भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 712
६९०श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

तैरेव च तदा युद्धे ताञ्जघान महाबलः।
पुनः परिघमुत्सृज्य प्रगृह्य रणमूर्धनि ॥१२१॥
उन महाबली वीरने उन्हीं परिघोंद्वारा उस समय युद्धमें उन शत्रुओंका संहार किया। वे युद्धके मुहानेपर बारंबार परिघको छोड़ते और ग्रहण करते थे ॥ १२१ ॥

स तेन विचरन् मार्गानैकः शत्रुनिबर्हणः।
भ्रान्तमुद्भ्रान्तमाविद्धमाप्लुतं विप्लुतं प्लुतम् ॥१२२॥
इति प्रकाराद् द्वात्रिंशद् विचरन्नाभ्यदृश्यत।
शत्रुसूदन अनिरुद्ध उस परिघसे अनेक पैंतरे दिखाते हुए युद्धमें अकेले ही विचरते थे। वे भ्रान्त, उद्भ्रान्त, आविद्ध, आप्लुत, विप्लुत और प्लुत आदि बत्तीस प्रकारके पैंतरोंसे विचरते हुए दिखायी दिये ॥ १२२ १/२॥

एकं सहस्रशश्चात्र ददृशू रणमूर्धनि ॥१२३॥
क्रीडन्तं बहुधा युद्धे व्यादितास्यमिवान्तकम्।
रणभूमिमें युद्धके मुहानेपर मुँह बाये हुए कालके समान अनेक प्रकारसे परिघ चलानेकी क्रीडा करते हुए एक ही अनिरुद्धको शत्रुओंने सहस्रोंकी संख्यामें देखा ॥ १२३ १/२ ॥

ततस्तेनाभिसंतप्ता रुधिरौघपरिप्लुताः ॥१२४॥
पुनर्भग्नाः प्राद्रवन्त यत्र बाणो व्यवस्थितः।
उस समय उनसे संतप्त हो रक्तके प्रवाहमें डूबे हुए दानव फिर अपना व्यूह भग्न करके भाग खड़े हुए और जहाँ बाणासुर खड़ा था, वहाँ जा पहुँचे ॥ १२४ १/२ ॥

गजत्राजिरथौघैस्ते चोद्यमानाः समन्ततः ॥१२५॥
कृत्वा चार्तस्वरं घोरं दिशो जग्मुर्हतौजसः।
हाथी, घोड़े तथा रथसमूह उन्हें चारों ओर लिये जा रहे थे। वे हतोत्साह दानव घोर आर्त्तनाद करके सम्पूर्ण दिशाओंमें भागे जा रहे थे ॥ १२५ १/२ ॥

एकैकस्योपरि तदा तेऽन्योन्यं भयपीडिताः ॥१२६॥
वमन्तः शोणितं जग्मुर्विषादाद् विमुखा रणे।
वे उस समय भयसे पीड़ित हो भागते समय परस्पर एक-एकके ऊपर चढ़ जाते थे तथा अधिक खेदके कारण युद्धसे विमुख हो रक्त वमन करते हुए पलायन कर रहे थे ॥

न बभूव पुरा देवैर्युध्यतां तादृशं भयम् ॥१२७॥
यादृशं युध्यमानानामनिरुद्धेन संयुगे।
पूर्वकालमें देवताओंके साथ युद्ध करते समय भी उन दानवोंको वैसा भय नहीं हुआ था, जैसा समराङ्गणमें अनिरुद्धके साथ युद्ध करते समय हुआ था १२७ १/२ ॥

केचिद् वमन्तो रुधिरं ह्यपतन् वसुधातले ॥१२८॥
दानवा गिरिशृङ्गाभा गदाशूलासिपाणयः।
कितने ही पर्वत-शिखरके समान विशालकाय दानव हाथोंमें गदा, शूल और तलवार लिये रक्त वमन करते हुए पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ १२८ १/२ ॥

ते बाणमुत्सृज्य रणे जग्मुर्भयसमाकुलाः ॥१२९॥
विशालमाकाशतलं दानवा निर्जितास्तदा।
उस समय रणभूमिमें पराजित हुए दानव भयसे व्याकुल हो बाणासुरको वहीं छोड़कर विशाल आकाशमें भाग गये ॥

निःशेषभग्नां महतीं दृष्ट्वा तां वाहिनीं तदा ॥१३०॥
बाणः क्रोधात्प्रजज्वाल समिद्धोऽग्निरिवाध्वरे।
जैसे यज्ञमें समिधा पाकर अग्नि प्रज्वलित हो उठती है, उसी प्रकार उस समय अपनी विशाल सेनाको पूर्णरूपसे भग्न हुई देख बाणासुर क्रोधसे जल उठा ॥ १३० १/२ ॥

अन्तरिक्षचरो भूत्वा साधुवादी समन्ततः ॥१३१॥
नारदो नृत्यति प्रीतो ह्यनिरुद्धस्य संयुगे।
इधर युद्धमें अनिरुद्धके पराक्रमसे प्रसन्न हुए नारदजी आकाशमें सब ओर विचरते और उन्हें साधुवाद देते हुए नृत्य करने लगे ॥ १३१ १/२ ॥

एतस्मिन्नन्तरे चैव बाणः परमकोपनः ॥१३२॥
कुम्भाण्डसंगृहीतं तु रथमास्थाय वीर्यवान्।
ययौ यत्रानिरुद्धो वै उद्यतासी रथे स्थितः ॥१३३॥
इसी बीचमें अत्यन्त क्रोधी और बलवान् बाणासुर कुम्भाण्डद्वारा नियन्त्रित रथपर आरूढ़ हो उसी रथपर


१. तलवार या परिघको गोलाकार घुमाना भ्रान्त कहलाता है, इससे शत्रुके प्रहारको निष्फल किया जाता है।
२. तलवार या परिघ चलानेका दूसरा पैंतरा--जिसमें हाथको ऊँचा करके उसे घुमाया जाता है।
३. तलवार या परिघ चलानेके बत्तीस हाथोंमेंसे एक, जिसमें तलवार या परिघको अपने चारों ओर घुमाकर दूसरेके चलाये हुए वारको व्यर्थ या खाली करते हैं।
४. सब ओर घूम-घूमकर उछलते हुए परिघ या तलवारको चलाना।
५. विशिष्ट रूपसे परिघका सञ्चालन करके शत्रु-सेनामें विप्लव मचा देना।
६. सामान्यतः कूद-कूदकर शत्रुके सम्मुख परिघ या तलवारको चलाना।
७. तलवार या परिघ चलानेके बत्तीस हाथ गिनाये गये हैं, जिनके नाम ये हैं—भ्रान्त, उद्भ्रान्त, आविद्ध, आप्लुत, विप्लुत, प्लुत, सृत, संचान्त, समुदीर्ण, निग्रह, प्रग्रह, पदावकर्षण, संधान, मस्तक आमण, भुजत्राणण, पाश, पाद, विबन्ध, भूमि, उद्भ्रमण, गति, प्रत्यागति, आक्षेप, पातन, उत्थानकप्लुति, लघुता, सौष्ठव, क्षोभा, स्थेय, दृढमुष्टिता, तिर्यक्प्रचार और ऊर्ध्वप्रचार ।