विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 722, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें७०० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
इत्येवमूचुस्तेऽन्योन्यं स्नेहविक्लवगद्गदाः ।
अधर्षिता यथा सिंहा गुहाभ्य इव निःसृताः ॥ १५ ॥
इस प्रकार वे एक-दूसरेसे कहने लगे। उस समय उनकी वाणी स्नेहजनित विकलताके कारण गद्गद हो रही थी। जिन्हें कभी किसीका तिरस्कार नहीं सहना पड़ा हो ऐसे सिंह जैसे गुफासे निकले हों, उसी प्रकार वे यादव भी अपने घरोंसे निकल पड़े ॥ १५ ॥
सन्नाहभेरी कृष्णस्य आहता महती तदा ।
यस्याः शब्देन ते सर्वे समागम्य च धिष्ठिताः ॥ १६ ॥
भगवान् श्रीकृष्णके यहाँ युद्धकी तैयारीके लिये सूचना देनेवाला विशाल डंका तत्काल बज उठा, जिसके शब्दसे समस्त यादव वहाँ एकत्र होकर खड़े हो गये ॥ १६ ॥
किमेतदिति तेऽन्योन्यं समपृच्छन्त यादवाः ।
अन्योन्यस्य हि ते सर्वे यथावृत्तमवेदयन् ॥ १७ ॥
वे यदुवंशी परस्पर पूछने लगे कि 'क्या बात है?' फिर जो जानकार थे, उन सबने एक दूसरेको यथार्थ बात बता दी ॥ १७ ॥
ततस्ते बाष्पपूर्णाक्षाः क्रोधसंरक्तलोचनाः ।
निःश्वसन्तो व्यतिष्ठन्त यादवा युद्धदुर्मदाः ॥ १८ ॥
तब वे रणदुर्मद यादव नेत्रोंमें आँसू भरकर क्रोधसे लाल आँखें किये लंबी साँस खींचते हुए खड़े हो गये ॥ १८ ॥
तूष्णींभूतेषु सर्वेषु विपृथुर्वाक्यमब्रवीत् ।
कृष्णं प्रहरतां श्रेष्ठं निःश्वसन्तं मुहुर्मुहुः ॥ १९ ॥
समस्त यादव वहाँ आकर चुपचाप खड़े हो गये। तब विपृथुने बारंबार दीर्घ निःश्वास लेते हुए योद्धाओंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा—॥ १९ ॥
किमिदं चिन्तयाविष्टः पुरुषेन्द्र भवानिह ।
तव बाहुबलप्राणाः स्वास्थिताः सर्वयादवाः ॥ २० ॥
'पुरुषोत्तम ! आप यहाँ इस प्रकार चिन्तामग्न क्यों हैं ? समस्त यादव आपके ही बाहुबलके भरोसे जीवन धारण करके यहाँ सुखपूर्वक रहते हैं ॥ २० ॥
भवन्तमाश्रिताः कृष्ण संविभक्ताश्च सर्वशः ।
तथैव बलवाञ्शक्रस्त्वय्यावेद्य जयाजयौ ॥ २१ ॥
सुखं स्वपिति निःशङ्कः कथं त्वं चिन्तयान्वितः ।
शोकसागरमक्षोभ्यं सर्वे ते ज्ञातयो गताः ॥ २२ ॥
'श्रीकृष्ण ! ये सब आपकी शरणमें हैं और आपने सबको पृथक्-पृथक् सुख-सुविधा प्रदान की है। इसी प्रकार बलवान् इन्द्र भी आपपर ही जय-पराजयका भार रखकर बिना किसी डर-भयके सुखपूर्वक सोते हैं। फिर आप कैसे चिन्तामें डूबे हुए हैं। आपके ये समस्त बन्धु-बान्धव आपकी यह दशा देखकर शोकके अक्षोभ्य समुद्रमें मग्न हो गये हैं ॥ २१-२२ ॥
तान् मज्जमानानकस्त्वं समुद्धर महाभुज ।
किमेदं चिन्तयाविष्टो न किंचिदपि भाषसे ॥ २३ ॥
चिन्तां कर्तुं वृथा देव न त्वमर्हसि माधव ।
'महाबाहो ! आप अकेले ही इन डूबते हुए कुटुम्बी-जनोंका उद्धार कीजिये। इस तरह चिन्तामग्न होकर आप क्यों कुछ भी नहीं बोल रहे हैं ? देव ! माधव ! आपको व्यर्थ चिन्ता नहीं करनी चाहिये' ॥ २३ १/२ ॥
इत्येवमुक्तः कृष्णस्तु निःश्वस्य सुचिरं बहु ॥ २४ ॥
प्राह वाक्यं स वाक्यज्ञो वृहस्पतिरिव स्वयम् ।
विपृथुके ऐसा कहनेपर बातचीतके मर्मको समझनेवाले श्रीकृष्णने बहुत देरतक लंबी साँस खींचकर साक्षात् वृहस्पतिके समान यह बात कही ॥ २४ १/२ ॥
श्रीकृष्ण उवाच
विपृथो चिन्तयाविष्टो ह्येतत्कार्यमचिन्तयम् ॥ २५ ॥
विचिन्तयंस्त्वहं चास्य कार्यस्यानं लभे गतिम् ।
श्रीकृष्ण बोले--विपृथु ! मैं चिन्तामग्न होकर इसी कार्यके विषयमें विचार कर रहा था; किंतु बहुत सोचनेपर भी मैं इस कार्यका कोई निश्चित आधार न पा सका ॥ २५ १/२ ॥
तथाहं भवताप्युक्तो नोत्तरं विदधे क्वचित् ॥ २६ ॥
इसीलिये तुम्हारे पूछनेपर भी मैंने कोई उत्तर नहीं दिया ॥ २६ ॥
दाशार्हगणमध्येऽहं वदाम्यर्थवतीं गिरम् ।
शृणुध्वं यादवाः सर्वे यया चिन्तान्वितो ह्यहम् ॥ २७ ॥
आज समस्त दाशार्हगणोंके बीच मैं यह अभिप्रायपूर्ण बात कह रहा हूँ। यादवो ! तुम सब लोग सुन लो कि मैं क्यों चिन्तित हो उठा हूँ ॥ २७ ॥
अनिरुद्धे हृते वीरे पृथिव्यां सर्वपार्थिवाः ।
अशक्ता इति मंस्यन्ते सर्वानस्मान् सबान्धवान् ॥ २८ ॥
वीर अनिरुद्धका इस तरह अपहरण हो जानेपर भूमण्डलके समस्त भूपाल बन्धु बान्धवोंसहित हम सब लोगोंको शक्तिहीन समझेंगे ॥ २८ ॥
आहुकश्चैव नो राजा हृतः शाल्वेन वै पुरा ।
प्रत्यानीतः स चास्माभिर्युद्धं कृत्वा सुदारुणम् ॥ २९ ॥
पूर्वकालमें शाल्वने हमारे राजा उग्रसेनको हर लिया था; तब हमने अत्यन्त दारुण युद्ध करके उन्हें वापस लौटाया था ॥ २९ ॥
प्रद्युम्नश्चापि मो बालः शम्बरेण हतो ह्यभूत् ।
स तं निहत्य समरे प्राप्तो रुक्मिणिनन्दनः ॥ ३० ॥
हमारे प्रद्युम्नको भी बाल्यावस्थामें शम्बरासुरने चुरा