भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 719

विष्णुपर्व ] विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ६९७


एवमेतासु नारीषु सर्वभूताश्रया ह्यसि । नमस्कृतासि त्रैलोक्ये किन्नरोद्गीतसेविते ॥ २४ ॥

पचास देवकन्याओंमें, जो देवताओंकी पत्नियां हैं उनमें, कद्रूके जो हजारों पुत्र हैं—उनके पुत्रों और पौत्रोंकी जो सुन्दरी स्त्रियां हैं—उनमें, माता और पितामें, स्वर्गके देवताओं और अप्सराओंसहित ऋषिपत्नियोंमें, यक्षों और गन्धर्वोंकी स्त्रियोंमें, विद्याधरोंकी नारियोंमें और सती-साध्वी मानवी स्त्रियोंमें, इस प्रकार इन उपर्युक्त महिलाओंमें आप जगन्माता देवीका निवास है; क्योंकि आप सम्पूर्ण भूतोंका आश्रय हैं। तीनों लोकोंमें सर्वत्र आपके चरणोंमें मस्तक झुकाया जाता है। किन्नरलोग उच्च स्वरसे गीत गाकर आपकी सेवा करते हैं ॥ २१-२४ ॥

अचिन्त्या ह्यप्रमेयासि यासि सासि नमोऽस्तु ते । एभिर्नामभिरन्यैश्च कीर्तिता ह्यसि गौतमि ॥ २५ ॥

आप अचिन्त्य और अप्रमेय हैं, जो हैं सो हैं, आपको नमस्कार है। गौतमनन्दिनी ! इन पूर्वोक्त नामोंसे और दूसरे नामोंसे भी आपका ही कीर्तन होता है ॥ २५ ॥

त्वत्प्रसादादविघ्नेन क्षिप्रं मुच्येय बन्धनात् । अवेक्षस्व विशालाक्षि पादौ ते शरणं व्रजे ॥ २६ ॥ सर्वेषामेव बन्धानां मोक्षणं कर्तुमर्हसि ।

विशाललोचने ! मैं आपकी कृपासे बिना किसी विघ्न-बाधाके शीघ्र बन्धनमुक्त हो जाऊँ। आप मेरे ऊपर कृपादृष्टि करें; मैं आपके चरणोंकी शरण लेता हूँ। आप मुझे सभी बन्धनोंसे छुड़ाने योग्य हैं ॥ २६ १/२ ॥

ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च चन्द्रसूर्याग्निमारुताः ॥ २७ ॥ अश्विनौ वसवश्चैव विश्वेसाध्यास्तथैव च । मरुता सह पर्जन्यो धाता भूमिर्दिशो दश ॥ २८ ॥ गावो नक्षत्रवंशाश्च ग्रहा नद्यो ह्रदास्तथा । सरितः सागराश्चैव नानाविद्याधरोरगाः ॥ २९ ॥ तथा नागाः सुपर्णाणो गन्धर्वाप्सरसां गणाः । कृत्स्नं जगदिदं प्रोक्तं देव्या नामानुकीर्तनात् ॥ ३० ॥

ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, चन्द्रमा, सूर्य, अग्नि, वायु, अश्विनीकुमार, वसु, विश्वेदेव, साध्यगण, मरुद्गण, पर्जन्य, धाता, भूमि, दसों दिशाएँ, गौ, नक्षत्रसमूह, ग्रहगण, नदियाँ, सरोवर, सरिताएँ, समुद्र, नाना विद्याधर, सर्प, नाग, गरुड़, गन्धर्व और अप्सराओंके समूह—इस प्रकार देवीके नामोंका वारंवार कीर्तन करनेसे इस सम्पूर्ण जगत्‌का कीर्तन हो जाता है ॥ २७-३० ॥


देव्याः स्तवमिमं पुण्यं यः पठेत् सुसमाहितः । सा तस्मै सप्तमे मासि वरमग्र्यं प्रयच्छति ॥ ३१ ॥

जो एकाग्रचित्त होकर देवीके इस पवित्र स्तोत्रका पाठ करता है, देवी उसे सातवें महीनेमें उत्तम वर प्रदान करती हैं।

अष्टादशभुजा देवी दिव्याभरणभूषिता । हारशोभितसर्वाङ्गी मुकुटोज्ज्वलभूषणा ॥ ३२ ॥

देवीकी अठारह भुजाएँ हैं। वे दिव्य आभरणोंसे विभूषित हैं। हारसे उनके सारे अङ्ग सुशोभित हैं। मुकुटकी आभासे उनके आभूषण चमक उठे हैं ॥ ३२ ॥

कात्यायनि स्तूयसे त्वं वरमग्र्यं प्रयच्छसि । अतः स्तवीमि त्वां देवीं वरदे वामलोचने ॥ ३३ ॥

कात्यायनि ! जब आपकी स्तुति की जाती है, तब आप उत्तम वर प्रदान करती हैं। अतः वरदायिनि वामलोचने ! मैं आप देवीकी स्तुति करता हूँ ॥ ३३ ॥

नमोऽस्तु ते महादेवि सुप्रीता मे सदा भव । प्रयच्छ त्वं वरं ह्यायुः पुष्टिं चैव क्षमां धृतिम् ॥ ३४ ॥ बन्धनस्थो विमुच्येयं सत्यमेतद् भवेदिति ।

महादेवि ! आपको नमस्कार है। आप सदा मुझपर सुप्रसन्न रहें और मुझे श्रेष्ठ आयु, पुष्टि, क्षमा और धैर्य प्रदान करें। मैं बन्धनमें पड़ा हुआ हूँ, किंतु इससे मुक्त हो जाऊँ—मेरा यह संकल्प सत्य हो ॥ ३४ १/२ ॥

वैशम्पायन उवाच एवं स्तुता महादेवी दुर्गा दुर्गपराक्रमा ॥ ३५ ॥ सांनिध्यं कल्पयामास अनिरुद्धस्य बन्धने ।

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! इस प्रकार स्तुति की जानेपर दुर्गम पराक्रम प्रकट करनेवाली महादेवी दुर्गाने बन्धनागारमें अनिरुद्धके पास आकर उन्हें दर्शन दिया ॥ ३५ १/२ ॥

अनिरुद्धहितार्थाय देवी शरणवत्सला ॥ ३६ ॥ बद्धं बाणपुरे वीरमनिरुद्धं व्यमोक्षयत् । सान्त्वयामास तं वीरमनिरुद्धममर्षणम् ॥ ३७ ॥

उस शरणागतवत्सला देवीने बाणनगरमें बँधे हुए वीर अनिरुद्धको उनका हित-साधन करनेके लिये बन्धनसे मुक्त कर दिया। साथ ही उन अमर्षशील वीर अनिरुद्धको सान्त्वना प्रदान की ॥ ३६-३७ ॥

पूजयामास तां वीरः सोऽनिरुद्धः प्रतापवान् । प्रसादं दर्शयामास अनिरुद्धस्य बन्धने ॥ ३८ ॥

उस समय प्रतापी वीर अनिरुद्धने देवीका पूजन किया। देवीने बन्धनागारमें अनिरुद्धको अपनी कृपाका प्रत्यक्ष दर्शन कराया ॥ ३८ ॥


१. पचास देवकन्याएँ यहाँ दक्ष प्रजापतिकी पुत्रियाँ हैं। इनमेंसे २७ सोमको, १३ कश्यपको और १० धर्मको ब्याही गयी थीं। इस प्रकार इनकी संख्या पचास है।