विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 729, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः [ ७०७
ब्रह्मण्यश्च वरेण्यश्च भवान् दामोदरः स्मृतः ।
प्रलम्बमथनश्चैव केशिहा दानवान्तकः ॥१२०॥
आप ब्राह्मणोंके प्रिय, ब्राह्मणोंके हितैषी, ब्राह्मणोंके ज्ञाता, ब्राह्मणोंके पालक तथा ब्राह्मणभक्त हैं। आप ही सर्वश्रेष्ठ दामोदर कहे गये हैं। आपने ही बलभद्ररूपसे प्रलम्बासुरका संहार किया है। आप केशीके हन्ता तथा दानवोंके काल हैं ॥१२०॥
असिलोम्नश्च हन्ता च तथा रावणनाशनः ।
विभीषणस्य भगवान् राज्यदो वालिनाशनः ॥१२१॥
आपने ही असिलोमाका वध किया है। आप ही वाली तथा रावणका विनाश करनेवाले और विभीषणको राज्य देनेवाले भगवान् श्रीराम हैं ॥ १२१ ॥
सुग्रीवराज्यदाता त्वं बलिराज्यापहारकः ।
रत्नहर्ता महारत्नं समुद्रोदरसम्भवम् ॥१२२॥
सुग्रीवको राज्य प्रदान करनेवाले भी आप ही हैं। आपने ही (वामनरूप धारण करके) बलिके राज्यका अपहरण किया है। आप कौस्तुभ और लक्ष्मी नामक रत्नोंको ग्रहण करनेवाले हैं। आप ही समुद्रके गर्भसे उत्पन्न धन्वन्तरि नामक महारत्न हैं ॥ १२२ ॥
वरुणश्च भवान् ख्यातो भवांश्च सरिदुद्भवः ।
भवान् खड्गधरो धन्वी धनुर्धरवरो महान् ॥१२३॥
आप ही वरुण नामसे विख्यात हैं। आप ही सरिताओंकी उत्पत्तिके स्थान मेरु हैं। आप नन्दक नामक खड्ग धारण करनेवाले, धन्वी एवं धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ महान् वीर हैं ॥१२३॥
दाशार्ह इति विख्यातो महाधन्वा धनुःप्रियः ।
गोविन्द इति विख्यात उदधिस्त्वं च सुव्रत ॥१२४॥
आप दाशार्ह नामसे विख्यात हैं। आपका धनुष विशाल है। आप धनुषके प्रेमी हैं। उत्तमव्रतधारी श्रीकृष्ण ! आप ही गोविन्द नामसे प्रसिद्ध तथा आप ही समुद्र हैं ॥ १२४ ॥
आकाशश्च तपश्चैव समुद्रमथनो भवान् ।
भवान् स्वर्गो बहुफलो भवान् स्वर्गचरो महान् ॥१२५॥
आप आकाश और तप हैं। आप ही समुद्रका मन्थन करनेवाले हैं। अनेक फलोंसे युक्त स्वर्ग आपका ही स्वरूप है। आप ही स्वर्गमें विचरनेवाले महान् पुरुष हैं ॥ १२५ ॥
त्वमेव च महामेघो बीजनिष्पत्तिरेव च ।
त्रैलोक्यमथनस्त्वं च क्रोधलोभमनोरथः ॥१२६॥
आप ही महान् मेघ हैं। आपसे ही बीजोंकी सिद्धि होती है। आप ही क्रोध आदिके रूपसे तीनों लोकोंको मथते रहते हैं। आप क्रोध, लोभ और मनोरथरूप हैं ॥ १२६ ॥
भवान् कामप्रदश्चैव कामः सर्वधनुर्धरः ।
संवर्तो वर्तनश्चैव प्रलयो निलयो महान् ॥१२७॥
आप महान् परमेश्वर ही कामनाओंके दाता तथा समस्त धनुषोंको धारण करनेमें समर्थ कामदेव हैं। आप ही संहारक और उत्पादक हैं तथा आप ही प्रलय एवं रक्षाके स्थान हैं ॥
हिरण्यगर्भो रूपज्ञो रूपवान् मधुसूदनः ।
ईशस्त्वं च महादेव असंख्यगुणान्वितः ॥१२८॥
स्तोतुमिच्छसिमां देव स्तोतव्यस्त्वं यदूत्तम ।
महादेव ! आप ही सब रूपोंके ज्ञाता हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा) हैं। आप ही रूपवान् मधुसूदन (विष्णु) हैं तथा आप ही असंख्य गुणोंसे सम्पन्न ईश्वर (शिव) हैं। यदुवर ! देव ! आप स्वयं ही स्तुतिके योग्य हैं तो भी मेरी स्तुति करना चाहते हैं (यह कितने आश्चर्यकी बात है) ॥ १२८½ ॥
चक्षुषा ये त्वया घोराः प्राणिनो हि निरीक्षिताः ॥१२९॥
हतास्ते यमदण्डेन तिर्यग्योनिरयगामिनः ।
जिन घोर प्राणियोंको आपने रोषपूर्ण दृष्टिसे देखा है, वे यमदण्डसे मारे गये हैं तथा पशु-पक्षियोंकी योनियों एवं नरकमें गिरनेवाले हैं ॥ १२९½ ॥
ये त्वया परमप्रीत्या प्राणिनो वै निरीक्षिताः ॥१३०॥
इह च प्रेत्य ते सर्वे सर्वथा स्वर्गगामिनः ।
एष तेऽहं महाबाहो वशगः शासने स्थितः ॥१३१॥
परंतु जिन प्राणियोंको आपने बड़े प्यारसे देखा है, वे सब इह लोकमें हो या परलोकमें सर्वथा स्वर्गलोकमें ही जानेके अधिकारी हैं। महाबाहो ! यह मैं आपकी आज्ञाके अधीन होकर सब प्रकारसे आपके शासनमें स्थित हूँ ॥१३०-१३१॥
जयस्थानं ततः कृत्वा गरुडः प्राह केशवम् ।
अयमस्मि स्थितो वीर आरुहस्व महाचल ॥१३२॥
तदनन्तर गरुड़ने जयस्थान (प्रस्थानकी मुद्रा) बनाकर भगवान् श्रीकृष्णसे कहा—'महाबली वीर ! यह मैं आपकी सेवामे खड़ा हूँ। आप मेरी पीठपर आरूढ होइये' ॥१३२॥
ततः कण्ठे परिष्वज्य माधवो गरुडं ततः ।
सखे शत्रुविनाशाय अर्घ्योऽयं प्रतिगृह्यताम् ॥१३३॥
यह सुनकर माधवने गरुड़को कण्ठसे लगाकर कहा—'सखे ! शत्रुओंके विनाशके लिये यह अर्घ्य ग्रहण करो' ॥
दत्त्वार्घ्यं परया प्रीत्या शङ्खचक्रगदासिभृत् ।
आरुरोह महाबाहुः सुपर्णं पुरुषोत्तमः ॥१३४॥
इस प्रकार परम प्रसन्नतापूर्वक अर्घ्य देकर शङ्ख, चक्र, गदा और खड्ग धारण करनेवाले महाबाहु पुरुषोत्तम श्रीहरि गरुड़पर आरूढ़ हुए ॥ १३४ ॥
कृष्णस्य पार्श्वमागम्य हर्षाद्देवास्थितोऽभवत् ।
कृष्णकेशः प्रवलयो विष्णुः कृष्णश्च वर्णतः ॥१३५॥
तत्पश्चात् काले केशोंवाले बलरामजी श्रीकृष्णके पास