विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 730, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें७०८ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे आकर हर्षपूर्वक बैठ गये; विष्णुस्वरूप श्रीकृष्ण वर्णसे भी कृष्ण ही थे। उन्होंने अपने हाथोंमें उत्तम वलय (कड़े) धारण कर रखे थे ॥ १३५ ॥ चतुर्दंष्ट्रश्चतुर्बाहुश्चतुर्वेदषडङ्गवित् । श्रीवत्साङ्कोऽरविन्दाक्ष ऊर्ध्वरोमा मृदुत्वचः ॥१३६॥ उनके मुखमें चार दाढ़ें सुशोभित थीं। वे चार भुजाएँ धारण किये हुए थे, छहों अङ्गोंसहित चारों वेदोंके ज्ञाता थे। उनके वक्षःस्थलमें श्रीवत्सचिह्न शोभा पाता था। उनके नेत्र प्रफुल्ल कमलके समान सुशोभित थे। रोमावलियाँ ऊपरकी ओर उठी हुई थीं और त्वचा बहुत ही कोमल थी ॥ १३६ ॥ समाङ्गुलीः समनखो रक्ताङ्गुलिनखान्तरः। स्निग्धगम्भीरनिर्घोषो वृत्तबाहुर्महाभुजः ॥१३७॥ उनकी सभी अँगुलियाँ समानरूपसे सुन्दर और सुडौल थीं। नख भी बराबर थे, अँगुलियों और नखोंके भीतरका भाग लाल था। उनकी वाणीका घोष स्निग्ध एवं गम्भीर था। भुजाएँ गोलाकार एवं विशाल थीं ॥ १३७॥ आजानुबाहुस्ताम्रास्यः सिंहविस्पष्टविक्रमः । सहस्रमिव सूर्याणां दीप्यमानः प्रकाशते ॥१३८॥ उनकी भुजाएँ घुटनोंतक लंबी थीं। मुखका रंग लाल था। उनका चलना-फिरना और पराक्रम सुस्पष्टतः सिंहके समान था। वे सहस्रों सूर्योंके समान देदीप्यमान होकर प्रकाशित होते थे ॥ १३८ ॥ यः प्रभुर्भाति विश्वात्मा भूतानां भावनो विभुः । यस्याष्टगुणमैश्वर्यं ददौ प्रीतः प्रजापतिः ॥१३९॥ प्रजापतीनां साध्यानां त्रिदशानां च शाश्वतः । स्तूयमानः स्तवैर्दिव्यैः सूतमागधवन्दिभिः । ऋषिभिश्च महाभागैर्वेदवेदाङ्गपारगैः ॥ १४०॥ संविधानमथाज्ञाप्य द्वारकायां महाबलः । गमनाय मतिं चक्रे वासुदेवः प्रतापवान् ॥ १४१॥ जो सर्वव्यापी भूतभावन प्रभु सम्पूर्ण विश्वके आत्मारूपसे प्रकाशित होते हैं। जिन्हें वामनावतारके समय प्रजापति कश्यपने प्रसन्न होकर अणिमा आदि आठ गुणोंसे युक्त ऐश्वर्य प्रदान किया है। जो प्रजापतियों, साध्यों और देवताओंमें सनातन पुरुष माने जाते हैं, उन महाबली एवं प्रतापी वासुदेव भगवान् श्रीकृष्णने द्वारकामें यात्राकी तैयारीके लिये आज्ञा देकर शोणितपुरको जानेका विचार किया। उस समय सूत, मागध, वन्दीजन तथा वेद-वेदाङ्गोंके पारंगत विद्वान् महाभाग महर्षिगण दिव्य स्तोत्रोंद्वारा उनकी स्तुति कर रहे थे ॥ आस्थितो गरुडं देवस्तस्य चानु हलायुधः । पृष्ठतोऽनु बलस्यापि प्रद्युम्नः शत्रुकर्शनः ॥१४२॥ पहले भगवान् श्रीकृष्ण गरुड़पर आरूढ़ हुए थे। उनके पीछे हलधर बलरामजी और बलरामजीके भी पीछे शत्रुसूदन प्रद्युम्न गरुड़पर बैठे थे ॥ १४२ ॥ जय बाणं महाबाहो ये चास्यानुगता रणे । न हि ते प्रमुखे स्थातुं कश्चिच्छक्तो महामृधे ॥१४३॥ (भगवान्की यात्राके समय अन्तरिक्षमें यह वाणी सुनायी दी-) 'महाबाहो ! आप बाणासुरको तथा उसके जो अनुयायी हों, उनको भी रणभूमिमें पराजित कीजिये। महासमरमें कोई भी आपके सामने ठहर नहीं सकता ॥ १४३ ॥ प्रसादे ते ध्रुवा लक्ष्मीर्विजयश्च पराक्रमे । विजेष्यसि रणे शत्रूं दैत्येन्द्रं सहसैनिकम् ॥ १४४॥ 'आपके प्रसादमें लक्ष्मीका अटल निवास है और पराक्रममें विजय प्रतिष्ठित है। आप रणभूमिमें अपने शत्रु दैत्यराज बाणको उसके सैनिकोंसहित परास्त कर देंगे' ॥ १४४ ॥ सिद्धचारणसंघानां महर्षीणां च सर्वशः । शृण्वन् वाचोऽन्तरिक्षे वै प्रययौ केशवो रणे ॥ १४५॥ इस प्रकार अन्तरिक्षमें सिद्धों और चारणोंके समुदायों तथा सम्पूर्ण महर्षियोंकी कही हुई बातें सुनते हुए भगवान् केशव युद्धके लिये प्रस्थित हुए ॥ १४५ ॥ इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि कृष्णप्रयाणे एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२१ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें श्रीकृष्णका प्रस्थानविषयक एक सौ इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२१ ॥ द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः श्रीकृष्ण, बलभद्र और प्रद्युम्नका शोणितपुरके लिये प्रस्थान, गरुड़का आहवनीय अग्निको शान्त करना, श्रीकृष्णद्वारा अग्निगणोंकी पराजय, बाणासुरके सैनिकोंके साथ श्रीकृष्ण आदिका युद्ध, त्रिशिरा ज्वरका आक्रमण और श्रीकृष्णके साथ उसका युद्ध वैशम्पायन उवाच ततस्तूर्यनिनादैश्च शङ्खानां च महास्वनैः । बन्दिमागधसूतानां स्तवैश्चापि सहस्रशः ॥ २ ॥ स तन्मुख्यैर्द्विजाशीर्भिः स्तूयमानो हि मानवैः । बभार रूपं सोमार्कशुक्राणां प्रतिमं तदा ॥ २ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर नाना