विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 715, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः [ ६९३
मायामाश्रित्य युध्यस्व नायं वध्योऽन्यथा भवेत्।
आत्मानं मां च रक्षस्व प्रमादात् किमुपेक्षसे ॥१६६॥
‘मायाका आश्रय लेकर युद्ध करो, अन्यथा यह मारा नहीं जा सकेगा। तुम अपनी और मेरी भी रक्षा करो। प्रमादवश उपेक्षा क्यों करते हो ॥ १६६ ॥
वध्यतामयमद्यैव न नः सर्वान् विनाशयेत्।
अन्यांश्च शतशो हत्वा उषां नीत्वा व्रजिष्यति ॥१६७॥
‘इसको अभी मार डालो; कहीं ऐसा न हो यह हम सब लोगोंका नाश कर डाले; यदि तुम सावधान नहीं हुए तो यह अन्य सैकड़ों वीरोंको मारकर उषाको भी लेकर चला जायगा’ ॥ १६७ ॥
कुम्भाण्डवचनैरेवं दानवेन्द्रः प्रनोदितः।
वाचं रूक्षामभिक्रुद्धः प्रोवाच वदतां वरः ॥१६८॥
कुम्भाण्डके वचनोंसे इस प्रकार प्रेरित हुआ वक्ताओंमें श्रेष्ठ दानवराज बाण अत्यन्त कुपित हो यह रूखी बात बोला—॥
एषोऽहमस्य विद्धे मृत्युं प्राणहरं रणे।
आदास्याम्यहमेतं वै गरुत्मानिव पन्नगम् ॥१६९॥
‘यह लो ! मैं अभी रणभूमिमें इसे मौतके हवाले कर देता हूँ, जो इसके प्राण हर लेगी। जैसे गरुड़ सर्पको दबोच लेता है, उसी प्रकार मैं भी इसे अपने काबूमें कर लूँगा’ ॥
इत्येवमुक्त्वा सरथः सध्वजः साश्वसारथिः।
गन्धर्वनगराकारस्तत्रैवान्तरधीयत ॥१७०॥
ऐसा कहकर रथ, ध्वज, घोड़े और सारथिसहित बाणासुर गन्धर्वनगरके समान वहीं अन्तर्धान हो गया ॥१७०॥
मुमोच निशितान् बाणांश्छन्नो मायाधरो बली।
विद्यायान्तर्हितं बाणं प्रद्युम्निरपराजितः ॥१७१॥
पौरुषेण समायुक्तः सम्प्रैक्षत दिशो दश।
वह मायाधारी बलवान् दानव स्वयं छिपकर अनिरुद्धपर पैने बाणोंकी वर्षा करने लगा। बाणासुरको अदृश्य हुआ जान अपराजित वीर अनिरुद्ध पुरुषार्थसे युक्त हो दसों दिशाओंकी ओर देखने लगे ॥ १७१½ ॥
आस्थाय तामसीं विद्यां तदा क्रुद्धो बलेः सुतः ॥१७२॥
मुमोच विशिखांस्तीक्ष्णांश्छन्नो मायाधरो बली।
तब क्रोधमें भरे हुए मायाधारी बलिपुत्र बलवान् बाणासुरने तामसी विद्याका आश्रय ले छिपे रहकर तीखे बाणोंका प्रहार आरम्भ किया ॥ १७२ ॥
प्रायुम्निः शरविद्धैर्बद्धः सर्पभूतैः समन्ततः ॥१७३॥
वेष्टितो बहुधा तस्य देहः पन्नगराशिभिः।
उस समय प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्ध सर्पाकार बाणोंद्वारा चारों ओरसे बँध गये। उनका शरीर सर्पसमूहोंसे बारंबार आवेष्टित हो गया ॥ १७३½ ॥
स तु वेष्टितसर्वाङ्गो बद्धः प्रद्युम्निराहवे ॥१७४॥
निष्प्रयत्नः कृतस्तस्थौ मैनाक इव पर्वतः।
युद्धमें सारे अङ्ग सर्पोंसे वेष्टित एवं बद्ध हो जानेके कारण प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्ध निश्चेष्ट कर दिये गये और वे मैनाक पर्वतकी भाँति अचलभावसे खड़े हो गये ॥ १७४½ ॥
ज्वालावलीढवदनैः सर्पभोगैर्विचेष्टितः ॥१७५॥
अभितः पर्वताकारः प्रद्युम्निरभवद् रणे।
मुखसे आग उगलनेवाले सर्पोंके शरीरोंद्वारा सब ओरसे आवेष्टित एवं चेष्टाहीन हुए अनिरुद्ध उस रणभूमिमें पर्वतके समान प्रतीत होते थे ॥ १७५½ ॥
निष्प्रयत्नगतिश्चापि सर्पवक्त्रमयैः शरैः ॥१७६॥
न विव्यथे स भूतात्मा सर्वतः परिवेष्टितः।
सर्पमुख बाणोंद्वारा सब ओरसे परिवेष्टित हो अपना प्रयत्न और गति अवरुद्ध हो जानेपर भी सर्वभूतात्मा अनिरुद्ध मनमें व्यथित नहीं हुए ॥ १७६½ ॥
ततस्तं वाग्भिरुग्राभिः संरब्धः समतर्जयत् ॥१७७॥
बाणो ध्वजं समाश्रित्य प्रोवाचामर्षितो वचः।
तब रोषमें भरे हुए बाणासुरने कठोर वचनोंद्वारा अनिरुद्धको फटकारा; फिर उसने ध्वजका सहारा लेकर अमर्षयुक्त हो यह बात कही—॥ १७७½ ॥
कुम्भाण्ड वध्यतां शीघ्रमयं वै कुलपांसनः ॥१७८॥
चारित्रं येन मे लोके दूषितं दूषितात्मना।
‘कुम्भाण्ड ! इस कुलाङ्गारका शीघ्र वध कर डालो, जिस दूषित हृदयवाले दुष्टने संसारमें मेरे यशको कलङ्कित कर दिया’ ॥
इत्येवमुक्ते वचने कुम्भाण्डो वाक्यमब्रवीत् ॥१७९॥
राजन् वक्ष्याम्यहं किंचित् तन्मे शृणु यदिच्छसि।
बाणासुरके ऐसा कहनेपर मन्त्री कुम्भाण्डने कहा—‘राजन् ! इस विषयमें मैं कुछ कहना चाहता हूँ। यदि आपकी इच्छा हो तो मेरी उस बातको सुन लें ॥ १७९½ ॥
अयं विज्ञायतां कस्य कुतो वायमिहागतः ॥१८०॥
केन चायमिहानीतः शक्रतुल्यपराक्रमः।
‘पहले इस बातको जान लीजिये, यह किसका पुत्र है और कहाँसे यहाँ आया है अथवा इस इन्द्रतुल्य पराक्रमी वीरको कौन यहाँ ले आया है ? ॥ १८०½ ॥
मयायं बहुशो राजन् दृष्टो युध्यन् महारणै ॥१८१॥
क्रीडन्निव च युद्धेषु दृश्यते देवसूनुवत्।
‘राजन् ! मैंने इस महासमरमें युद्ध करते समय इसकी ओर बारंबार देखा है। यह युद्धभूमिमें देवकुमारके समान क्रीड़ा करता-सा दिखायी देता था ॥ १८१½ ॥