विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 714, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें६५२ -श्रीमहाभारते खिलभागे- [ हरिवंशे अभिलाषासे उनके सिरपर सब ओरसे क्षुद्रक नामवाले दान- हरसेको काट दिया और युद्धके मुहानेपर तलवारसे ही उसके समूहोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ १४९ ॥ घोड़ोंको मार डाला ॥ १५७ ॥ ततो बाणसहस्राणि चर्मणा व्यवधूय सः । तं पुनः शरवर्षेण पट्टिशैस्तोमरैरपि । बभौ प्रमुखतस्तस्य स्थितः सूर्य इवोदये ॥१५०॥ चकाराऽन्तर्हितं बाणो युद्धमार्गविशारदः ॥१५८॥ उस समय उसके हजारों बाणोंको ढालसे ही इधर-उधर तब युद्धमार्गके ज्ञानमें निपुण बाणासुरने पुनः पट्टिशों, करके अनिरुद्ध उसके सामने खड़े हो उदयकालके सूर्यकी तोमरों और बाणोंकी वर्षा करके अनिरुद्धको ढँक दिया ॥ भाँति शोभा पाने लगे ॥ १५० ॥ हतोऽयमिति विज्ञाय प्राणदन् नैर्ऋता गणाः । सोऽभिभूय रणे बाणमास्थितो यदुनन्दनः । ततोऽवप्लुत्य सहसा रथपार्श्वे व्यवस्थितः ॥१५९॥ सिंहः प्रमुखतो दृष्ट्वा गजमेकं यथा वने ॥१५१॥ अब यह मारा गया ऐसा जानकर वे दैत्य गर्जना करने रणभूमिमें बाणासुरका तिरस्कार करके यदुनन्दन लगे; इतनेमें ही अनिरुद्ध सहसा कूदकर रथके पार्श्वभागमें अनिरुद्ध उसी तरह निर्भय खड़े रहे, जैसे वनमें सिंह अपने खड़े हो गये ॥ १५९ ॥ सामने एक हाथीको देखकर निर्भय खड़ा रहता है ॥ १५१॥ शक्तिं वाणस्ततः क्रुद्धो घोररूपां भयानकाम् । ततो वाणः स बाणौघैर्मर्मभेदिभिराशुगैः । जग्राह ज्वलितां घोरां घण्टामालाकुलां रणे ॥१६०॥ विव्याध निशितैस्तीक्ष्णैः प्रद्युम्निमपराजितम् ॥१५२॥ ज्वलनादित्यसंकाशां यमदण्डोग्रदर्शनाम् । तदनन्तर बाणासुरने अपराजित वीर प्रद्युम्नकुमारको प्राहिणोत् तामसङ्गेन महोल्कां ज्वलितामिव ॥१६१॥ मर्मभेदी, शीघ्रगामी, तेज किये हुए, पैने बाणसमूहोंद्वारा तब कुपित हुए बाणासुरने रणभूमिमें एक घोर एवं घायल कर दिया ॥ १५२ ॥ भयानक शक्ति हाथमें ली, जो अग्निके समान प्रज्वलित हो समाहतस्ततो बाणैः खड्गचर्मधरोऽपतत् । रही थी; वह घोर शक्ति घंटाओंकी मालाओंसे व्याप्त थी। तमापतन्तं निशितैरभ्यहन् सायकैस्तथा ॥१५३॥ उसका तेज अग्नि और सूर्यके समान जान पड़ता था तथा उन बाणोंसे घायल होनेपर अनिरुद्ध ढाल और तलवार वह यमदण्डके समान भयानक दिखायी देती थी; उस दैत्यने लिये बाणासुरपर टूट पड़े । उन्हें आक्रमण करते देख उस निर्भय होकर जलती हुई उल्काके समान वह शक्ति अनिरुद्ध- असुरने तीखे सायकोंसे उनपर और भी चोट की ॥ १५३ ॥ पर चला दी ॥ १६०-१६१ ॥ सोऽतिविद्धो महाबाहुर्बाणैः संनतपर्वभिः । तामापतन्तीं सम्प्रेक्ष्य जीवितान्तकरीं तदा । क्रोधेनाभिप्रजज्वाल चिकीर्षुः कर्म दुष्करम् ॥१५४॥ सोऽभिप्लुत्य तदा शक्तिं जग्राह पुरुषोत्तमः ॥१६२॥ झुकी हुई गाँठवाले बाणोंसे अत्यन्त घायल होनेपर निर्विभेद ततो बाणं तया शक्त्या महाबलः । महाबाहु अनिरुद्ध क्रोधसे जल उठे और दुष्कर कर्म करनेकी सा भित्त्वा तस्य देहं वै प्राविशद् धरणीतलम् ॥१६३॥ इच्छा करने लगे ॥ १५४ ॥ उस समय जीवनका अन्त कर देनेवाली उस शक्तिको रुधिरौघप्लुतैर्गात्रैर्बाणवर्षैः समाहितः । अपने ऊपर आती देख पुरुषप्रवर महाबली अनिरुद्धने अभिभूतः सुसंक्रुद्धो ययौ बाणरथं प्रति ॥१५५॥ उछलकर तत्काल उसे हाथसे पकड़ लिया और उसी शक्तिसे असिभिर्मुसलैः शूलैः पट्टिशैस्तोमरैस्तथा । बाणासुरको विदीर्ण कर डाला; वह शक्ति उसके शरीरको सोऽतिविद्धः शरौघैश्च प्रद्युम्निर्न व्यकम्पत ॥१५६॥ विदीर्ण करती हुई पृथ्वीमें समा गयी ॥ १६२-१६३ ॥ बाणोंकी वर्षासे आच्छादित हो अनिरुद्धके सारे अङ्ग स गाढविद्धो व्यथितो ध्वजयष्टिं समाश्रितः । खूनसे लथपथ हो गये, इस तरह पराभव प्राप्त होनेसे ततो मूर्च्छाभिभूतं तं कुम्भाण्डो वाक्यमब्रवीत् ॥१६४॥ अनिरुद्धका क्रोध बहुत बढ़ गया और वे बाणासुरके रथकी उस शक्तिकी गहरी चोटसे पीड़ित हो बाणासुरने ध्वज- ओर चल दिये। उस समय तलवारों, मूसलों, शूलों, पट्टिशों, दण्डका सहारा ले लिया। उसे मूर्च्छित हुआ देख कुम्भाण्डने तोमरों और बाणसमूहोंसे अत्यन्त घायल होनेपर भी प्रद्युम्न- उससे कहा-॥ १६४ ॥ कुमार कम्पित नहीं हुए ॥ १५५-१५६ ॥ उपेक्षसे दानवेन्द्र किमेवं शत्रुमुद्यतम् । आप्लुत्य सहसा क्रुद्धो रथेषां तस्य सोऽच्छिनत्। लब्धलक्षो ह्ययं वीरो निर्विकारोऽद्य दृश्यते ॥१६५॥ जघान चाश्वान् खड्गेन बाणस्य रणमूर्धनि ॥१५७॥ 'दानवराज ! इस प्रकार उद्यत हुए शत्रु की उपेक्षा किस सहसा क्रोधपूर्वक उछलकर उन्होंने बाणासुरके रथके लिये करते हो । इस वीरने अपना लक्ष्य पा लिया है, अतः आज निर्विकार दिखायी देता है ॥ १६५ ॥