विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 734, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें७१२ श्रीमद्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे हाथोंमें चमकीले अस्त्र-शस्त्र शोभा पा रहे थे। भगवान् शिवके प्रमथगणोंमें जो मुख्य-मुख्य वीर थे, वे भी वहाँ आकर अविनाशी भगवान् शिवके साथ युद्ध करने लगे ॥ ५१३ ॥ सर्वतस्तैः प्रदीप्तास्त्रैः सार्चिष्मद्भिरिवाग्निभिः ॥ ५२ ॥ अभ्युपेत्य तदात्युग्रैर्यक्षरक्षस्किन्नरैः । पीयते रुधिरं तेषां चतुर्णामपि संयुगे ॥ ५३ ॥ चमकीले अस्त्र-शस्त्र धारण करनेके कारण जो लपटोंसे युक्त अग्नियोंके समान प्रतीत होते थे, वे भयंकर यक्ष, राक्षस और किन्नर सब ओरसे निकट आकर युद्धस्थलमें श्रीकृष्ण, बलभद्र, प्रद्युम्न और गरुड़ - इन चारोंका रक्त पीनेकी चेष्टा करने लगे ॥ ५२-५३ ॥ तद् बलं तु समासाद्य बलभद्रो महाबलः । प्रोवाच वचनं तत्र परस्य बलनाशनः ॥ ५४ ॥ शत्रुओंकी सेनाका नाश करनेवाले महाबली बलभद्र बाणासुरकी उस सेनाको निकट पाकर श्रीकृष्णसे इस प्रकार बोले- ॥ ५४ ॥ कृष्ण कृष्ण महाबाहो विधत्स्वैषां महत् भयम् । इति संचोदितः कृष्णो बलभद्रेण धीमता ॥ ५५ ॥ तेषां वधार्थमाग्नेयं जग्राह पुरुषोत्तमः । अस्त्रमस्त्रविदां श्रेष्ठो यमान्तकसमप्रभः । 'कृष्ण ! कृष्ण ! महाबाहो ! इनके लिये महान् भय उपस्थित करो !' बुद्धिमान् बलभद्रके द्वारा इस प्रकार प्रेरित हो अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने उन शत्रुओंके वधके लिये आग्नेयास्त्र हाथमें लिया। उस समय वे यम और अन्तकके समान भयंकर जान पड़ते थे ॥ ५५३ ॥ प्रविधूयासुरगणान् क्रव्यादानस्त्रतेजसा ॥ ५६ ॥ प्रययौ त्वरया युक्तो यत्र दृश्येत तद् बलम् । अपने अस्त्रके तेजसे उन मांसाहारी असुरोंको नष्ट करके श्रीकृष्ण बड़ी उतावलीके साथ उस स्थानपर गये, जहाँ वह शत्रुसेना दिखायी दे रही थी ॥ ५६३ ॥ शूलपट्टिशशक्त्यृष्टिपिनाकपरिघायुधम् ॥ ५७ ॥ प्रमाथगणभूयिष्ठं बलं तदभवत् क्षितौ । शूल, पट्टिश, शक्ति, ऋष्टि, पिनाक और परिघ आदि आयुधोंसे युक्त वह सेना, जिसमें प्रमथगणोंकी अधिकता थी, भूतलपर खड़ी थी ॥ ५७३ ॥ शैलमेघप्रतीकाशैर्नानरूपैर्भयानकैः । वाहनैः संघशः सर्वै योधास्तत्रावतस्थिरे ॥ ५८ ॥ पर्वत और मेघोंके समान दिखायी देनेवाले नाना रूपधारी भयानक वाहनोंपर आरूढ़ हो वे समस्त योद्धा वहाँ संघबद्ध होकर खड़े थे ॥ ५८ ॥ वातोद्भूतैरिव घनैर्विप्रकीर्णैरिवाचलैः । शुशुभे तत्र बहुलैर्नानैर्दृढधन्विभिः ॥ ५९ ॥ सुदृढ़ धनुष धारण करनेवाले बहुसंख्यक सैनिकोंसे, जो वायुद्वारा उड़ाये गये छिन्न-भिन्न बादलों तथा बिखरे हुए पर्वतोंके समान दूरतक फैले हुए थे, उस स्थानकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ ५९ ॥ मुसलैरसिभिः शूलैर्गदाभिः परिघैस्तथा । अगाधं तदसंख्येयं शुशुभे सर्वतो बलम् ॥ ६० ॥ वह असंख्य एवं अगाध सेना सब ओरसे मुसल, खड्ग, शूल, गदा और परिघ आदिके द्वारा सुशोभित हो रही थी ॥ ततः संकर्षणो देवमुवाच मधुसूदनम् । कृष्ण कृष्ण महाबाहो यदेतद् दृश्यते बलम् । एतैः सह रणे योद्धुमिच्छामि पुरुषोत्तम ॥ ६१ ॥ तब संकर्षणने भगवान् मधुसूदनसे कहा- 'कृष्ण ! कृष्ण ! महाबाहो ! पुरुषोत्तम ! यह जो सेना दिखायी देती है, रणभूमिमें इसके सैनिकोंके साथ मैं युद्ध करना चाहता हूँ' ॥ श्रीकृष्ण उवाच ममाप्येषा संजाता बुद्धिरित्यब्रवीच्च तम् । एभिः सह रणे योद्धुमिच्छेयं योधसत्तमैः ॥ ६२ ॥ युध्यतः प्राङ्मुखस्यास्तु सुपर्णो वै ममाग्रतः । सव्यपार्श्वे तु प्रद्युम्नस्तथा मे दक्षिणे भवान् । रक्षितव्यमथान्योन्यमस्मिन् घोरे महामृधे ॥ ६३ ॥ श्रीकृष्ण बोले- 'मेरे मनमें भी ऐसा विचार उत्पन्न हुआ है।' ऐसा कहकर वे पुनः उनसे बोले, 'भैया ! रण- भूमिमें इन श्रेष्ठ योद्धाओंके साथ मैं युद्ध करना चाहता हूँ। पूर्वाभिमुख होकर युद्ध करते समय मेरे आगे-आगे तो गरुड़ रहें, बायीं ओर प्रद्युम्न हों और दाहिनी ओर आप रहें। इस घोर महायुद्धमें हमें एक दूसरेकी रक्षा करनी चाहिये ॥ वैशम्पायन उवाच एवं ब्रवन्तस्ते ऽन्योन्यमधिरूढाः खगोत्तमम् । गिरिशृङ्गेन्निभैर्घोरैर्गदामुसलाङ्गलैः ॥ ६४ ॥ युध्यतो रौहिणेयस्य रौद्रं रूपमभूत् तदा । युगान्ते सर्वभूतानां कालस्येव दिधक्षतः ॥ ६५ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! परस्पर ऐसी बातचीत करके पक्षिप्रवर गरुड़पर चढ़े हुए वे तीनों वीर युद्ध करने लगे । पर्वतके शिखरोंकी भाँति भयंकर गदा, मुसल और हलसे युद्ध करते हुए रोहिणीकुमार बलभद्रका रूप उस समय वैसा ही भयंकर हो उठा, जैसा कि प्रलय- कालमें सम्पूर्ण भूतोंको दग्ध कर देनेकी इच्छावाले कालका रूप होता है ॥ ६४-६५ ॥ आकृष्य लाङ्गलाग्रेण मुसलेनावपोथयत् । चचाराप्रतिमो रामो युद्धमार्गविशारदः ॥ ६६ ॥ युद्धमार्गोंके विशेषज्ञ अत्यन्त बलशाली बलराम रणभूमिमें सब ओर विचरने लगे। वे हलके अग्रभागसे शत्रुओंको खींचकर उन्हें मुसलसे मार गिराते थे ॥ ६६ ॥ प्रद्युम्नः शरजालैस्तान् समन्तात् पर्यवारयत् । दानवान् पुरुषव्याघ्रो युध्यमानान् महाबलः ॥ ६७ ॥ पुरुषसिंह महाबली प्रद्युम्नने बाणोंका जाल-सा बिछाकर वहाँ जूझते हुए दानवोंको सब ओरसे ढक दिया ॥ ६७ ॥