विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 726, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ७०४ | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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स्वागत-सत्कारके पश्चात् जब नारदजी सब प्रकारके बिछौनोंसे ढके हुए शुभ्र आसनपर सुखपूर्वक बैठ गये, तब वे यथोचित रीतिसे यह अर्थयुक्त वचन बोले ॥ ७५ ॥
नारद उवाच
किमेवं चिन्तयाविष्टा निःसङ्गा गतमानसाः ।
उत्साहहीनाः सर्वे वै क्लीवा इव समासत ॥ ७६ ॥
नारदजीने कहा—आज क्या बात है कि समस्त यादव इस तरह चिन्तामग्न, असंग, अनमने और उत्साहहीन होकर क्लीवों (कायरों) के समान चुपचाप बैठे हैं ? ॥ ७६ ॥
इत्येवमुक्ते वचने नारदेन महात्मना।
वासुदेवोऽब्रवीद् वाक्यं श्रूयतां भगवन्निदम् ॥ ७७ ॥
महात्मा नारदके इस तरह पूछनेपर भगवान् श्रीकृष्ण बोले—'भगवन् ! इसका कारण सुनिये—॥ ७७ ॥
अनिरुद्धो हृतो ब्रह्मन् केनापि निशि सुव्रत।
यस्यार्थे सर्व एवास्म चिन्तयाविष्टचेतसः ॥ ७८ ॥
'उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ब्रह्मन् ! यहाँ रात्रिके समय किसीने अनिरुद्धका अपहरण कर लिया है। उन्हींके लिये हम सब लोग यहाँ चिन्तित-चित्त होकर बैठे हैं ॥ ७८ ॥
एष ते यदि वृत्तान्तः श्रुतो दृष्टोऽपि वा मुने।
भगवन् कथ्यतां साधु प्रियमेतन्ममानघ ॥ ७९ ॥
'निष्पाप मुने ! भगवन् ! यदि यह वृत्तान्त आपने कहीं सुना या देखा हो तो अच्छी तरह बताइये, यह मेरा प्रिय विषय है' ॥ ७९ ॥
इत्येवमुक्ते वचने केशवेन महात्मना।
प्रहस्यैतद् वचः प्राह श्रूयतां मधुसूदन ॥ ८० ॥
महात्मा केशवके ऐसी बात कहनेपर नारदजी ठठाकर हँस पड़े और इस प्रकार बोले—'मधुसूदन ! सुनिये—॥
निवृत्तं सुमहद् युद्धं देवासुरसमं महत् ।
अनिरुद्धस्य चैकस्य बाणस्यापि महामृधे ॥ ८१ ॥
'एक महासमरमें एक ओर अकेले अनिरुद्ध थे और दूसरी ओर सेनासहित बाणासुर था। इन दोनोंमें महान् देवासुर-संग्रामके समान बड़ा भारी युद्ध हुआ है ॥ ८१ ॥
उषा नाम सुता तस्य बाणस्याप्रतिमौजसः।
तस्यार्थे चित्रलेखा वै जहाराशु तमप्सराः ॥ ८२ ॥
'अप्रतिम बलशाली बाणासुरकी एक पुत्री है, जिसका नाम उषा है। उसीके लिये चित्रलेखा अप्सरा शीघ्रतापूर्वक अनिरुद्धको हर ले गयी ॥ ८२ ॥
उभयोरपि तत्रासीन्महायद्धं सुदारुणम् ।
प्राद्युम्निबाणयोः संख्ये बलिवासवयोरिव ॥ ८३ ॥
'वहाँ अनिरुद्ध और बाणासुर दोनोंमें अत्यन्त भयंकर महान् युद्ध हुआ । ठीक उसी तरह, जैसे देवासुर-संग्राममें बलि और इन्द्रका युद्ध हुआ था ॥ ८३ ॥
अस्माभिश्चापि तद् युद्धं दृष्टं सुमहदद्भुतम् ।
अनिरुद्धो भयात् तेन संयुगेष्वनिवर्तिना ॥ ८४ ॥
बाणेन मायामास्थाय बद्धो नागैर्महाबलः ।
'मैंने भी उस महान् एवं अद्भुत युद्धको अपनी आँखों देखा है। युद्धसे पीछे न हटनेवाले बाणासुरने भयभीत होकर मायाका सहारा लिया और नागपाशसे महाबली अनिरुद्धको बाँध लिया ॥ ८४३ ॥
व्यादिष्टस्तु वधस्तस्य बाणेन गरुडध्वज ॥ ८५ ॥
तं निवारितवान् मन्त्री कुम्भाण्डो नाम तस्य ह ।
'गरुडध्वज ! उस समय उसने अनिरुद्धके वधकी आज्ञा दे दी, परंतु उसके मन्त्री कुम्भाण्डने उसे वैसा करनेसे रोक दिया ॥ ८५३ ॥
कुमारस्यानिरुद्धस्य तेनासक्तेन संयुगे ॥ ८६ ॥
बाणेन मायामास्थाय सर्पैनियमनं कृतम् ।
उत्तिष्ठतु भवांल्छीघ्रं यशसे विजयाय च ॥ ८७ ॥
'युद्धमें आसक्त हुए बाणासुरने मायाका सहारा लेकर सर्पमय बाणोंद्वारा कुमार अनिरुद्धको बाँधा है; अतः अब आप यश और विजयके लिये शीघ्र उठिये ॥ ८६-८७ ॥
नायं संरक्षितुं कालः प्राणांस्तात जयैषिणाम् ।
प्राणैः किंचिद्गतैर्वीरो धैर्यमालम्ब्य तिष्ठति ॥ ८८ ॥
'तात ! विजयकी अभिलाषा रखनेवाले वीरोंके लिये यह अपने प्राणोंको बचाकर बैठनेका समय नहीं है। वीर पुरुष प्राणोंके कुछ संकटमें पड़ जानेपर धैर्यका सहारा लेकर शत्रुके सामने डटा रहता है' ॥ ८८ ॥
वैशम्पायन उवाच
इत्येवमुक्ते वचने वासुदेवः प्रतापवान् ।
प्रायात्रिकान् वै सम्भारानाज्ञापयत वीर्यवान् ॥ ८९ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! उनके ऐसा कहनेपर पराक्रमी एवं प्रतापी वीर वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णने रण-यात्राके लिये उपयुक्त सामग्री तैयार करनेकी आज्ञा दे दी ॥ ८९ ॥
ततश्चन्दनचूर्णैश्च लाजैश्चैव समन्ततः।
निर्ययौ स महाबाहुः कीर्यमाणो जनार्दनः ॥ ९० ॥
तदनन्तर महाबाहु जनार्दन यात्राके लिये घरसे बाहर निकले। उस समय उनके ऊपर चारों ओरसे चन्दनचूर्ण और लावा बिखेरे जा रहे थे ॥ ९० ॥