विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 727, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः [ ७०५
नारद उवाच
स्मरणं वैनतेयस्य कर्तुमर्हसि माधव ।
न ह्यन्येन तदध्वानं शक्यं गन्तुं महाभुज ॥ ९१ ॥
(इतनेमें ही) नारदजी बोले—माधव ! विनता-नन्दन गरुड़का स्मरण कीजिये। महाबाहो! उनके सिवा दूसरा कोई उस मार्गपर नहीं जा सकता ॥ ९१ ॥
आकर्ण्य तमध्वानं गन्तव्यमतिदुर्गमम् ।
एकादश सहस्राणि योजनानां जनार्दन ॥ ९२ ॥
तदितः शोणितपुरं प्रद्युम्निर्यत्र साम्प्रतम् ।
जनार्दन ! मेरी बात सुनिये। जिस मार्गपर आपको चलना है, वह अत्यन्त दुर्गम है। प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्ध इस समय जहाँ विद्यमान हैं, वह शोणितपुर यहाँसे ग्यारह हजार योजनकी दूरीपर है ॥ ९२½ ॥
मनोजवो महावीर्यो वैनतेयः प्रतापवान् ॥ ९३ ॥
समाह्वयस्व गोविन्द स हि त्वां तत्र नेष्यति ।
एकेन सुमुहूर्तेन बाणं संदर्शयिष्यति ॥ ९४ ॥
गोविन्द ! महापराक्रमी और प्रतापी विनतानन्दन गरुड़ मनके समान वेगशाली हैं। आप उन्हींका आवाहन कीजिये। वे ही आपको वहाँ पहुँचायेंगे। वे एक ही मुहूर्तमें आपको बाणासुरके सामने उपस्थित कर देंगे ॥ ९३-९४ ॥
वैशम्पायन उवाच
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा सस्मार गरुडं तदा ।
स कृष्णपार्श्वमागम्य प्राञ्जलिर्गरुडः स्थितः ॥ ९५ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! नारदजीका यह वचन सुनकर भगवान् श्रीकृष्णने उस समय गरुड़का स्मरण किया। स्मरण करते ही वे श्रीकृष्णके पास आकर हाथ जोड़-कर खड़े हो गये ॥ ९५ ॥
प्रणम्यथ वचः प्राह वैनतेयो महाबलः ।
वासुदेवं महात्मानं श्लक्ष्णं मधुरया गिरा ॥ ९६ ॥
महात्मा वासुदेवको प्रणाम करके महाबली गरुड उनसे स्नेहयुक्त मधुर वाणीमे बोले ॥ ९६ ॥
गरुड उवाच
पद्मनाभ महाबाहो किमर्थं संस्मृतो ह्यहम् ।
कृत्यं ते यदिहात्रास्ति श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ ९७ ॥
गरुडने कहा—पद्मनाभ ! महाबाहो ! आपने किस लिये मेरा स्मरण किया है। यहाँ आपको मुझसे जो काम है, उसे मैं ठीक-ठीक सुनना चाहता हूँ ॥ ९७ ॥
कस्य पक्षपरिक्षेपैर्नाशयामि पुरीं प्रभो ।
प्रभावात्तव गोविन्द को न विद्याद् बलं मम ॥ ९८ ॥
प्रभो ! आशा दीजिये, मैं अपने पंखोंके प्रहारसे किसकी पुरीका नाश कर डालूँ ? गोविन्द ! आपके प्रभावसे मेरे बल-को कौन नहीं जानता है ? ॥ ९८ ॥
गदावेगं च ते वीर चक्राग्निं च महाभुज ।
नावबुध्यति मूढात्मा को दर्पान्नाशमेष्यति ॥ ९९ ॥
वीर ! महाबाहो ! कौन मूढ़चित्त पुरुष आपकी गदाके वेग और सुदर्शन चक्रके तेजको नहीं जानता है ? वह अपने घमंडके कारण नष्ट हो जायगा ॥ ९९ ॥
हलं सिंहमुखं कस्य वनमाली नियोक्ष्यति ।
कस्य देहस्तु निर्भिन्नो मेदिनीं यास्यति प्रभो ॥ १०० ॥
प्रभो ! वनमालाधारी बलरामजी सिंहके-से मुखवाले अपने हलका प्रहार आज किसपर करनेवाले हैं ? किसका शरीर आज छिन्न-भिन्न होकर पृथ्वीपर गिरनेवाला है ? ॥
कस्य शङ्खरवैः प्राणान् मोहयिष्यसि माधव ।
कोऽयं सपरिवारोऽद्य यास्यते यमसादनम् ॥ १०१ ॥
माधव ! आप अपनी शङ्खध्वनिसे किसके प्राणोंको मोहित करनेवाले हैं। यह कौन है, जो आज परिवारसहित यमलोकमें जाना चाहता है ॥ १०१ ॥
एवमुक्ते तु वचने वैनतेयेन धीमता ।
वासुदेवो वचः प्राह शृणु त्वं वदतां वर ॥ १०२ ॥
बुद्धिमान् विनतानन्दन गरुड़के ऐसा कहनेपर वसुदेव-नन्दन भगवान् श्रीकृष्ण बोले—वक्ताओंमे श्रेष्ठ गरुड़ ! सुनो॥
बलेः पुत्रेण बाणेन प्रद्युम्निरपराजितः ।
उषायाः कारणे बद्धो नगरे शोणिताह्वये ।
अनिरुद्धस्तु कामार्तो बद्धो नागैर्विषोल्बणैः ॥ १०३ ॥
'बलिके पुत्र बाणासुरने अपराजित वीर प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्धको उषाके साथ सम्बन्ध स्थापित करनेके कारण शोणितपुरमें बंदी बना लिया है। कामपीड़ित अनिरुद्धको उसने प्रचण्ड विषवाले सर्पोंके द्वारा बाँध रखा है ॥ १०३ ॥
तस्य मोक्षार्थमाहूतो मया त्वं पतगेश्वर ।
तव वेगसमो नास्ति पक्षिणां प्रवरो भवान् ।
अशक्यं च तदध्वानं गन्तुमन्येन काश्यप ॥ १०४ ॥
'पक्षिराज ! उन्हीं अनिरुद्धको बन्धनसे छुड़ानेके लिये मैंने तुम्हारा आवाहन किया है। वेगमें तुम्हारी समानता करनेवाला दूसरा कोई नहीं है। तुम पक्षियोंमें सबसे श्रेष्ठ हो। कश्यपनन्दन ! तुम्हारे सिवा दूसरे किसीके लिये उस मार्गपर चलना असम्भव है ॥ १०४ ॥
तत्र प्रापय मां शीघ्रं यत्र प्रद्युम्निरावसत् ।
वैदर्भी ते शृणुष वीर रुदती पुत्रगृद्धिनी ॥ १०५ ॥
त्वत्प्रसादाद् भवत्येषा पुत्रेण सह भामिनी ।
'जहाँ प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्ध निवास करते हैं, वहाँ
म० ह० २३ —