विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 720, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें६९८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंश
नागपाशेन बद्धस्य तस्योपाहृतचेतसः।
स्फोटयित्वा कराग्रेण पञ्जरं वज्रसंनिभम् ॥ ३९ ॥
बद्धं बाणपुरे वीरं सानिरुद्धमभाषत ।
सान्त्वयन्ती वचो देवी प्रसादाभिमुखी तदा ॥ ४० ॥
जो नागपाशमें बँधे हुए थे और उषाने जिनके चित्तको चुरा लिया था, उन अनिरुद्धके वज्रतुल्य पिंजरेको अपने हाथके अग्रभागसे तोड़-फोड़कर देवीने बाणपुरमें अवरुद्ध हुए वीर अनिरुद्धको मुक्त कर दिया और कृपा करनेके लिये उद्यत हो उन्हें सान्त्वना देते हुए इस प्रकार कहा ॥ ३९-४० ॥
श्रीदेव्युवाच
चक्रायुधो मोक्षयितानिरुद्ध
त्वां बन्धनादाशु सहस्व कालम्।
छित्त्वा स बाणस्य सहस्रबाहुं
पुरीं निजां नेष्यति दैत्यसूदनः ॥ ४१ ॥
श्रीदेवीने कहा—अनिरुद्ध ! चक्रधारी भगवान् श्रीकृष्ण शीघ्र आकर तुम्हें पूर्णतः इस बन्धनसे छुड़ायेंगे, तबतक कुछ कालतक इस कष्टको सहन करो। वे दैत्य-सूदन श्रीहरि बाणासुरकी सहस्र भुजाओंका छेदन करके तुम्हें अपनी पुरीको ले जायेंगे ॥ ४१ ॥
ततोऽनिरुद्धः पुनरेव देवीं
तुष्टाव हृष्टः शशिकान्तवक्त्रः ।
तदनन्तर चन्द्रमाके समान कमनीय मुखवाले अनिरुद्धने प्रसन्न होकर पुनः देवीका स्तवन किया ॥ ४१ ½ ॥
अनिरुद्ध उवाच
नमोऽस्तु ते देवि वरप्रदे शिवे
नमोऽस्तु ते देवि सुरारिनाशिनी ॥ ४२ ॥
अनिरुद्ध बोले—कल्याणस्वरूपे ! वरदायिनि देवि ! आपको नमस्कार है। देवशत्रुओंका नाश करनेवाली देवि ! आपको प्रणाम है ॥ ४२ ॥
नमोऽस्तु ते कामचरे सदाशिवे
नमोऽस्तु ते सर्वहितैषिणि प्रिये ।
नमोऽस्तु ते भीतिकरि द्विषां सदा
नमोऽस्तु ते बन्धनमोक्षकारिणि ॥ ४३ ॥
इच्छानुसार विचरनेवाली सदाशिवे ! आपको नमस्कार है। सबका हित चाहनेवाली सर्वप्रिये ! आपको नमस्कार है। शत्रुओंको सदा भय देनेवाली देवि ! आपको प्रणाम है तथा बन्धनसे छुड़ानेवाली देवि ! आपको नमस्कार है ॥ ४३ ॥
ब्रह्माणीन्द्राणि रुद्राणि भूतभव्यभवे शिवे ।
त्राहि मां सर्वभीतिभ्यो नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ ४४ ॥
ब्रह्माणि ! इन्द्राणि ! रुद्राणि ! भूत, वर्तमान और भविष्य-स्वरूपे शिवे ! सब प्रकारके भयोंसे मेरी रक्षा करें। नारायणि ! आपको नमस्कार है ॥ ४४ ॥
नमोऽस्तु ते जगद्धात्रे प्रिये दान्ते महाव्रते ।
भक्तिप्रिये जगन्मातः शैलपुत्रि वसुन्धरे ॥ ४५ ॥
त्राहि मां त्वं विशालाक्षि नारायणि नमोऽस्तु ते ।
त्रायस्व सर्वदुःखेभ्यो दानवानां भयङ्करि ॥ ४६ ॥
जगत्की रक्षा करनेवाली प्रिय देवि ! आपको नमस्कार है। मन और इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाली महाव्रतधारिणी भक्तिप्रिये ! जगन्मातः ! गिरिराजनन्दिनि ! वसुन्धरे ! विशाल नेत्रोंवाली नारायणि ! आप मेरी रक्षा कीजिये ! आपको नमस्कार है। दानवोंको भय देनेवाली देवि ! सब प्रकारके दुःखोंसे मेरा परित्राण कीजिये ॥ ४५-४६ ॥
रुद्रप्रिये महाभागे भक्तानामार्तिनाशिनि ।
नमामि शिरसा देवीं बन्धनस्थो विमोक्षितः ॥ ४७ ॥
रुद्रप्रिये ! भक्तोंकी पीड़ा दूर करनेवाली महाभागे ! मैं चरणोंमें मस्तक झुकाकर आप देवीको नमस्कार करता हूँ। आपने मुझे बन्धनमें रहते हुए भी मुक्त कर दिया ॥ ४७ ॥
वैशम्पायन उवाच
आर्यास्तवमिदं पुण्यं यः पठेत् सुसमाहितः ।
सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति ।
बन्धनस्थो विमुच्येत सत्यं व्यासवचो यथा ॥ ४८ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! जो एकाग्रचित्त होकर इस पवित्र आर्यास्तोत्रका पाठ करता है, वह सब पापोंसे मुक्त होकर विष्णुलोकमें जाता है और यदि बन्धनमें पड़ा हो तो उससे मुक्त हो जाता है। जैसा कि व्यासजीका सत्य वचन है ॥ ४८ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि अनिरुद्धकृत आर्यास्तवो
नाम विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२० ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें आर्यास्तवविषयक एक सौ बीसवाँ
अध्याय पूरा हुआ ॥ १२० ॥