विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 721, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| विष्णुपर्व ] | एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः | ६९९ |
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एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
अनिरुद्धके अपहरणसे रनवासमें शोक, श्रीकृष्ण और यादवोंकी चिन्ता, गुप्तचरोंकी नियुक्ति और उनकी विफलता, नारदजीका आगमन और अनिरुद्धका समाचार-निवेदन, श्रीकृष्णके द्वारा गरुड़ का आवाहन और स्तवन, गरुड़द्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति और श्रीकृष्णका शोणितपुरको प्रस्थान
वैशम्पायन उवाच
ततोऽनिरुद्धस्य गृहे रुरुदुः सर्वयोषितः ।
प्रियं नाथमपश्यन्त्यः कुरर्य इव संघशः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! तदनन्तर अनिरुद्धके महलमें रहनेवाली समस्त सुन्दरियाँ अपने प्रिय स्वामीको न देखकर झुंड-की-झुंड एकत्र हो कुररियोंकी भाँति विलाप करने लगीं— ॥ १ ॥
अहो धिकिमिदं नाथनाथे कृष्णे व्यवस्थिते ।
अनाथा इव संत्रस्ता रुदिमो भयपीडिताः ॥ २ ॥
'अहो ! धिक्कार है, यह क्या हुआ ? नाथोंके भी नाथ श्रीकृष्णके रहते हुए हमलोग अनाथकी भाँति संत्रस्त और भयसे पीड़ित हो रोदन करती हैं ॥ २ ॥
यस्येन्द्रप्रमुखा देवाः सादित्याः समरुद्गणाः ।
बाहुच्छायामुपाश्रित्य वसन्ति दिवि निर्वृताः ॥ ३ ॥
तस्योत्पन्नमिदं लोके भयदस्य महाभयम् ।
तस्यानिरुद्धः पौत्रस्तु वीरः केनापि नो हृतः ॥ ४ ॥
'जिनकी भुजाओंकी छायाका आश्रय ले आदित्यों और मरुद्गणोंसहित इन्द्र आदि सभी देवता स्वर्गमें सुखपूर्वक निवास करते हैं। लोकमैं भय देनेवाले ( या दूसरोंके भयका निवारण करनेवाले ) उन्हीं भगवान् श्रीकृष्णके समक्ष आज यह महान् भय उत्पन्न हो गया। उनके वीर पौत्र हमारे स्वामी अनिरुद्धको आज किसीने हर लिया ॥ ३-४ ॥
अहो नास्ति भयं नूनं तस्य लोके सुदुर्मतेः ।
वासुदेवस्य यः क्रोधमुत्पादयति दुःसहम् ॥ ५ ॥
'अहो ! उस दुर्बुद्धिको निश्चय ही संसारमें कोई भय नहीं है, जो भगवान् वासुदेवके हृदयमें दुःसह क्रोध उत्पन्न कर रहा है ॥ ५ ॥
व्यादितास्यस्य यो मृत्योर्दंष्ट्राग्रे परिवर्तते ।
स वासुदेवं समरे मोहादभ्युदियाद् रिपुः ॥ ६ ॥
'जो मुँह बाकर खड़ी हुई मौतकी दाढ़ोंके सामने चक्कर लगाता है, वही मोहवश समराङ्गणमें शत्रुभावसे भगवान् वासुदेवके सामने जा सकता है ॥ ६ ॥
इदमेवंविधं कृत्वा विप्रियं यदुपूङ्गवे ।
कथं जीवन् विमुच्येत साक्षादपि शचीपतिः ॥ ७ ॥
'यदुकुलतिलक श्रीकृष्णके प्रति यह ऐसा अप्रिय बर्ताव करके साक्षात् शचीपति इन्द्र भी कैसे जीवित छूट सकता है ? ॥
हृतनाथाः स्म शोच्याः स्म वयं नाथं विना कृताः ।
विप्रयोगेण नाथस्य कृतान्तवशगाः कृताः ॥ ८ ॥
'हाय ! हमारे नाथका अपहरण हो जानेसे हम सब-की-सब अनाथ एवं शोचनीय हो गयीं। अपने स्वामीके वियोगसे हम कालके अधीन कर दी गयीं' ॥ ८ ॥
इत्येवं ता वदन्त्यश्च रुदन्त्यश्च पुनः पुनः ।
नेत्रजं वारि मुमुचुरशिवं परमाङ्गनाः ॥ ९ ॥
वे सुन्दरी अङ्गनाएँ इस प्रकार बारंबार विलाप करती और रोती हुई अपने नेत्रोंसे अमङ्गलसूचक आँसू बहाने लगीं ॥
तासां बाष्पाम्बुपूर्णानि नयनानि चकाशिरे ।
सलिलेनाप्लुतानीव पङ्कजानि जलागमे ॥ १० ॥
उनके अश्रुजलसे भरे हुए नेत्र वर्षाकालमें जलसे भीगे हुए कमलोंके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ १० ॥
तासामरालपक्ष्मणि राजयन्ति शुभानि च ।
रुधिरेणाप्लुतानीव नयनानि चकाशिरे ॥ ११ ॥
उनके कुटिल बरौनियोंसे युक्त सुन्दर एवं लाल नेत्र खूनमें डूबे हुए-से प्रतीत होते थे ॥ ११ ॥
तासाहर्म्यतलस्थानां पूर्ण आसीन्महास्वनः ।
कुररीणामिवाकाशे रुदतीनां सहस्रशः ॥ १२ ॥
अट्टालिकाओंमें बैठकर रोती हुई उन सुन्दरियोंका सब ओर फैला हुआ वह आर्तनाद आकाशमें सहस्रों कुररियोंके करुण-क्रन्दनके समान जान पड़ता था ॥ १२ ॥
ते श्रुत्वा निनदं घोरमपूर्वं भयमागतम् ।
उत्पेतुः सहसा स्वेभ्यो गृहेभ्यः पुरुषर्षभाः ॥ १३ ॥
उस भयंकर आर्तनादको सुनकर किसी अपूर्व भयके आगमनका अनुमान करके वे पुरुषप्रवर यादव अपने-अपने घरोंसे सहसा उछल पड़े ॥ १३ ॥
कस्मादेषोऽनिरुद्धस्य श्रूयते सुमहान्स्वनः ।
गृहे कृष्णाभिगुप्तानां कुतो नो भयमागतम् ॥ १४ ॥
वे सोचने लगे 'अनिरुद्धके महलमें यह महान् कोलाहल क्यों सुनायी देता है ? श्रीकृष्णके संरक्षणमें रहने-वाले हमलोगोंके घरमें यह भय कहाँसे आ गया ?' ॥ १४ ॥