विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 724, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ७०२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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तत्र शक्रस्त्वया कृष्ण ऐरावतशिरोगतः।
निर्जितो बाहुवीर्येण त्वया युद्धविशारदः ॥ ४६ ॥
‘श्रीकृष्ण ! उस समय आपने अपने बाहुबलसे ऐरावतकी पीठपर बैठे हुए युद्धविशारद इन्द्रको भी पराजित कर दिया॥
तेन वैरं त्वया सार्धं कर्तव्यं नात्र संशयः।
वैरानुबन्धश्च महांस्तेन कार्यस्त्वया सह ॥ ४७ ॥
‘अतः इसमें कोई संशय नहीं कि देवराज इन्द्र आपके साथ वैर कर सकते हैं । उनका आपके साथ महान् वैर बाँधना अवश्य सम्भव है ॥ ४७ ॥
तत्रानिरुद्धहरणं कृतं मघवता स्वयम्।
न ह्यन्यस्य भवेच्छक्तिर्वैरनिर्यातनं प्रति ॥ ४८ ॥
‘अतः अनिरुद्धका अपहरण स्वतः इन्द्रने ही किया है। दूसरे किसीमें इस तरह वैरका बदला लेनेकी शक्ति नहीं हो सकती’ ॥ ४८ ॥
इत्येवमुक्ते वचने कृष्णो नाग इव श्वसन्।
उवाच वचनं धीमानानधृष्टिं महाबलम् ॥ ४९ ॥
उनके ऐसी बात कहनेपर बुद्धिमान् भगवान् श्रीकृष्णने हाथीके समान उच्छ्वास लेकर महाबली अनाधृष्टिके इस प्रकार कहा—॥ ४९ ॥
सेनानीस्तात मा मैवं न देवाः क्षुद्रकर्माणः।
नाकृतज्ञा न च क्लीबा नावल्लिप्ता न बालिशाः ॥ ५० ॥
‘तात ! सेनापते ! ऐसी बात न कहो, न कहो, देवता ऐसा नीच कर्म करनेवाले नहीं होते । वे न तो अकृतज्ञ होते हैं, न कायर । न घमंडी होते हैं, न मूर्ख ॥ ५० ॥
देवार्थे च मे यत्नो महान् दानवसंक्षये।
तेषां प्रियार्थे च रणे हन्मि दृप्तान् महाबलान् ॥ ५१ ॥
‘देवताओंके लिये ही मेरा दानव-संहारके निमित्त महान् प्रयत्न होता रहता है । उन्हींका प्रिय करनेके लिये मैं रणमें अभिमानी और महाबली असुरोंका वध करता हूँ ॥ ५१ ॥
तत्परस्तन्मनाश्चास्मि तद्भक्तस्तत्प्रिये रतः।
कथं पापं करिष्यन्ति विज्ञायैवंविधं हि माम् ॥ ५२ ॥
‘मैं शरीरसे उन देवताओंके हितमें तत्पर रहता हूँ, मनसे उन्हींका हित-चिन्तन करता हूँ, उनमें भक्तिभाव रखता हूँ और उन्हींका प्रिय करनेमें लगा रहता हूँ। मुझे ऐसा जानकर भी वे मेरे साथ दुर्व्यवहार क्यों करेंगे ॥ ५२ ॥
अक्षुद्राः सत्यवन्तश्च नित्यं भक्तानुकम्पिनः।
तेभ्यो न विद्यते पापं बालिशत्वात् प्रभाषसे ॥ ५३ ॥
‘देवता क्षुद्रतासे रहित, सत्यवादी तथा भक्तोंपर सदा कृपा करनेवाले होते हैं। उनसे पाप नहीं हो सकता । तुम विवेकशून्य होनेके कारण उनके सम्बन्धमें उपर्युक्त बात कह रहे हो ॥ ५३ ॥
कदाचिदिह पुंश्चल्या अनिरुद्धो हृतो भवेत्।
देवेषु समहेन्द्रेषु नैतत् कर्म विधीयते ॥ ५४ ॥
‘कदाचित् यह सम्भव हो सकता है कि किसी पुंश्चली स्त्रीने यहाँ आकर अनिरुद्धका अपहरण किया हो । इन्द्रसहित देवताओंमेंसे किसीके द्वारा ऐसा कर्म नहीं बन सकता’ ॥ ५४ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं चिन्तयमानस्य कृष्णस्याद्भुतकर्मणः।
कृष्णस्य वचनं श्रुत्वा ततोऽक्रूरोऽब्रवीद् वचः ॥ ५५ ॥
मधुरं श्लक्ष्णया वाचा अर्थवाक्यविशारदः।
यच्छक्रस्य प्रभो कार्यं तदस्माकं विनिश्चितम् ॥ ५६ ॥
अस्माकं चापि यत्कार्यं तद्धि कार्यं शचीपतेः।
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! ऐसा विचार करते हुए अद्भुतकर्मा श्रीकृष्णका यह वचन सुनकर अर्थयुक्त वचन बोलनेमें चतुर अक्रूरने स्नेहयुक्त वाणीमें मधुर स्वरसे कहा— ‘प्रभो ! इन्द्रका जो कार्य है, वह निश्चय ही हमलोगोंका भी है। इसी प्रकार जो हमारा कार्य है, वह शचीपति इन्द्रका भी है ॥ ५५-५६ १/२ ॥
संरक्ष्याश्च वयं देवैरस्माभिश्चापि देवताः।
देवतार्थे वयं चापि मानुषत्वमुपागताः ॥ ५७ ॥
‘देवताओंको हमारी रक्षा करनी चाहिये और हमें देवताओंकी; क्योंकि हमलोग भी देवताओंके लिये ही मानव-शरीरमें आये हैं’ ॥ ५७ ॥
एवमक्रूरवचनैश्चोदितो मधुसूदनः ।
स्निग्धगम्भीरया वाचा पुनः कृष्णोऽभ्यभाषत ॥ ५८ ॥
अक्रूरके इन वचनोंसे प्रेरित होकर मधुसूदन भगवान् श्रीकृष्णने पुनः स्निग्ध गम्भीर वाणीमें कहा- ॥ ५८ ॥
नायं देवैर्न गन्धर्वैर्न यक्षैर्न च राक्षसैः।
प्रद्युम्नपुत्रोऽपहृतः पुंश्चल्या नु महायशः ॥ ५९ ॥
‘महायशस्वी अक्रूरजी ! प्रद्युम्नपुत्र अनिरुद्धका अपहरण देवताओं, गन्धर्वों, यक्षों और राक्षसों ने नहीं किया है। निश्चय ही यह किसी पुंश्चली (व्यभिचारिणी) स्त्रीका काम है ॥ ५९ ॥
मायाविदग्धाः पुंश्चल्यो दैत्यदानवयोषितः।
ताभिर्हतो न संदेहो नान्यतो विद्यते भयम् ॥ ६० ॥
‘दैत्यों और दानवोंकी जो पुंश्चली स्त्रियाँ हैं, वे मायामें निपुण होती हैं । उन्हींके द्वारा अनिरुद्धका अपहरण हुआ है। इसमें संदेह नहीं है । दूसरे किसीसे यह भय नहीं प्राप्त हुआ है’ ॥ ६० ॥