भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 713, कुल 1169 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 713

विष्णुपर्व ] एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ६५१


बैठा हुआ उस स्थानपर गया, जहाँ अनिरुद्ध तलवार हाथमें लिये खड़े थे ॥ १३२-१३३ ॥

पट्टिशासिगदाशूलमुद्यम्य च परश्वधान् ।
बभौ बाहुसहस्रेण शक्रो ध्वजशतैरिव ॥ १३४॥
बद्धगोधाङ्गुलित्रैश्च बाहुभिः स महाभुजः।
नानाप्रहरणोपेतः शुशुभे दानवोत्तमः ॥१३५॥

बाणासुर अपनी सहस्र भुजाओंसे पट्टिश, खड्ग, गदा, शूल और फरसे उठा सैकड़ों ध्वजोंसे युक्त देवराज इन्द्रके समान शोभा पाता था। जिनकी अँगुलियोंमें गोधाचर्मके दस्ताने बँधे हुए थे, उन भुजाओंसे नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लिये वह महाबाहु दानवराज बड़ी शोभा पा रहा था ॥

सिंहनादं नदन् क्रुद्धो विस्फारितमहाधनुः।
अब्रवीत् तिष्ठ तिष्ठेति क्रोधसंरक्तलोचनः ॥१३६॥

उसके नेत्र क्रोधसे लाल हो रहे थे; वह क्रोधमें भरकर सिंहके समान दहाड़ता और अपने विशाल धनुषको खींचता हुआ बोला—'अरे खड़ा रह ! खड़ा रह !!' ॥ १३६ ॥

वचनं तस्य संश्रुत्य प्रद्युम्निरपराजितः ।
बाणस्य वदनं संख्ये समुद्वीक्ष्य ततोऽहसत् ॥१३७॥

बाणासुरकी बात सुनकर और युद्धस्थलमें उसके मुखपर दृष्टि डालकर अपराजित वीर प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्ध हँसने लगे ॥ १३७ ॥

किङ्किणीशतनिर्घोषं रक्तध्वजपताकिनम्।
ऋष्यचर्मावनद्धाङ्गं दशनल्वं महारथम् ॥१३८॥

बाणासुरका विशाल रथ दस नल्व ( चार हजार हाथ ) के बराबर था; उसमें सैकड़ों छोटी-छोटी घंटियाँ लगी थीं; जिनकी ध्वनि सब ओर गूँजती रहती थी; उस रथकी ध्वजा-पताकाएँ लाल रङ्गकी थीं तथा उस रथके प्रत्येक अवयवपर ऋष्यनामक मृगविशेषका चमड़ा मढ़ा हुआ था ॥ १३८ ॥

तस्य वाजसहस्रं तु रथे युक्तं महात्मनः।
पुरा देवासुरे युद्धे हिरण्यकशिपोरिव ॥१३९॥

उस महाकाय दानवके रथमें एक सहस्र घोड़े जुते हुए थे; ठीक उसी तरह जैसे पूर्वकालमें देवासुर संग्रामके अवसरपर हिरण्यकशिपुके रथमें जोते गये थे ॥ १३९ ॥

तमापतन्तं ददृशे दानवं यदुपुङ्गवः।
सम्पहृष्टस्ततो युद्धे तेजसा चाप्यपूर्यत ॥१४०॥

यदुकुलतिलक अनिरुद्धने जब उस दानवको आक्रमण करते देखा; तब वे युद्धके लिये हर्ष और उत्साहसे भर गये तथा महान् तेजसे सम्पन्न हो गये ॥ १४० ॥

असिचर्मधरो वीरः स्वस्थः संग्रामलालसः ।
नरसिंहो यथा पूर्वमादिदैत्यवधोद्यतः ॥१४१॥

जैसे पूर्वकालमें आदिदैत्य हिरण्यकशिपुका वध करनेके लिये उद्यत हुए भगवान् नरसिंह शोभा पाते थे, उसी प्रकार संग्रामकी लालसासे ढाल और तलवार धारण किये स्वस्थभावसे खड़े हुए वीर अनिरुद्ध सुशोभित होते थे ॥ १४१ ॥

आपतन्तं ददर्शार्थ खड्गचर्मधरं तदा।
खड्गचर्मधरं तं तु दृष्ट्वा बाणः पदातिनम् ॥१४२॥
प्रहर्षमतुलं लेभे प्रद्युम्निवधकाङ्क्षया।

उस समय बाणासुरने अनिरुद्धको ढाल और तलवार लिये अपने सामने आते देखा। उन्हें केवल ढाल और तलवार धारण किये पैदल आते देख उन्हें मार डालनेकी इच्छासे बाणासुरको अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ ॥ १४२½ ॥

तनुत्रेण विहीनश्च खड्गपाणिश्च यादवः ॥१४३॥
अजेय इति तं मत्वा युद्धायाभिमुखः स्थितः ।

कवचसे रहित तथा केवल खड्ग हाथमें लिये होनेपर भी यादववीर अनिरुद्ध बाणासुरको 'यह अजेय है' ऐसा मानते हुए भी निःशङ्क हो उसके सामने युद्धके लिये खड़े हुए ॥ १४३½ ॥

अनिरुद्धं रणे बाणो जितकाशी महाबलः ॥१४४॥
वाचं चोवाच संक्रुद्धो गृह्यतां हन्यतामिति ।

विजयसे सुशोभित होनेवाला महाबली बाणासुर कुपित हो रणभूमिमें अनिरुद्धसे बोला—'इसे पकड़ो, मारो' ॥

वाचं च ब्रुवतस्तस्य श्रुत्वा प्रद्युम्निराहवे ॥१४५॥
बाणस्य ब्रुवतः क्रोधाद्धसमानोऽभ्युदैक्षत ।

उस समराङ्गणमें इस तरह बोलते हुए बाणासुरकी बात सुनकर हँसते हुए प्रद्युम्नकुमारने क्रोधपूर्वक उसकी ओर देखा॥

उषां भयपरित्रस्तां रुदतीं तत्र भामिनीम् ॥१४६॥
अनिरुद्धः प्रहस्याथ समाश्वास्य च तां स्थितः ।

वहाँ भयसे संत्रस्त हो रोती हुई भामिनी उषाको सान्त्वना देकर अनिरुद्ध हँसते हुए युद्धके लिये खड़े हो गये॥

अथ बाणः शरौघाणां क्षुद्रकाणां समन्ततः ॥१४७॥
विक्षेप समरे क्रुद्धो ह्यनिरुद्धवधेप्सया ।
अनिरुद्धस्तु चिच्छेद काङ्क्षंस्तस्य पराजयम् ॥ १४८॥

तदनन्तर समरभूमिमें कुपित हुए बाणासुरने अनिरुद्धके वधकी इच्छासे उनपर चारों ओरसे क्षुद्रक नामक बाणसमूहोंका प्रहार आरम्भ किया। किंतु अनिरुद्धने उसे पराजित करनेकी इच्छा रखकर उसके सारे बाणोंको तलवारसे ही काट डाला॥

ववर्ष शरजालानि क्षुद्रकाणां समन्ततः ।
बाणोऽनिरुद्धशिरसि काङ्क्षंस्तस्य रणे वधम् ॥१४९॥

तब बाणासुरने पुनः रणभूमिमें अनिरुद्धके वधकी