भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 728

७०६ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे शीघ्र मुझे पहुँचा दो। वीर ! विदर्भराज रुक्मीकी पुत्री गरुड उवाच शुभाङ्गी, जो तुम्हारी पुत्रवधू लगती है, अपने पुत्रसे मिलने- अत्यद्भुतमिदं वाक्यं तव कृष्ण महाभुज । की इच्छा रखकर रो रही है। तुम्हारी कृपासे यह भामिनी त्वत्प्रसादाच्च विजयः सर्वत्रैव महाभुज ॥ ११३॥ अपने पुत्रसे मिल सके—ऐसा प्रयत्न करो ॥ १०५॥ गरुड़ बोले-महाबाहो ! श्रीकृष्ण ! आपकी यह अमृतं तु हृतं पूर्वं त्वया पन्नगनाशन ॥१०६॥ बात तो बड़ी अद्भुत है। बड़ी बाँहवाले प्रभो ! आपकी मया सह समागम्य तस्मिन् काले महाभुज । कृपासे ही सर्वत्र विजय होती है ॥ ११३ ॥ अभवन्मे ध्वजश्चैव त्वद्भक्ताः सर्ववृष्णयः । धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि संस्तवान्मधुसूदन । सखित्वं मानयस्वाद्य भक्तिं च पतगेश्वर ॥१०७॥ स्तोतव्यस्त्वं मया कृष्ण स्तौषि मां त्वं महाभुज ॥ 'सर्पशत्रो ! तुमने पूर्वकालमें ( देवताओंको पराजित मधुसूदन ! आपने जो मेरी स्तुति-प्रशंसा की है, इससे करके ) अमृतका अपहरण किया था। महाबाहो ! वह समय मैं धन्य हो गया। यह आपने मुझपर महान् अनुग्रह किया। तुम्हें याद होगा जब कि तुम मेरे साथ मिलकर मेरे ध्वजरूप महाबाहु श्रीकृष्ण ! मुझे आपकी स्तुति करनी चाहिये, किंतु हुए थे। ये समस्त वृष्णिवंशी तुम्हारे भक्त हैं। पक्षिराज ! आप उलटे मेरी ही स्तुति कर रहे हैं ॥ ११४ ॥ आज तुम हमारी मैत्री तथा भक्तिका आदर करो। १०६-१०७। वेदाध्यक्षः सुराध्यक्षः सर्वकामप्रदो भवान् । तव वेगसमो नास्ति पक्षिणो न च ते समाः । अमोघदर्शनस्त्वं हि वरार्थिपु वरप्रदः ॥ ११५॥ सुपर्ण सुकृतेन त्वां शपे पन्नगनाशन ॥१०८॥ आप सम्पूर्ण वेदोंके अध्यक्ष ( उनके द्वारा प्रतिपादित 'तुम्हारे वेगकी समानता करनेवाला दूसरा कोई नहीं सर्वसाक्षी चेतन परमात्मा ) हैं। देवताओंके भी स्वामी तथा है। दूसरे पक्षी भी तुम्हारे समान नहीं हैं। सर्पनाशन गरुड़ ! सम्पूर्ण कामनाओंके दाता हैं। आपका दर्शन अमोघ है। आप मैं पुण्यकी शपथ खाकर तुमसे यह बात कह रहा हूँ ॥१०८॥ वरार्थी पुरुषोंको वर देनेवाले हैं ॥ ११५ ॥ दासीभावं गता माता मोक्षितेकाकिना पुरा। चतुर्भुजश्चतुर्मूर्तिश्चातुर्होत्रप्रवर्तकः । । पक्षविक्षेपमात्रेण हता योधास्त्वया पुरा ॥१०९॥ चातुराश्रम्यहोता च चतुर्नेता महाकविः ॥११६॥ 'पूर्वकालमें जब माता विनता दासीभावको प्राप्त हुई आपकी चार भुजाएँ हैं। वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और थीं। उस समय तुमने अकेले ही उनका उद्धार किया था। अनिरुद्ध-ये चार आपकी मूर्तियाँ हैं। आप चातुर्होत्र यज्ञके अपने पंखोंके प्रहारमात्रसे पहले तुमने बहुत-से योद्धाओंका प्रवर्तक हैं। चारों आश्रमोंमें होता हैं। चारों पुरुषार्थोंकी प्राप्ति संहार कर डाला है ॥ १०९ ॥ करानेवाले तथा महाज्ञानी हैं ॥ ११६ ॥ भवान् सुरगणान् सर्वान् पृष्ठमारोप्य विक्रमात् । धनुर्धरश्चक्रधरो भवाञ्छङ्खधरो महान् । गच्छ मे ह्यग्रमान् देशान् विजयश्च तवाश्रयात् ॥११०॥ भवान् पूर्वेषु देहेषु ख्यातो भूमिधरः प्रभो ॥११७॥ 'तुम इन समस्त यादववीरोंको, जो देवगणोंके अंशसे आप शार्ङ्ग धनुष, सुदर्शन चक्र और पाञ्चजन्य शङ्ख उत्पन्न हैं, अपनी पीठपर बिठाकर पराक्रमपूर्वक मेरे साथ धारण करनेवाले महान् विष्णु हैं। प्रभो ! आप अपने पूर्व- उन अगम्य देशोंमें चलो। तुम्हारे भरोसे ही आज हमारी विग्रहों ( कूर्म, वराह आदि अवतारों ) में धरणीधरके रूपमें विजय है ॥ ११० ॥ विख्यात हैं ॥ ११७ ॥ गुरुत्वान्मेरुतुल्यस्त्वं लघुत्वात् पवनोपमः । लाङ्गली मुसली चक्री देवकीतनयो भवान् । भूते भव्ये भविष्ये च न ते तुल्योऽस्ति विक्रमे ॥१११॥ चाणूरमथनश्चैव गोप्रियः कंसहा भवान् ॥ ११८॥ 'तुम गुरुतामें मेरुके समान और शीघ्रतापूर्वक चलनेमें आप ही हलधर, मुसलधारी और चक्र धारण करनेवाले वायुके तुल्य हो। भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालोंमें हैं। आप देवकीके पुत्र, चाणूरका संहार करनेवाले, गौओंके तुम्हारे समान विक्रमशाली दूसरा कोई नहीं है ॥ १११ ॥ प्रिय तथा कंसका वध करनेवाले हैं ॥ ११८ ॥ सत्यसंघ महाभाग वैनतेय महाद्युते । गोवर्धनधरश्चैव मल्लारिर्मल्लभावनः । अनिरुद्धेक्षणेनाद्य साहाय्यमुपकल्प्यताम् ॥११२॥ मल्लप्रियो महामल्लो महापुरुष इत्यपि ॥११९॥ 'महातेजस्वी, महाभाग, सत्यप्रतिज्ञ, विनतानन्दन ! आप ही गोवर्धनधारी हैं। आप मल्लोंके शत्रु, मल्लोंके आज अनिरुद्धसे मिला देनेमें तुम हमारी सहायता करो।' पोषक, मल्लोंके प्रेमी, महामल्लस्वरूप तथा महापुरुष हैं ॥ विप्रप्रियो विप्रहितो विप्रशो विप्रभावनः ।