भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 732, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 732
७९०श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

गङ्गामुपागमत तूर्णं वैनतेयो महाबलः।
आप्लुत्याकाशगङ्गायामापीय सलिलं बहु ॥ १८ ॥
प्रववर्षोपरि गतो वैनतेयः प्रतापवान् ।
तेनाग्निं शमयामास बुद्धिमान् विनतात्मजः ॥ १९ ॥

तत्पश्चात् वे महाबली विनतानन्दन तुरंत ही गङ्गाजीके तटपर गये। वहाँ आकाशगङ्गामें उतरकर प्रतापी गरुडने बहुत-सा जल पी लिया और अग्निदेवके ऊपर जाकर वर्षा की। उस उपायसे बुद्धिमान् विनताकुमारने पूर्वोक्त अग्निको बुझा दिया ॥ १८-१९ ॥

अग्निराहवनीयस्तु ततः शान्तिमुपागमत् ।
तं दृष्ट्वाहवनीयं तु शान्तमाकाशगङ्गया ।
परमं विस्मयं गत्वा सुपर्णो वाक्यमब्रवीत् ॥ २० ॥

फिर तो आहवनीय अग्निदेव शान्त हो गये। आकाश-गङ्गाके जलसे आहवनीय अग्निको शान्त हुआ देख गरुड़ महान् आश्चर्यमें पड़कर बोले—॥ २० ॥

अहो वीर्यमथाग्नेस्तु यो दहेद् युगसंक्षये ।
यथेदं वर्णवैरूप्यं चक्रे कृष्णस्य धीमतः ॥ २१ ॥

'अहो ! अग्निका बल तो अद्भुत है, क्योंकि वे महाप्रलयके समय तीनों लोकोंको दग्ध कर सकते हैं; जैसे कि यहाँ इन्होंने बुद्धिमान् श्रीकृष्णके रूप-रंगमें परिवर्तन ला दिया या ॥

त्रयाणां लोकानां पर्याप्त इति मे मतिः ।
कृष्णः संकर्षणश्चैव प्रद्युम्नश्च महाबलः ॥ २२ ॥

'(तथापि श्रीकृष्णके प्रभावसे आकाश-गङ्गाद्वारा यह बुझ गये) मेरा तो यह विश्वास है कि श्रीकृष्ण, संकर्षण और महाबली प्रद्युम्न—ये तीन वीर तीनों लोकोंका सामना करनेके लिये पर्याप्त हैं' ॥ २२ ॥

ततः प्रशान्ते दहने सम्प्रतस्थे स पक्षिराट् ।
स्वपक्षबलविक्षेपं कुर्वन् घोरं महास्वनम् ॥ २३ ॥

तदनन्तर आग बुझ जानेपर पक्षिराज गरुड़ अपने पंखोंके बलपूर्वक संचालनसे भयंकर एवं महान् कोलाहल करते हुए आगे बढ़े ॥ २३ ॥

तं दृष्ट्वा विस्मयं तत्र रुद्रस्यानुचराग्नयः ।
आस्थिता गरुडं ह्येते नानारूपा भयावहाः ॥ २४ ॥
किमर्थमिह सम्प्राप्ताः के चापीमे जनास्त्रयः ।

वहाँ उन्हें देखकर रुद्रके अनुचर अग्निगणोंको बड़ा विस्मय हुआ। वे सोचने लगे, 'ये नाना रूपधारी भयंकर वीर गरुड़पर चढ़कर किस लिये यहाँ आये हैं तथा ये तीनों पुरुष कौन हैं ?' ॥ २४ ½ ॥

निश्चयं नाधिगच्छन्ति ते गिरिव्रजवह्नयः ॥ २५ ॥
प्रावर्तयंश्च संग्रामं तैस्त्रिभिः सह यादवैः ।

इस प्रकार पर्वतोंपर विचरनेवाले वे अग्निगण किसी निश्चयपर नहीं पहुँच सके; अतः उन्होंने उन तीनों यादव-वीरोंके साथ युद्ध छेड़ दिया ॥ २५ ½ ॥

तेषां युद्धप्रसक्तानां संनादः सुमहानभूत् ॥ २६ ॥
तं च श्रुत्वा महानादं सिंहानामिव गर्जताम् ।
अथाङ्गिराः स्वपुरुषं प्रेषयामास बुद्धिमान् ॥ २७ ॥

युद्धमें आसक्त हुए उन अग्नियोंका महान् सिंहनाद प्रकट होने लगा। दहाड़ते हुए सिंहोंके समान उनके उस महानादको सुनकर बुद्धिमान् अङ्गिराने अपने एक पुरुषको वहाँ भेजा ॥ २६-२७ ॥

यत्र तद् वर्तते युद्धं तत्र गच्छस्व मा चिरम् ।
दृष्ट्वा तत् सर्वमागच्छ इत्युक्तः प्रहितस्त्वरन् ॥ २८ ॥

उन्होंने उससे कहा—'जहाँ वह युद्ध हो रहा है वहाँ शीघ्र जाओ और वह सब कुछ देखकर शीघ्र लौट आओ।' ऐसा कहकर उन्होंने उसे बड़ी उतावलीके साथ भेजा ॥ २८ ॥

तथेत्युक्त्वा स तद् युद्धं वर्तमानमवैक्षत ।
अग्नीनां वासुदेवेन संसक्तानां महामृधे ॥ २९ ॥

तब 'बहुत अच्छा' कहकर उस पुरुषने महासमरमें भगवान् वासुदेवके साथ उलझे हुए अग्निगणोंके उस वर्तमान युद्धको देखा ॥ २९ ॥

ते जातवेदसः सर्वे कल्माषः कुसुमस्तथा ।
दहनः शोषणश्चैव तपनश्च महाबलः ॥ ३० ॥
स्वाहाकारस्य विषये प्रख्याताः पञ्च वह्नयः ।

वे सबके-सब जातवेदा अग्नि थे; उनके नाम इस प्रकार थे—कल्माष, कुसुम, दहन, शोषण और महाबली तपन। ये स्वाहाकारविषयक पाँच प्रख्यात अग्नि कहे गये हैं ॥ ३० ½ ॥

अथापरे महाभागाः स्वैरनीकैर्व्यवस्थिताः ॥ ३१ ॥
पिठरः पतगः स्वर्णः श्वागाधो भ्राज एव च ।
स्वधाकाराश्रयाः पञ्च मयुध्यंस्तेऽपि चाग्नयः ॥ ३२ ॥

इनके सिवा दूसरे महाभाग अग्नि भी अपने सैनिकोंके साथ खड़े थे, जिनके नाम थे—पिठर, पतग, स्वर्ण, श्वागाध और भ्राज। ये पाँच स्वधाकारका आश्रय लेकर रहनेवाले अग्नि कहे गये हैं; ये अग्नि भी वहाँ युद्ध कर रहे थे ॥

ज्योतिष्टोमविभागी च वषट्काराश्रयौ पुनः ।
द्वावग्नी सम्प्रयुध्येते महात्मानौ महाद्युती ॥ ३३ ॥

इनके सिवा वषट्कारके आश्रयमें रहनेवाले दो महा-तेजस्वी और महामनस्वी अग्नि, जिनका नाम ज्योतिष्टोम और विभाग था, वहाँ युद्ध कर रहे थे ॥ ३३ ॥

आग्नेयं रथमास्थाय शरमुद्यम्य भास्वरम् ।
तयोर्मध्येऽङ्गिराश्चैव महर्षिर्विबभौ रणे ॥ ३४ ॥

इन दोनोंके बीचमें प्रमुख अग्नि महर्षि अङ्गिरा आग्नेय रथपर आरूढ़ हो एक तेजस्वी बाण हाथमें लिये रणभूमिमें प्रकाशित हो रहे थे ॥ ३४ ॥

स्थितमङ्गिरसं दृष्ट्वा विमुञ्चन्तं शिताञ्छरान् ।
कृष्णः प्रोवाच संक्रुद्धः सयन्निव पुनः पुनः ॥ ३५ ॥

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