विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 718, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें६९६ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
प्राज्ञां दक्षां शिवां सौम्यां दनुपुत्रविमर्दिनीम् ।
तां देवीं सर्वदेहस्थां सर्वभूतनमस्कृताम् ॥ ८ ॥
जो प्राज्ञा (बुद्धिमती एवं विदुषी), दक्षा, कल्याणस्वरूपा, सौम्या, दानवमर्दिनी, सबके शरीरमें विद्यमान तथा सम्पूर्ण भूत द्वारा वन्दित हैं, उन आर्यादेवीका मेरा प्रणाम है॥
दर्शनीं पूरणीं मायां वह्न्यर्कशशिप्रभाम् ।
शान्तिं ध्रुवां च जननीं मोहिनीं शोषणीं तथा ॥ ९ ॥
सेव्यां देवैः सर्षिगणैः सर्वदेवनमस्कृताम् ।
कालीं कात्यायनीं देवीं भयदां भयनाशिनीम् ॥१०॥
जो दर्शनी (दृष्टिशक्ति), पूरणी (मनोरथोंकी पूर्ति करनेवाली), मायास्वरूपा, अग्नि, सूर्य और चन्द्रमाके समान कान्तिवाली, शान्तिमयी, ध्रुवा (अविनाशिनी), सबकी जननी, मोहिनी तथा शोषणी हैं, ऋषियोंसहित सम्पूर्ण देवता जिनकी सेवा करते हैं, समस्त देवता जिनके चरणोंमें शीश झुकाते हैं, जो काली, कात्यायनी देवी, भयदायिनी तथा भयनाशिनी हैं, उनका मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ९-१० ॥
कालरात्रिं कामगमां त्रिनेत्रां ब्रह्मचारिणीम् ।
सौदामिनीं मेघरवां वेतालीं विपुलाननाम् ॥ ११ ॥
जो कालरात्रि, इच्छानुसार सर्वत्र जा सकनेवाली, त्रिनेत्रधारिणी और ब्रह्मचारिणी हैं, जो विद्युत्स्वरूपा, मेघके समान गर्जना करनेवाली, वेताली और विशाल मुखवाली हैं, उन देवीको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ११ ॥
यूथस्याद्यां महाभागां शकुनीं रेवतीं तथा ।
तिथीनां पञ्चमीं षष्ठीं पूर्णमासीं चतुर्दशीम् ॥ १२ ॥
जो यूथकी प्रधान अध्यक्षा, महासौभाग्यशालिनी, शकुनि, रेवती आदि ग्रहरूप तथा तिथियोंमें पञ्चमी, षष्ठी, पूर्णमासी और चतुर्दशीस्वरूपा हैं, उन देवीको नमस्कार है॥
सप्तविंशतिन्नक्षत्राणि नद्यः सर्वा दिशो दश ।
नगरोपवनोद्यानद्वारारट्टालकवासिनीम् ॥ १३ ॥
सत्ताईस नक्षत्र, सम्पूर्ण नदियाँ और दसों दिशाएँ— ये जिनके स्वरूप हैं, जो नगरों, उपवनों, उद्यानों और अट्टालिकाओंमें उनकी अधिष्ठात्रा देवीके रूपमें निवास करती हैं, उन आर्यादेवीको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ १३ ॥
ह्रीं श्रीं गङ्गां च गन्धर्वी योगिनीं योगदां सताम् ।
कीर्तिमाशां दिशं स्पर्शा नमस्यामि सरस्वतीम् ॥१४॥
जो ह्री (लज्जा), श्री (लक्ष्मी या सम्पत्ति), गङ्गा, गन्धर्वी (श्रीराधा), योगिनी तथा सत्पुरुषोंको योग प्रदान करनेवाली हैं, उन कीर्ति, आशा, दिशा, स्पर्धा एवं सरस्वती नामवाली देवीको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ १४ ॥
वेदानां मातरं चैव सावित्रीं भक्तवत्सलाम् ।
तपस्विनीं शान्तिकरीमेकानंशां सनातनाम् ॥ १५ ॥
जो वेदोंकी माता, भक्तवत्सला सावित्री, तपस्विनी, शान्तिकरी, एकानंशा एवं सनातनस्वरूपा हैं, उन आर्यादेवीको नमस्कार है ॥ १५ ॥
कौटीर्यां मदिरां चण्डामिलां मलयवासिनीम् ।
भूतधात्रीं भयंकरीं कूष्माण्डीं कुसुमप्रियाम् ॥ १६ ॥
जो कुटीरवासिनी, मत्त बना देनेवाली, अत्यन्त कोपना, इला, मलयवासिनी, सम्पूर्ण भूतोंको धारण करनेवाली, भयंकरी, कूष्माण्डी और कुसुमप्रिया हैं, उन देवीको मेरा नमस्कार है ॥
दारुणीं मदिरावासां विन्ध्यकैलासवासिनीम् ।
वराङ्गनां सिंहरथीं बहुरूपां वृषध्वजाम् ॥ १७ ॥
जिनका स्वभाव दारुण है, आवासस्थान भी मत्त बना देनेवाला है, जो विन्ध्य और कैलास पर्वतपर निवास करती हैं, श्रेष्ठ अङ्गना हैं, सिंह जिनका रथ या वाहन है, जो बहुत से रूप धारण करनेवाली तथा वृषभ-चिह्नसे चिह्नित ध्वजवाली हैं, उन देवीको नमस्कार है ॥ १७ ॥
दुर्लभां दुर्जयां दुर्गां निशुम्भभयदर्शिनीम् ।
सुरप्रियां सुरां देवीं वज्रपाण्यनुजां शिवाम् ॥ १८ ॥
जो दुर्लभ, दुर्जय, दुर्गम, निशुम्भासुरको भय दिखानेवाली, देवप्रिया, सुरस्वरूपा तथा वज्रपाणि इन्द्रकी अनुजा हैं, उन कल्याणमयी देवीको नमस्कार है ॥ १८ ॥
किरातीं चीरवसनां चौरसेनानमस्कृताम् ।
आज्यपां सोमपां सौम्यां सर्वपर्वतवासिनीम् ॥ १९ ॥
जो किरात-वेष धारण करनेवाली, चीर-वस्त्रधारिणी तथा चोरोंकी सेनासे नमस्कृत हैं तथा जो घृत पीनेवाली, सोमरसका पान करनेवाली, सौम्यस्वरूपा तथा समस्त पर्वतोंमें निवास करनेवाली हैं, उन देवीको मैं नमस्कार करता हूँ ॥
निशुम्भशुम्भमथनीं गजकुम्भोपमस्तनीम् ।
जननीं सिद्धसेनस्य सिद्धचारणसेविताम् ॥ २० ॥
चरां कुमारप्रभवां पार्वतीं पर्वतात्मजाम् ।
जो निशुम्भ और शुम्भका संहार करनेवाली हैं, जिनके स्तन हाथीके कुम्भस्थलके समान जान पड़ते हैं तथा सिद्ध और चारण जिनकी सेवामें लगे रहते हैं, जो कार्तिकेयकी जननी हैं, जिनसे कुमारकी उत्पत्ति हुई है तथा जो पर्वतकी पुत्री होनेपर भी सर्वत्र विचरनेवाली हैं, उन पार्वती देवीको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ २०½ ॥
पञ्चाशद्देवकन्यानां पत्न्यो देवगणस्य च ॥ २१ ॥
कद्रुपुत्रसहस्रस्य पुत्रपौत्रवरस्त्रियः ।
माता पिता जगन्मान्या दिवि देवाप्सरोगणैः ॥ २२ ॥
ऋषिपत्नीगणानां च यक्षगन्धर्वयोषिताम् ।
विद्याधराणां नारीषु साध्वीषु मनुजासु च ॥ २३ ॥