्च लाजैश्चैव समन्ततः।
निर्ययौ स महाबाहुः कीर्यमाणो जनार्दनः ॥ ९० ॥
तदनन्तर महाबाहु जनार्दन यात्राके लिये घरसे बाहर निकले। उस समय उनके ऊपर चारों ओरसे चन्दनचूर्ण और लावा बिखेरे जा रहे थे ॥ ९० ॥
विष्णुपर्व ] एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः [ ७०५
नारद उवाच
स्मरणं वैनतेयस्य कर्तुमर्हसि माधव ।
न ह्यन्येन तदध्वानं शक्यं गन्तुं महाभुज ॥ ९१ ॥
(इतनेमें ही) नारदजी बोले—माधव ! विनता-नन्दन गरुड़का स्मरण कीजिये। महाबाहो! उनके सिवा दूसरा कोई उस मार्गपर नहीं जा सकता ॥ ९१ ॥
आकर्ण्य तमध्वानं गन्तव्यमतिदुर्गमम् ।
एकादश सहस्राणि योजनानां जनार्दन ॥ ९२ ॥
तदितः शोणितपुरं प्रद्युम्निर्यत्र साम्प्रतम् ।
जनार्दन ! मेरी बात सुनिये। जिस मार्गपर आपको चलना है, वह अत्यन्त दुर्गम है। प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्ध इस समय जहाँ विद्यमान हैं, वह शोणितपुर यहाँसे ग्यारह हजार योजनकी दूरीपर है ॥ ९२½ ॥
मनोजवो महावीर्यो वैनतेयः प्रतापवान् ॥ ९३ ॥
समाह्वयस्व गोविन्द स हि त्वां तत्र नेष्यति ।
एकेन सुमुहूर्तेन बाणं संदर्शयिष्यति ॥ ९४ ॥
गोविन्द ! महापराक्रमी और प्रतापी विनतानन्दन गरुड़ मनके समान वेगशाली हैं। आप उन्हींका आवाहन कीजिये। वे ही आपको वहाँ पहुँचायेंगे। वे एक ही मुहूर्तमें आपको बाणासुरके सामने उपस्थित कर देंगे ॥ ९३-९४ ॥
वैशम्पायन उवाच
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा सस्मार गरुडं तदा ।
स कृष्णपार्श्वमागम्य प्राञ्जलिर्गरुडः स्थितः ॥ ९५ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! नारदजीका यह वचन सुनकर भगवान् श्रीकृष्णने उस समय गरुड़का स्मरण किया। स्मरण करते ही वे श्रीकृष्णके पास आकर हाथ जोड़-कर खड़े हो गये ॥ ९५ ॥
प्रणम्यथ वचः प्राह वैनतेयो महाबलः ।
वासुदेवं महात्मानं श्लक्ष्णं मधुरया गिरा ॥ ९६ ॥
महात्मा वासुदेवको प्रणाम करके महाबली गरुड उनसे स्नेहयुक्त मधुर वाणीमे बोले ॥ ९६ ॥
गरुड उवाच
पद्मनाभ महाबाहो किमर्थं संस्मृतो ह्यहम् ।
कृत्यं ते यदिहात्रास्ति श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ ९७ ॥
गरुडने कहा—पद्मनाभ ! महाबाहो ! आपने किस लिये मेरा स्मरण किया है। यहाँ आपको मुझसे जो काम है, उसे मैं ठीक-ठीक सुनना चाहता हूँ ॥ ९७ ॥
कस्य पक्षपरिक्षेपैर्नाशयामि पुरीं प्रभो ।
प्रभावात्तव गोविन्द को न विद्याद् बलं मम ॥ ९८ ॥
प्रभो ! आशा दीजिये, मैं अपने पंखोंके प्रहारसे किसकी पुरीका नाश कर डालूँ ? गोविन्द ! आपके प्रभावसे मेरे बल-को कौन नहीं जानता है ? ॥ ९८ ॥
गदावेगं च ते वीर चक्राग्निं च महाभुज ।
नावबुध्यति मूढात्मा को दर्पान्नाशमेष्यति ॥ ९९ ॥
वीर ! महाबाहो ! कौन मूढ़चित्त पुरुष आपकी गदाके वेग और सुदर्शन चक्रके तेजको नहीं जानता है ? वह अपने घमंडके कारण नष्ट हो जायगा ॥ ९९ ॥
हलं सिंहमुखं कस्य वनमाली नियोक्ष्यति ।
कस्य देहस्तु निर्भिन्नो मेदिनीं यास्यति प्रभो ॥ १०० ॥
प्रभो ! वनमालाधारी बलरामजी सिंहके-से मुखवाले अपने हलका प्रहार आज किसपर करनेवाले हैं ? किसका शरीर आज छिन्न-भिन्न होकर पृथ्वीपर गिरनेवाला है ? ॥
कस्य शङ्खरवैः प्राणान् मोहयिष्यसि माधव ।
कोऽयं सपरिवारोऽद्य यास्यते यमसादनम् ॥ १०१ ॥
माधव ! आप अपनी शङ्खध्वनिसे किसके प्राणोंको मोहित करनेवाले हैं। यह कौन है, जो आज परिवारसहित यमलोकमें जाना चाहता है ॥ १०१ ॥
एवमुक्ते तु वचने वैनतेयेन धीमता ।
वासुदेवो वचः प्राह शृणु त्वं वदतां वर ॥ १०२ ॥
बुद्धिमान् विनतानन्दन गरुड़के ऐसा कहनेपर वसुदेव-नन्दन भगवान् श्रीकृष्ण बोले—वक्ताओंमे श्रेष्ठ गरुड़ ! सुनो॥
बलेः पुत्रेण बाणेन प्रद्युम्निरपराजितः ।
उषायाः कारणे बद्धो नगरे शोणिताह्वये ।
अनिरुद्धस्तु कामार्तो बद्धो नागैर्विषोल्बणैः ॥ १०३ ॥
'बलिके पुत्र बाणासुरने अपराजित वीर प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्धको उषाके साथ सम्बन्ध स्थापित करनेके कारण शोणितपुरमें बंदी बना लिया है। कामपीड़ित अनिरुद्धको उसने प्रचण्ड विषवाले सर्पोंके द्वारा बाँध रखा है ॥ १०३ ॥
तस्य मोक्षार्थमाहूतो मया त्वं पतगेश्वर ।
तव वेगसमो नास्ति पक्षिणां प्रवरो भवान् ।
अशक्यं च तदध्वानं गन्तुमन्येन काश्यप ॥ १०४ ॥
'पक्षिराज ! उन्हीं अनिरुद्धको बन्धनसे छुड़ानेके लिये मैंने तुम्हारा आवाहन किया है। वेगमें तुम्हारी समानता करनेवाला दूसरा कोई नहीं है। तुम पक्षियोंमें सबसे श्रेष्ठ हो। कश्यपनन्दन ! तुम्हारे सिवा दूसरे किसीके लिये उस मार्गपर चलना असम्भव है ॥ १०४ ॥
तत्र प्रापय मां शीघ्रं यत्र प्रद्युम्निरावसत् ।
वैदर्भी ते शृणुष वीर रुदती पुत्रगृद्धिनी ॥ १०५ ॥
त्वत्प्रसादाद् भवत्येषा पुत्रेण सह भामिनी ।
'जहाँ प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्ध निवास करते हैं, वहाँ
म० ह० २३ —