भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 733

विष्णुपर्व ] द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ७११


महर्षि अङ्गिराको पैने बाण छोड़ते हुए वहाँ स्थित देख क्रोधमें भरे हुए भगवान् श्रीकृष्ण वारंवार मुसकराते हुए-से बोले—॥ ३५ ॥
तिष्ठध्वमग्नयः सर्वे एष वो विदधे भयम् ।
ममास्त्रतेजसा दग्धा दिशो यास्यथ विद्रुताः ।
अथाङ्गिरास्त्रिशूलेन दीप्तेन समधावत ॥ ३६ ॥
आददान इव क्रोधात् कृष्णप्राणान् महामृधे ।
'अग्नियो ! तुम सब लोग खड़े रहो ! मैं अभी तुम्हारे लिये भयकी सृष्टि करता हूँ । मेरे अस्त्रके तेजसे दग्ध होकर तुम स्वयं ही सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग जाओगे।' यह सुनकर अङ्गिराने उस महासमरमे क्रोधपूर्वक चमकता हुआ त्रिशूल हाथमें लेकर श्रीकृष्णपर धावा किया, मानो वे उनके प्राण ले लेनेको उद्यत हों ॥ ३६½ ॥
त्रिशूलं तस्य दीप्तं तु चिच्छेद परमेषुभिः ।
अर्धचन्द्रैस्तथा तीक्ष्णैर्यमान्तकनिभोपमैः ॥ ३७ ॥
श्रीकृष्णने अपने तीखे अर्द्धचन्द्राकार उत्तम बाणोंसे, जो यमराजके समान क्रूर और अन्तकके समान प्राणहारी थे, उनके चमकते हुए त्रिशूलको काट डाला ॥ ३७ ॥
स्थूणाकर्णेन बाणेन दीप्तेन स महामनाः ।
विव्याधान्तकतुल्येन वक्षस्यङ्गिरसं ततः ॥ ३८ ॥
इसके बाद उन महामना श्रीहरिने स्थूणाकर्ण नामक कालसदृश तेजस्वी बाणद्वारा अङ्गिराकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी ॥ ३८ ॥
रुधिरौघप्लुताङ्गाङ्गैरङ्गिरा विह्वलन्निव ।
विष्टब्धगात्रः सहसा पपात धरणीतले ॥ ३९ ॥
अङ्गिराका सारा शरीर लहूलुहान हो गया । उनकी देह अकड़ गयी और वे विह्वल होकर सहसा पृथ्वीपर गिर पड़े ॥
शेषास्ततोऽग्नयः सर्वे चत्वारो ब्रह्मणः सुताः ।
आवाहयन्तदा शीघ्रं बाणस्य पुरमन्तिकात् ॥ ४० ॥
तत्पश्चात् शेष सब अग्नि जो ब्रह्माजीके चार पुत्र हैं, उस समय उन्हें शीघ्र ही बाणासुरके नगरके निकट उठा ले गये ॥ ४० ॥
अथागमत् ततः कृष्णो यत्र बाणपुरं ततः ।
अथ बाणपुरं दृष्ट्वा दूरात् प्रोवाच नारदः ॥ ४१ ॥
तत्पश्चात् श्रीकृष्ण जहाँ बाणासुरका नगर निकट था, वहाँ गये । बाणपुरको दूरसे ही देखकर नारदजीने कहा—॥४१॥
एतत् तच्छोणितपुरं कृष्ण पश्य महाभुज ।
अत्र रुद्रो महातेजा रुद्राण्या सहितोऽवसत् ॥ ४२ ॥
गुहश्च बाणगुप्त्यर्थं सततं क्षेमकारणात् ।
'महाबाहु श्रीकृष्ण ! देखिये, यही शोणितपुर है। यहाँ महातेजस्वी रुद्रने देवी रुद्राणीके साथ निवास किया है। बाणासुरकी रक्षा तथा उसके क्षेमके लिये कार्तिकेय भी यहाँ सदा निवास करते हैं' ॥ ४२½ ॥

नारदस्य वचः श्रुत्वा कृष्णः सम्प्रहसन् ब्रवीत् ॥ ४३ ॥
क्षणं चिन्त्यतामत्र श्रूयतां च महामुने ।
यदि वावतरेद् रुद्रो बाणसंरक्षणं प्रति ॥ ४४ ॥
शक्तितो वयमप्यत्र सह योत्स्याम तेन वै ।
नारदजीकी यह बात सुनकर श्रीकृष्ण हँसते हुए बोले— 'महामुने ! आप यहाँ मेरी बात सुनिये और क्षणभर उसपर विचार कीजिये । यदि बाणासुरकी रक्षाके लिये भगवान् रुद्र उतर आयेंगे तो हमलोग भी अपनी शक्तिके अनुसार उनके साथ युद्ध अवश्य करेंगे' ॥ ४३-४४½ ॥
एवं विवदतोस्तत्र कृष्णनारदयोस्तदा ॥ ४५ ॥
प्राप्ता निमेषमात्रेण शीघ्रगा गरुडेन ते ।
इस प्रकार वहाँ नारद और श्रीकृष्णमें बातचीत हो रही थी कि गरुड़के द्वारा शीघ्र चलकर वे सब लोग निमेषमात्रमें जा पहुँचे ॥ ४५½ ॥
ततः शङ्खं समाधाय वदने पुष्करेक्षणः ॥ ४६ ॥
वायुवेगसमुद्भूतो मेघश्चन्द्रमिवोद्गिरन् ।
तब कमलनयन श्रीकृष्णने शङ्खको अपने मुँहसे लगाकर बजाया । उस समय ऐसा जान पड़ता था मानो कोई मेघ वायुके वेगसे प्रेरित होकर चन्द्रमाको उगल रहा हो ॥४६½॥
ततः प्रध्माप्य तं शङ्खं भयमुत्पाद्य वीर्यवान् ॥ ४७ ॥
प्रविवेश पुरं कृष्णो बाणस्याद्भुतकर्मणः ।
इस प्रकार उस शङ्खको बजाकर असुरोंके मनमें भय उत्पन्न करके पराक्रमी श्रीकृष्णने अद्भुत कर्म करनेवाले बाणासुरके पुरमें प्रवेश किया ॥ ४७½ ॥
ततः शङ्खप्रणादैश्च भेरीणां च महास्वनैः ॥ ४८ ॥
बाणानीकानि सहसा संनह्यन्त समन्ततः ।
तदनन्तर शङ्खोंके शब्दों और भेरियोंके गम्भीर घोषोंसे प्रेरित हो बाणासुरकी सारी सेनाएँ सहसा सब ओरसे कवच आदि पहनकर युद्धके लिये तैयार हो गयीं ॥ ४८½ ॥
ततः किंकरसैन्यं तु व्यादिष्टं समरे भयात् ॥ ४९ ॥
कोटिशश्चापि बहुशो दीप्तप्रहरणास्तदा ।
तत्पश्चात् बाणासुरने भयके कारण युद्धके लिये अपने किङ्कर नामक सैनिकोको आज्ञा दी। उनकी संख्या कई करोड़की थी । उन सबके पास चमकीले अस्त्र-शस्त्र थे ॥
तदसंख्येयमेकस्थं महाभ्रघनसंनिभम् ॥ ५० ॥
नीलाञ्जनचयप्रख्यमप्रमेयमथाक्षयम् ।
एक स्थानपर खड़ी हुई वह असंख्य सेना महान् मेघोंकी घटाके समान जान पड़ती थी । उसकी कान्ति नीली अञ्जनराशिके समान दिखायी देती थी। वह अप्रमेय और अक्षय थी ॥ ५०½ ॥
दीप्तप्रहरणाः सर्वे दैत्यदानवराक्षसाः ॥ ५१ ॥
प्रमाथगणमुख्याश्च अयुध्यन् कृष्णमव्ययम् ।
उस सेनामें जो दैत्य, दानव और राक्षस थे, उन सबके