भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 711

विष्णुपर्व ] एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः [ ६८९


उत्तम पराक्रमी वीर अनिरुद्ध अपने परिघकी मारसे दानवोंको भगाकर रणभूमिमें बड़े हर्षके साथ सिंहनाद करने लगे ॥ १०५ ॥

घर्मान्ते तोयदो व्योम्नि नदन्निव महास्वनः ।
तिष्ठध्वमिति चुक्रोश दानवान् युद्धदुर्मदान् ॥ १०६॥
प्राद्युम्निर्व्यहनञ्चापि सर्व्वाञ्छत्रुनिवर्हणः ।

जैसे वर्षाकालमें आकाशके भीतर छाये हुए मेघ बड़े जोर-जोरसे गर्जना करते हैं, उसी प्रकार शत्रुसूदन प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्धने गर्जना करके उन रणदुर्मद दानवोंसे चिल्लाकर कहा—'अरे ! खड़े रहो।' साथ ही उन्होंने सबका संहार आरम्भ कर दिया ॥ १०६½ ॥

तेन ते समरे सर्वे हन्यमाना महात्मना ॥ १०७॥
यतो बाणस्ततो भीता ययुर्युद्धपराङ्मुखाः ।

उन महामनस्वी वीरके द्वारा समराङ्गणमें मारे जाते हुए वे समस्त सैनिक युद्धसे विमुख हो गये और भयभीत होकर उस स्थानपर गये, जहाँ बाणासुर विद्यमान था ॥ १०७½ ॥

ततो बाणसमीपस्थाः श्वसन्तो रुधिरोक्षिताः ॥ १०८॥
न शर्म लेभिरे दैत्या भयविप्लवचेतसः ।

बाणासुरके समीप खड़े होकर वे सभी दानव लंबी साँस खींचने लगे; उन सबके शरीर रक्तसे रँग गये थे; भयके कारण उनका चित्त व्याकुल हो गया था, अतः उन दैत्योंको चैन नहीं मिलता था ॥ १०८½ ॥

मा भैष्ट मा भैष्ट इति राज्ञा ते तेन चोदिताः ॥ १०९॥
त्रासमुत्सृज्य चैकस्था युध्यध्वं दानवर्षभाः ।

तब राजा बाणासुरने उन्हें आदेश देते हुए कहा—'दानवशिरोमणियो ! डरो मत ! डरो मत !! त्रास छोड़ एक साथ खड़े होकर युद्ध करो' ॥ १०९½ ॥

तानुवाच पुनर्बाणो भयविह्वललोचनान् ॥ ११०॥
किमिदं लोकविख्यातं यश उत्सृज्य दूरतः ।
भवन्तो यान्ति वैक्लव्यं क्लीबा इव विचेतसः ॥ १११॥

उसके इतना कहनेपर भी उनकी आँखें भयसे व्याकुल ही बनी रहीं यह देख बाणासुरने पुनः उनसे कहा—'यह क्या बात है कि तुमलोग अपने विश्वविख्यात यशको दूरसे ही त्यागकर कायरोंके समान व्याकुल और अचेत हो रहे हो ? ॥

कोऽयं यस्य भयत्रस्ता भवन्तो यान्त्यनेकंशः ।
कुलापदेशिनः सर्वे नानायुद्धविशारदाः ॥ ११२॥

'यह कौन है, जिसके भयसे डरकर, तुमलोग झुंड-के-झुंड भागे जा रहे हो। तुम सब लोगोंका कुल विख्यात है तथा तुम नाना प्रकारके युद्धोंकी कलामें निपुण हो (तो भी तुममें यह कायरता कैसे आयी ?) ॥ ११२ ॥

भवद्भिर्न हि मे कार्यं युद्धसाहाय्यमद्य वै।
अब्रवीद् ध्वंसतेत्येवं मत्समीपाच्च नश्यत ॥ ११३॥

'अच्छा, भाग जाओ ! अब तुमलोगोंसे मुझे युद्धविषयक सहायता नहीं लेनी है, मेरे पाससे दूर हो जाओ' ॥ ११३ ॥

अथ तान् वाग्भिरुग्राभित्रासयन् बहुधा बली।
व्यादिदेश रणे शूरानन्यानयुतशः पुनः ॥ ११४॥

इस प्रकार बलवान् बाणासुरने अपने कठोर वचनोंद्वारा उनको बारंबार त्रास देते हुए दूसरे रणवीर योद्धाओंको, जिनकी संख्या दस हजारके लगभग थी, पुनः युद्धके लिये आज्ञा दी ॥ ११४ ॥

प्रमाथगणभूयिष्ठं व्यादिष्टं तस्य निग्रहे ।
अनीकं सुमहद्रौद्रं नानाप्रहरणोद्यतम् ॥ ११५॥

तत्पश्चात् उसने अनिरुद्धको बंदी बनानेके लिये एक महाभयंकर सेनाको आदेश दिया, जिसमें अधिकांश प्रमथगण थे। वह सेना नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित थी ॥

अथान्तरिक्षं बहुधा विद्युत्वद्भिरिवाम्बुदैः ।
बाणानीकैः समभवद् व्याप्तं संदीप्तलोचनैः ॥ ११६॥

फिर तो बिजलीवाले मेघोंकी भाँति चमकीले नेत्रोंवाले बाणासुरके सैनिकोंसे आकाशका बहुत बड़ा भाग व्याप्त हो गया ॥ ११६ ॥

केचित् क्षितिस्थाः प्राक्रोशन् गजा इव समन्ततः ।
अन्तरिक्षे व्यराजन्त घर्मान्त इव तोयदाः ॥ ११७॥

कुछ सैनिक पृथिवीपर ही खड़े हो सब ओर हाथियोंकी भाँति चिग्घाड़ रहे थे तथा कुछ लोग वर्षाकालके बादलोंकी भाँति आकाशमें ही शोभा पाते थे ॥ ११७ ॥

ततस्तत् सुमहत् सैन्यं समेतमभवत् पुनः ।
तिष्ठ तिष्ठेति च तदा वाचोऽश्रूयन्त सर्वशः ॥ ११८॥

तदनन्तर वह विशाल सेना फिर एकत्र हो गयी। उस समय उसमें सब ओर 'ठहरो, खड़े रहो' ये ही बातें सुनायी देती थीं ॥ ११८ ॥

अनिरुद्धो रणे वीरः स च तानभ्यवर्तत ।
तदाश्चर्यं समभवद् यदेकस्तु समागतः ॥ ११९॥

वीर अनिरुद्ध अकेले ही उन सबका सामना कर रहे थे। एकने ही जो उस विशाल सेनाका सामना किया, यह उस समय एक महान् आश्चर्यकी बात हुई ॥ ११९ ॥

अयुध्यत महावीर्यैर्दानवैः सह संयुगे ।
तेषामेव च जग्राह परिघांस्तोमरानपि ॥ १२०॥

वे रणभूमिमें उन महापराक्रमी दानवोंके साथ युद्ध करने लगे। उन्होंने शत्रुओंके ही परिघों तथा तोमरोंको ले लिया ॥ १२० ॥