भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 731

विष्णुपर्व ] द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ७०९

प्रकारके वाद्योंकी ध्वनियों तथा शङ्खोंके गम्भीर घोषोंके साथ
सूत, मागध और वन्दीजन उत्तम स्तोत्रोंद्वारा भगवान्‌की
स्तुति करने लगे। ऊपरको मुख किये खड़े हुए मनुष्य उन्हें
विजयसूचक आशीर्वाद देने लगे। उस समय भगवान्‌ने सोम,
सूर्य और शुक्रके समान तेजस्वी रूप धारण कर
लिया था ॥ १-२ ॥
अतीव शुशुभे रूपं व्योम्नि तस्योत्पतिष्यतः ।
वैनतेयस्य भद्रं ते बृंहितं हरितेजसा ॥ ३ ॥
राजन् ! तुम्हारा भला हो ! आकाशमें उड़ते हुए
विनतानन्दन गरुडका रूप भगवान् श्रीहरिके तेजसे व्याप्त
होकर अधिक शोभा पाने लगा ॥ ३ ॥
अथाष्टबाहुः कृष्णस्तु पर्वताकारसंनिभः ।
विवभौ पुण्डरीकाक्षो विकाङ्क्षन् बाणसंक्षयम् ॥ ४ ॥
तदनन्तर कमलनयन श्रीकृष्ण आठ भुजाएँ धारण करके
बाणासुरका विनाश चाहते हुए पर्वतके समान विशालकाय
हो अधिक शोभा पाने लगे ॥ ४ ॥
असिचक्रगदाबाणा दक्षिणं पार्श्वमास्थिताः ।
चर्म शार्ङ्गं तथा वज्रं शङ्खं चैवास्य वामतः ॥ ५ ॥
खड्ग, चक्र, गदा और बाण—ये चार आयुध उनके
दाहिने पार्श्वमें खड़े थे; ढाल, धनुष, वज्र और शङ्ख—ये
वामपार्श्वमें स्थित थे ॥ ५ ॥
शीर्षाणां वै सहस्रं तु विहितं शार्ङ्गधन्वना ।
सहस्रं चैव कायानां वहन् संकर्षणस्तदा ॥ ६ ॥
उस समय शार्ङ्गधन्वा भगवान् श्रीकृष्णने अपने सहस्रों
सिर बना लिये और संकर्षण सहस्रों शरीर धारण करने लगे॥
श्वेतप्रहरणोऽधृष्यः कैलास इव शृङ्गवान् ।
प्रस्थितो गरुडेनाथ उद्यन्निव निशाकरः ॥ ७ ॥
श्वेत आयुधसे युक्त अजेय वीर बलराम शिखरयुक्त
कैलासके समान शोभा पाते थे। वे गरुड़के द्वारा यात्रा करते
समय उदयकालके चन्द्रमाकी भाँति प्रकाशित हो रहे थे ॥
सनत्कुमारस्य वपुः प्रादुरासीन्महात्मनः ।
प्रद्युम्नस्य महाबाहोः संग्रामे विक्रमिष्यतः ॥ ८ ॥
संग्राममें पराक्रम करनेको उद्यत हुए महाबाहु प्रद्युम्नके
शरीरमें महात्मा सनत्कुमारका स्वरूप प्रकट हो गया ॥ ८ ॥
स पक्षबलविक्षेपैर्विधुन्वन् पर्वतान् बहून् ।
जगाम मार्गं बलवान् वातस्य प्रतिषेधयन् ॥ ९ ॥
बलवान् गरुड़ अपने पङ्खोंके बलपूर्वक संचालनसे बहु-
संख्यक पर्वतोंको कम्पित करते और वायुका मार्ग रोकते
हुए चले ॥ ९ ॥
अथ वायोरतिगतिमास्थाय गरुडस्तदा ।
सिद्धचारणसंघानां शुभं मार्गमवातरत् ॥ १० ॥
तत्पश्चात् वायुसे भी बढ़कर तीव्र गतिका आश्रय ले गरुड़ तत्काल ही सिद्धों और चारणसमूहोंके शुभ मार्गपर जा
पहुँचे ॥ १० ॥
अथ रामोऽब्रवीद् वाक्यं कृष्णमप्रतिमं रणे ।
स्वाभिः प्रभाभिर्हीनाः स्म कृष्ण कस्मादपूर्ववत् ॥ ११ ॥
उस समय बलरामजीने रणभूमिमें अनुपम शक्तिशाली
श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा—'कृष्ण ! हमलोग अपनी
स्वाभाविक कान्तिसे रहित हो अपूर्ववत् कैसे हो गये ? ॥ ११॥
सर्वे कनकवर्णाभाः संवृत्ताः स्म न संशयः ।
किमिदं ब्रूहि नस्तत्त्वं किं मेरोःपार्श्वगा वयम् ॥ १२ ॥
'हम सब लोगोंकी अङ्गकान्ति सुवर्णके समान हो गयी है,
इसमें संशय नहीं है; ऐसा क्यों हुआ ? यह हमें ठीक-ठीक
बताओ, क्या हम मेरु पर्वतके आसपास चल रहे हैं ?' ॥ १२ ॥

श्रीभगवानुवाच
मन्ये बाणस्य नगरमभ्यासस्थमरिंदम ।
रक्षार्थं तस्य निर्यातो वह्निरेष स्थितो ज्वलन् ॥ १३ ॥
श्रीभगवान् बोले—शत्रुदमन ! मैं समझता हूँ बाणा-
सुरका नगर अब निकट ही है। उसकी रक्षाके लिये बाहर
निकलकर यह अग्निदेव प्रज्वलित होते हुए खड़े हैं ॥ १३ ॥
अग्नेराहवनीयस्य प्रभया स्म समाहताः ।
तेन नो वर्णरूप्यमिदं जातं हलायुध ॥ १४ ॥
भैया हलायुध ! हमलोग आहवनीय अग्निकी प्रभासे
आहत हैं; इसीसे हमारी अङ्गकान्तिमे यह परिवर्तन आ
गया है ॥ १४ ॥

श्रीराम उवाच
यदि स्म संनिकर्षस्था यदि निष्प्रभतां गताः ।
तद् विधत्स्व स्वयं बुद्ध्या यदत्रानन्तरं हितम् ॥ १५ ॥
बलरामजीने पूछा—श्रीकृष्ण ! यदि हमलोग शोणित-
पुरके निकट हैं और यदि इस अग्निकी प्रभासे आहत होकर
हमलोग निष्प्रभ हो गये हैं तो अब तुम स्वयं ही बुद्धिसे
सोचकर बताओ कि अब यहाँ क्या करनेसे हमारा हित होगा॥

श्रीभगवानुवाच
कुरुष्व वैनतेय त्वं यच्च कार्यमनन्तरम् ।
त्वया विधाने विहिते करिष्याम्यहमुत्तमम् ॥ १६ ॥
श्रीभगवान् बोले—विनतानन्दन ! अब यहाँ जो
आवश्यक कर्तव्य हो, वह तुम्हीं करो। तुम्हारे द्वारा इस
अग्निके निवारणका उपाय कर लिये जानेपर मैं उत्तम पराक्रम
प्रकट करूँगा ॥ १६ ॥

वैशम्पायन उवाच
एतच्छ्रुत्वा तु गरुडो वासुदेवस्य भाषितम् ।
चक्रे मुखसहस्रं हि कामरूपी महाबलः ॥ १७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! वसुदेवनन्दन
श्रीकृष्णका यह कथन सुनकर इच्छानुसार रूप धारण करने-
वाले महाबली गरुडने अपने हजारों मुख बना लिये ॥ १७ ॥