विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 723, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः [ ७०१
लिया था, परंतु रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न समराङ्गणमें उस असुरका वध करके स्वयं चले आये ॥ ३० ॥
इदं तु सुमहत् कष्टं प्रद्युम्निः क्व प्रवासितः ।
एवंविधमहं दोषं न स्मरे मनुजर्षभाः ॥ ३१ ॥
किंतु यह तो सबसे बढ़कर महान् कष्टकी बात है कि प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्ध कहीं परदेशमें पहुँचा दिये गये और हमें पतातक नहीं चला। नरश्रेष्ठ यादवो ! ऐसा दोष कभी प्राप्त हुआ हो, इसका मुझे स्मरण नहीं है ॥ ३१ ॥
भस्मना गुण्ठितः पादो येन मे मूर्ध्नि पातितः ।
तस्याहं सानुबन्धस्य हरिष्ये जीवितं रणे ॥ ३२ ॥
जिसने मेरे मस्तकपर अपना राखसे लिपटा हुआ पैर रखा है, सगे-सम्बन्धियोंसहित उस दुरात्माके प्राणोंको मैं रणभूमिमें अवश्य हर लूँगा ॥ ३२ ॥
इत्येवमुक्ते कृष्णेन सात्यकिर्वाक्यमब्रवीत् ।
चाराः कृष्ण प्रणीयन्तामनिरुद्धस्य मार्गणे ।
सपर्वतवनोद्देशां मार्गन्तु वसुधामिमाम् ॥ ३३ ॥
श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर सात्यकि बोले—'श्रीकृष्ण ! अनिरुद्धकी खोजके लिये गुप्तचर भेजे जायें तथा वे पर्वत और वनस्थलीसहित इस सारी पृथ्वीमें उनका अनुसंधान करें' ॥
आहुकं प्राह कृष्णस्तु स्मितं कृत्वा वचस्तदा ।
आभ्यन्तराश्च बाह्याश्च व्यादिश्यन्तां चरा नृप ॥ ३४ ॥
तब श्रीकृष्णने मुसकराकर राजा उग्रसेनसे कहा—'नरेश्वर ! आप बाह्य और आभ्यन्तर (प्रकट और गुप्त) चरोंको इस कार्यके लिये नियुक्त कीजिये' ॥ ३४ ॥
वैशम्पायन उवाच
केशवस्य वचः श्रुत्वा आहुकस्त्वरितोऽभवत् ।
अन्वेषणेऽनिरुद्धस्य स चारान् दिष्टवांस्तदा ॥ ३५ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! भगवान् श्रीकृष्णका यह वचन सुनकर राजा उग्रसेन बड़ी उतावलीके साथ उठे । उन्होंने अनिरुद्धकी खोजके लिये तत्काल प्रकट एवं गुप्त चर नियुक्त कर दिये ॥ ३५ ॥
ततश्चारास्तु व्यादिष्टाः पार्थिवेन यशस्विना ।
हया रथाश्च व्यादिष्टाः पार्थिवेन महात्मना ।
अभ्यन्तरं च मार्गध्वं बाह्यतश्च समन्ततः ॥ ३६ ॥
यशस्वी भूपाल महामना उग्रसेनने चरोंको नियुक्त करके उनके लिये घोड़े और रथ भी दे दिये और यह आज्ञा दी—'तुमलोग भीतर-बाहर सब ओर अनिरुद्धको ढूँढो ॥ ३६ ॥
वेणुमन्तं लताविष्टं तथा रैवतकं गिरिम् ।
ऋक्षवन्तं गिरिं चैव मार्गध्वं त्वरिता हयैः ॥ ३७ ॥
'घोड़ोंपर सवार हो शीघ्रतापूर्वक जाकर वेणुमान्, लताविष्ट, रैवतक तथा ऋक्षवान् पर्वतपर उनकी खोज करो ॥
एकैकं तत्र चोद्यानं मार्गध्वं काननानि च ।
यातव्यं चापि निःशङ्कमुद्यानानि समन्ततः ॥ ३८ ॥
हयानां च सहस्राणि रथानां चाप्यनेकशः ।
आरुह्य त्वरिताः सर्वे मार्गध्वं यदुनन्दनम् ॥ ३९ ॥
'वहाँका एक-एक उद्यान और जंगल-झाड़ी छान डालो, उद्यानोंमें सब ओर बेखटके चले जाना, हजारों घोड़ों और बहुसंख्यक रथोंपर आरूढ़ हो तुम सब लोग बड़ी उतावलीके साथ यदुनन्दन अनिरुद्धका पता लगाओ' ॥ ३८-३९ ॥
सेनापतिरनाधृष्टिरिदं वचनमब्रवीत् ।
कृष्णमक्लिष्टकर्माणमच्युतं भीतभीतवत् ॥ ४० ॥
तदनन्तर सेनापति अनाधृष्टि ने अनायास ही महान् कर्म करनेवाले अच्युत श्रीकृष्णसे डरते-डरते-से इस प्रकार कहा—॥
शृणु कृष्ण वचो मह्यं रोचते यदि ते प्रभो ।
चिरात् प्रभृति मे वक्तुं भवन्तं जायते मतिः ॥ ४१ ॥
'प्रभो ! श्रीकृष्ण ! यदि आपको जँचे तो मेरी बात भी सुनें । बड़ी देरसे मेरे मनमें यह बात आ रही थी कि मैं आपसे कुछ कहूँ ॥ ४१ ॥
असिलोमा पुलोमा च निसुन्दनरकौ हतौ ।
सौभः शाल्वश्च निहतौ मैन्दो द्विविद एव च ॥ ४२ ॥
'आपके द्वारा असिलोमा और पुलोमा मारे गये । निसुन्द और नरक कालके गालमें डाल दिये गये । सौभ विमान और उसके स्वामी राजा शाल्व भी नष्ट कर दिये गये । मैन्द और द्विविद भी मारे गये ॥ ४२ ॥
हयग्रीवश्च सुमहान् सानुबन्धस्त्वया हतः ।
तादृशे विग्रहे वृत्ते देवहेतोः सुदारुणे ॥ ४३ ॥
सर्वाण्येतानि कर्माणि निःशेषाणि रणे रणे ।
कृतवानसि गोविन्द पार्ष्णिग्राहश्च नास्ति ते ॥ ४४ ॥
'महान् असुर हयग्रीव सगे सम्बन्धियोंसहित आपके हाथसे मारा गया । देवताओंके लिये वैसे-वैसे अत्यन्त भयङ्कर युद्ध आपने किये हैं । गोविन्द ! प्रत्येक रणक्षेत्रमें आपने ये सारे कर्म पूर्णरूपसे सम्पन्न किये हैं, किंतु आपका साथ देनेवाला कोई नहीं है ॥ ४३-४४ ॥
इदं कर्म त्वया कृष्ण सानुबन्धं महत् कृतम् ।
पारिजातस्य हरणे यत् कृतं कर्म दुष्करम् ॥ ४५ ॥
'श्रीकृष्ण ! पारिजातका हरण करते समय आपने जो दुष्कर कर्म किया था, वह सचमे महान् था । आपके द्वारा किया गया यह पारिजात-हरणरूपी कर्म परिणामसहित सबसे उत्कृष्ट है ॥ ४५ ॥