भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 716

६९४ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

बलवान् सत्त्वसम्पन्नः सर्वशस्त्रविशारदः ॥ १८२॥
नायं वधकृतं दोषमर्हते दैत्यसत्तम।
'दैत्यप्रवर ! यह बलवान्, धैर्यसम्पन्न तथा सम्पूर्ण शस्त्रविद्यामें प्रवीण है। अतः वधरूप दोषका पात्र नहीं है॥

गान्धर्वेण विवाहेन कन्येयं तव संगता ॥ १८३॥
अदेया ह्यप्रतिग्राह्या अतश्चिन्त्य वधं कुरु ।
'आपकी कन्याने गान्धर्व विवाहके द्वारा इसके साथ समागम किया है। अतः न तो अब वह दूसरेको देने योग्य रह गयी है और न दूसरेके द्वारा ग्रहण करने योग्य ही; अतः खूब सोच-विचारकर इसका वध कीजिये ॥ १८३ १/२ ॥'

विज्ञाय च वधं वास्य पूजां वास्य करिष्यसि ॥ १८४॥
वधे ह्यस्य महान् दोषो रक्षणे सुमहान् गुणः।
'पहले इसका परिचय प्राप्त करके फिर वध अथवा पूजन कीजियेगा। इसका वध करनेमें महान् दोष है और रक्षा करनेमें महान् गुण ॥ १८४ १/२ ॥'

अयं हि पुरुषोत्कृष्टः सर्वथा मानमर्हति ॥ १८५॥
सर्वतो वेष्टितस्तूर्णं व्यथत्येष भोगिभिः ।
कुलशौण्डीर्यवीर्यैश्च सत्त्वेन च समन्वितः ॥ १८६॥
'यह पुरुषोंमें श्रेष्ठ होनेके कारण सर्वथा सम्मानके योग्य है। देखिये ! सर्पोंने सब ओरसे इसके शरीरको जकड़ लिया है तो भी यह व्यथित नहीं होता है। अपने कुलके अभिमान, बल-पराक्रम तथा धैर्यसे सम्पन्न है ॥ १८५-१८६ ॥

पश्य राजन् महावीर्यैरन्वितः पुरुषोत्तमः ।
न नो गणयते सर्वान् वधं प्राप्तोऽप्ययं बली ॥ १८७॥
'राजन् ! देखिये तो सही ! महाबली सर्पोंसे बद्ध होकर वधावस्थाको प्राप्त होनेपर भी यह बलवान् पुरुषोत्तम वीर हम सब लोगोंको कुछ भी नहीं गिनता है ॥ १८७ ॥

यदि मायाप्रभावेण नात्र बद्धो भवेदयम्।
सर्वान् सुरगणान् संख्ये योधयेन्नात्र संशयः ॥ १८८॥
'यदि यह मायाके प्रभावसे बाँधा न गया होता तो रणभूमिमें केवल असुरोंसे ही नहीं, समस्त देवताओंसे भी युद्ध कर सकता था, इसमें संशय नहीं है ॥ १८८ ॥

सर्वसंग्राममार्गज्ञो भवेद् वीर्याधिकस्तव ।
शोणितौघप्लुवैर्गात्रैर्नागभोगैश्च वेष्टितः ॥ १८९॥
त्रिशिखां भ्रुकुटिं कृत्वा न चिन्तयति नः स्थितान्।
'यह युद्धके सभी मागोंका ज्ञाता तथा बल-पराक्रममें आपसे भी बढ़कर है। इसके सारे अङ्ग खूनसे लथपथ हो गये हैं। इसे सर्पके शरीरोंसे जकड़ दिया गया है तो भी यह भौंहोंको तीन जगहसे टेढ़ी करके यहाँ खड़े हुए हमलोगोंको कुछ भी नहीं समझता है ॥ १८९ १/२ ॥

इमामवस्थां नीतोऽपि स्वबाहुबलमाश्रितः ॥ १९०॥
न चिन्तयति राजंस्त्वां वीर्यवान् कोऽप्यसौ युवा।
'राजन् ! इस अवस्थाको पहुँच जानेपर भी यह अपने बाहुबलका भरोसा करके आपकी कोई परवा नहीं करता है। वास्तवमें यह युवक कोई अद्भुत पराक्रमी वीर है ॥ १९० १/२ ॥'

सहस्रबाहोः समरे द्विबाहुः समवस्थितः ।
न चिन्तयति ते वीर्यमयं वीर्यमदान्वितः ॥ १९१॥
उचितं यदि ते राजन् ज्ञेयो वीर्यबलान्वितः ।
'सहस्रबाहुके साथ समरभूमिमें यह दो ही बाँहोंका वीर खड़ा है, किंतु अपने बल-पराक्रमके मदसे उन्मत्त हो आपके बल-वीर्यको कुछ नहीं समझता ॥ १९१ १/२ ॥'

कन्या चेयं न चान्यस्य निर्यात्ये तेन संगता ॥ १९२॥
यदि चेष्टतमः कश्चिदयं वंशे महात्मनाम् ।
ततः पूजामयं वीरः प्राप्स्यते चासुरोत्तम ॥ १९३॥
'असुरप्रवर ! आपकी यह कन्या इसके साथ सम्बन्ध स्थापित कर चुकी है, अतः अब दूसरेको नहीं दी जा सकती। यदि यह किन्हीं महात्मा पुरुषोंके कुलमें उत्पन्न हो तो हमारे लिये परम अभीष्ट है। उस दशामें यह वीर हमसे पूजा प्राप्त करेगा ॥ १९२-१९३ ॥

रक्ष्यतामिति चोक्त्वैव तथास्त्विति च तस्थिवान् ।
एवमुक्ते तु वचने कुम्भाण्डेन महात्मना ॥ १९४॥
तथेत्याह च कुम्भाण्डं बाणः शत्रुनिषूदनः ।
'अतः आप इसकी रक्षा कीजिये।' इतना कहकर ही कुम्भाण्ड चुप हो गये। महात्मा कुम्भाण्डके ऐसी बात कहने-पर शत्रुसूदन बाणासुर भी उनसे 'तथास्तु' कहकर चुपचाप बैठा रहा ॥ १९४ १/२ ॥'

संरक्षिणस्ततो दत्त्वा अनिरुद्धस्य धीमतः ॥ १९५॥
ययौ स्वमेव भवनं बलेः पुत्रो महायशाः ।
तदनन्तर ! बुद्धिमान् अनिरुद्धके लिये पहरेदार देकर महायशस्वी बलिपुत्र बाणासुर अपने घरको ही चला गया ॥

संयतं मायया दृष्ट्वा अनिरुद्धं महाबलम् ॥ १९६॥
ऋषीणां नारदः श्रेष्ठोऽव्रजद् द्वारवतीं प्रति ।
ततो ह्याकाशमार्गेण मुनिर्द्वारवतीं गतः ॥ १९७॥
महाबली अनिरुद्धको मायाद्वारा बँधा हुआ देख मुनिश्रेष्ठ नारद आकाशमार्गसे द्वारकापुरीकी ओर चल दिये ॥ १९६-१९७॥

गते ऋषीणां प्रवरे सोऽनिरुद्धो व्यचिन्तयत् ।
नष्टोऽयं दानवः क्रूरो युद्धमेष्यत्यसंशयः ॥ १९८॥
मुनिप्रवर नारदजीके चले जानेपर अनिरुद्ध मन-ही-मन इस प्रकार विचार करने लगे—यह क्रूर दानव कहीं छिप गया है। पुनः युद्धके लिये आयेगा, इसमें संशय नहीं है ॥१९८॥