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विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

विष्णुपर्व ] विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ६९७


एवमेतासु नारीषु सर्वभूताश्रया ह्यसि । नमस्कृतासि त्रैलोक्ये किन्नरोद्गीतसेविते ॥ २४ ॥

पचास देवकन्याओंमें, जो देवताओंकी पत्नियां हैं उनमें, कद्रूके जो हजारों पुत्र हैं—उनके पुत्रों और पौत्रोंकी जो सुन्दरी स्त्रियां हैं—उनमें, माता और पितामें, स्वर्गके देवताओं और अप्सराओंसहित ऋषिपत्नियोंमें, यक्षों और गन्धर्वोंकी स्त्रियोंमें, विद्याधरोंकी नारियोंमें और सती-साध्वी मानवी स्त्रियोंमें, इस प्रकार इन उपर्युक्त महिलाओंमें आप जगन्माता देवीका निवास है; क्योंकि आप सम्पूर्ण भूतोंका आश्रय हैं। तीनों लोकोंमें सर्वत्र आपके चरणोंमें मस्तक झुकाया जाता है। किन्नरलोग उच्च स्वरसे गीत गाकर आपकी सेवा करते हैं ॥ २१-२४ ॥

अचिन्त्या ह्यप्रमेयासि यासि सासि नमोऽस्तु ते । एभिर्नामभिरन्यैश्च कीर्तिता ह्यसि गौतमि ॥ २५ ॥

आप अचिन्त्य और अप्रमेय हैं, जो हैं सो हैं, आपको नमस्कार है। गौतमनन्दिनी ! इन पूर्वोक्त नामोंसे और दूसरे नामोंसे भी आपका ही कीर्तन होता है ॥ २५ ॥

त्वत्प्रसादादविघ्नेन क्षिप्रं मुच्येय बन्धनात् । अवेक्षस्व विशालाक्षि पादौ ते शरणं व्रजे ॥ २६ ॥ सर्वेषामेव बन्धानां मोक्षणं कर्तुमर्हसि ।

विशाललोचने ! मैं आपकी कृपासे बिना किसी विघ्न-बाधाके शीघ्र बन्धनमुक्त हो जाऊँ। आप मेरे ऊपर कृपादृष्टि करें; मैं आपके चरणोंकी शरण लेता हूँ। आप मुझे सभी बन्धनोंसे छुड़ाने योग्य हैं ॥ २६ १/२ ॥

ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च चन्द्रसूर्याग्निमारुताः ॥ २७ ॥ अश्विनौ वसवश्चैव विश्वेसाध्यास्तथैव च । मरुता सह पर्जन्यो धाता भूमिर्दिशो दश ॥ २८ ॥ गावो नक्षत्रवंशाश्च ग्रहा नद्यो ह्रदास्तथा । सरितः सागराश्चैव नानाविद्याधरोरगाः ॥ २९ ॥ तथा नागाः सुपर्णाणो गन्धर्वाप्सरसां गणाः । कृत्स्नं जगदिदं प्रोक्तं देव्या नामानुकीर्तनात् ॥ ३० ॥

ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, चन्द्रमा, सूर्य, अग्नि, वायु, अश्विनीकुमार, वसु, विश्वेदेव, साध्यगण, मरुद्गण, पर्जन्य, धाता, भूमि, दसों दिशाएँ, गौ, नक्षत्रसमूह, ग्रहगण, नदियाँ, सरोवर, सरिताएँ, समुद्र, नाना विद्याधर, सर्प, नाग, गरुड़, गन्धर्व और अप्सराओंके समूह—इस प्रकार देवीके नामोंका वारंवार कीर्तन करनेसे इस सम्पूर्ण जगत्‌का कीर्तन हो जाता है ॥ २७-३० ॥


देव्याः स्तवमिमं पुण्यं यः पठेत् सुसमाहितः । सा तस्मै सप्तमे मासि वरमग्र्यं प्रयच्छति ॥ ३१ ॥

जो एकाग्रचित्त होकर देवीके इस पवित्र स्तोत्रका पाठ करता है, देवी उसे सातवें महीनेमें उत्तम वर प्रदान करती हैं।

अष्टादशभुजा देवी दिव्याभरणभूषिता । हारशोभितसर्वाङ्गी मुकुटोज्ज्वलभूषणा ॥ ३२ ॥

देवीकी अठारह भुजाएँ हैं। वे दिव्य आभरणोंसे विभूषित हैं। हारसे उनके सारे अङ्ग सुशोभित हैं। मुकुटकी आभासे उनके आभूषण चमक उठे हैं ॥ ३२ ॥

कात्यायनि स्तूयसे त्वं वरमग्र्यं प्रयच्छसि । अतः स्तवीमि त्वां देवीं वरदे वामलोचने ॥ ३३ ॥

कात्यायनि ! जब आपकी स्तुति की जाती है, तब आप उत्तम वर प्रदान करती हैं। अतः वरदायिनि वामलोचने ! मैं आप देवीकी स्तुति करता हूँ ॥ ३३ ॥

नमोऽस्तु ते महादेवि सुप्रीता मे सदा भव । प्रयच्छ त्वं वरं ह्यायुः पुष्टिं चैव क्षमां धृतिम् ॥ ३४ ॥ बन्धनस्थो विमुच्येयं सत्यमेतद् भवेदिति ।

महादेवि ! आपको नमस्कार है। आप सदा मुझपर सुप्रसन्न रहें और मुझे श्रेष्ठ आयु, पुष्टि, क्षमा और धैर्य प्रदान करें। मैं बन्धनमें पड़ा हुआ हूँ, किंतु इससे मुक्त हो जाऊँ—मेरा यह संकल्प सत्य हो ॥ ३४ १/२ ॥

वैशम्पायन उवाच एवं स्तुता महादेवी दुर्गा दुर्गपराक्रमा ॥ ३५ ॥ सांनिध्यं कल्पयामास अनिरुद्धस्य बन्धने ।

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! इस प्रकार स्तुति की जानेपर दुर्गम पराक्रम प्रकट करनेवाली महादेवी दुर्गाने बन्धनागारमें अनिरुद्धके पास आकर उन्हें दर्शन दिया ॥ ३५ १/२ ॥

अनिरुद्धहितार्थाय देवी शरणवत्सला ॥ ३६ ॥ बद्धं बाणपुरे वीरमनिरुद्धं व्यमोक्षयत् । सान्त्वयामास तं वीरमनिरुद्धममर्षणम् ॥ ३७ ॥

उस शरणागतवत्सला देवीने बाणनगरमें बँधे हुए वीर अनिरुद्धको उनका हित-साधन करनेके लिये बन्धनसे मुक्त कर दिया। साथ ही उन अमर्षशील वीर अनिरुद्धको सान्त्वना प्रदान की ॥ ३६-३७ ॥

पूजयामास तां वीरः सोऽनिरुद्धः प्रतापवान् । प्रसादं दर्शयामास अनिरुद्धस्य बन्धने ॥ ३८ ॥

उस समय प्रतापी वीर अनिरुद्धने देवीका पूजन किया। देवीने बन्धनागारमें अनिरुद्धको अपनी कृपाका प्रत्यक्ष दर्शन कराया ॥ ३८ ॥


१. पचास देवकन्याएँ यहाँ दक्ष प्रजापतिकी पुत्रियाँ हैं। इनमेंसे २७ सोमको, १३ कश्यपको और १० धर्मको ब्याही गयी थीं। इस प्रकार इनकी संख्या पचास है।

६९८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंश


नागपाशेन बद्धस्य तस्योपाहृतचेतसः।
स्फोटयित्वा कराग्रेण पञ्जरं वज्रसंनिभम् ॥ ३९ ॥
बद्धं बाणपुरे वीरं सानिरुद्धमभाषत ।
सान्त्वयन्ती वचो देवी प्रसादाभिमुखी तदा ॥ ४० ॥

जो नागपाशमें बँधे हुए थे और उषाने जिनके चित्तको चुरा लिया था, उन अनिरुद्धके वज्रतुल्य पिंजरेको अपने हाथके अग्रभागसे तोड़-फोड़कर देवीने बाणपुरमें अवरुद्ध हुए वीर अनिरुद्धको मुक्त कर दिया और कृपा करनेके लिये उद्यत हो उन्हें सान्त्वना देते हुए इस प्रकार कहा ॥ ३९-४० ॥

श्रीदेव्युवाच

चक्रायुधो मोक्षयितानिरुद्ध
त्वां बन्धनादाशु सहस्व कालम्।
छित्त्वा स बाणस्य सहस्रबाहुं
पुरीं निजां नेष्यति दैत्यसूदनः ॥ ४१ ॥

श्रीदेवीने कहा—अनिरुद्ध ! चक्रधारी भगवान् श्रीकृष्ण शीघ्र आकर तुम्हें पूर्णतः इस बन्धनसे छुड़ायेंगे, तबतक कुछ कालतक इस कष्टको सहन करो। वे दैत्य-सूदन श्रीहरि बाणासुरकी सहस्र भुजाओंका छेदन करके तुम्हें अपनी पुरीको ले जायेंगे ॥ ४१ ॥

ततोऽनिरुद्धः पुनरेव देवीं
तुष्टाव हृष्टः शशिकान्तवक्त्रः ।

तदनन्तर चन्द्रमाके समान कमनीय मुखवाले अनिरुद्धने प्रसन्न होकर पुनः देवीका स्तवन किया ॥ ४१ ½ ॥

अनिरुद्ध उवाच

नमोऽस्तु ते देवि वरप्रदे शिवे
नमोऽस्तु ते देवि सुरारिनाशिनी ॥ ४२ ॥

अनिरुद्ध बोले—कल्याणस्वरूपे ! वरदायिनि देवि ! आपको नमस्कार है। देवशत्रुओंका नाश करनेवाली देवि ! आपको प्रणाम है ॥ ४२ ॥

नमोऽस्तु ते कामचरे सदाशिवे
नमोऽस्तु ते सर्वहितैषिणि प्रिये ।
नमोऽस्तु ते भीतिकरि द्विषां सदा
नमोऽस्तु ते बन्धनमोक्षकारिणि ॥ ४३ ॥

इच्छानुसार विचरनेवाली सदाशिवे ! आपको नमस्कार है। सबका हित चाहनेवाली सर्वप्रिये ! आपको नमस्कार है। शत्रुओंको सदा भय देनेवाली देवि ! आपको प्रणाम है तथा बन्धनसे छुड़ानेवाली देवि ! आपको नमस्कार है ॥ ४३ ॥

ब्रह्माणीन्द्राणि रुद्राणि भूतभव्यभवे शिवे ।
त्राहि मां सर्वभीतिभ्यो नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ ४४ ॥

ब्रह्माणि ! इन्द्राणि ! रुद्राणि ! भूत, वर्तमान और भविष्य-स्वरूपे शिवे ! सब प्रकारके भयोंसे मेरी रक्षा करें। नारायणि ! आपको नमस्कार है ॥ ४४ ॥

नमोऽस्तु ते जगद्धात्रे प्रिये दान्ते महाव्रते ।
भक्तिप्रिये जगन्मातः शैलपुत्रि वसुन्धरे ॥ ४५ ॥
त्राहि मां त्वं विशालाक्षि नारायणि नमोऽस्तु ते ।
त्रायस्व सर्वदुःखेभ्यो दानवानां भयङ्करि ॥ ४६ ॥

जगत्की रक्षा करनेवाली प्रिय देवि ! आपको नमस्कार है। मन और इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाली महाव्रतधारिणी भक्तिप्रिये ! जगन्मातः ! गिरिराजनन्दिनि ! वसुन्धरे ! विशाल नेत्रोंवाली नारायणि ! आप मेरी रक्षा कीजिये ! आपको नमस्कार है। दानवोंको भय देनेवाली देवि ! सब प्रकारके दुःखोंसे मेरा परित्राण कीजिये ॥ ४५-४६ ॥

रुद्रप्रिये महाभागे भक्तानामार्तिनाशिनि ।
नमामि शिरसा देवीं बन्धनस्थो विमोक्षितः ॥ ४७ ॥

रुद्रप्रिये ! भक्तोंकी पीड़ा दूर करनेवाली महाभागे ! मैं चरणोंमें मस्तक झुकाकर आप देवीको नमस्कार करता हूँ। आपने मुझे बन्धनमें रहते हुए भी मुक्त कर दिया ॥ ४७ ॥

वैशम्पायन उवाच

आर्यास्तवमिदं पुण्यं यः पठेत् सुसमाहितः ।
सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति ।
बन्धनस्थो विमुच्येत सत्यं व्यासवचो यथा ॥ ४८ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! जो एकाग्रचित्त होकर इस पवित्र आर्यास्तोत्रका पाठ करता है, वह सब पापोंसे मुक्त होकर विष्णुलोकमें जाता है और यदि बन्धनमें पड़ा हो तो उससे मुक्त हो जाता है। जैसा कि व्यासजीका सत्य वचन है ॥ ४८ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि अनिरुद्धकृत आर्यास्तवो
नाम विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२० ॥

इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें आर्यास्तवविषयक एक सौ बीसवाँ
अध्याय पूरा हुआ ॥ १२० ॥

विष्णुपर्व ]एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः६९९

एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

अनिरुद्धके अपहरणसे रनवासमें शोक, श्रीकृष्ण और यादवोंकी चिन्ता, गुप्तचरोंकी नियुक्ति और उनकी विफलता, नारदजीका आगमन और अनिरुद्धका समाचार-निवेदन, श्रीकृष्णके द्वारा गरुड़ का आवाहन और स्तवन, गरुड़द्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति और श्रीकृष्णका शोणितपुरको प्रस्थान

वैशम्पायन उवाच
ततोऽनिरुद्धस्य गृहे रुरुदुः सर्वयोषितः ।
प्रियं नाथमपश्यन्त्यः कुरर्य इव संघशः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! तदनन्तर अनिरुद्धके महलमें रहनेवाली समस्त सुन्दरियाँ अपने प्रिय स्वामीको न देखकर झुंड-की-झुंड एकत्र हो कुररियोंकी भाँति विलाप करने लगीं— ॥ १ ॥

अहो धिकिमिदं नाथनाथे कृष्णे व्यवस्थिते ।
अनाथा इव संत्रस्ता रुदिमो भयपीडिताः ॥ २ ॥

'अहो ! धिक्कार है, यह क्या हुआ ? नाथोंके भी नाथ श्रीकृष्णके रहते हुए हमलोग अनाथकी भाँति संत्रस्त और भयसे पीड़ित हो रोदन करती हैं ॥ २ ॥

यस्येन्द्रप्रमुखा देवाः सादित्याः समरुद्गणाः ।
बाहुच्छायामुपाश्रित्य वसन्ति दिवि निर्वृताः ॥ ३ ॥
तस्योत्पन्नमिदं लोके भयदस्य महाभयम् ।
तस्यानिरुद्धः पौत्रस्तु वीरः केनापि नो हृतः ॥ ४ ॥

'जिनकी भुजाओंकी छायाका आश्रय ले आदित्यों और मरुद्गणोंसहित इन्द्र आदि सभी देवता स्वर्गमें सुखपूर्वक निवास करते हैं। लोकमैं भय देनेवाले ( या दूसरोंके भयका निवारण करनेवाले ) उन्हीं भगवान् श्रीकृष्णके समक्ष आज यह महान् भय उत्पन्न हो गया। उनके वीर पौत्र हमारे स्वामी अनिरुद्धको आज किसीने हर लिया ॥ ३-४ ॥

अहो नास्ति भयं नूनं तस्य लोके सुदुर्मतेः ।
वासुदेवस्य यः क्रोधमुत्पादयति दुःसहम् ॥ ५ ॥

'अहो ! उस दुर्बुद्धिको निश्चय ही संसारमें कोई भय नहीं है, जो भगवान् वासुदेवके हृदयमें दुःसह क्रोध उत्पन्न कर रहा है ॥ ५ ॥

व्यादितास्यस्य यो मृत्योर्दंष्ट्राग्रे परिवर्तते ।
स वासुदेवं समरे मोहादभ्युदियाद् रिपुः ॥ ६ ॥

'जो मुँह बाकर खड़ी हुई मौतकी दाढ़ोंके सामने चक्कर लगाता है, वही मोहवश समराङ्गणमें शत्रुभावसे भगवान् वासुदेवके सामने जा सकता है ॥ ६ ॥

इदमेवंविधं कृत्वा विप्रियं यदुपूङ्गवे ।
कथं जीवन् विमुच्येत साक्षादपि शचीपतिः ॥ ७ ॥

'यदुकुलतिलक श्रीकृष्णके प्रति यह ऐसा अप्रिय बर्ताव करके साक्षात् शचीपति इन्द्र भी कैसे जीवित छूट सकता है ? ॥

हृतनाथाः स्म शोच्याः स्म वयं नाथं विना कृताः ।
विप्रयोगेण नाथस्य कृतान्तवशगाः कृताः ॥ ८ ॥

'हाय ! हमारे नाथका अपहरण हो जानेसे हम सब-की-सब अनाथ एवं शोचनीय हो गयीं। अपने स्वामीके वियोगसे हम कालके अधीन कर दी गयीं' ॥ ८ ॥

इत्येवं ता वदन्त्यश्च रुदन्त्यश्च पुनः पुनः ।
नेत्रजं वारि मुमुचुरशिवं परमाङ्गनाः ॥ ९ ॥

वे सुन्दरी अङ्गनाएँ इस प्रकार बारंबार विलाप करती और रोती हुई अपने नेत्रोंसे अमङ्गलसूचक आँसू बहाने लगीं ॥

तासां बाष्पाम्बुपूर्णानि नयनानि चकाशिरे ।
सलिलेनाप्लुतानीव पङ्कजानि जलागमे ॥ १० ॥

उनके अश्रुजलसे भरे हुए नेत्र वर्षाकालमें जलसे भीगे हुए कमलोंके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ १० ॥

तासामरालपक्ष्मणि राजयन्ति शुभानि च ।
रुधिरेणाप्लुतानीव नयनानि चकाशिरे ॥ ११ ॥

उनके कुटिल बरौनियोंसे युक्त सुन्दर एवं लाल नेत्र खूनमें डूबे हुए-से प्रतीत होते थे ॥ ११ ॥

तासाहर्म्यतलस्थानां पूर्ण आसीन्महास्वनः ।
कुररीणामिवाकाशे रुदतीनां सहस्रशः ॥ १२ ॥

अट्टालिकाओंमें बैठकर रोती हुई उन सुन्दरियोंका सब ओर फैला हुआ वह आर्तनाद आकाशमें सहस्रों कुररियोंके करुण-क्रन्दनके समान जान पड़ता था ॥ १२ ॥

ते श्रुत्वा निनदं घोरमपूर्वं भयमागतम् ।
उत्पेतुः सहसा स्वेभ्यो गृहेभ्यः पुरुषर्षभाः ॥ १३ ॥

उस भयंकर आर्तनादको सुनकर किसी अपूर्व भयके आगमनका अनुमान करके वे पुरुषप्रवर यादव अपने-अपने घरोंसे सहसा उछल पड़े ॥ १३ ॥

कस्मादेषोऽनिरुद्धस्य श्रूयते सुमहान्स्वनः ।
गृहे कृष्णाभिगुप्तानां कुतो नो भयमागतम् ॥ १४ ॥

वे सोचने लगे 'अनिरुद्धके महलमें यह महान् कोलाहल क्यों सुनायी देता है ? श्रीकृष्णके संरक्षणमें रहने-वाले हमलोगोंके घरमें यह भय कहाँसे आ गया ?' ॥ १४ ॥

७०० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

इत्येवमूचुस्तेऽन्योन्यं स्नेहविक्लवगद्गदाः ।
अधर्षिता यथा सिंहा गुहाभ्य इव निःसृताः ॥ १५ ॥
इस प्रकार वे एक-दूसरेसे कहने लगे। उस समय उनकी वाणी स्नेहजनित विकलताके कारण गद्गद हो रही थी। जिन्हें कभी किसीका तिरस्कार नहीं सहना पड़ा हो ऐसे सिंह जैसे गुफासे निकले हों, उसी प्रकार वे यादव भी अपने घरोंसे निकल पड़े ॥ १५ ॥

सन्नाहभेरी कृष्णस्य आहता महती तदा ।
यस्याः शब्देन ते सर्वे समागम्य च धिष्ठिताः ॥ १६ ॥
भगवान् श्रीकृष्णके यहाँ युद्धकी तैयारीके लिये सूचना देनेवाला विशाल डंका तत्काल बज उठा, जिसके शब्दसे समस्त यादव वहाँ एकत्र होकर खड़े हो गये ॥ १६ ॥

किमेतदिति तेऽन्योन्यं समपृच्छन्त यादवाः ।
अन्योन्यस्य हि ते सर्वे यथावृत्तमवेदयन् ॥ १७ ॥
वे यदुवंशी परस्पर पूछने लगे कि 'क्या बात है?' फिर जो जानकार थे, उन सबने एक दूसरेको यथार्थ बात बता दी ॥ १७ ॥

ततस्ते बाष्पपूर्णाक्षाः क्रोधसंरक्तलोचनाः ।
निःश्वसन्तो व्यतिष्ठन्त यादवा युद्धदुर्मदाः ॥ १८ ॥
तब वे रणदुर्मद यादव नेत्रोंमें आँसू भरकर क्रोधसे लाल आँखें किये लंबी साँस खींचते हुए खड़े हो गये ॥ १८ ॥

तूष्णींभूतेषु सर्वेषु विपृथुर्वाक्यमब्रवीत् ।
कृष्णं प्रहरतां श्रेष्ठं निःश्वसन्तं मुहुर्मुहुः ॥ १९ ॥
समस्त यादव वहाँ आकर चुपचाप खड़े हो गये। तब विपृथुने बारंबार दीर्घ निःश्वास लेते हुए योद्धाओंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा—॥ १९ ॥

किमिदं चिन्तयाविष्टः पुरुषेन्द्र भवानिह ।
तव बाहुबलप्राणाः स्वास्थिताः सर्वयादवाः ॥ २० ॥
'पुरुषोत्तम ! आप यहाँ इस प्रकार चिन्तामग्न क्यों हैं ? समस्त यादव आपके ही बाहुबलके भरोसे जीवन धारण करके यहाँ सुखपूर्वक रहते हैं ॥ २० ॥

भवन्तमाश्रिताः कृष्ण संविभक्ताश्च सर्वशः ।
तथैव बलवाञ्शक्रस्त्वय्यावेद्य जयाजयौ ॥ २१ ॥
सुखं स्वपिति निःशङ्कः कथं त्वं चिन्तयान्वितः ।
शोकसागरमक्षोभ्यं सर्वे ते ज्ञातयो गताः ॥ २२ ॥
'श्रीकृष्ण ! ये सब आपकी शरणमें हैं और आपने सबको पृथक्-पृथक् सुख-सुविधा प्रदान की है। इसी प्रकार बलवान् इन्द्र भी आपपर ही जय-पराजयका भार रखकर बिना किसी डर-भयके सुखपूर्वक सोते हैं। फिर आप कैसे चिन्तामें डूबे हुए हैं। आपके ये समस्त बन्धु-बान्धव आपकी यह दशा देखकर शोकके अक्षोभ्य समुद्रमें मग्न हो गये हैं ॥ २१-२२ ॥

तान् मज्जमानानकस्त्वं समुद्धर महाभुज ।
किमेदं चिन्तयाविष्टो न किंचिदपि भाषसे ॥ २३ ॥
चिन्तां कर्तुं वृथा देव न त्वमर्हसि माधव ।
'महाबाहो ! आप अकेले ही इन डूबते हुए कुटुम्बी-जनोंका उद्धार कीजिये। इस तरह चिन्तामग्न होकर आप क्यों कुछ भी नहीं बोल रहे हैं ? देव ! माधव ! आपको व्यर्थ चिन्ता नहीं करनी चाहिये' ॥ २३ १/२ ॥

इत्येवमुक्तः कृष्णस्तु निःश्वस्य सुचिरं बहु ॥ २४ ॥
प्राह वाक्यं स वाक्यज्ञो वृहस्पतिरिव स्वयम् ।
विपृथुके ऐसा कहनेपर बातचीतके मर्मको समझनेवाले श्रीकृष्णने बहुत देरतक लंबी साँस खींचकर साक्षात् वृहस्पतिके समान यह बात कही ॥ २४ १/२ ॥

श्रीकृष्ण उवाच
विपृथो चिन्तयाविष्टो ह्येतत्कार्यमचिन्तयम् ॥ २५ ॥
विचिन्तयंस्त्वहं चास्य कार्यस्यानं लभे गतिम् ।
श्रीकृष्ण बोले--विपृथु ! मैं चिन्तामग्न होकर इसी कार्यके विषयमें विचार कर रहा था; किंतु बहुत सोचनेपर भी मैं इस कार्यका कोई निश्चित आधार न पा सका ॥ २५ १/२ ॥

तथाहं भवताप्युक्तो नोत्तरं विदधे क्वचित् ॥ २६ ॥
इसीलिये तुम्हारे पूछनेपर भी मैंने कोई उत्तर नहीं दिया ॥ २६ ॥

दाशार्हगणमध्येऽहं वदाम्यर्थवतीं गिरम् ।
शृणुध्वं यादवाः सर्वे यया चिन्तान्वितो ह्यहम् ॥ २७ ॥
आज समस्त दाशार्हगणोंके बीच मैं यह अभिप्रायपूर्ण बात कह रहा हूँ। यादवो ! तुम सब लोग सुन लो कि मैं क्यों चिन्तित हो उठा हूँ ॥ २७ ॥

अनिरुद्धे हृते वीरे पृथिव्यां सर्वपार्थिवाः ।
अशक्ता इति मंस्यन्ते सर्वानस्मान् सबान्धवान् ॥ २८ ॥
वीर अनिरुद्धका इस तरह अपहरण हो जानेपर भूमण्डलके समस्त भूपाल बन्धु बान्धवोंसहित हम सब लोगोंको शक्तिहीन समझेंगे ॥ २८ ॥

आहुकश्चैव नो राजा हृतः शाल्वेन वै पुरा ।
प्रत्यानीतः स चास्माभिर्युद्धं कृत्वा सुदारुणम् ॥ २९ ॥
पूर्वकालमें शाल्वने हमारे राजा उग्रसेनको हर लिया था; तब हमने अत्यन्त दारुण युद्ध करके उन्हें वापस लौटाया था ॥ २९ ॥

प्रद्युम्नश्चापि मो बालः शम्बरेण हतो ह्यभूत् ।
स तं निहत्य समरे प्राप्तो रुक्मिणिनन्दनः ॥ ३० ॥
हमारे प्रद्युम्नको भी बाल्यावस्थामें शम्बरासुरने चुरा

विष्णुपर्व ] एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः [ ७०१

लिया था, परंतु रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न समराङ्गणमें उस असुरका वध करके स्वयं चले आये ॥ ३० ॥

इदं तु सुमहत् कष्टं प्रद्युम्निः क्व प्रवासितः ।
एवंविधमहं दोषं न स्मरे मनुजर्षभाः ॥ ३१ ॥

किंतु यह तो सबसे बढ़कर महान् कष्टकी बात है कि प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्ध कहीं परदेशमें पहुँचा दिये गये और हमें पतातक नहीं चला। नरश्रेष्ठ यादवो ! ऐसा दोष कभी प्राप्त हुआ हो, इसका मुझे स्मरण नहीं है ॥ ३१ ॥

भस्मना गुण्ठितः पादो येन मे मूर्ध्नि पातितः ।
तस्याहं सानुबन्धस्य हरिष्ये जीवितं रणे ॥ ३२ ॥

जिसने मेरे मस्तकपर अपना राखसे लिपटा हुआ पैर रखा है, सगे-सम्बन्धियोंसहित उस दुरात्माके प्राणोंको मैं रणभूमिमें अवश्य हर लूँगा ॥ ३२ ॥

इत्येवमुक्ते कृष्णेन सात्यकिर्वाक्यमब्रवीत् ।
चाराः कृष्ण प्रणीयन्तामनिरुद्धस्य मार्गणे ।
सपर्वतवनोद्देशां मार्गन्तु वसुधामिमाम् ॥ ३३ ॥

श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर सात्यकि बोले—'श्रीकृष्ण ! अनिरुद्धकी खोजके लिये गुप्तचर भेजे जायें तथा वे पर्वत और वनस्थलीसहित इस सारी पृथ्वीमें उनका अनुसंधान करें' ॥

आहुकं प्राह कृष्णस्तु स्मितं कृत्वा वचस्तदा ।
आभ्यन्तराश्च बाह्याश्च व्यादिश्यन्तां चरा नृप ॥ ३४ ॥

तब श्रीकृष्णने मुसकराकर राजा उग्रसेनसे कहा—'नरेश्वर ! आप बाह्य और आभ्यन्तर (प्रकट और गुप्त) चरोंको इस कार्यके लिये नियुक्त कीजिये' ॥ ३४ ॥

वैशम्पायन उवाच

केशवस्य वचः श्रुत्वा आहुकस्त्वरितोऽभवत् ।
अन्वेषणेऽनिरुद्धस्य स चारान् दिष्टवांस्तदा ॥ ३५ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! भगवान् श्रीकृष्णका यह वचन सुनकर राजा उग्रसेन बड़ी उतावलीके साथ उठे । उन्होंने अनिरुद्धकी खोजके लिये तत्काल प्रकट एवं गुप्त चर नियुक्त कर दिये ॥ ३५ ॥

ततश्चारास्तु व्यादिष्टाः पार्थिवेन यशस्विना ।
हया रथाश्च व्यादिष्टाः पार्थिवेन महात्मना ।
अभ्यन्तरं च मार्गध्वं बाह्यतश्च समन्ततः ॥ ३६ ॥

यशस्वी भूपाल महामना उग्रसेनने चरोंको नियुक्त करके उनके लिये घोड़े और रथ भी दे दिये और यह आज्ञा दी—'तुमलोग भीतर-बाहर सब ओर अनिरुद्धको ढूँढो ॥ ३६ ॥

वेणुमन्तं लताविष्टं तथा रैवतकं गिरिम् ।
ऋक्षवन्तं गिरिं चैव मार्गध्वं त्वरिता हयैः ॥ ३७ ॥
'घोड़ोंपर सवार हो शीघ्रतापूर्वक जाकर वेणुमान्, लताविष्ट, रैवतक तथा ऋक्षवान् पर्वतपर उनकी खोज करो ॥

एकैकं तत्र चोद्यानं मार्गध्वं काननानि च ।
यातव्यं चापि निःशङ्कमुद्यानानि समन्ततः ॥ ३८ ॥
हयानां च सहस्राणि रथानां चाप्यनेकशः ।
आरुह्य त्वरिताः सर्वे मार्गध्वं यदुनन्दनम् ॥ ३९ ॥

'वहाँका एक-एक उद्यान और जंगल-झाड़ी छान डालो, उद्यानोंमें सब ओर बेखटके चले जाना, हजारों घोड़ों और बहुसंख्यक रथोंपर आरूढ़ हो तुम सब लोग बड़ी उतावलीके साथ यदुनन्दन अनिरुद्धका पता लगाओ' ॥ ३८-३९ ॥

सेनापतिरनाधृष्टिरिदं वचनमब्रवीत् ।
कृष्णमक्लिष्टकर्माणमच्युतं भीतभीतवत् ॥ ४० ॥

तदनन्तर सेनापति अनाधृष्टि ने अनायास ही महान् कर्म करनेवाले अच्युत श्रीकृष्णसे डरते-डरते-से इस प्रकार कहा—॥

शृणु कृष्ण वचो मह्यं रोचते यदि ते प्रभो ।
चिरात् प्रभृति मे वक्तुं भवन्तं जायते मतिः ॥ ४१ ॥

'प्रभो ! श्रीकृष्ण ! यदि आपको जँचे तो मेरी बात भी सुनें । बड़ी देरसे मेरे मनमें यह बात आ रही थी कि मैं आपसे कुछ कहूँ ॥ ४१ ॥

असिलोमा पुलोमा च निसुन्दनरकौ हतौ ।
सौभः शाल्वश्च निहतौ मैन्दो द्विविद एव च ॥ ४२ ॥

'आपके द्वारा असिलोमा और पुलोमा मारे गये । निसुन्द और नरक कालके गालमें डाल दिये गये । सौभ विमान और उसके स्वामी राजा शाल्व भी नष्ट कर दिये गये । मैन्द और द्विविद भी मारे गये ॥ ४२ ॥

हयग्रीवश्च सुमहान् सानुबन्धस्त्वया हतः ।
तादृशे विग्रहे वृत्ते देवहेतोः सुदारुणे ॥ ४३ ॥
सर्वाण्येतानि कर्माणि निःशेषाणि रणे रणे ।
कृतवानसि गोविन्द पार्ष्णिग्राहश्च नास्ति ते ॥ ४४ ॥

'महान् असुर हयग्रीव सगे सम्बन्धियोंसहित आपके हाथसे मारा गया । देवताओंके लिये वैसे-वैसे अत्यन्त भयङ्कर युद्ध आपने किये हैं । गोविन्द ! प्रत्येक रणक्षेत्रमें आपने ये सारे कर्म पूर्णरूपसे सम्पन्न किये हैं, किंतु आपका साथ देनेवाला कोई नहीं है ॥ ४३-४४ ॥

इदं कर्म त्वया कृष्ण सानुबन्धं महत् कृतम् ।
पारिजातस्य हरणे यत् कृतं कर्म दुष्करम् ॥ ४५ ॥

'श्रीकृष्ण ! पारिजातका हरण करते समय आपने जो दुष्कर कर्म किया था, वह सचमे महान् था । आपके द्वारा किया गया यह पारिजात-हरणरूपी कर्म परिणामसहित सबसे उत्कृष्ट है ॥ ४५ ॥

७०२श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

तत्र शक्रस्त्वया कृष्ण ऐरावतशिरोगतः।
निर्जितो बाहुवीर्येण त्वया युद्धविशारदः ॥ ४६ ॥
‘श्रीकृष्ण ! उस समय आपने अपने बाहुबलसे ऐरावतकी पीठपर बैठे हुए युद्धविशारद इन्द्रको भी पराजित कर दिया॥

तेन वैरं त्वया सार्धं कर्तव्यं नात्र संशयः।
वैरानुबन्धश्च महांस्तेन कार्यस्त्वया सह ॥ ४७ ॥
‘अतः इसमें कोई संशय नहीं कि देवराज इन्द्र आपके साथ वैर कर सकते हैं । उनका आपके साथ महान् वैर बाँधना अवश्य सम्भव है ॥ ४७ ॥

तत्रानिरुद्धहरणं कृतं मघवता स्वयम्।
न ह्यन्यस्य भवेच्छक्तिर्वैरनिर्यातनं प्रति ॥ ४८ ॥
‘अतः अनिरुद्धका अपहरण स्वतः इन्द्रने ही किया है। दूसरे किसीमें इस तरह वैरका बदला लेनेकी शक्ति नहीं हो सकती’ ॥ ४८ ॥

इत्येवमुक्ते वचने कृष्णो नाग इव श्वसन्।
उवाच वचनं धीमानानधृष्टिं महाबलम् ॥ ४९ ॥
उनके ऐसी बात कहनेपर बुद्धिमान् भगवान् श्रीकृष्णने हाथीके समान उच्छ्वास लेकर महाबली अनाधृष्टिके इस प्रकार कहा—॥ ४९ ॥

सेनानीस्तात मा मैवं न देवाः क्षुद्रकर्माणः।
नाकृतज्ञा न च क्लीबा नावल्लिप्ता न बालिशाः ॥ ५० ॥
‘तात ! सेनापते ! ऐसी बात न कहो, न कहो, देवता ऐसा नीच कर्म करनेवाले नहीं होते । वे न तो अकृतज्ञ होते हैं, न कायर । न घमंडी होते हैं, न मूर्ख ॥ ५० ॥

देवार्थे च मे यत्नो महान् दानवसंक्षये।
तेषां प्रियार्थे च रणे हन्मि दृप्तान् महाबलान् ॥ ५१ ॥
‘देवताओंके लिये ही मेरा दानव-संहारके निमित्त महान् प्रयत्न होता रहता है । उन्हींका प्रिय करनेके लिये मैं रणमें अभिमानी और महाबली असुरोंका वध करता हूँ ॥ ५१ ॥

तत्परस्तन्मनाश्चास्मि तद्भक्तस्तत्प्रिये रतः।
कथं पापं करिष्यन्ति विज्ञायैवंविधं हि माम् ॥ ५२ ॥
‘मैं शरीरसे उन देवताओंके हितमें तत्पर रहता हूँ, मनसे उन्हींका हित-चिन्तन करता हूँ, उनमें भक्तिभाव रखता हूँ और उन्हींका प्रिय करनेमें लगा रहता हूँ। मुझे ऐसा जानकर भी वे मेरे साथ दुर्व्यवहार क्यों करेंगे ॥ ५२ ॥

अक्षुद्राः सत्यवन्तश्च नित्यं भक्तानुकम्पिनः।
तेभ्यो न विद्यते पापं बालिशत्वात् प्रभाषसे ॥ ५३ ॥
‘देवता क्षुद्रतासे रहित, सत्यवादी तथा भक्तोंपर सदा कृपा करनेवाले होते हैं। उनसे पाप नहीं हो सकता । तुम विवेकशून्य होनेके कारण उनके सम्बन्धमें उपर्युक्त बात कह रहे हो ॥ ५३ ॥

कदाचिदिह पुंश्चल्या अनिरुद्धो हृतो भवेत्।
देवेषु समहेन्द्रेषु नैतत् कर्म विधीयते ॥ ५४ ॥
‘कदाचित् यह सम्भव हो सकता है कि किसी पुंश्चली स्त्रीने यहाँ आकर अनिरुद्धका अपहरण किया हो । इन्द्रसहित देवताओंमेंसे किसीके द्वारा ऐसा कर्म नहीं बन सकता’ ॥ ५४ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवं चिन्तयमानस्य कृष्णस्याद्भुतकर्मणः।
कृष्णस्य वचनं श्रुत्वा ततोऽक्रूरोऽब्रवीद् वचः ॥ ५५ ॥
मधुरं श्लक्ष्णया वाचा अर्थवाक्यविशारदः।
यच्छक्रस्य प्रभो कार्यं तदस्माकं विनिश्चितम् ॥ ५६ ॥
अस्माकं चापि यत्कार्यं तद्धि कार्यं शचीपतेः।
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! ऐसा विचार करते हुए अद्भुतकर्मा श्रीकृष्णका यह वचन सुनकर अर्थयुक्त वचन बोलनेमें चतुर अक्रूरने स्नेहयुक्त वाणीमें मधुर स्वरसे कहा— ‘प्रभो ! इन्द्रका जो कार्य है, वह निश्चय ही हमलोगोंका भी है। इसी प्रकार जो हमारा कार्य है, वह शचीपति इन्द्रका भी है ॥ ५५-५६ १/२ ॥

संरक्ष्याश्च वयं देवैरस्माभिश्चापि देवताः।
देवतार्थे वयं चापि मानुषत्वमुपागताः ॥ ५७ ॥
‘देवताओंको हमारी रक्षा करनी चाहिये और हमें देवताओंकी; क्योंकि हमलोग भी देवताओंके लिये ही मानव-शरीरमें आये हैं’ ॥ ५७ ॥

एवमक्रूरवचनैश्चोदितो मधुसूदनः ।
स्निग्धगम्भीरया वाचा पुनः कृष्णोऽभ्यभाषत ॥ ५८ ॥
अक्रूरके इन वचनोंसे प्रेरित होकर मधुसूदन भगवान् श्रीकृष्णने पुनः स्निग्ध गम्भीर वाणीमें कहा- ॥ ५८ ॥

नायं देवैर्न गन्धर्वैर्न यक्षैर्न च राक्षसैः।
प्रद्युम्नपुत्रोऽपहृतः पुंश्चल्या नु महायशः ॥ ५९ ॥
‘महायशस्वी अक्रूरजी ! प्रद्युम्नपुत्र अनिरुद्धका अपहरण देवताओं, गन्धर्वों, यक्षों और राक्षसों ने नहीं किया है। निश्चय ही यह किसी पुंश्चली (व्यभिचारिणी) स्त्रीका काम है ॥ ५९ ॥

मायाविदग्धाः पुंश्चल्यो दैत्यदानवयोषितः।
ताभिर्हतो न संदेहो नान्यतो विद्यते भयम् ॥ ६० ॥
‘दैत्यों और दानवोंकी जो पुंश्चली स्त्रियाँ हैं, वे मायामें निपुण होती हैं । उन्हींके द्वारा अनिरुद्धका अपहरण हुआ है। इसमें संदेह नहीं है । दूसरे किसीसे यह भय नहीं प्राप्त हुआ है’ ॥ ६० ॥

विष्णुपर्व ] एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ५०३


वैशम्पायन उवाच

इत्येवमुक्ते वचने कृष्णेन तु महात्मना ।
अथावगम्य तत्त्वेन यद् भूतं यदुमण्डले ।
उदतिष्ठन्महानादस्तदा कृष्णं प्रशंसयन् ॥ ६१ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! महात्मा श्रीकृष्णके ऐसी बात कहनेपर यदुमण्डलमें जो कुछ हुआ था, उसको ठीकसे जान लेनेपर वहाँ श्रीकृष्णकी प्रशंसासे भरा हुआ महान् शब्द प्रकट हुआ ॥ ६१ ॥

हर्षयन् स तु सर्वेषां सूतमागधवन्दिनाम् ।
मधुरः श्रूयते घोषो यादवस्य निवेशने ॥ ६२ ॥

यदुपति श्रीकृष्णके महलमें सबके हर्षको बढ़ाता हुआ सूतों, मागधों और वन्दियोंका वह मधुर घोष सबको सुनायी देने लगा ॥ ६२ ॥

ते चाराः सर्वतः सर्वे सभाद्वारमुपागताः ।
शनैर्गद्गदया वाचा इदं वचनमब्रुवन् ॥ ६३ ॥

इतनेमें ही वे सब गुप्तचर सब ओरसे खोज करके सभाद्वारपर लौट आये और धीरे-धीरे गद्गद वाणीमें इस प्रकार बोले—॥ ६३ ॥

उद्यानानि गुहाः शैलाः सभा नद्यः सरांसि च ।
एकैकं शतशो राजन् मार्गितं न च दृश्यते ॥ ६४ ॥

'राजन् ! सारे उद्यान, गुफाएँ, पर्वत, धर्मशालाएँ, नदियाँ और सरोवर छान डाले गये । एक-एक स्थानपर सौ-सौ बार खोज की गयी; परंतु कहीं अनिरुद्धका दर्शन नहीं हुआ' ॥

अन्ये कृष्णं चरा राजन्नुपागम्य तदाब्रुवन् ।
सर्वे नो विदिता देशाः प्राद्युम्निर्न च दृश्यते ॥ ६५ ॥

राजन् ! दूसरे चर भी भगवान् श्रीकृष्णके पास आकर कहने लगे—'प्रभो ! हमें सब देशोंका पता है, सर्वत्र खोज की गयी, किंतु कहीं भी प्रद्युम्नकुमारका पता नहीं लग रहा है ॥

यदन्यत् संविधातव्यं विधानं यदुनन्दन ।
तदाज्ञापय नः क्षिप्रमनिरुद्धस्य मार्गणे ॥ ६६ ॥

'यदुनन्दन ! अनिरुद्धके अन्वेषणके लिये अब और जो कुछ कार्य करना हो, उसके लिये हमें शीघ्र आज्ञा दीजिये' ॥

ततस्ते दीनमनसः सर्वे बाष्पाकुलेक्षणाः ।
अन्योन्यमभ्यभाषन्त किमतः कार्यमुत्तमम् ॥ ६७ ॥

चरोंकी ये बातें सुनकर सबका मन उदास हो गया । सबके नेत्रोंमें आँसू भर आये और सब एक-दूसरेसे कहने लगे—'इससे उत्तम कार्य अब और क्या करना चाहिये ?'॥ ६७ ॥

संदष्टौष्ठपुटाः केचित् केचिद् बाष्पाकुलेक्षणाः ।
केचिद् भ्रुकुटिमास्थाय चिन्तयन्त्यर्थसिद्धये ॥ ६८ ॥

किसीने क्रोधवश दाँतोंसे ओठ दबा लिये, किन्हींके नेत्रोंमें आँसू भर आये और कोई भौंहें टेढ़ी करके कार्यसिद्धिके उपायपर विचार करने लगे ॥ ६८ ॥

एवं चिन्तयतां तेषां बह्वर्थमभिभाषितम् ।
अनिरुद्धः कुतश्चेति सम्भ्रमः सुमहानभूत् ॥ ६९ ॥

इस प्रकार चिन्तन करते हुए उन यादवोंके मुखसे अनेक तरहकी बातें निकलीं । 'अनिरुद्ध कहाँ गये ?' इस प्रश्नको लेकर सबके हृदयमें महान् सम्भ्रम उत्पन्न हो गया ॥

अन्योन्यमभिवीक्षन्ते यादवा जातमन्यवः ।
तां निशां विमनस्कास्ते गमयेयुः कथंचन ।
अनिरुद्धो हृतश्चेति पुनः पुनररिंदम ॥ ७० ॥

शत्रुदमन नरेश ! उस समय कुपित और खिन्न हुए यादव एक दूसरेका मुँह देखने लगे । अनिरुद्धके अपहरणकी बारंबार चर्चा करते हुए उन्होंने उदास मनसे किसी तरह वह रात बितायी ॥ ७० ॥

एवं च ब्रुवतां तेषां प्रभाता रजनी तदा ।
ततस्तूर्यनिनादैश्च शङ्खानां च महास्वनैः ।
प्रबोधनं महाबाहोः कृष्णस्याक्रियतालये ॥ ७१ ॥

इस तरह आपसमें बात करते हुए ही उनकी रात बीत गयी और प्रातःकाल आ गया । तदनन्तर महाबाहु श्रीकृष्णके भवनमें सबको जगानेके लिये बड़े जोर जोरसे भाँति-भाँतिके बाजे बजने लगे और शङ्खोंकी भी गम्भीर ध्वनि होने लगी ॥७१॥

ततः प्रभाते विमले प्रादुर्भूते दिवाकरे ।
प्रविवेश सभामेको नारदः प्रहसन्निव ॥ ७२ ॥

तत्पश्चात् निर्मल प्रभातमें जब सूर्यदेवका उदय हुआ, उस समय अकेले नारदजीने हँसते हुए-से वहाँ यादवोंकी सभामें प्रवेश किया ॥ ७२ ॥

दृष्ट्वा तु यादवान् सर्वान् कृष्णेन सह संगतान् ।
ततः स जयशब्देन माधवं प्रत्यपूजयत् ॥ ७३ ॥

श्रीकृष्णके साथ एकत्र हुए समस्त यादवोंकी ओर देखकर उन्होंने 'जय हो, जय हो' कहकर माधव (श्रीकृष्ण) का समादर किया ॥ ७३ ॥

उग्रसेनादयस्ते च तमृषिं प्रत्यपूजयन् ।
अथाभ्युत्थाय विमनाः कृष्णः समितिदुर्जयः ।
मधुपर्कं च गां चैव नारदाय ददौ प्रभुः ॥ ७४ ॥

फिर उग्रसेन आदिने नारदजीका पूजन किया । इसके बाद रणदुर्जय भगवान् श्रीकृष्णने उदास मनसे उठकर नारदजीको मधुपर्क तथा एक गौ समर्पित की ॥ ७४ ॥

सोपविश्यासने शुभ्रे सर्वास्तरणसंवृते ।
सुखासीनो यथान्यायमुवाचेदं वचोऽर्थवत् ॥ ७५ ॥

७०४श्रीमद्भारते खिलभागे[ हरिवंशे

स्वागत-सत्कारके पश्चात् जब नारदजी सब प्रकारके बिछौनोंसे ढके हुए शुभ्र आसनपर सुखपूर्वक बैठ गये, तब वे यथोचित रीतिसे यह अर्थयुक्त वचन बोले ॥ ७५ ॥

नारद उवाच

किमेवं चिन्तयाविष्टा निःसङ्गा गतमानसाः ।
उत्साहहीनाः सर्वे वै क्लीवा इव समासत ॥ ७६ ॥

नारदजीने कहा—आज क्या बात है कि समस्त यादव इस तरह चिन्तामग्न, असंग, अनमने और उत्साहहीन होकर क्लीवों (कायरों) के समान चुपचाप बैठे हैं ? ॥ ७६ ॥

इत्येवमुक्ते वचने नारदेन महात्मना।
वासुदेवोऽब्रवीद् वाक्यं श्रूयतां भगवन्निदम् ॥ ७७ ॥

महात्मा नारदके इस तरह पूछनेपर भगवान् श्रीकृष्ण बोले—'भगवन् ! इसका कारण सुनिये—॥ ७७ ॥

अनिरुद्धो हृतो ब्रह्मन् केनापि निशि सुव्रत।
यस्यार्थे सर्व एवास्म चिन्तयाविष्टचेतसः ॥ ७८ ॥

'उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ब्रह्मन् ! यहाँ रात्रिके समय किसीने अनिरुद्धका अपहरण कर लिया है। उन्हींके लिये हम सब लोग यहाँ चिन्तित-चित्त होकर बैठे हैं ॥ ७८ ॥

एष ते यदि वृत्तान्तः श्रुतो दृष्टोऽपि वा मुने।
भगवन् कथ्यतां साधु प्रियमेतन्ममानघ ॥ ७९ ॥

'निष्पाप मुने ! भगवन् ! यदि यह वृत्तान्त आपने कहीं सुना या देखा हो तो अच्छी तरह बताइये, यह मेरा प्रिय विषय है' ॥ ७९ ॥

इत्येवमुक्ते वचने केशवेन महात्मना।
प्रहस्यैतद् वचः प्राह श्रूयतां मधुसूदन ॥ ८० ॥

महात्मा केशवके ऐसी बात कहनेपर नारदजी ठठाकर हँस पड़े और इस प्रकार बोले—'मधुसूदन ! सुनिये—॥

निवृत्तं सुमहद् युद्धं देवासुरसमं महत् ।
अनिरुद्धस्य चैकस्य बाणस्यापि महामृधे ॥ ८१ ॥

'एक महासमरमें एक ओर अकेले अनिरुद्ध थे और दूसरी ओर सेनासहित बाणासुर था। इन दोनोंमें महान् देवासुर-संग्रामके समान बड़ा भारी युद्ध हुआ है ॥ ८१ ॥

उषा नाम सुता तस्य बाणस्याप्रतिमौजसः।
तस्यार्थे चित्रलेखा वै जहाराशु तमप्सराः ॥ ८२ ॥

'अप्रतिम बलशाली बाणासुरकी एक पुत्री है, जिसका नाम उषा है। उसीके लिये चित्रलेखा अप्सरा शीघ्रतापूर्वक अनिरुद्धको हर ले गयी ॥ ८२ ॥

उभयोरपि तत्रासीन्महायद्धं सुदारुणम् ।
प्राद्युम्निबाणयोः संख्ये बलिवासवयोरिव ॥ ८३ ॥

'वहाँ अनिरुद्ध और बाणासुर दोनोंमें अत्यन्त भयंकर महान् युद्ध हुआ । ठीक उसी तरह, जैसे देवासुर-संग्राममें बलि और इन्द्रका युद्ध हुआ था ॥ ८३ ॥

अस्माभिश्चापि तद् युद्धं दृष्टं सुमहदद्भुतम् ।
अनिरुद्धो भयात् तेन संयुगेष्वनिवर्तिना ॥ ८४ ॥
बाणेन मायामास्थाय बद्धो नागैर्महाबलः ।

'मैंने भी उस महान् एवं अद्भुत युद्धको अपनी आँखों देखा है। युद्धसे पीछे न हटनेवाले बाणासुरने भयभीत होकर मायाका सहारा लिया और नागपाशसे महाबली अनिरुद्धको बाँध लिया ॥ ८४३ ॥

व्यादिष्टस्तु वधस्तस्य बाणेन गरुडध्वज ॥ ८५ ॥
तं निवारितवान् मन्त्री कुम्भाण्डो नाम तस्य ह ।

'गरुडध्वज ! उस समय उसने अनिरुद्धके वधकी आज्ञा दे दी, परंतु उसके मन्त्री कुम्भाण्डने उसे वैसा करनेसे रोक दिया ॥ ८५३ ॥

कुमारस्यानिरुद्धस्य तेनासक्तेन संयुगे ॥ ८६ ॥
बाणेन मायामास्थाय सर्पैनियमनं कृतम् ।
उत्तिष्ठतु भवांल्छीघ्रं यशसे विजयाय च ॥ ८७ ॥

'युद्धमें आसक्त हुए बाणासुरने मायाका सहारा लेकर सर्पमय बाणोंद्वारा कुमार अनिरुद्धको बाँधा है; अतः अब आप यश और विजयके लिये शीघ्र उठिये ॥ ८६-८७ ॥

नायं संरक्षितुं कालः प्राणांस्तात जयैषिणाम् ।
प्राणैः किंचिद्गतैर्वीरो धैर्यमालम्ब्य तिष्ठति ॥ ८८ ॥

'तात ! विजयकी अभिलाषा रखनेवाले वीरोंके लिये यह अपने प्राणोंको बचाकर बैठनेका समय नहीं है। वीर पुरुष प्राणोंके कुछ संकटमें पड़ जानेपर धैर्यका सहारा लेकर शत्रुके सामने डटा रहता है' ॥ ८८ ॥

वैशम्पायन उवाच

इत्येवमुक्ते वचने वासुदेवः प्रतापवान् ।
प्रायात्रिकान् वै सम्भारानाज्ञापयत वीर्यवान् ॥ ८९ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! उनके ऐसा कहनेपर पराक्रमी एवं प्रतापी वीर वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णने रण-यात्राके लिये उपयुक्त सामग्री तैयार करनेकी आज्ञा दे दी ॥ ८९ ॥

ततश्चन्दनचूर्णैश्च लाजैश्चैव समन्ततः।
निर्ययौ स महाबाहुः कीर्यमाणो जनार्दनः ॥ ९० ॥

तदनन्तर महाबाहु जनार्दन यात्राके लिये घरसे बाहर निकले। उस समय उनके ऊपर चारों ओरसे चन्दनचूर्ण और लावा बिखेरे जा रहे थे ॥ ९० ॥

विष्णुपर्व ] एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः [ ७०५


नारद उवाच

स्मरणं वैनतेयस्य कर्तुमर्हसि माधव ।
न ह्यन्येन तदध्वानं शक्यं गन्तुं महाभुज ॥ ९१ ॥
(इतनेमें ही) नारदजी बोले—माधव ! विनता-नन्दन गरुड़का स्मरण कीजिये। महाबाहो! उनके सिवा दूसरा कोई उस मार्गपर नहीं जा सकता ॥ ९१ ॥

आकर्ण्य तमध्वानं गन्तव्यमतिदुर्गमम् ।
एकादश सहस्राणि योजनानां जनार्दन ॥ ९२ ॥
तदितः शोणितपुरं प्रद्युम्निर्यत्र साम्प्रतम् ।
जनार्दन ! मेरी बात सुनिये। जिस मार्गपर आपको चलना है, वह अत्यन्त दुर्गम है। प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्ध इस समय जहाँ विद्यमान हैं, वह शोणितपुर यहाँसे ग्यारह हजार योजनकी दूरीपर है ॥ ९२½ ॥

मनोजवो महावीर्यो वैनतेयः प्रतापवान् ॥ ९३ ॥
समाह्वयस्व गोविन्द स हि त्वां तत्र नेष्यति ।
एकेन सुमुहूर्तेन बाणं संदर्शयिष्यति ॥ ९४ ॥
गोविन्द ! महापराक्रमी और प्रतापी विनतानन्दन गरुड़ मनके समान वेगशाली हैं। आप उन्हींका आवाहन कीजिये। वे ही आपको वहाँ पहुँचायेंगे। वे एक ही मुहूर्तमें आपको बाणासुरके सामने उपस्थित कर देंगे ॥ ९३-९४ ॥

वैशम्पायन उवाच

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा सस्मार गरुडं तदा ।
स कृष्णपार्श्वमागम्य प्राञ्जलिर्गरुडः स्थितः ॥ ९५ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! नारदजीका यह वचन सुनकर भगवान् श्रीकृष्णने उस समय गरुड़का स्मरण किया। स्मरण करते ही वे श्रीकृष्णके पास आकर हाथ जोड़-कर खड़े हो गये ॥ ९५ ॥

प्रणम्यथ वचः प्राह वैनतेयो महाबलः ।
वासुदेवं महात्मानं श्लक्ष्णं मधुरया गिरा ॥ ९६ ॥
महात्मा वासुदेवको प्रणाम करके महाबली गरुड उनसे स्नेहयुक्त मधुर वाणीमे बोले ॥ ९६ ॥

गरुड उवाच

पद्मनाभ महाबाहो किमर्थं संस्मृतो ह्यहम् ।
कृत्यं ते यदिहात्रास्ति श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ ९७ ॥
गरुडने कहा—पद्मनाभ ! महाबाहो ! आपने किस लिये मेरा स्मरण किया है। यहाँ आपको मुझसे जो काम है, उसे मैं ठीक-ठीक सुनना चाहता हूँ ॥ ९७ ॥

कस्य पक्षपरिक्षेपैर्नाशयामि पुरीं प्रभो ।
प्रभावात्तव गोविन्द को न विद्याद् बलं मम ॥ ९८ ॥
प्रभो ! आशा दीजिये, मैं अपने पंखोंके प्रहारसे किसकी पुरीका नाश कर डालूँ ? गोविन्द ! आपके प्रभावसे मेरे बल-को कौन नहीं जानता है ? ॥ ९८ ॥


गदावेगं च ते वीर चक्राग्निं च महाभुज ।
नावबुध्यति मूढात्मा को दर्पान्नाशमेष्यति ॥ ९९ ॥
वीर ! महाबाहो ! कौन मूढ़चित्त पुरुष आपकी गदाके वेग और सुदर्शन चक्रके तेजको नहीं जानता है ? वह अपने घमंडके कारण नष्ट हो जायगा ॥ ९९ ॥

हलं सिंहमुखं कस्य वनमाली नियोक्ष्यति ।
कस्य देहस्तु निर्भिन्नो मेदिनीं यास्यति प्रभो ॥ १०० ॥
प्रभो ! वनमालाधारी बलरामजी सिंहके-से मुखवाले अपने हलका प्रहार आज किसपर करनेवाले हैं ? किसका शरीर आज छिन्न-भिन्न होकर पृथ्वीपर गिरनेवाला है ? ॥

कस्य शङ्खरवैः प्राणान् मोहयिष्यसि माधव ।
कोऽयं सपरिवारोऽद्य यास्यते यमसादनम् ॥ १०१ ॥
माधव ! आप अपनी शङ्खध्वनिसे किसके प्राणोंको मोहित करनेवाले हैं। यह कौन है, जो आज परिवारसहित यमलोकमें जाना चाहता है ॥ १०१ ॥

एवमुक्ते तु वचने वैनतेयेन धीमता ।
वासुदेवो वचः प्राह शृणु त्वं वदतां वर ॥ १०२ ॥
बुद्धिमान् विनतानन्दन गरुड़के ऐसा कहनेपर वसुदेव-नन्दन भगवान् श्रीकृष्ण बोले—वक्ताओंमे श्रेष्ठ गरुड़ ! सुनो॥

बलेः पुत्रेण बाणेन प्रद्युम्निरपराजितः ।
उषायाः कारणे बद्धो नगरे शोणिताह्वये ।
अनिरुद्धस्तु कामार्तो बद्धो नागैर्विषोल्बणैः ॥ १०३ ॥
'बलिके पुत्र बाणासुरने अपराजित वीर प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्धको उषाके साथ सम्बन्ध स्थापित करनेके कारण शोणितपुरमें बंदी बना लिया है। कामपीड़ित अनिरुद्धको उसने प्रचण्ड विषवाले सर्पोंके द्वारा बाँध रखा है ॥ १०३ ॥

तस्य मोक्षार्थमाहूतो मया त्वं पतगेश्वर ।
तव वेगसमो नास्ति पक्षिणां प्रवरो भवान् ।
अशक्यं च तदध्वानं गन्तुमन्येन काश्यप ॥ १०४ ॥
'पक्षिराज ! उन्हीं अनिरुद्धको बन्धनसे छुड़ानेके लिये मैंने तुम्हारा आवाहन किया है। वेगमें तुम्हारी समानता करनेवाला दूसरा कोई नहीं है। तुम पक्षियोंमें सबसे श्रेष्ठ हो। कश्यपनन्दन ! तुम्हारे सिवा दूसरे किसीके लिये उस मार्गपर चलना असम्भव है ॥ १०४ ॥

तत्र प्रापय मां शीघ्रं यत्र प्रद्युम्निरावसत् ।
वैदर्भी ते शृणुष वीर रुदती पुत्रगृद्धिनी ॥ १०५ ॥
त्वत्प्रसादाद् भवत्येषा पुत्रेण सह भामिनी ।
'जहाँ प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्ध निवास करते हैं, वहाँ


म० ह० २३ —

७०६ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे शीघ्र मुझे पहुँचा दो। वीर ! विदर्भराज रुक्मीकी पुत्री गरुड उवाच शुभाङ्गी, जो तुम्हारी पुत्रवधू लगती है, अपने पुत्रसे मिलने- अत्यद्भुतमिदं वाक्यं तव कृष्ण महाभुज । की इच्छा रखकर रो रही है। तुम्हारी कृपासे यह भामिनी त्वत्प्रसादाच्च विजयः सर्वत्रैव महाभुज ॥ ११३॥ अपने पुत्रसे मिल सके—ऐसा प्रयत्न करो ॥ १०५॥ गरुड़ बोले-महाबाहो ! श्रीकृष्ण ! आपकी यह अमृतं तु हृतं पूर्वं त्वया पन्नगनाशन ॥१०६॥ बात तो बड़ी अद्भुत है। बड़ी बाँहवाले प्रभो ! आपकी मया सह समागम्य तस्मिन् काले महाभुज । कृपासे ही सर्वत्र विजय होती है ॥ ११३ ॥ अभवन्मे ध्वजश्चैव त्वद्भक्ताः सर्ववृष्णयः । धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि संस्तवान्मधुसूदन । सखित्वं मानयस्वाद्य भक्तिं च पतगेश्वर ॥१०७॥ स्तोतव्यस्त्वं मया कृष्ण स्तौषि मां त्वं महाभुज ॥ 'सर्पशत्रो ! तुमने पूर्वकालमें ( देवताओंको पराजित मधुसूदन ! आपने जो मेरी स्तुति-प्रशंसा की है, इससे करके ) अमृतका अपहरण किया था। महाबाहो ! वह समय मैं धन्य हो गया। यह आपने मुझपर महान् अनुग्रह किया। तुम्हें याद होगा जब कि तुम मेरे साथ मिलकर मेरे ध्वजरूप महाबाहु श्रीकृष्ण ! मुझे आपकी स्तुति करनी चाहिये, किंतु हुए थे। ये समस्त वृष्णिवंशी तुम्हारे भक्त हैं। पक्षिराज ! आप उलटे मेरी ही स्तुति कर रहे हैं ॥ ११४ ॥ आज तुम हमारी मैत्री तथा भक्तिका आदर करो। १०६-१०७। वेदाध्यक्षः सुराध्यक्षः सर्वकामप्रदो भवान् । तव वेगसमो नास्ति पक्षिणो न च ते समाः । अमोघदर्शनस्त्वं हि वरार्थिपु वरप्रदः ॥ ११५॥ सुपर्ण सुकृतेन त्वां शपे पन्नगनाशन ॥१०८॥ आप सम्पूर्ण वेदोंके अध्यक्ष ( उनके द्वारा प्रतिपादित 'तुम्हारे वेगकी समानता करनेवाला दूसरा कोई नहीं सर्वसाक्षी चेतन परमात्मा ) हैं। देवताओंके भी स्वामी तथा है। दूसरे पक्षी भी तुम्हारे समान नहीं हैं। सर्पनाशन गरुड़ ! सम्पूर्ण कामनाओंके दाता हैं। आपका दर्शन अमोघ है। आप मैं पुण्यकी शपथ खाकर तुमसे यह बात कह रहा हूँ ॥१०८॥ वरार्थी पुरुषोंको वर देनेवाले हैं ॥ ११५ ॥ दासीभावं गता माता मोक्षितेकाकिना पुरा। चतुर्भुजश्चतुर्मूर्तिश्चातुर्होत्रप्रवर्तकः । । पक्षविक्षेपमात्रेण हता योधास्त्वया पुरा ॥१०९॥ चातुराश्रम्यहोता च चतुर्नेता महाकविः ॥११६॥ 'पूर्वकालमें जब माता विनता दासीभावको प्राप्त हुई आपकी चार भुजाएँ हैं। वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और थीं। उस समय तुमने अकेले ही उनका उद्धार किया था। अनिरुद्ध-ये चार आपकी मूर्तियाँ हैं। आप चातुर्होत्र यज्ञके अपने पंखोंके प्रहारमात्रसे पहले तुमने बहुत-से योद्धाओंका प्रवर्तक हैं। चारों आश्रमोंमें होता हैं। चारों पुरुषार्थोंकी प्राप्ति संहार कर डाला है ॥ १०९ ॥ करानेवाले तथा महाज्ञानी हैं ॥ ११६ ॥ भवान् सुरगणान् सर्वान् पृष्ठमारोप्य विक्रमात् । धनुर्धरश्चक्रधरो भवाञ्छङ्खधरो महान् । गच्छ मे ह्यग्रमान् देशान् विजयश्च तवाश्रयात् ॥११०॥ भवान् पूर्वेषु देहेषु ख्यातो भूमिधरः प्रभो ॥११७॥ 'तुम इन समस्त यादववीरोंको, जो देवगणोंके अंशसे आप शार्ङ्ग धनुष, सुदर्शन चक्र और पाञ्चजन्य शङ्ख उत्पन्न हैं, अपनी पीठपर बिठाकर पराक्रमपूर्वक मेरे साथ धारण करनेवाले महान् विष्णु हैं। प्रभो ! आप अपने पूर्व- उन अगम्य देशोंमें चलो। तुम्हारे भरोसे ही आज हमारी विग्रहों ( कूर्म, वराह आदि अवतारों ) में धरणीधरके रूपमें विजय है ॥ ११० ॥ विख्यात हैं ॥ ११७ ॥ गुरुत्वान्मेरुतुल्यस्त्वं लघुत्वात् पवनोपमः । लाङ्गली मुसली चक्री देवकीतनयो भवान् । भूते भव्ये भविष्ये च न ते तुल्योऽस्ति विक्रमे ॥१११॥ चाणूरमथनश्चैव गोप्रियः कंसहा भवान् ॥ ११८॥ 'तुम गुरुतामें मेरुके समान और शीघ्रतापूर्वक चलनेमें आप ही हलधर, मुसलधारी और चक्र धारण करनेवाले वायुके तुल्य हो। भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालोंमें हैं। आप देवकीके पुत्र, चाणूरका संहार करनेवाले, गौओंके तुम्हारे समान विक्रमशाली दूसरा कोई नहीं है ॥ १११ ॥ प्रिय तथा कंसका वध करनेवाले हैं ॥ ११८ ॥ सत्यसंघ महाभाग वैनतेय महाद्युते । गोवर्धनधरश्चैव मल्लारिर्मल्लभावनः । अनिरुद्धेक्षणेनाद्य साहाय्यमुपकल्प्यताम् ॥११२॥ मल्लप्रियो महामल्लो महापुरुष इत्यपि ॥११९॥ 'महातेजस्वी, महाभाग, सत्यप्रतिज्ञ, विनतानन्दन ! आप ही गोवर्धनधारी हैं। आप मल्लोंके शत्रु, मल्लोंके आज अनिरुद्धसे मिला देनेमें तुम हमारी सहायता करो।' पोषक, मल्लोंके प्रेमी, महामल्लस्वरूप तथा महापुरुष हैं ॥ विप्रप्रियो विप्रहितो विप्रशो विप्रभावनः ।

विष्णुपर्व ] एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः [ ७०७


ब्रह्मण्यश्च वरेण्यश्च भवान् दामोदरः स्मृतः ।
प्रलम्बमथनश्चैव केशिहा दानवान्तकः ॥१२०॥

आप ब्राह्मणोंके प्रिय, ब्राह्मणोंके हितैषी, ब्राह्मणोंके ज्ञाता, ब्राह्मणोंके पालक तथा ब्राह्मणभक्त हैं। आप ही सर्वश्रेष्ठ दामोदर कहे गये हैं। आपने ही बलभद्ररूपसे प्रलम्बासुरका संहार किया है। आप केशीके हन्ता तथा दानवोंके काल हैं ॥१२०॥

असिलोम्नश्च हन्ता च तथा रावणनाशनः ।
विभीषणस्य भगवान् राज्यदो वालिनाशनः ॥१२१॥

आपने ही असिलोमाका वध किया है। आप ही वाली तथा रावणका विनाश करनेवाले और विभीषणको राज्य देनेवाले भगवान् श्रीराम हैं ॥ १२१ ॥

सुग्रीवराज्यदाता त्वं बलिराज्यापहारकः ।
रत्नहर्ता महारत्नं समुद्रोदरसम्भवम् ॥१२२॥

सुग्रीवको राज्य प्रदान करनेवाले भी आप ही हैं। आपने ही (वामनरूप धारण करके) बलिके राज्यका अपहरण किया है। आप कौस्तुभ और लक्ष्मी नामक रत्नोंको ग्रहण करनेवाले हैं। आप ही समुद्रके गर्भसे उत्पन्न धन्वन्तरि नामक महारत्न हैं ॥ १२२ ॥

वरुणश्च भवान् ख्यातो भवांश्च सरिदुद्भवः ।
भवान् खड्गधरो धन्वी धनुर्धरवरो महान् ॥१२३॥

आप ही वरुण नामसे विख्यात हैं। आप ही सरिताओंकी उत्पत्तिके स्थान मेरु हैं। आप नन्दक नामक खड्ग धारण करनेवाले, धन्वी एवं धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ महान् वीर हैं ॥१२३॥

दाशार्ह इति विख्यातो महाधन्वा धनुःप्रियः ।
गोविन्द इति विख्यात उदधिस्त्वं च सुव्रत ॥१२४॥

आप दाशार्ह नामसे विख्यात हैं। आपका धनुष विशाल है। आप धनुषके प्रेमी हैं। उत्तमव्रतधारी श्रीकृष्ण ! आप ही गोविन्द नामसे प्रसिद्ध तथा आप ही समुद्र हैं ॥ १२४ ॥

आकाशश्च तपश्चैव समुद्रमथनो भवान् ।
भवान् स्वर्गो बहुफलो भवान् स्वर्गचरो महान् ॥१२५॥

आप आकाश और तप हैं। आप ही समुद्रका मन्थन करनेवाले हैं। अनेक फलोंसे युक्त स्वर्ग आपका ही स्वरूप है। आप ही स्वर्गमें विचरनेवाले महान् पुरुष हैं ॥ १२५ ॥

त्वमेव च महामेघो बीजनिष्पत्तिरेव च ।
त्रैलोक्यमथनस्त्वं च क्रोधलोभमनोरथः ॥१२६॥

आप ही महान् मेघ हैं। आपसे ही बीजोंकी सिद्धि होती है। आप ही क्रोध आदिके रूपसे तीनों लोकोंको मथते रहते हैं। आप क्रोध, लोभ और मनोरथरूप हैं ॥ १२६ ॥

भवान् कामप्रदश्चैव कामः सर्वधनुर्धरः ।
संवर्तो वर्तनश्चैव प्रलयो निलयो महान् ॥१२७॥

आप महान् परमेश्वर ही कामनाओंके दाता तथा समस्त धनुषोंको धारण करनेमें समर्थ कामदेव हैं। आप ही संहारक और उत्पादक हैं तथा आप ही प्रलय एवं रक्षाके स्थान हैं ॥

हिरण्यगर्भो रूपज्ञो रूपवान् मधुसूदनः ।
ईशस्त्वं च महादेव असंख्यगुणान्वितः ॥१२८॥
स्तोतुमिच्छसिमां देव स्तोतव्यस्त्वं यदूत्तम ।

महादेव ! आप ही सब रूपोंके ज्ञाता हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा) हैं। आप ही रूपवान् मधुसूदन (विष्णु) हैं तथा आप ही असंख्य गुणोंसे सम्पन्न ईश्वर (शिव) हैं। यदुवर ! देव ! आप स्वयं ही स्तुतिके योग्य हैं तो भी मेरी स्तुति करना चाहते हैं (यह कितने आश्चर्यकी बात है) ॥ १२८½ ॥

चक्षुषा ये त्वया घोराः प्राणिनो हि निरीक्षिताः ॥१२९॥
हतास्ते यमदण्डेन तिर्यग्योनिरयगामिनः ।

जिन घोर प्राणियोंको आपने रोषपूर्ण दृष्टिसे देखा है, वे यमदण्डसे मारे गये हैं तथा पशु-पक्षियोंकी योनियों एवं नरकमें गिरनेवाले हैं ॥ १२९½ ॥

ये त्वया परमप्रीत्या प्राणिनो वै निरीक्षिताः ॥१३०॥
इह च प्रेत्य ते सर्वे सर्वथा स्वर्गगामिनः ।
एष तेऽहं महाबाहो वशगः शासने स्थितः ॥१३१॥

परंतु जिन प्राणियोंको आपने बड़े प्यारसे देखा है, वे सब इह लोकमें हो या परलोकमें सर्वथा स्वर्गलोकमें ही जानेके अधिकारी हैं। महाबाहो ! यह मैं आपकी आज्ञाके अधीन होकर सब प्रकारसे आपके शासनमें स्थित हूँ ॥१३०-१३१॥

जयस्थानं ततः कृत्वा गरुडः प्राह केशवम् ।
अयमस्मि स्थितो वीर आरुहस्व महाचल ॥१३२॥

तदनन्तर गरुड़ने जयस्थान (प्रस्थानकी मुद्रा) बनाकर भगवान् श्रीकृष्णसे कहा—'महाबली वीर ! यह मैं आपकी सेवामे खड़ा हूँ। आप मेरी पीठपर आरूढ होइये' ॥१३२॥

ततः कण्ठे परिष्वज्य माधवो गरुडं ततः ।
सखे शत्रुविनाशाय अर्घ्योऽयं प्रतिगृह्यताम् ॥१३३॥

यह सुनकर माधवने गरुड़को कण्ठसे लगाकर कहा—'सखे ! शत्रुओंके विनाशके लिये यह अर्घ्य ग्रहण करो' ॥

दत्त्वार्घ्यं परया प्रीत्या शङ्खचक्रगदासिभृत् ।
आरुरोह महाबाहुः सुपर्णं पुरुषोत्तमः ॥१३४॥

इस प्रकार परम प्रसन्नतापूर्वक अर्घ्य देकर शङ्ख, चक्र, गदा और खड्ग धारण करनेवाले महाबाहु पुरुषोत्तम श्रीहरि गरुड़पर आरूढ़ हुए ॥ १३४ ॥

कृष्णस्य पार्श्वमागम्य हर्षाद्देवास्थितोऽभवत् ।
कृष्णकेशः प्रवलयो विष्णुः कृष्णश्च वर्णतः ॥१३५॥

तत्पश्चात् काले केशोंवाले बलरामजी श्रीकृष्णके पास

७०८ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे आकर हर्षपूर्वक बैठ गये; विष्णुस्वरूप श्रीकृष्ण वर्णसे भी कृष्ण ही थे। उन्होंने अपने हाथोंमें उत्तम वलय (कड़े) धारण कर रखे थे ॥ १३५ ॥ चतुर्दंष्ट्रश्चतुर्बाहुश्चतुर्वेदषडङ्गवित् । श्रीवत्साङ्कोऽरविन्दाक्ष ऊर्ध्वरोमा मृदुत्वचः ॥१३६॥ उनके मुखमें चार दाढ़ें सुशोभित थीं। वे चार भुजाएँ धारण किये हुए थे, छहों अङ्गोंसहित चारों वेदोंके ज्ञाता थे। उनके वक्षःस्थलमें श्रीवत्सचिह्न शोभा पाता था। उनके नेत्र प्रफुल्ल कमलके समान सुशोभित थे। रोमावलियाँ ऊपरकी ओर उठी हुई थीं और त्वचा बहुत ही कोमल थी ॥ १३६ ॥ समाङ्गुलीः समनखो रक्ताङ्गुलिनखान्तरः। स्निग्धगम्भीरनिर्घोषो वृत्तबाहुर्महाभुजः ॥१३७॥ उनकी सभी अँगुलियाँ समानरूपसे सुन्दर और सुडौल थीं। नख भी बराबर थे, अँगुलियों और नखोंके भीतरका भाग लाल था। उनकी वाणीका घोष स्निग्ध एवं गम्भीर था। भुजाएँ गोलाकार एवं विशाल थीं ॥ १३७॥ आजानुबाहुस्ताम्रास्यः सिंहविस्पष्टविक्रमः । सहस्रमिव सूर्याणां दीप्यमानः प्रकाशते ॥१३८॥ उनकी भुजाएँ घुटनोंतक लंबी थीं। मुखका रंग लाल था। उनका चलना-फिरना और पराक्रम सुस्पष्टतः सिंहके समान था। वे सहस्रों सूर्योंके समान देदीप्यमान होकर प्रकाशित होते थे ॥ १३८ ॥ यः प्रभुर्भाति विश्वात्मा भूतानां भावनो विभुः । यस्याष्टगुणमैश्वर्यं ददौ प्रीतः प्रजापतिः ॥१३९॥ प्रजापतीनां साध्यानां त्रिदशानां च शाश्वतः । स्तूयमानः स्तवैर्दिव्यैः सूतमागधवन्दिभिः । ऋषिभिश्च महाभागैर्वेदवेदाङ्गपारगैः ॥ १४०॥ संविधानमथाज्ञाप्य द्वारकायां महाबलः । गमनाय मतिं चक्रे वासुदेवः प्रतापवान् ॥ १४१॥ जो सर्वव्यापी भूतभावन प्रभु सम्पूर्ण विश्वके आत्मारूपसे प्रकाशित होते हैं। जिन्हें वामनावतारके समय प्रजापति कश्यपने प्रसन्न होकर अणिमा आदि आठ गुणोंसे युक्त ऐश्वर्य प्रदान किया है। जो प्रजापतियों, साध्यों और देवताओंमें सनातन पुरुष माने जाते हैं, उन महाबली एवं प्रतापी वासुदेव भगवान् श्रीकृष्णने द्वारकामें यात्राकी तैयारीके लिये आज्ञा देकर शोणितपुरको जानेका विचार किया। उस समय सूत, मागध, वन्दीजन तथा वेद-वेदाङ्गोंके पारंगत विद्वान् महाभाग महर्षिगण दिव्य स्तोत्रोंद्वारा उनकी स्तुति कर रहे थे ॥ आस्थितो गरुडं देवस्तस्य चानु हलायुधः । पृष्ठतोऽनु बलस्यापि प्रद्युम्नः शत्रुकर्शनः ॥१४२॥ पहले भगवान् श्रीकृष्ण गरुड़पर आरूढ़ हुए थे। उनके पीछे हलधर बलरामजी और बलरामजीके भी पीछे शत्रुसूदन प्रद्युम्न गरुड़पर बैठे थे ॥ १४२ ॥ जय बाणं महाबाहो ये चास्यानुगता रणे । न हि ते प्रमुखे स्थातुं कश्चिच्छक्तो महामृधे ॥१४३॥ (भगवान्की यात्राके समय अन्तरिक्षमें यह वाणी सुनायी दी-) 'महाबाहो ! आप बाणासुरको तथा उसके जो अनुयायी हों, उनको भी रणभूमिमें पराजित कीजिये। महासमरमें कोई भी आपके सामने ठहर नहीं सकता ॥ १४३ ॥ प्रसादे ते ध्रुवा लक्ष्मीर्विजयश्च पराक्रमे । विजेष्यसि रणे शत्रूं दैत्येन्द्रं सहसैनिकम् ॥ १४४॥ 'आपके प्रसादमें लक्ष्मीका अटल निवास है और पराक्रममें विजय प्रतिष्ठित है। आप रणभूमिमें अपने शत्रु दैत्यराज बाणको उसके सैनिकोंसहित परास्त कर देंगे' ॥ १४४ ॥ सिद्धचारणसंघानां महर्षीणां च सर्वशः । शृण्वन् वाचोऽन्तरिक्षे वै प्रययौ केशवो रणे ॥ १४५॥ इस प्रकार अन्तरिक्षमें सिद्धों और चारणोंके समुदायों तथा सम्पूर्ण महर्षियोंकी कही हुई बातें सुनते हुए भगवान् केशव युद्धके लिये प्रस्थित हुए ॥ १४५ ॥ इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि कृष्णप्रयाणे एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२१ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें श्रीकृष्णका प्रस्थानविषयक एक सौ इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२१ ॥ द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः श्रीकृष्ण, बलभद्र और प्रद्युम्नका शोणितपुरके लिये प्रस्थान, गरुड़‌का आहवनीय अग्निको शान्त करना, श्रीकृष्णद्वारा अग्निगणोंकी पराजय, बाणासुरके सैनिकोंके साथ श्रीकृष्ण आदिका युद्ध, त्रिशिरा ज्वरका आक्रमण और श्रीकृष्णके साथ उसका युद्ध वैशम्पायन उवाच ततस्तूर्यनिनादैश्च शङ्खानां च महास्वनैः । बन्दिमागधसूतानां स्तवैश्चापि सहस्रशः ॥ २ ॥ स तन्मुख्यैर्द्विजाशीर्भिः स्तूयमानो हि मानवैः । बभार रूपं सोमार्कशुक्राणां प्रतिमं तदा ॥ २ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर नाना

विष्णुपर्व ] द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ७०९

प्रकारके वाद्योंकी ध्वनियों तथा शङ्खोंके गम्भीर घोषोंके साथ
सूत, मागध और वन्दीजन उत्तम स्तोत्रोंद्वारा भगवान्‌की
स्तुति करने लगे। ऊपरको मुख किये खड़े हुए मनुष्य उन्हें
विजयसूचक आशीर्वाद देने लगे। उस समय भगवान्‌ने सोम,
सूर्य और शुक्रके समान तेजस्वी रूप धारण कर
लिया था ॥ १-२ ॥
अतीव शुशुभे रूपं व्योम्नि तस्योत्पतिष्यतः ।
वैनतेयस्य भद्रं ते बृंहितं हरितेजसा ॥ ३ ॥
राजन् ! तुम्हारा भला हो ! आकाशमें उड़ते हुए
विनतानन्दन गरुडका रूप भगवान् श्रीहरिके तेजसे व्याप्त
होकर अधिक शोभा पाने लगा ॥ ३ ॥
अथाष्टबाहुः कृष्णस्तु पर्वताकारसंनिभः ।
विवभौ पुण्डरीकाक्षो विकाङ्क्षन् बाणसंक्षयम् ॥ ४ ॥
तदनन्तर कमलनयन श्रीकृष्ण आठ भुजाएँ धारण करके
बाणासुरका विनाश चाहते हुए पर्वतके समान विशालकाय
हो अधिक शोभा पाने लगे ॥ ४ ॥
असिचक्रगदाबाणा दक्षिणं पार्श्वमास्थिताः ।
चर्म शार्ङ्गं तथा वज्रं शङ्खं चैवास्य वामतः ॥ ५ ॥
खड्ग, चक्र, गदा और बाण—ये चार आयुध उनके
दाहिने पार्श्वमें खड़े थे; ढाल, धनुष, वज्र और शङ्ख—ये
वामपार्श्वमें स्थित थे ॥ ५ ॥
शीर्षाणां वै सहस्रं तु विहितं शार्ङ्गधन्वना ।
सहस्रं चैव कायानां वहन् संकर्षणस्तदा ॥ ६ ॥
उस समय शार्ङ्गधन्वा भगवान् श्रीकृष्णने अपने सहस्रों
सिर बना लिये और संकर्षण सहस्रों शरीर धारण करने लगे॥
श्वेतप्रहरणोऽधृष्यः कैलास इव शृङ्गवान् ।
प्रस्थितो गरुडेनाथ उद्यन्निव निशाकरः ॥ ७ ॥
श्वेत आयुधसे युक्त अजेय वीर बलराम शिखरयुक्त
कैलासके समान शोभा पाते थे। वे गरुड़के द्वारा यात्रा करते
समय उदयकालके चन्द्रमाकी भाँति प्रकाशित हो रहे थे ॥
सनत्कुमारस्य वपुः प्रादुरासीन्महात्मनः ।
प्रद्युम्नस्य महाबाहोः संग्रामे विक्रमिष्यतः ॥ ८ ॥
संग्राममें पराक्रम करनेको उद्यत हुए महाबाहु प्रद्युम्नके
शरीरमें महात्मा सनत्कुमारका स्वरूप प्रकट हो गया ॥ ८ ॥
स पक्षबलविक्षेपैर्विधुन्वन् पर्वतान् बहून् ।
जगाम मार्गं बलवान् वातस्य प्रतिषेधयन् ॥ ९ ॥
बलवान् गरुड़ अपने पङ्खोंके बलपूर्वक संचालनसे बहु-
संख्यक पर्वतोंको कम्पित करते और वायुका मार्ग रोकते
हुए चले ॥ ९ ॥
अथ वायोरतिगतिमास्थाय गरुडस्तदा ।
सिद्धचारणसंघानां शुभं मार्गमवातरत् ॥ १० ॥
तत्पश्चात् वायुसे भी बढ़कर तीव्र गतिका आश्रय ले गरुड़ तत्काल ही सिद्धों और चारणसमूहोंके शुभ मार्गपर जा
पहुँचे ॥ १० ॥
अथ रामोऽब्रवीद् वाक्यं कृष्णमप्रतिमं रणे ।
स्वाभिः प्रभाभिर्हीनाः स्म कृष्ण कस्मादपूर्ववत् ॥ ११ ॥
उस समय बलरामजीने रणभूमिमें अनुपम शक्तिशाली
श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा—'कृष्ण ! हमलोग अपनी
स्वाभाविक कान्तिसे रहित हो अपूर्ववत् कैसे हो गये ? ॥ ११॥
सर्वे कनकवर्णाभाः संवृत्ताः स्म न संशयः ।
किमिदं ब्रूहि नस्तत्त्वं किं मेरोःपार्श्वगा वयम् ॥ १२ ॥
'हम सब लोगोंकी अङ्गकान्ति सुवर्णके समान हो गयी है,
इसमें संशय नहीं है; ऐसा क्यों हुआ ? यह हमें ठीक-ठीक
बताओ, क्या हम मेरु पर्वतके आसपास चल रहे हैं ?' ॥ १२ ॥

श्रीभगवानुवाच
मन्ये बाणस्य नगरमभ्यासस्थमरिंदम ।
रक्षार्थं तस्य निर्यातो वह्निरेष स्थितो ज्वलन् ॥ १३ ॥
श्रीभगवान् बोले—शत्रुदमन ! मैं समझता हूँ बाणा-
सुरका नगर अब निकट ही है। उसकी रक्षाके लिये बाहर
निकलकर यह अग्निदेव प्रज्वलित होते हुए खड़े हैं ॥ १३ ॥
अग्नेराहवनीयस्य प्रभया स्म समाहताः ।
तेन नो वर्णरूप्यमिदं जातं हलायुध ॥ १४ ॥
भैया हलायुध ! हमलोग आहवनीय अग्निकी प्रभासे
आहत हैं; इसीसे हमारी अङ्गकान्तिमे यह परिवर्तन आ
गया है ॥ १४ ॥

श्रीराम उवाच
यदि स्म संनिकर्षस्था यदि निष्प्रभतां गताः ।
तद् विधत्स्व स्वयं बुद्ध्या यदत्रानन्तरं हितम् ॥ १५ ॥
बलरामजीने पूछा—श्रीकृष्ण ! यदि हमलोग शोणित-
पुरके निकट हैं और यदि इस अग्निकी प्रभासे आहत होकर
हमलोग निष्प्रभ हो गये हैं तो अब तुम स्वयं ही बुद्धिसे
सोचकर बताओ कि अब यहाँ क्या करनेसे हमारा हित होगा॥

श्रीभगवानुवाच
कुरुष्व वैनतेय त्वं यच्च कार्यमनन्तरम् ।
त्वया विधाने विहिते करिष्याम्यहमुत्तमम् ॥ १६ ॥
श्रीभगवान् बोले—विनतानन्दन ! अब यहाँ जो
आवश्यक कर्तव्य हो, वह तुम्हीं करो। तुम्हारे द्वारा इस
अग्निके निवारणका उपाय कर लिये जानेपर मैं उत्तम पराक्रम
प्रकट करूँगा ॥ १६ ॥

वैशम्पायन उवाच
एतच्छ्रुत्वा तु गरुडो वासुदेवस्य भाषितम् ।
चक्रे मुखसहस्रं हि कामरूपी महाबलः ॥ १७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! वसुदेवनन्दन
श्रीकृष्णका यह कथन सुनकर इच्छानुसार रूप धारण करने-
वाले महाबली गरुडने अपने हजारों मुख बना लिये ॥ १७ ॥

७९०श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

गङ्गामुपागमत तूर्णं वैनतेयो महाबलः।
आप्लुत्याकाशगङ्गायामापीय सलिलं बहु ॥ १८ ॥
प्रववर्षोपरि गतो वैनतेयः प्रतापवान् ।
तेनाग्निं शमयामास बुद्धिमान् विनतात्मजः ॥ १९ ॥

तत्पश्चात् वे महाबली विनतानन्दन तुरंत ही गङ्गाजीके तटपर गये। वहाँ आकाशगङ्गामें उतरकर प्रतापी गरुडने बहुत-सा जल पी लिया और अग्निदेवके ऊपर जाकर वर्षा की। उस उपायसे बुद्धिमान् विनताकुमारने पूर्वोक्त अग्निको बुझा दिया ॥ १८-१९ ॥

अग्निराहवनीयस्तु ततः शान्तिमुपागमत् ।
तं दृष्ट्वाहवनीयं तु शान्तमाकाशगङ्गया ।
परमं विस्मयं गत्वा सुपर्णो वाक्यमब्रवीत् ॥ २० ॥

फिर तो आहवनीय अग्निदेव शान्त हो गये। आकाश-गङ्गाके जलसे आहवनीय अग्निको शान्त हुआ देख गरुड़ महान् आश्चर्यमें पड़कर बोले—॥ २० ॥

अहो वीर्यमथाग्नेस्तु यो दहेद् युगसंक्षये ।
यथेदं वर्णवैरूप्यं चक्रे कृष्णस्य धीमतः ॥ २१ ॥

'अहो ! अग्निका बल तो अद्भुत है, क्योंकि वे महाप्रलयके समय तीनों लोकोंको दग्ध कर सकते हैं; जैसे कि यहाँ इन्होंने बुद्धिमान् श्रीकृष्णके रूप-रंगमें परिवर्तन ला दिया या ॥

त्रयाणां लोकानां पर्याप्त इति मे मतिः ।
कृष्णः संकर्षणश्चैव प्रद्युम्नश्च महाबलः ॥ २२ ॥

'(तथापि श्रीकृष्णके प्रभावसे आकाश-गङ्गाद्वारा यह बुझ गये) मेरा तो यह विश्वास है कि श्रीकृष्ण, संकर्षण और महाबली प्रद्युम्न—ये तीन वीर तीनों लोकोंका सामना करनेके लिये पर्याप्त हैं' ॥ २२ ॥

ततः प्रशान्ते दहने सम्प्रतस्थे स पक्षिराट् ।
स्वपक्षबलविक्षेपं कुर्वन् घोरं महास्वनम् ॥ २३ ॥

तदनन्तर आग बुझ जानेपर पक्षिराज गरुड़ अपने पंखोंके बलपूर्वक संचालनसे भयंकर एवं महान् कोलाहल करते हुए आगे बढ़े ॥ २३ ॥

तं दृष्ट्वा विस्मयं तत्र रुद्रस्यानुचराग्नयः ।
आस्थिता गरुडं ह्येते नानारूपा भयावहाः ॥ २४ ॥
किमर्थमिह सम्प्राप्ताः के चापीमे जनास्त्रयः ।

वहाँ उन्हें देखकर रुद्रके अनुचर अग्निगणोंको बड़ा विस्मय हुआ। वे सोचने लगे, 'ये नाना रूपधारी भयंकर वीर गरुड़पर चढ़कर किस लिये यहाँ आये हैं तथा ये तीनों पुरुष कौन हैं ?' ॥ २४ ½ ॥

निश्चयं नाधिगच्छन्ति ते गिरिव्रजवह्नयः ॥ २५ ॥
प्रावर्तयंश्च संग्रामं तैस्त्रिभिः सह यादवैः ।

इस प्रकार पर्वतोंपर विचरनेवाले वे अग्निगण किसी निश्चयपर नहीं पहुँच सके; अतः उन्होंने उन तीनों यादव-वीरोंके साथ युद्ध छेड़ दिया ॥ २५ ½ ॥

तेषां युद्धप्रसक्तानां संनादः सुमहानभूत् ॥ २६ ॥
तं च श्रुत्वा महानादं सिंहानामिव गर्जताम् ।
अथाङ्गिराः स्वपुरुषं प्रेषयामास बुद्धिमान् ॥ २७ ॥

युद्धमें आसक्त हुए उन अग्नियोंका महान् सिंहनाद प्रकट होने लगा। दहाड़ते हुए सिंहोंके समान उनके उस महानादको सुनकर बुद्धिमान् अङ्गिराने अपने एक पुरुषको वहाँ भेजा ॥ २६-२७ ॥

यत्र तद् वर्तते युद्धं तत्र गच्छस्व मा चिरम् ।
दृष्ट्वा तत् सर्वमागच्छ इत्युक्तः प्रहितस्त्वरन् ॥ २८ ॥

उन्होंने उससे कहा—'जहाँ वह युद्ध हो रहा है वहाँ शीघ्र जाओ और वह सब कुछ देखकर शीघ्र लौट आओ।' ऐसा कहकर उन्होंने उसे बड़ी उतावलीके साथ भेजा ॥ २८ ॥

तथेत्युक्त्वा स तद् युद्धं वर्तमानमवैक्षत ।
अग्नीनां वासुदेवेन संसक्तानां महामृधे ॥ २९ ॥

तब 'बहुत अच्छा' कहकर उस पुरुषने महासमरमें भगवान् वासुदेवके साथ उलझे हुए अग्निगणोंके उस वर्तमान युद्धको देखा ॥ २९ ॥

ते जातवेदसः सर्वे कल्माषः कुसुमस्तथा ।
दहनः शोषणश्चैव तपनश्च महाबलः ॥ ३० ॥
स्वाहाकारस्य विषये प्रख्याताः पञ्च वह्नयः ।

वे सबके-सब जातवेदा अग्नि थे; उनके नाम इस प्रकार थे—कल्माष, कुसुम, दहन, शोषण और महाबली तपन। ये स्वाहाकारविषयक पाँच प्रख्यात अग्नि कहे गये हैं ॥ ३० ½ ॥

अथापरे महाभागाः स्वैरनीकैर्व्यवस्थिताः ॥ ३१ ॥
पिठरः पतगः स्वर्णः श्वागाधो भ्राज एव च ।
स्वधाकाराश्रयाः पञ्च मयुध्यंस्तेऽपि चाग्नयः ॥ ३२ ॥

इनके सिवा दूसरे महाभाग अग्नि भी अपने सैनिकोंके साथ खड़े थे, जिनके नाम थे—पिठर, पतग, स्वर्ण, श्वागाध और भ्राज। ये पाँच स्वधाकारका आश्रय लेकर रहनेवाले अग्नि कहे गये हैं; ये अग्नि भी वहाँ युद्ध कर रहे थे ॥

ज्योतिष्टोमविभागी च वषट्काराश्रयौ पुनः ।
द्वावग्नी सम्प्रयुध्येते महात्मानौ महाद्युती ॥ ३३ ॥

इनके सिवा वषट्कारके आश्रयमें रहनेवाले दो महा-तेजस्वी और महामनस्वी अग्नि, जिनका नाम ज्योतिष्टोम और विभाग था, वहाँ युद्ध कर रहे थे ॥ ३३ ॥

आग्नेयं रथमास्थाय शरमुद्यम्य भास्वरम् ।
तयोर्मध्येऽङ्गिराश्चैव महर्षिर्विबभौ रणे ॥ ३४ ॥

इन दोनोंके बीचमें प्रमुख अग्नि महर्षि अङ्गिरा आग्नेय रथपर आरूढ़ हो एक तेजस्वी बाण हाथमें लिये रणभूमिमें प्रकाशित हो रहे थे ॥ ३४ ॥

स्थितमङ्गिरसं दृष्ट्वा विमुञ्चन्तं शिताञ्छरान् ।
कृष्णः प्रोवाच संक्रुद्धः सयन्निव पुनः पुनः ॥ ३५ ॥

विष्णुपर्व ] द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ७११


महर्षि अङ्गिराको पैने बाण छोड़ते हुए वहाँ स्थित देख क्रोधमें भरे हुए भगवान् श्रीकृष्ण वारंवार मुसकराते हुए-से बोले—॥ ३५ ॥
तिष्ठध्वमग्नयः सर्वे एष वो विदधे भयम् ।
ममास्त्रतेजसा दग्धा दिशो यास्यथ विद्रुताः ।
अथाङ्गिरास्त्रिशूलेन दीप्तेन समधावत ॥ ३६ ॥
आददान इव क्रोधात् कृष्णप्राणान् महामृधे ।
'अग्नियो ! तुम सब लोग खड़े रहो ! मैं अभी तुम्हारे लिये भयकी सृष्टि करता हूँ । मेरे अस्त्रके तेजसे दग्ध होकर तुम स्वयं ही सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग जाओगे।' यह सुनकर अङ्गिराने उस महासमरमे क्रोधपूर्वक चमकता हुआ त्रिशूल हाथमें लेकर श्रीकृष्णपर धावा किया, मानो वे उनके प्राण ले लेनेको उद्यत हों ॥ ३६½ ॥
त्रिशूलं तस्य दीप्तं तु चिच्छेद परमेषुभिः ।
अर्धचन्द्रैस्तथा तीक्ष्णैर्यमान्तकनिभोपमैः ॥ ३७ ॥
श्रीकृष्णने अपने तीखे अर्द्धचन्द्राकार उत्तम बाणोंसे, जो यमराजके समान क्रूर और अन्तकके समान प्राणहारी थे, उनके चमकते हुए त्रिशूलको काट डाला ॥ ३७ ॥
स्थूणाकर्णेन बाणेन दीप्तेन स महामनाः ।
विव्याधान्तकतुल्येन वक्षस्यङ्गिरसं ततः ॥ ३८ ॥
इसके बाद उन महामना श्रीहरिने स्थूणाकर्ण नामक कालसदृश तेजस्वी बाणद्वारा अङ्गिराकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी ॥ ३८ ॥
रुधिरौघप्लुताङ्गाङ्गैरङ्गिरा विह्वलन्निव ।
विष्टब्धगात्रः सहसा पपात धरणीतले ॥ ३९ ॥
अङ्गिराका सारा शरीर लहूलुहान हो गया । उनकी देह अकड़ गयी और वे विह्वल होकर सहसा पृथ्वीपर गिर पड़े ॥
शेषास्ततोऽग्नयः सर्वे चत्वारो ब्रह्मणः सुताः ।
आवाहयन्तदा शीघ्रं बाणस्य पुरमन्तिकात् ॥ ४० ॥
तत्पश्चात् शेष सब अग्नि जो ब्रह्माजीके चार पुत्र हैं, उस समय उन्हें शीघ्र ही बाणासुरके नगरके निकट उठा ले गये ॥ ४० ॥
अथागमत् ततः कृष्णो यत्र बाणपुरं ततः ।
अथ बाणपुरं दृष्ट्वा दूरात् प्रोवाच नारदः ॥ ४१ ॥
तत्पश्चात् श्रीकृष्ण जहाँ बाणासुरका नगर निकट था, वहाँ गये । बाणपुरको दूरसे ही देखकर नारदजीने कहा—॥४१॥
एतत् तच्छोणितपुरं कृष्ण पश्य महाभुज ।
अत्र रुद्रो महातेजा रुद्राण्या सहितोऽवसत् ॥ ४२ ॥
गुहश्च बाणगुप्त्यर्थं सततं क्षेमकारणात् ।
'महाबाहु श्रीकृष्ण ! देखिये, यही शोणितपुर है। यहाँ महातेजस्वी रुद्रने देवी रुद्राणीके साथ निवास किया है। बाणासुरकी रक्षा तथा उसके क्षेमके लिये कार्तिकेय भी यहाँ सदा निवास करते हैं' ॥ ४२½ ॥

नारदस्य वचः श्रुत्वा कृष्णः सम्प्रहसन् ब्रवीत् ॥ ४३ ॥
क्षणं चिन्त्यतामत्र श्रूयतां च महामुने ।
यदि वावतरेद् रुद्रो बाणसंरक्षणं प्रति ॥ ४४ ॥
शक्तितो वयमप्यत्र सह योत्स्याम तेन वै ।
नारदजीकी यह बात सुनकर श्रीकृष्ण हँसते हुए बोले— 'महामुने ! आप यहाँ मेरी बात सुनिये और क्षणभर उसपर विचार कीजिये । यदि बाणासुरकी रक्षाके लिये भगवान् रुद्र उतर आयेंगे तो हमलोग भी अपनी शक्तिके अनुसार उनके साथ युद्ध अवश्य करेंगे' ॥ ४३-४४½ ॥
एवं विवदतोस्तत्र कृष्णनारदयोस्तदा ॥ ४५ ॥
प्राप्ता निमेषमात्रेण शीघ्रगा गरुडेन ते ।
इस प्रकार वहाँ नारद और श्रीकृष्णमें बातचीत हो रही थी कि गरुड़के द्वारा शीघ्र चलकर वे सब लोग निमेषमात्रमें जा पहुँचे ॥ ४५½ ॥
ततः शङ्खं समाधाय वदने पुष्करेक्षणः ॥ ४६ ॥
वायुवेगसमुद्भूतो मेघश्चन्द्रमिवोद्गिरन् ।
तब कमलनयन श्रीकृष्णने शङ्खको अपने मुँहसे लगाकर बजाया । उस समय ऐसा जान पड़ता था मानो कोई मेघ वायुके वेगसे प्रेरित होकर चन्द्रमाको उगल रहा हो ॥४६½॥
ततः प्रध्माप्य तं शङ्खं भयमुत्पाद्य वीर्यवान् ॥ ४७ ॥
प्रविवेश पुरं कृष्णो बाणस्याद्भुतकर्मणः ।
इस प्रकार उस शङ्खको बजाकर असुरोंके मनमें भय उत्पन्न करके पराक्रमी श्रीकृष्णने अद्भुत कर्म करनेवाले बाणासुरके पुरमें प्रवेश किया ॥ ४७½ ॥
ततः शङ्खप्रणादैश्च भेरीणां च महास्वनैः ॥ ४८ ॥
बाणानीकानि सहसा संनह्यन्त समन्ततः ।
तदनन्तर शङ्खोंके शब्दों और भेरियोंके गम्भीर घोषोंसे प्रेरित हो बाणासुरकी सारी सेनाएँ सहसा सब ओरसे कवच आदि पहनकर युद्धके लिये तैयार हो गयीं ॥ ४८½ ॥
ततः किंकरसैन्यं तु व्यादिष्टं समरे भयात् ॥ ४९ ॥
कोटिशश्चापि बहुशो दीप्तप्रहरणास्तदा ।
तत्पश्चात् बाणासुरने भयके कारण युद्धके लिये अपने किङ्कर नामक सैनिकोको आज्ञा दी। उनकी संख्या कई करोड़की थी । उन सबके पास चमकीले अस्त्र-शस्त्र थे ॥
तदसंख्येयमेकस्थं महाभ्रघनसंनिभम् ॥ ५० ॥
नीलाञ्जनचयप्रख्यमप्रमेयमथाक्षयम् ।
एक स्थानपर खड़ी हुई वह असंख्य सेना महान् मेघोंकी घटाके समान जान पड़ती थी । उसकी कान्ति नीली अञ्जनराशिके समान दिखायी देती थी। वह अप्रमेय और अक्षय थी ॥ ५०½ ॥
दीप्तप्रहरणाः सर्वे दैत्यदानवराक्षसाः ॥ ५१ ॥
प्रमाथगणमुख्याश्च अयुध्यन् कृष्णमव्ययम् ।
उस सेनामें जो दैत्य, दानव और राक्षस थे, उन सबके

७१२ श्रीमद्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे हाथोंमें चमकीले अस्त्र-शस्त्र शोभा पा रहे थे। भगवान् शिवके प्रमथगणोंमें जो मुख्य-मुख्य वीर थे, वे भी वहाँ आकर अविनाशी भगवान् शिवके साथ युद्ध करने लगे ॥ ५१३ ॥ सर्वतस्तैः प्रदीप्तास्त्रैः सार्चिष्मद्भिरिवाग्निभिः ॥ ५२ ॥ अभ्युपेत्य तदात्युग्रैर्यक्षरक्षस्किन्नरैः । पीयते रुधिरं तेषां चतुर्णामपि संयुगे ॥ ५३ ॥ चमकीले अस्त्र-शस्त्र धारण करनेके कारण जो लपटोंसे युक्त अग्नियोंके समान प्रतीत होते थे, वे भयंकर यक्ष, राक्षस और किन्नर सब ओरसे निकट आकर युद्धस्थलमें श्रीकृष्ण, बलभद्र, प्रद्युम्न और गरुड़ - इन चारोंका रक्त पीनेकी चेष्टा करने लगे ॥ ५२-५३ ॥ तद् बलं तु समासाद्य बलभद्रो महाबलः । प्रोवाच वचनं तत्र परस्य बलनाशनः ॥ ५४ ॥ शत्रुओंकी सेनाका नाश करनेवाले महाबली बलभद्र बाणासुरकी उस सेनाको निकट पाकर श्रीकृष्णसे इस प्रकार बोले- ॥ ५४ ॥ कृष्ण कृष्ण महाबाहो विधत्स्वैषां महत् भयम् । इति संचोदितः कृष्णो बलभद्रेण धीमता ॥ ५५ ॥ तेषां वधार्थमाग्नेयं जग्राह पुरुषोत्तमः । अस्त्रमस्त्रविदां श्रेष्ठो यमान्तकसमप्रभः । 'कृष्ण ! कृष्ण ! महाबाहो ! इनके लिये महान् भय उपस्थित करो !' बुद्धिमान् बलभद्रके द्वारा इस प्रकार प्रेरित हो अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने उन शत्रुओंके वधके लिये आग्नेयास्त्र हाथमें लिया। उस समय वे यम और अन्तकके समान भयंकर जान पड़ते थे ॥ ५५३ ॥ प्रविधूयासुरगणान् क्रव्यादानस्त्रतेजसा ॥ ५६ ॥ प्रययौ त्वरया युक्तो यत्र दृश्येत तद् बलम् । अपने अस्त्रके तेजसे उन मांसाहारी असुरोंको नष्ट करके श्रीकृष्ण बड़ी उतावलीके साथ उस स्थानपर गये, जहाँ वह शत्रुसेना दिखायी दे रही थी ॥ ५६३ ॥ शूलपट्टिशशक्त्यृष्टिपिनाकपरिघायुधम् ॥ ५७ ॥ प्रमाथगणभूयिष्ठं बलं तदभवत् क्षितौ । शूल, पट्टिश, शक्ति, ऋष्टि, पिनाक और परिघ आदि आयुधोंसे युक्त वह सेना, जिसमें प्रमथगणोंकी अधिकता थी, भूतलपर खड़ी थी ॥ ५७३ ॥ शैलमेघप्रतीकाशैर्नानरूपैर्भयानकैः । वाहनैः संघशः सर्वै योधास्तत्रावतस्थिरे ॥ ५८ ॥ पर्वत और मेघोंके समान दिखायी देनेवाले नाना रूपधारी भयानक वाहनोंपर आरूढ़ हो वे समस्त योद्धा वहाँ संघबद्ध होकर खड़े थे ॥ ५८ ॥ वातोद्भूतैरिव घनैर्विप्रकीर्णैरिवाचलैः । शुशुभे तत्र बहुलैर्नानैर्दृढधन्विभिः ॥ ५९ ॥ सुदृढ़ धनुष धारण करनेवाले बहुसंख्यक सैनिकोंसे, जो वायुद्वारा उड़ाये गये छिन्न-भिन्न बादलों तथा बिखरे हुए पर्वतोंके समान दूरतक फैले हुए थे, उस स्थानकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ ५९ ॥ मुसलैरसिभिः शूलैर्गदाभिः परिघैस्तथा । अगाधं तदसंख्येयं शुशुभे सर्वतो बलम् ॥ ६० ॥ वह असंख्य एवं अगाध सेना सब ओरसे मुसल, खड्ग, शूल, गदा और परिघ आदिके द्वारा सुशोभित हो रही थी ॥ ततः संकर्षणो देवमुवाच मधुसूदनम् । कृष्ण कृष्ण महाबाहो यदेतद् दृश्यते बलम् । एतैः सह रणे योद्धुमिच्छामि पुरुषोत्तम ॥ ६१ ॥ तब संकर्षणने भगवान् मधुसूदनसे कहा- 'कृष्ण ! कृष्ण ! महाबाहो ! पुरुषोत्तम ! यह जो सेना दिखायी देती है, रणभूमिमें इसके सैनिकोंके साथ मैं युद्ध करना चाहता हूँ' ॥ श्रीकृष्ण उवाच ममाप्येषा संजाता बुद्धिरित्यब्रवीच्च तम् । एभिः सह रणे योद्धुमिच्छेयं योधसत्तमैः ॥ ६२ ॥ युध्यतः प्राङ्मुखस्यास्तु सुपर्णो वै ममाग्रतः । सव्यपार्श्वे तु प्रद्युम्नस्तथा मे दक्षिणे भवान् । रक्षितव्यमथान्योन्यमस्मिन् घोरे महामृधे ॥ ६३ ॥ श्रीकृष्ण बोले- 'मेरे मनमें भी ऐसा विचार उत्पन्न हुआ है।' ऐसा कहकर वे पुनः उनसे बोले, 'भैया ! रण- भूमिमें इन श्रेष्ठ योद्धाओंके साथ मैं युद्ध करना चाहता हूँ। पूर्वाभिमुख होकर युद्ध करते समय मेरे आगे-आगे तो गरुड़ रहें, बायीं ओर प्रद्युम्न हों और दाहिनी ओर आप रहें। इस घोर महायुद्धमें हमें एक दूसरेकी रक्षा करनी चाहिये ॥ वैशम्पायन उवाच एवं ब्रवन्तस्ते ऽन्योन्यमधिरूढाः खगोत्तमम् । गिरिशृङ्गेन्निभैर्घोरैर्गदामुसलाङ्गलैः ॥ ६४ ॥ युध्यतो रौहिणेयस्य रौद्रं रूपमभूत् तदा । युगान्ते सर्वभूतानां कालस्येव दिधक्षतः ॥ ६५ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! परस्पर ऐसी बातचीत करके पक्षिप्रवर गरुड़पर चढ़े हुए वे तीनों वीर युद्ध करने लगे । पर्वतके शिखरोंकी भाँति भयंकर गदा, मुसल और हलसे युद्ध करते हुए रोहिणीकुमार बलभद्रका रूप उस समय वैसा ही भयंकर हो उठा, जैसा कि प्रलय- कालमें सम्पूर्ण भूतोंको दग्ध कर देनेकी इच्छावाले कालका रूप होता है ॥ ६४-६५ ॥ आकृष्य लाङ्गलाग्रेण मुसलेनावपोथयत् । चचाराप्रतिमो रामो युद्धमार्गविशारदः ॥ ६६ ॥ युद्धमार्गोंके विशेषज्ञ अत्यन्त बलशाली बलराम रणभूमिमें सब ओर विचरने लगे। वे हलके अग्रभागसे शत्रुओंको खींचकर उन्हें मुसलसे मार गिराते थे ॥ ६६ ॥ प्रद्युम्नः शरजालैस्तान् समन्तात् पर्यवारयत् । दानवान् पुरुषव्याघ्रो युध्यमानान् महाबलः ॥ ६७ ॥ पुरुषसिंह महाबली प्रद्युम्नने बाणोंका जाल-सा बिछाकर वहाँ जूझते हुए दानवोंको सब ओरसे ढक दिया ॥ ६७ ॥

विष्णुपर्व ] द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ७१३


स्निग्धाञ्जनचयप्रख्यः शङ्खचक्रगदाधरः ।
प्रध्माय बहुशः शङ्खमयुध्यत जनार्दनः ॥ ६८ ॥
चिकनी अञ्जनराशिके समान कान्तिमान् जनार्दन अपने हाथोंमें शङ्ख, चक्र और गदा लिये हुए थे। वे बारंबार शङ्ख बजाकर युद्ध करने लगे ॥ ६८ ॥

पक्षप्रहारनिहता नखतुण्डाग्रदारिताः ।
नीता वैवस्वतपुरं वैनतेयेन धीमता ॥ ६९ ॥
बुद्धिमान् विनतानन्दन गरुड़ने बहुत-से दानवोंको पंजों और चोंचके अग्रभागसे विदीर्ण करके तथा कितनोंको पंखोंके प्रहारसे हनाहत करके यमलोक पहुँचा दिया ॥ ६९ ॥

तैर्हन्यमानं दैत्यानामनीकं भीमविक्रमम् ।
अभज्यत तदा संख्ये बाणवर्षसमाहतम् ॥ ७० ॥
उन चारोंके द्वारा मारी जाती हुई भयानक पराक्रम-वाली दैत्य-सेनाके पाँव उखड़ गये। वह युद्धस्थलमें बाणोंकी वर्षासे क्षत विक्षत हो गयी थी ॥ ७० ॥

भज्यमानेष्वनीकेषु त्रातुकामः समभ्ययात् ।
ज्वरस्त्रिपादस्त्रिशिराः षड्भुजो नवलोचनः ॥ ७१ ॥
भस्मप्रहरणो रौद्रः कालान्तकयमोपमः ।
नदन् मेघसहस्रेण तुल्यो निर्घातनिःस्वनः ॥ ७२ ॥
जब इस प्रकार सारी सेनाएँ भागने लगीं, तब उनकी रक्षा करनेके लिये त्रिशिरा नामक ज्वर सामने आया। उसके तीन पैर, तीन सिर, छः बाँहें और नौ आँखें थीं। भस्म ही उसका आयुध था। वह काल, अन्तक और यमके समान भयंकर दिखायी देता था। वह जब सिंहनाद करता, तब गर्जते हुए हजारों मेघोंके समान प्रतीत होता था। उसकी आवाज वज्रकी गड़गड़ाहटके समान जान पड़ती थी ॥

निःश्वसञ्जृम्भमाणश्च निद्रान्विततनुर्भृशम् ।
नेत्राभ्यामाकुलं वक्त्रं मुहुः कुर्वन् भ्रमन् मुहुः ॥ ७३ ॥
वह बारंबार लंबी साँस खींचता और जँभाई लेता था। उसका शरीर निद्रासे अत्यन्त आकुल प्रतीत होता था। वह बारंबार घूमता और अपने दोनों नेत्रोंसे युक्त मुखको व्यथासे व्याकुल बना लेता था ॥ ७३ ॥

संहृष्टरोमा ग्लानाक्षो भग्नचित्त इव श्वसन् ।
हलायुधमभिक्रुद्धः साक्षेपमिदमब्रवीत् ॥ ७४ ॥
उसके रोंगटे खड़े हो रहे थे। नेत्र आदि इन्द्रियाँ गली जा रही थीं। वह भग्नचित्त (हतोत्साह) सा होकर साँस लेता था। उसने क्रोधमें भरकर हलधरसे यह आक्षेपयुक्त बात कही—॥ ७४ ॥

किमेवं बलमत्तोऽसि न मां पश्यसि संयुगे ।
तिष्ठ तिष्ठ न मे जीवन् मोक्ष्यसे रणमूर्धनि ॥ ७५ ॥
'तुम क्यों इस प्रकार बलसे उन्मत्त हो रहे हो ? क्या इस युद्धस्थलमें तुम मुझे नहीं देखते हो ? खड़े रहो, खड़े रहो ! आज इस युद्धके मुहानेपर तुम मेरे हाथसे जीवित नहीं छूट सकोगे' ॥ ७५ ॥

इत्येवमुक्त्वा प्रहसन् हलायुधमुपादवत् ।
युगान्ताग्निनिभैर्घोरैर्मुष्टिभिर्जनयन् भयम् ॥ ७६ ॥
ऐसा कहकर जोर-जोरसे हँसते हुए त्रिशिराने हल नामक आयुध धारण करनेवाले बलरामजीपर आक्रमण किया। वह प्रलयाग्निके समान अपने भयानक मुक्कोंसे भय उत्पन्न कर रहा था ॥ ७६ ॥

चरतस्तत्र संग्रामे मण्डलानि सहस्रशः ।
रौहिणेयस्य शीघ्रेण नावस्थानमदृश्यत ॥ ७७ ॥
रोहिणीकुमार बलभद्र वहाँ संग्राममें सहस्रों पैंतरे बदलते हुए शीघ्रतापूर्वक विचर रहे थे। अतः कहीं उनका ठहरना उसे नहीं दिखायी दिया ॥ ७७ ॥

तस्य भस्म तदा क्षिप्तं ज्वरेणाप्रतिमौजसा ।
शैघ्याद् वक्षो निपतितं शरीरे पर्वतोपमे ॥ ७८ ॥
तब उस अप्रतिम बलशाली ज्वरने बड़ी फुर्तीसे उनके ऊपर भस्म फेंका, जो उनके पर्वताकार शरीरमे छातीपर जाकर गिरा ॥ ७८ ॥

तद् भस्म वक्षसस्तस्य मेरोः शिखरमागमत् ।
प्रदीप्तं पतितं तत्र गिरिशृङ्गं व्यदारयत् ॥ ७९ ॥
वह भस्म उनकी छातीसे मेरुपर्वतके शिखरपर आ गिरा। वहाँ गिरते ही वह प्रज्वलित हो उठा और उसने उस पर्वत शिखरको विदीर्ण कर डाला ॥ ७९ ॥

शेषेण चापि जज्वल भस्मना कृष्णपूर्वजः ।
निःश्वसञ्जृम्भमाणश्च निद्रान्विततनुर्भृशम् ॥ ८० ॥
जो भस्म उनके वक्षःस्थलपर शेष रह गया, उतनेहीसे श्रीकृष्णके बड़े भैया जलने लगे। वे बारंबार साँस और जँभाई लेने लगे। उनका शरीर निद्रासे अत्यन्त अभिभूत हो गया ॥ ८० ॥

नेत्रयोराकुलत्वं च मुहुः कुर्वन् भ्रमंस्तथा ।
संहृष्टरोमा ग्लानाक्षः क्षिप्तचित्त इव श्वसन् ॥ ८१ ॥
वे बारंबार नेत्रोंसे व्याकुलता प्रकट करने और चक्कर काटने लगे। उनके शरीरमें रोमाञ्च हो आया। उनकी नेत्र आदि इन्द्रियाँ गलने लगीं। वे विक्षिप्तचित्त-से होकर लंबी साँस खींचने लगे ॥ ८१ ॥

ततो हलधरो भग्नः कृष्णमाह विचेतनः ।
कृष्ण कृष्ण महाबाहो प्रदीप्तोऽस्म्यभयं कुरु ॥ ८२ ॥
दह्यामि सर्वतस्तात कथं शान्तिर्भवेन्मम ।
उस समय हलधरने हतोत्साह एवं अचेत होकर श्रीकृष्ण-से कहा—'कृष्ण ! कृष्ण ! महाबाहो ! मैं जल रहा हूँ। मेरा भय दूर करो। तात ! मेरे शरीरमें सब ओरसे जलन हो रही है। मुझे किस तरह शान्ति प्राप्त हो' ॥ ८२ १/२ ॥

इत्येवमुक्ते वचने बलेनामिततेजसा ॥ ८३ ॥
प्रहस्य वचनं प्राह कृष्णः प्रहरतां वरः ।
न भेतव्यमितीत्युक्त्वा परिष्वक्तो हलायुधः ॥ ८४ ॥
कृष्णेन परमस्नेहात् ततो दाहात् प्रमुच्यत ।
अमिततेजस्वी बलदेवने जब ऐसी बात कही, तब प्रहार करनेवालोंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्णने उनसे हँसकर कहा—'भैया !

७१४श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

डरो मत।' ऐसा कहकर श्रीकृष्णने बड़े स्नेहके साथ हलधरको हृदयसे लगाया। फिर तो वे तत्काल ही उस दाहसे मुक्त हो गये ॥ ८३-८४ १/२ ॥

मोक्षयित्वा बलं तत्र दाहात् तु मधुसूदनः ॥ ८५ ॥
प्रोवाच परमक्रुद्धो वासुदेवो ज्वरं तदा ।
बलरामजीको वहाँ ज्वरजनित दाहसे मुक्त करके अत्यन्त कुपित हुए वसुदेवनन्दन मधुसूदनने उस समय उस ज्वरसे कहा ॥ ८५ १/२ ॥

श्रीभगवानुवाच
एह्येहि ज्वर युध्यस्व या ते शक्तिर्महामृधे ॥ ८६ ॥
यच्च ते पौरुषं सर्वं तद् दर्शयतु नो भवान् ।
श्रीभगवान् बोले—ज्वर ! आओ, आओ, युद्ध करो। तुम्हारी जो शक्ति है और तुममें जो पुरुषार्थ है, वह सब हमें इस महासमरमें दिखाओ ॥ ८६ १/२ ॥

सव्येतराभ्यां बाहुभ्यामेवमुक्तो ज्वरस्तदा ॥ ८७ ॥
चिक्षेपाग्निं महत् भस्म ज्वालागर्भं महाबलः ।
उनके ऐसा कहनेपर उस महाबली ज्वरने अपनी दोनों दाहिनी भुजाओंसे उनके ऊपर वह महान् भस्म फेंका, जिसके भीतर ज्वाला छिपी हुई थी ॥ ८७ १/२ ॥

ततः प्रदीप्तगात्रस्तु मुहूर्तमभवत् प्रभुः ॥ ८८ ॥
कृष्णः प्रहरतां श्रेष्ठः शमं चाग्निर्गतस्ततः ।
उस भस्मसे दो घड़ीके लिये प्रहार करनेवालोंमें श्रेष्ठ भगवान् श्रीकृष्णका सारा शरीर जल उठा; परंतु फिर वह आग अपने-आप बुझ गयी ॥ ८८ १/२ ॥

ततस्तैर्भुजगाकारैर्बाहुभिस्तु त्रिभिस्तदा ॥ ८९ ॥
जघान कृष्णं ग्रीवायां मुष्टिनैकेन चोरसि ।
तब उस त्रिशिराने अपनी तीन सर्पाकार भुजाओंसे श्रीकृष्णके कण्ठमें प्रहार किया और एक मुक्केसे उनकी छातीपर चोट की ॥ ८९ १/२ ॥

स सम्प्रहारस्तुमुलस्तयोः पुरुषसिंहयोः ॥ ९० ॥
ज्वरस्य तु महायुद्धे कृष्णस्य तु महौजसः ।
पर्वतेषु पतन्तीनामशनीनामिव स्वनः ॥ ९१ ॥
(फिर श्रीकृष्ण भी उस ज्वरको पीटने लगे।) उस महायुद्धमें ज्वर और महातेजस्वी श्रीकृष्ण दोनों पुरुषसिंहोंमें भयंकर मुष्टिका प्रहार होने लगा । उसका शब्द पर्वतोंपर गिरती हुई बिजलियोंकी गड़गड़ाहटके समान प्रतीत होता था॥

कृष्णज्वरभुजाघातैर्युद्धमासीत् सुदारुणम् ।
नैवमेवं प्रहर्तव्यमिति तत्र महास्वनः ।
मुहूर्तमभवद् युद्धमन्योन्यं तु महात्मनोः ॥ ९२ ॥
श्रीकृष्ण और ज्वर दोनोंमें भुजाओंके आघातसे अत्यन्त भयंकर युद्ध हो रहा था। 'ऐसे नहीं, ऐसे प्रहार करना चाहिये' यह शब्द वहाँ बड़े जोर-जोरसे सुनायी देता था। इस प्रकार उन दोनों महात्माओंमें दो घड़ीतक परस्पर युद्ध चलता रहा॥

ततो ज्वरं कनकविचित्रभूषणं
न्यपीडयद् भुजयुगलेन संयुगे ।
जगत्क्षयं समुपनयञ्जगत्पतिः
शरीरधृग् गगनचरं महामृधे ॥ ९३ ॥
तदनन्तर मानवशरीर धारण करके प्रकट हुए जगदीश्वर श्रीहरिने उस महासमरमें सोनेके विचित्र आभूषणोंसे विभूषित उस आकाशचारी ज्वरको अपनी दोनों भुजाओंसे धर दबाया। उस समय ऐसा जान पड़ता था कि वे जगदीश्वर सारे संसारका संहार कर डालेंगे ॥ ९३ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि कृष्णज्वरयुद्धे द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें श्रीकृष्ण और ज्वरका युद्धविषयक एक सौ बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२२ ॥


त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

श्रीकृष्णसे पराजित हुए ज्वरका उनकी शरणमें जाना, उनसे वर पाना और उनकी आज्ञा शिरोधार्य कर रणभूमिसे हट जाना

वैशम्पायन उवाच
मृतमित्यभिविज्ञाय ज्वरं शत्रुनिषूदनः ।
कृष्णो भुजबलाभ्यां तु चिक्षेपाथ महीतले ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! उस ज्वरको मरा हुआ जानकर शत्रुसूदन श्रीकृष्णने अपनी बलिष्ठ भुजाओंसे उठाकर उसे पृथ्वीपर फेंक दिया ॥ १ ॥

मुक्तमात्रः स बाहुभ्यां कृष्णदेहं विवेश ह ।
अमुक्त्वा विग्रहं तस्य कृष्णस्याप्रतिमौजसः ॥ २ ॥
श्रीकृष्णकी भुजाओंसे छूटते ही वह उनके शरीरके भीतर घुस गया; वह अमिततेजस्वी श्रीकृष्णके श्रीविग्रहको छोड़कर न जा सका ॥ २ ॥

स ह्याविष्टस्तथा तेन ज्वरेणाप्रतिमौजसा ।
कृष्णः स्खलन्निव मुहुः क्षितौ गाढं व्यवर्तत ॥ ३ ॥
उस अप्रतिम बलशाली ज्वरसे आविष्ट होकर श्रीकृष्ण बारंबार लड़खड़ाते हुए-से पृथ्वीपर बैठ गये और जोर-जोरसे लोटने लगे ॥ ३ ॥

[विष्णुपर्व ] त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ७१५


जृम्भते श्वसते चैव वल्गते च पुनः पुनः।
रोमाञ्चोत्थितगात्रश्च निद्रया चाभिभूयते ॥ ४ ॥
वे बारंबार जँभाई लेते, लंबी साँस खींचते और उछलते-कूदते थे; उनके सम्पूर्ण अङ्गोंमें रोमाञ्च हो आया और वे निद्रासे अभिभूत होने लगे ॥ ४ ॥

ततः स्थैर्यं समालम्ब्य कृष्णः परपुरंजयः ।
विकुर्वति महायोगी जम्भमाणः पुनः पुनः ॥ ५ ॥
तदनन्तर किसी तरह स्थिरता धारण करके शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले महायोगी श्रीकृष्ण बारंबार जँभाई लेते हुए विकारको प्राप्त होने लगे ॥ ५ ॥

ज्वराभिभूतमात्मानं विज्ञाय पुरुषोत्तमः ।
सोऽसृजज्ज्वरमन्यं तु पूर्वज्वरविनाशनम् ॥ ६ ॥
अपने आपको ज्वरसे आक्रान्त हुआ जान पुरुषोत्तम श्रीहरिने दूसरे ज्वरकी सृष्टि की, जो पूर्व ज्वरका विनाश करनेवाला था ॥ ६ ॥

घोरं वैष्णवमत्युग्रं सर्वप्राणिभयंकरम् ।
संसृष्टवान् स तेजस्वी तं ज्वरं भीमविक्रमम् ॥ ७ ॥
तेजस्वी श्रीकृष्णने जिस भयानक पराक्रमी ज्वरकी सृष्टि की थी, वह घोर वैष्णव ज्वर अत्यन्त उग्र तथा समस्त प्राणियोंके लिये भयङ्कर था ॥ ७ ॥

ज्वरः कृष्णविसृष्टस्तु गृहीत्वा तं ज्वरं बलात् ।
कृष्णाय हृष्टः प्रायच्छत् तं जग्राह ततो हरिः ॥ ८ ॥
श्रीकृष्णद्वारा रचे गये उस ज्वरने पूर्वोक्त त्रिशिरा ज्वरको बलपूर्वक पकड़कर बड़े हर्षके साथ उसे श्रीकृष्णको समर्पित कर दिया। तब श्रीहरिने पुनः उस ज्वरको पकड़ लिया ॥ ८ ॥

ततस्तं परमक्रुद्धो वासुदेवो महाबलः ।
स्वगात्रात् स्वज्वरेणैव निष्कासयत वीर्यवान् ॥ ९ ॥
तब अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए महाबली पराक्रमी भगवान् वासुदेवने अपने ज्वरके द्वारा ही त्रिशिरा ज्वरको अपने शरीरसे निकलवा दिया ॥ ९ ॥

आविध्य भूतले चैनं शतधा कर्तुमुद्यतः ।
व्याघोषत ज्वरस्तत्र भोः परित्रातुमर्हसि ॥ १० ॥
तत्पश्चात् वे उसे पृथ्वीपर घुमाकर उसके सौ टुकड़े कर देनेको उद्यत हो गये, तब वहाँ उस ज्वरने यह पुकार की, 'प्रभो ! आप मेरी रक्षा करें' ॥ १० ॥

आविध्यमाने तस्मिंस्तु कृष्णेनामिततेजसा ।
अशरीरा ततो वाणी ह्यन्तरिक्षादभाषत ॥ ११ ॥
अमिततेजस्वी श्रीकृष्णके द्वारा उस ज्वरके घुमाये जाते समय आकाशसे शरीररहित वाणीने इस प्रकार कहा—॥११॥

कृष्ण कृष्ण महाबाहो यदूनां नन्दिवर्धन ।
मा वधीर्ज्वरमेनं तु रक्षणीयस्त्वयानघ ॥ १२ ॥
'कृष्ण ! कृष्ण !! महाबाहो !!! यदुकुलका आनन्द बढ़ानेवाले निष्पाप श्रीकृष्ण ! आप इस ज्वरका वध न कीजिये, यह आपके द्वारा रक्षणीय है' ॥ १२ ॥

इत्येवमुक्ते वचने तं मुमोच हरिः स्वयम् ।
भूतभव्यभविष्यस्य जगतः परमो गुरुः ॥ १३ ॥
आकाशवाणीके ऐसा कहनेपर भूत, भविष्य और वर्तमान जगत्‌के परम गुरु साक्षात् श्रीहरिने उसे छोड़ दिया ॥ १३ ॥

कृष्णस्य पादयोर्मूर्ध्ना शरणं सोऽगमज्ज्वरः ।
एवं मुक्तो हृषीकेशं ज्वरो वाक्यमथाब्रवीत् ॥ १४ ॥
उनके हाथसे इस प्रकार मुक्त होकर वह ज्वर श्रीकृष्णके दोनों चरणोंमें मस्तक रखकर उन्हींकी शरणमें गया और उन भगवान् हृषीकेशसे इस प्रकार बोला—॥ १४ ॥

शृणुष्व मम गोविन्द विज्ञाप्यं यदुनन्दन ।
यो मे मनोरथो देव तं त्वं कुरु महाभुज ॥ १५ ॥
'गोविन्द ! यदुनन्दन ! मेरा निवेदन सुनिये । देव ! महाबाहो ! मेरा जो मनोरथ है, उसे पूर्ण कीजिये ॥ १५ ॥

अहमेको ज्वरस्तात नान्यो लोके ज्वरो भवेत् ।
त्वत्प्रसादाद्धि देवेश वरमेनं वृणोम्यहम् ॥ १६ ॥
'तात ! देवेश्वर ! संसारमें मैं एक ज्वर हूँ, अब मेरे सिवा दूसरा कोई ज्वर न हो। आपकी कृपासे मैं इस वरको माँगता हूँ' ॥ १६ ॥

देव उवाच
एवं भवतु भद्रं ते यथा त्वं ज्वर काङ्क्षसे ।
वरार्थिनां वरो देयो भवांश्च शरणं गतः ॥ १७ ॥
श्रीभगवान्ने कहा— ज्वर ! तुम्हारा भला हो, तुम जैसा चाहते हो, ऐसा ही हो।' मेरे लिये सभी वरार्थियोंको वर देना उचित है, तुम तो वरार्थी होकर मेरी शरणमें आये हो ( अतः तुम विशेष कृपाके पात्र हो ) ॥ १७ ॥

एक एव ज्वरो लोके भवानस्तु यथा पुरा ।
योऽयं मया ज्वरः सृष्टो मय्येवैष प्रलीयताम् ॥ १८ ॥
तुम पहलेकी ही भाँति संसारमें एक ही ज्वरके रूपमें रहो । मैंने जो इस ज्वरकी सृष्टि की है, यह फिर मुझमें ही लीन हो जाय ॥ १८ ॥

वैशम्पायन उवाच
एवमुक्ते तु वचने ज्वरं प्रति महायशाः ।
कृष्णः प्रहरतां श्रेष्ठः पुनर्वाक्यमुवाच ह ॥ १९ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! उस ज्वरके प्रति ऐसी बात कहकर प्रहार करनेवालोंमें श्रेष्ठ महायशस्वी श्रीकृष्ण पुनः इस प्रकार बोले ॥ १९ ॥

वासुदेव उवाच
शृणुष्व ज्वर संदेशं यथा लोके चरिष्यसि ।
सर्वजातिषु विश्रब्धं यथा स्थावरजङ्गमे ॥ २० ॥
वासुदेवने कहा— ज्वर ! मेरा संदेश सुनो, जिसके अनुसार तुम चराचर जगत्में सभी जातिके प्राणियोंके भीतर बेखटके विचरण करोगे ॥ २० ॥

तृतीयो यश्च ते भागो मानुषेषूपपत्स्यते ।

७१६ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे त्रिधा विभज्य चात्मानं मन्प्रियं यदि काङ्क्षसे । चतुष्पादान् भजैकेन द्वितीयेन च स्थावरान् ॥ २१ ॥ तृतीयो यश्च ते भागो मानुषेषूपपत्स्यते । त्रिधाभूतं वपुः कृत्वा पक्षिषु त्वं भव ज्वर ॥ २२ ॥ चतुर्थो यस्तृतीयस्य भविष्यति स ते ध्रुवम् । एकान्तरस्तृतीयस्तु स वै चातुर्थिको ज्वरः ॥ २३ ॥ यदि तुम मेरा प्रिय करना चाहते हो तो अपने आप- को तीन भागोंमें विभक्त करके एक भागसे चौपायोंका आश्रय लो, द्वितीय भागसे वृक्ष, पर्वत आदि स्थावर वस्तुओंका सेवन करो तथा तुम्हारा जो तीसरा भाग है, वह मनुष्योंमें रहने योग्य होगा । ज्वर ! इस प्रकार तुम अपने स्वरूपको तीन भागोंमें बाँटकर उपर्युक्त स्थानोंमें रहो तथा तुम्हारे तीसरे भागका जो एक चौथाई अंश है, वह पक्षियोंमें अटल भावसे स्थित होगा । यह तीसरी श्रेणीका जो ज्वर है, वह एक दिनका अन्तर देकर आनेपर एकान्तर या अँतरया कहलायेगा, दो दिनका अन्तर देनेपर तिजरा और तीन दिन- का अन्तर देकर आनेपर वही चातुर्थिक (चौथिया ज्वर) कहलायेगा ॥ २१-२३ ॥ मानुषेष्वभिभेदेन वस त्वं प्रविभज्य वै । जातिष्वथावशेषासु निवंस त्वं शृणुष्व मे ॥ २४ ॥ इन भेद-उपभेदोंके साथ अपने रूपका विभाजन करके तुम मनुष्योंमें निवास करो । साथ ही, जो शेष जातियाँ हैं, उनमें भी तुम वास करो । किस तरह ? यह मुझसे सुनो-॥ वृक्षेषु कीटरूपेण तथा संकोचपत्रकः । पाण्डुपत्रश्च विख्यातः फलेष्वातूर्यमेव च ॥ २५ ॥ वृक्षोंमें तुम कीटरूपसे निवास करो, इसके सिवा वहाँ तुम संकोचपत्रक और पाण्डुपत्रक नामसे विख्यात होगे (वृक्षोंके जो पत्ते सिकुड़ने लगते हैं, यह उनमें संकोचपत्रक नामक ज्वर है और जो उनके पत्ते पीले पड़ने लगते हैं, यह उनमें पाण्डुपत्रक नामक ज्वर है) तथा वृक्षोंके फलोंमें आतूर्यनामसे तुम्हारी ख्याति होगी (फलोंके एक देशमें जाली पड़ जानेसे जो वे फल सिकुड़ने या सूखने लगते हैं, यह उनमें आतूर्यनामक ज्वरका लक्षण है) ॥ २५ ॥ अपां तु नीलिकां विद्याच्छिखोद्भेदेन बर्हिणाम् । पद्मिन्यादौ हिमो भूत्वा पृथिव्यामपि चोपरः ॥ २६ ॥ गैरिकः पर्वतेष्वेव मत्प्रसादाद् भविष्यसि । जलोंमें नीलिकाको ज्वर समझना चाहिये । मोरोंके सिरपर जो शिखा फूट निकलती है, उसीके रूपमें उनके भीतर तुम्हारा वास होगा । तुम कमलिनी आदिपर हिम (पाला), पृथ्वीमें ऊपर तथा पर्वतोंपर गेरू होकर मेरी कृपासे वहाँ निवास करोगे ॥ २६३ ॥ गोष्वपस्मारको भूत्वा खोरकश्च भविष्यसि ॥ २७ ॥ एवं त्वं बहुरूपेण भविष्यसि महीतले । गौओंमें अपस्मार ( कम्पन) और खोरक (खुर- रोग ) होकर रहोगे । इस प्रकार तुम पृथ्वीपर बहुत-से रूपोंमें प्रकट होओगे ॥ २७३ ॥ दर्शनात् स्पर्शनाच्चापि प्राणिनां वधमेष्यसि ॥ २८ ॥ ऋते देवमनुष्याणां नान्यस्त्वां विसहिष्यति । तुम अपने दृष्टिपात और स्पर्शसे भी प्राणियोंका वध कर डालोगे । देवता और मनुष्योंके सिवा दूसरा कोई तुम्हारा वेग नहीं सह सकेगा ॥ २८३ ॥ वैशम्पायन उवाच कृष्णस्य वचनं श्रुत्वा ज्वरो हृष्टमना ह्यभूत् ॥ २९ ॥ प्रोवाच वचनं किंचित् प्रणमित्वा कृताञ्जलिः । वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! श्रीकृष्णकी यह बात सुनकर ज्वरका मन प्रसन्न हो गया । उसने हाथ जोड़कर प्रणाम करके कुछ बात कही ॥ २९३ ॥ ज्वर उवाच सर्वजातिप्रभुत्वेन कृतो धन्योऽस्मि माधव ॥ ३० ॥ भूयश्च ते वचः कर्तुमिच्छामि पुरुषर्षभ । तदाज्ञापय गोविन्द किं करोमि महाभुज ॥ ३१ ॥ ज्वर बोला—पुरुषप्रवर माधव ! आपने सभी जातिके प्राणियोंपर मेरी प्रभुता स्थापित करके मुझे धन्य कर दिया । महाबाहु गोविन्द ! अब मैं पुनः आपकी आज्ञाका पालन करना चाहता हूँ । अतः आज्ञा दीजिये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ ॥ ३०-३१ ॥ अहमसुरकुलप्रमाथिना त्रिपुरहरेण हरेण निर्मितः । रणशिरसि विनिर्जितस्त्वया प्रभुरसि देव तवास्मि किंकरः ॥ ३२ ॥ देव ! असुरकुलनाशक और त्रिपुरसंहारक भगवान् हरने मेरी सृष्टि की है, आज युद्धके मुहानेपर आपने मुझे पराजित कर दिया । अतः आप मेरे प्रभु हैं और मैं आपका किङ्कर हूँ ॥ ३२ ॥ धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यत् त्वया मत्प्रियं कृतम् । आज्ञापय प्रियं किं ते चक्रायुध करोम्यहम् ॥ ३३ ॥ चक्रधारी श्रीकृष्ण ! आपने जो मेरा प्रिय किया, इससे मैं धन्य हो गया । आपके अनुग्रहका पात्र बन गया, अब आज्ञा दीजिये, मैं आपका कौन सा प्रिय कार्य सम्पन्न करूँ ? ॥ वैशम्पायन उवाच ज्वरस्य वचनं श्रुत्वा वासुदेवोऽब्रवीद् वचः । अभिसंधिं शृणुष्वाद्य यत्त्वां वक्ष्यामि निश्चयात् ॥३४॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! ज्वरका यह वचन सुनकर वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णने कहा—'ज्वर ! मैं क्या चाहता हूँ; यह सुनो । मैं निश्चित रूपसे तुमसे जो कुछ कहता हूँ, उसपर ध्यान दो' ॥ ३४ ॥ श्रीभगवानुवाच महाहवे तव मम च द्वयोरिमं पराक्रमं भुजबलकेवलाश्रयोः ।