विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 725, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ५०३
वैशम्पायन उवाच
इत्येवमुक्ते वचने कृष्णेन तु महात्मना ।
अथावगम्य तत्त्वेन यद् भूतं यदुमण्डले ।
उदतिष्ठन्महानादस्तदा कृष्णं प्रशंसयन् ॥ ६१ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! महात्मा श्रीकृष्णके ऐसी बात कहनेपर यदुमण्डलमें जो कुछ हुआ था, उसको ठीकसे जान लेनेपर वहाँ श्रीकृष्णकी प्रशंसासे भरा हुआ महान् शब्द प्रकट हुआ ॥ ६१ ॥
हर्षयन् स तु सर्वेषां सूतमागधवन्दिनाम् ।
मधुरः श्रूयते घोषो यादवस्य निवेशने ॥ ६२ ॥
यदुपति श्रीकृष्णके महलमें सबके हर्षको बढ़ाता हुआ सूतों, मागधों और वन्दियोंका वह मधुर घोष सबको सुनायी देने लगा ॥ ६२ ॥
ते चाराः सर्वतः सर्वे सभाद्वारमुपागताः ।
शनैर्गद्गदया वाचा इदं वचनमब्रुवन् ॥ ६३ ॥
इतनेमें ही वे सब गुप्तचर सब ओरसे खोज करके सभाद्वारपर लौट आये और धीरे-धीरे गद्गद वाणीमें इस प्रकार बोले—॥ ६३ ॥
उद्यानानि गुहाः शैलाः सभा नद्यः सरांसि च ।
एकैकं शतशो राजन् मार्गितं न च दृश्यते ॥ ६४ ॥
'राजन् ! सारे उद्यान, गुफाएँ, पर्वत, धर्मशालाएँ, नदियाँ और सरोवर छान डाले गये । एक-एक स्थानपर सौ-सौ बार खोज की गयी; परंतु कहीं अनिरुद्धका दर्शन नहीं हुआ' ॥
अन्ये कृष्णं चरा राजन्नुपागम्य तदाब्रुवन् ।
सर्वे नो विदिता देशाः प्राद्युम्निर्न च दृश्यते ॥ ६५ ॥
राजन् ! दूसरे चर भी भगवान् श्रीकृष्णके पास आकर कहने लगे—'प्रभो ! हमें सब देशोंका पता है, सर्वत्र खोज की गयी, किंतु कहीं भी प्रद्युम्नकुमारका पता नहीं लग रहा है ॥
यदन्यत् संविधातव्यं विधानं यदुनन्दन ।
तदाज्ञापय नः क्षिप्रमनिरुद्धस्य मार्गणे ॥ ६६ ॥
'यदुनन्दन ! अनिरुद्धके अन्वेषणके लिये अब और जो कुछ कार्य करना हो, उसके लिये हमें शीघ्र आज्ञा दीजिये' ॥
ततस्ते दीनमनसः सर्वे बाष्पाकुलेक्षणाः ।
अन्योन्यमभ्यभाषन्त किमतः कार्यमुत्तमम् ॥ ६७ ॥
चरोंकी ये बातें सुनकर सबका मन उदास हो गया । सबके नेत्रोंमें आँसू भर आये और सब एक-दूसरेसे कहने लगे—'इससे उत्तम कार्य अब और क्या करना चाहिये ?'॥ ६७ ॥
संदष्टौष्ठपुटाः केचित् केचिद् बाष्पाकुलेक्षणाः ।
केचिद् भ्रुकुटिमास्थाय चिन्तयन्त्यर्थसिद्धये ॥ ६८ ॥
किसीने क्रोधवश दाँतोंसे ओठ दबा लिये, किन्हींके नेत्रोंमें आँसू भर आये और कोई भौंहें टेढ़ी करके कार्यसिद्धिके उपायपर विचार करने लगे ॥ ६८ ॥
एवं चिन्तयतां तेषां बह्वर्थमभिभाषितम् ।
अनिरुद्धः कुतश्चेति सम्भ्रमः सुमहानभूत् ॥ ६९ ॥
इस प्रकार चिन्तन करते हुए उन यादवोंके मुखसे अनेक तरहकी बातें निकलीं । 'अनिरुद्ध कहाँ गये ?' इस प्रश्नको लेकर सबके हृदयमें महान् सम्भ्रम उत्पन्न हो गया ॥
अन्योन्यमभिवीक्षन्ते यादवा जातमन्यवः ।
तां निशां विमनस्कास्ते गमयेयुः कथंचन ।
अनिरुद्धो हृतश्चेति पुनः पुनररिंदम ॥ ७० ॥
शत्रुदमन नरेश ! उस समय कुपित और खिन्न हुए यादव एक दूसरेका मुँह देखने लगे । अनिरुद्धके अपहरणकी बारंबार चर्चा करते हुए उन्होंने उदास मनसे किसी तरह वह रात बितायी ॥ ७० ॥
एवं च ब्रुवतां तेषां प्रभाता रजनी तदा ।
ततस्तूर्यनिनादैश्च शङ्खानां च महास्वनैः ।
प्रबोधनं महाबाहोः कृष्णस्याक्रियतालये ॥ ७१ ॥
इस तरह आपसमें बात करते हुए ही उनकी रात बीत गयी और प्रातःकाल आ गया । तदनन्तर महाबाहु श्रीकृष्णके भवनमें सबको जगानेके लिये बड़े जोर जोरसे भाँति-भाँतिके बाजे बजने लगे और शङ्खोंकी भी गम्भीर ध्वनि होने लगी ॥७१॥
ततः प्रभाते विमले प्रादुर्भूते दिवाकरे ।
प्रविवेश सभामेको नारदः प्रहसन्निव ॥ ७२ ॥
तत्पश्चात् निर्मल प्रभातमें जब सूर्यदेवका उदय हुआ, उस समय अकेले नारदजीने हँसते हुए-से वहाँ यादवोंकी सभामें प्रवेश किया ॥ ७२ ॥
दृष्ट्वा तु यादवान् सर्वान् कृष्णेन सह संगतान् ।
ततः स जयशब्देन माधवं प्रत्यपूजयत् ॥ ७३ ॥
श्रीकृष्णके साथ एकत्र हुए समस्त यादवोंकी ओर देखकर उन्होंने 'जय हो, जय हो' कहकर माधव (श्रीकृष्ण) का समादर किया ॥ ७३ ॥
उग्रसेनादयस्ते च तमृषिं प्रत्यपूजयन् ।
अथाभ्युत्थाय विमनाः कृष्णः समितिदुर्जयः ।
मधुपर्कं च गां चैव नारदाय ददौ प्रभुः ॥ ७४ ॥
फिर उग्रसेन आदिने नारदजीका पूजन किया । इसके बाद रणदुर्जय भगवान् श्रीकृष्णने उदास मनसे उठकर नारदजीको मधुपर्क तथा एक गौ समर्पित की ॥ ७४ ॥
सोपविश्यासने शुभ्रे सर्वास्तरणसंवृते ।
सुखासीनो यथान्यायमुवाचेदं वचोऽर्थवत् ॥ ७५ ॥