विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 717, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ६९५
स गत्वा नारदस्तत्र शङ्खचक्रगदाधरम्।
ज्ञापयिष्यति तत्त्वेन इममर्थं न संशयः ॥१९९॥
नारदजी वहाँ जाकर शङ्ख-चक्र-गदाधर भगवान् श्रीकृष्णसे यह सब समाचार ठीक-ठीक बतायेंगे, इसमें कोई संदेह नहीं है ॥ १९९ ॥
नागैर्विचेष्टितं दृष्ट्वा उषा प्राद्युम्निमातुरा।
रुरोद बाष्परुद्धाक्षी तामाह रुदतीं पुनः ॥२००॥
साँपोंसे बँधकर अनिरुद्ध चेष्टहीन हो गये हैं, यह देख व्याकुल हुई उषा फूट-फूटकर रोने लगी। उसके नेत्र आँसुओंसे भर गये, तब उस रोती हुई उषासे अनिरुद्धने कहा—॥
किमिदं रुद्यते भीरु मा भैस्त्वं मृगलोचने।
पश्य सुश्रोणि सम्प्राप्तं मत्कृते मधुसूदनम् ॥२०१॥
यस्य शङ्खध्वनिं श्रुत्वा बाहुशब्दं बलस्य च।
दानवा नाशमेष्यन्ति गर्भाश्चासुरयोषिताम् ॥२०२॥
'भीरु ! तुम इस तरह रोती क्यों हो ? मृगलोचने ! भय-भीत न हो। सुश्रोणि ! देखो, भगवान् मधुसूदन मेरे लिये यहाँ आना ही चाहते हैं। जिनके शङ्खनादको, भुजाओंके शब्दको और बलकी चर्चाको सुनकर दानव नष्ट हो जायेंगे और असुरोंकी स्त्रियोंके गर्भ गिर जायँगे' ॥ २०१-२०२ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तानिरुद्धेन उषा विश्रम्भमागता।
नृशंसं पितरं चैव शोचते सा सुमध्यमा ॥२०३॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! अनिरुद्धके ऐसा कहनेपर उषाको विश्वास हो गया। वह सुन्दर कटिप्रदेशवाली सुन्दरी अब अपने निर्दय पिताके लिये शोक करने लगी ॥ २०३ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि बाणानिरुद्धयुद्धे एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें बाणासुर और अनिरुद्धका युद्धविषयक एक सौ उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११९ ॥
विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
अनिरुद्धके द्वारा आर्यादेवीकी स्तुति और देवीका प्रसन्न होकर उन्हें बन्धनके कष्टसे मुक्त करना
वैशम्पायन उवाच
यदा बाणपुरे वीरः सोऽनिरुद्धः सहोषया।
संनिरुद्धो नरेन्द्रण बाणेन बलिसूनुना ॥ १ ॥
तदा देवीं कोटवर्तीं रक्षार्थं शरणं गतः।
यद् गीतममिरुद्धेन देव्याः स्तोत्रमिदं शृणु ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! जब उषाके साथ वीर अनिरुद्ध बलिकुमार राजा बाणासुरके द्वारा बाण-नगरमें बंदी बना लिये गये, तब वे अपनी रक्षाके लिये कोटवती देवीकी शरणमें गये। उस समय अनिरुद्धने जिस स्तोत्रका गान किया था, वह इस प्रकार है; सुनो ॥ १-२ ॥
अनन्तमक्षयं दिव्यमादिदेवं सनातनम्।
नारायणं नमस्कृत्य प्रवरं जगतां प्रभुम् ॥ ३ ॥
चण्डीं कात्यायनीं देवीमार्या लोकनमस्कृताम्।
वरदां कीर्तयिष्यामि नामभिर्हरिसंस्तुतैः ॥ ४ ॥
जो अनन्त, अक्षय, दिव्य, आदिदेव और सनातन हैं, उन सर्वश्रेष्ठ जगदीश्वर नारायणदेवको नमस्कार करके विश्ववन्दित वरदायिनी चण्डी कात्यायनी आर्या देवीका मैं श्रीहरिके द्वारा प्रशंसित नामोंसे कीर्तन करूँगा ॥ ३-४ ॥
ऋषिभिर्देवैस्तैश्चैव वाक्पुष्पैरर्चितां शुभाम्।
तां देवीं सर्वदेहस्थां सर्वदेवनमस्कृताम् ॥ ५ ॥
ऋषियों और देवताओंने वाणीरूपी पुष्पोंद्वारा जिन मङ्गलमयी देवीकी पूजा की है, जो सबके शरीरमें विराजमान हैं तथा सम्पूर्ण देवता जिन्हें नमस्कार करते हैं, उन आर्या देवीका मैं गुणगान करूँगा ॥ ५ ॥
अनिरुद्ध उवाच
महेन्द्रविष्णुभगिनीं नमस्यामि हिताय वै।
मनसा भावशुद्धेन शुचिः स्तोष्ये कृताञ्जलिः॥ ६ ॥
अनिरुद्धने कहा—जो देवराज इन्द्र और भगवान् विष्णुकी बहिन हैं, उन देवीको मैं अपने हितके लिये नमस्कार करता हूँ तथा हाथ जोड़कर पवित्र हो भावशुद्ध हृदयसे उनकी स्तुति करना चाहता हूँ ॥ ६ ॥
गौतमीं कंसभयदां यशोदानन्दवर्द्धिनीम् ।
मेध्यां गोकुलसम्भृतां नन्दगोपस्य नन्दिनीम् ॥ ७ ॥
जो गौतमी (गोदावरी)स्वरूपा, कंसको भय देनेवाली, यशोदाका आनन्द बढ़ानेवाली, पवित्र, गोकुलमें आविर्भूत तथा नन्दगोपकी नन्दिनी हैं, उन आर्यादेवीको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ७ ॥